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    कोरोना काल में बढ़ेगा कुपोषण का प्रभाव?


    कोरोना वायरस दिन दूनी रात चौगुनी के साथ विस्तार ले रहा है। इस वायरस के बढ़ते आंकड़ो ने न केवल हमारी ज़िंदगी की रफ़्तार पर ब्रेक लगाया है बल्कि हमारी दिनचर्या को भी काफी हद तक प्रभावित किया है। आज हर व्यक्ति पोष्टिक आहार और अपने स्वास्थ्य के प्रति चिंतित नजर आ रहा है। एक कहावत है- यथा अन्नम तथा मन्नम… जैसा अन्न हम खाते है, वैसा ही हमारा मानसिक और भौतिक विकास भी होता है। वर्तमान समय में न ही पोष्टिक अन्न मिल रहा है और न ही मानसिक सुकून मिल रहा है। आज खाने की वस्तुओं में पोषक तत्वों से कही अधिक जहर की मात्रा पाई जा रही है। मिलावट के जहर ने स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। जिसके कारण कई गंभीर रोगों का खतरा बढ़ रहा है। जिनमें कुपोषण सबसे गंभीर समस्या बन हुआ है।
           पोषण शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाने के लिए 1982 में केंद्र सरकार ने पहली बार राष्ट्रीय पोषण सप्ताह की शुरुआत की थी। राष्ट्रीय विकास में सबसे बड़ी बाधा कुपोषण ही है। इसके प्रति जागरूकता फैलाने तथा देश को कुपोषण से मुक्ति दिलाने के लिए ही प्रति वर्ष “पोषण सप्ताह” मनाया जाता है। इस वर्ष राष्ट्रीय पोषण सप्ताह 1 सितंबर से 7 सितंबर तक मनाया जा रहा है। कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण ने आज हर व्यक्ति को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से प्रभावित किया है। आज संकट की घड़ी में यह आवश्यक हो गया है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहे, लेकिन देश की उस अधिसंख्य जनसंख्या का क्या? जिसे रहनुमाई व्यवस्था कोरोना काल में सिर्फ़ पांच किलो चावल और एक किलो चना देकर स्वस्थ देखने का वितंडा कर रही है!
                प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक भारत को कुपोषण से मुक्ति दिलाने के लिए पोषण अभियान शुरू किया है। इस अभियान में केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को शामिल किया है। इस पोषण अभियान की टैगलाइन- “सही पोषण-देश रोशन” रखी गयी है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों, गर्भवती महिलाओं ओर स्तनपान करने वाली महिलाओं को पोषण प्रदान करना है। देखा जाए तो हमारे देश मे कुपोषण से मुक्ति के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है, लेकिन अब भी हम कुपोषण में शीर्ष पर बने हुए है। इसकी सबसे बड़ी वजह जागरूकता की कमी और सरकारी योजनाओं में आपसी तालमेल न होना है। जिसकी वजह से आज भी जरूरतमंदों को इन सरकारी योजनाओं का लाभ नही मिल पाता है। हाल ही में जारी ग्लोबल न्यूट्रिशन की रिपोर्ट में भी यह अंदेशा जताया गया है कि भारत 2025 तक अपने न्यूट्रिशन लक्ष्य को पूरा नही कर पायेगा। कोरोना वायरस के दौर में आज हर व्यक्ति को भरपूर मात्रा में न्यूट्रिशन और पोषण की जरूरत है जिससे इम्यून सिस्टम बेहतर रहे। रिपोर्ट में कहा गया है कि पोषण में असमानता के कारण 2012 में जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे वह 2025 तक पूरे होते नही दिख रहे है। हमारे देश मे कुपोषण बहुत ही विकट समस्या बनती जा रही है। वैश्विक परिदृश्य पर देखे तो नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे देश ही हमसे खराब स्थिति में है। ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2020 में कहा गया है, कि कुपोषण का सबसे बड़ा कारण लिंगभेद, भौगोलिक परिस्थिति, उम्र और जाति आधारित असमानता है।
             यूनिसेफ ने भी हाल में कोविड-19 महामारी के सम्बंध में अपनी चिंता व्यक्त की है। यूनिसेफ का कहना है कि कोरोना काल मे लगभग 67 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हो सकते है। भारत मे 5 साल से कम आयु के 2 करोड़ बच्चे कुपोषण जैसी गम्भीर समस्या से ग्रस्त है। वैश्विक भूख सूचकांक- 2019 के अनुसार भारत में बच्चों में कुपोषण की समस्या जहां 2008-2012 के बीच 16.5 फीसदी थी वही 2014-2018 में बढ़कर 20.8 फीसदी हो गई। साल 2019 की ही बात करे तो करीब 4 करोड़ सत्तर लाख बच्चे कुपोषण का दंश झेल रहे है। जाहिर सी बात है कि कोरोना काल मे यह आंकड़ा कई गुना बढ़ोतरी कर सकता है।

          कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप का दुष्परिणाम है, कि दिहाड़ी मजदूरी करने वाला बहुत बड़ा तबका बेरोजगार हो गया है। यही बेरोजगारी भुखमरी और कुपोषण को कई गुना बढ़ा रही है। आज आधी आबादी दो जून की रोटी को तरस रहा है ऐसे समय मे कैसे उम्मीद करें कि मानव को सही पोषण आहार मिल सकेगा? वही कोरोना काल मे स्कूल बंद होने की वजह से बच्चों को मिड डे मील योजना का लाभ भी नही मिला पा रहा है। यह तो जग जाहिर है कि कुपोषण का सबसे अधिक असर नवजात शिशु और महिलाओं पर ही होता है और इस कुचक्र की शुरुआत बचपन से ही शुरू हो जाती है। कम उम्र में लड़कियों की शादी का देना जिससे उचित शारिरिक विकास संभव नही हो पाता है। कम उम्र में महिलाएं बच्चों को जन्म दे देती है। जिससे महिलाएं और बच्चे दोनो ही कुपोषण और एनीमिया जैसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाते है। कुपोषण आज के समय मे सबसे गम्भीर समस्या बन गयी है। कुपोषण का शिकार होने से बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास नही हो पाता है। कुपोषण को कम करना है तो महिलाओं को कुपोषण के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है। जिन लोगों को भोजन नही मिल रहा है, उनके लिए ऐसी योजनाएं बनाई जाए जिससे पेट भर भोजन ही नही बल्कि न्यूट्रिशन युक्त भोजन मिल सके। हमारे देश मे लगभग 40 प्रतिशत अन्न बिना उपयोग के बर्बाद हो जाता है। उस अन्न को किसी न किसी रूप में गरीबो तक पहुँचाने की उचित व्यवस्था की जाना चाहिए। इससे भी कुछ हद तक कुपोषण का कलंक दूर किया जा सकता है।
    सोनम लववंशी

    सोनम लववंशी
    सोनम लववंशी
    स्वतंत्र लेखिका

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