लेखक परिचय

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

मीणा-आदिवासी परिवार में जन्म। तीसरी कक्षा के बाद पढाई छूटी! बाद में नियमित पढाई केवल 04 वर्ष! जीवन के 07 वर्ष बाल-मजदूर एवं बाल-कृषक। निर्दोष होकर भी 04 वर्ष 02 माह 26 दिन 04 जेलों में गुजारे। जेल के दौरान-कई सौ पुस्तकों का अध्ययन, कविता लेखन किया एवं जेल में ही ग्रेज्युएशन डिग्री पूर्ण की! 20 वर्ष 09 माह 05 दिन रेलवे में मजदूरी करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति! हिन्दू धर्म, जाति, वर्ग, वर्ण, समाज, कानून, अर्थ व्यवस्था, आतंकवाद, नक्सलवाद, राजनीति, कानून, संविधान, स्वास्थ्य, मानव व्यवहार, मानव मनोविज्ञान, दाम्पत्य, आध्यात्म, दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक उत्पीड़न सहित अनेकानेक विषयों पर सतत लेखन और चिन्तन! विश्लेषक, टिप्पणीकार, कवि, शायर और शोधार्थी! छोटे बच्चों, वंचित वर्गों और औरतों के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावमय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययनरत! मुख्य संस्थापक तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष-‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान’ (BAAS), राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स एसोसिएशन (JMWA), पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा/जजा संगठनों का अ.भा. परिसंघ, पूर्व अध्यक्ष-अ.भा. भील-मीणा संघर्ष मोर्चा एवं पूर्व प्रकाशक तथा सम्पादक-प्रेसपालिका (हिन्दी पाक्षिक)।

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यह अवस्था अर्थात् तृप्ति या ऑर्गेज्म तो स्त्री की पुरुष के समक्ष हार या समर्पण का स्वाभाविक प्रतिफल होता है, जबकि ऐसी आधुनिका नारियों का अवचेतन तो इतना रुग्ण हो चुका होता है कि वे पुरुष के समक्ष अपना सबकुछ समर्पित करके हार जाने के बजाय कुछ भी समर्पित नहीं करके सब कुछ पा लेने की लालसा लिये और बिना दिल से जुड़े केवल शरीर का अपनी शर्तों के अनुसार मनचाहा मिलन (संसर्ग) करने में अपनी शान समझती हैं| जिन्हें, उनके तथाकथित प्रेमी भी एक देह से अधिक कुछ नहीं समझते हैं और जो पुरुष सिर्फ देह से जुड़ता है, वह स्त्री को वह सब कभी नहीं दे सकता जो एक स्त्री की प्रकृतिप्रदत्त आकांक्षा होती है|

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
एक जमाना था, जब स्त्रियॉं अपने मन की पीड़ा सिर्फ अपनी अनेकानेक और खासमखास सहेलियों से बांटकर अपने मन को हल्का कर लिया करती थी| समय बदला और सहेलियों पर से भी विश्‍वास डगमगाने लगा तो स्त्री घुटन में जीने लगी, लेकिन फिर भी वह अपनी भाभी या ननद या किसी अन्य स्त्री में अपनी सहेली ढूँढती रही और अपने दिल का दर्द या बोझ बांटती रही और उसे समाधान के नाम पर सहानुभूतियॉं मिलती रही या उसको अपनी व्यथा कहने के बाद पता चलता कि उसका ही जैसा दर्द उसकी अनेकों साथी स्त्रियों का भी है| जिससे उसे अहसास होता रहा कि अकेली वही पीड़ा नहीं झेल रही है| और भी हैं जो उसके ही समान या उससे भी भारी पीड़ा झेल रही हैं| उसे संस्कारों में सीखने को मिलता रहा है कि ‘सहना’ और ‘सहना’ स्त्री का सहज स्वभाव है| जो सह नहीं सकती वो समर्पण नहीं कर सकती| इसलिये स्त्रियों को बड़े से बड़े दु:ख सहने की आदीकाल से आदत रही है| उसके अवचेतन मन ने इसे सहजता से अंगीकार कर कर लिया है|
यही बड़ा कारण है कि किसी अपवाद को छोड़ दिया जाये तो स्त्रियों की हृदयाघात से मौत नहीं होती है| वे जीवनभर ही तो आघात सहती और दूसरों को देती रहती हैं, ऐसे में उनका हृदय, जो प्रकृति की ओर से कोमल होते हुए भी इतना कठोर हो चुका होता है कि वे बड़े से बड़े आघात को सहने में सक्षम हो जाती है और इसके प्रतिफल में हृदयाघात जैसी जानलेवा बीमारी से सफलता पूर्वक लड़कर जीत जाती हैं| बल्कि अधिक सही तो यही होगा कि स्त्री को हृदयाघात की समस्या का सामना ही नहीं करना पड़ता है| जिसे स्त्री की मजबूती माना जाये या कोमल हृदयी और बात-बात पर रोने वाली स्त्री की ताकत? यह एक बड़ा विषय है, जिस पर कभी अलग से लिखना होगा|
फिलहाल तो बात स्त्री के दिल के दर्द की है| जिसे आजकल की स्त्रियॉं इण्टरनेट अर्थात् अन्तरजाल पर उड़ेल रही हैं| अच्छी बात है कि दिल तो हल्का हो ही जाता होगा, लेकिन अन्तरजाल पर ऐसी आन्तरिक और हृदय की वेदनाओं को समझकर सच्चे हृदय से समझने और सहलाने वाले और सही समाधान सुझाने वाले हैं, कहॉं? यदि हैं भी तो कितने? सबसे बड़ी समस्या तो ये भी है कि अन्तरजाल हर प्रकार के कथित ज्ञान रूपी सुझावों से भरा पड़ा है| ऐसे में किसे सच्चा ज्ञान माना जाये और किसे नकारा जाये? यहॉं तो नब्बे फीसदी से अधिक तो केवल अपनी ही भड़ास या कहो मन की गन्दगी निकालने हाजिर होते हैं और अन्जरजाल को और गन्दा तथा अविश्‍वसनीय बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते!पिछले दिनों अन्तरजाल पर मैं कुछ पढ रहा था तो अचानक मेरी नजर पड़ी-‘‘जल्दी बोर हो जाती हूँ’’ शीर्षक पर, जिसमें किसी अनाम या कहो छद्म नाम-‘एबीसी’ के जरिये किसी स्त्री की पीड़ा निम्न शब्दों में प्रदर्शित पढने को मिली-

‘‘मेरा डिवॉर्स (तलाक) हो चुका है| मेरी प्रॉब्लम बहुत ही अलग (अर्थात् ये स्त्री मानती है कि केवल उसे ही ऐसी समस्या है) है| मैं चार लड़कों के साथ रिलेशनशिप में रह चुकी हूँ, लेकिन किसी के साथ भी मेरा रिश्ता लंबा नहीं चलता| दरअसल, मैं उनसे जल्दी बोर हो जाती हूँ| मेरे उनके साथ फिजिकल रिलेशन भी हैं| बावजूद इसके एक या दो साल में वे मुझे खराब लगने लगते हैं| थोड़ी-सी अनबन होते ही मेरा ध्यान दूसरे की तरफ भागने लगता है| मुझे बताएं कि मैं कैसे एक के साथ ही रिलेशन बनाकर रख सकती हूँ|-एबीसी’’

जहॉं मन की उलझनों या समस्याओं को आगे से आमन्त्रित किया गया हो तो वहॉं पर, उनका समाधान देना भी अनिवार्य कर्त्तव्य बन जाता है, सो उक्त मन की उलझन या समस्या का समाधान भी एक साइकोलोजिस्ट की ओर से निम्न शब्दों में प्रकाशित किया गया है-

‘‘कभी-कभार हमारा माइंड सेट ऐसा हो जाता है कि वह किसी भी रिलेशन को लंबे वक्त तक नहीं निभा पाता| हमारे पास्ट एक्स्पीरियंस भी हमें लाइफ में आगे बढ़ने से रोकते हैं| ऐसे में कोई सुझाव देना तो मुश्किल होगा, लेकिन साइकोथेरपी (मनोचिकित्सा) आपको इसमें आपकी काफी हद तक मदद कर सकती है| आप प्रोफेशनल काउंसिलिंग भी ले सकती हैं|’’

यही नहीं इस विषय के नीचे पाठकों की ओर से भी समाधान सुझाये और प्रकाशित किये गये हैं| जिन्हें ज्यों का त्यों उद्धरित करना भी मैं उचित नहीं समझता हूँ| यद्यपि पाठकों के सुझावों के सार को बतलाया जाना विषय को समझने और पाठकों को बतलाने के लिये जरूरी है| अधिकतर पुरुष पाठकों ने ही प्रतिक्रिया दी है और उनमें से सभी ने अपनी-अपनी टिप्पणी के साथ खुद से सम्पर्क करने का आग्रह करते हुए अपने-अपने मोबाइल नम्बर भी प्रदर्शित किये हुए हैं| पाठकों के विचार, कुछ इस प्रकार हैं-

सभी बंदे इक जैसे नही होते ..अगर आप एक अच्छा रिलेशन चाहती है तो मुझसे सम्पर्क करें….| प्लीज़ कॉल मी अगर आप बडिया सोल्यूशन चाहती हो…| कॉल मी यदि आप एक अच्छी फ्रेंडशिप चाहती है तो…! इसका मतलब साफ है, आप दूसरी लड़कियों की तरह नहीं हैं (अर्थात् सति-सावित्री) आप सेक्स धंधा शुरू कर दीजिये| वहॉं हर बार अलग लोग मिलेंगे, जिनसे तुम्हारा मन नहीं भरेगा| कभी आप किसी के साथ घर मत बसाना वर्ना बेचारे की लाइफ खराब हो जायेगी….! सभी बंदे इक जैसे नहीं होते…..अगर आप एक अच्छा रिलेशन चाहती हैं तो मुझे काल करें….! अरे जब आप इतने लोगों का भला कर रही हो तो क्यू एक के साथ रिलेशन बना के रखना चाहती हो जो कर रही हो वो ही करती रहो…!……तेरे जैसी लड़किओं से…..इस देश का कल्चर खराब हो रहा है, तुझे इंसान का नहीं…..का ……चाहिये…..! चलिये आप मुझसे बात कीजिये देखते हैं कि आपका रिलेशन क्यों नहीं टिकता वो तो फोन पर बात करके पता लग ही जाएगा कि आप क्या कहती हैं? जिसकी वजह से रिलेशन नहीं टिकता…! ………मेडम जी आप मृगतृष्णा की शिकार हो गयी हैं, जैसे हिरण पानी की तलाश मे रेगिस्तान मे भटकता है, आप अपनी भूख मिटाने के लिये चार क्या चालीस से सम्बन्ध रखो यह भूख कभी मिटने वाली नहीं है, आप शारीरिक भूख की जगह किसी सच्चे प्यार की तलाश कीजिये आपका प्राब्लम सॉल्व हो जायेगा, आपकी शारीरिक भूख मिटाने के लिए बहुत ही मिल जायेंगे, मगर प्यार करने वॉला सिर्फ एल ही सही आदमी मिलेगा और उस सच्चे प्यार में ना आप बोर होंगी और आपकी मृगतृष्णा भी समाप्त हो जायेगी, अगर आपको प्यार करने वॉला नहीं मिलता है तो उसके लिये मैं आपको एक गाना रिमाइंड करता हूँ- ‘मेरा जीवन कोरा काग़ज़, कोरा ही रह गया..गुड लक!’

इसी पर एक मात्र स्त्री की प्रतिक्रिया भी उद्धरित करना जरूरी है-

मेरी समस्या थोड़ी दूसरी है, मैंने 10-12 लड़कों के साथ रिलेशन बनाया है और सबके साथ खूब एंजाय किया| अब हालत ये हैं कि किसी के साथ रिश्ता तोड़ने के बारे मे सोच भी नहीं सकती!

इतनी सारी टिप्पणियॉं पढने के बाद मैंने अपनी राय वहॉं पर लिखकर प्रदर्शित करनी चाही तो पता चला कि टिप्पणी के कालम में शब्द सीमा का बन्धन है| अत: संक्षेप में ही बात कही या लिखी जा सकती है| जबकि मुझे तो अपनी बात विस्तार से कहने की आदत है| वैसे भी यह ऐसा छोटा विषय नहीं है कि सार में बात कहकर मामले को रफादफा समझ लिया जाये| सो हमने दो टुकड़ों में अपनी बात संक्षेप में प्रदर्शित की, लेकिन सन्तोष नहीं मिला तो, सोचा इस बारे में अलग से ही एक लेख लिख दिया जाये|

इस बारे में प्रश्‍नकर्ता महोदया को सम्बोधित करते हुए ही मैं अपनी बात रखना उचित समझता हूँ|

मैडम वैसे तो आपको डॉ. (साईकॉलोजिस्ट) अपनी राय दे ही चुके हैं और बहुत सारे पाठक भी अपनी भड़ास निकाल ही चुके हैं! जिसे बिना सेंसर किये प्रकाशित भी किया जा चुका है!

मुझे ऐसा लगता है कि आपकी समस्या आपके नियन्त्रण में नहीं है, केवल मामला शारीरिक संबंधों तक ही सीमित नहीं है, जैसा कि अधिकतर पाठक समझ या सोच रहे हैं! दाम्पत्य विवाद परामर्शदाता के रूप में प्रेक्टिस के दौरान ऐसे अनेक मामले मेरे सामने भी आते रहे हैं! हमारे सभ्य कहलाने वाले समाज में ऐसे बहुत सारे स्त्री-पुरुष हैं, जिनका एक दो या दस बीस से मन नहीं भरता और वे लगातार, बल्कि उम्रभर ही अपने साथी बदलते रहते हैं! फर्क यही है कि वे अपनी इस आदत को समस्या ही नहीं मानते और उसे छिपाकर ही मर जाते हैं!

मैडम जी आपने गुप्त या छद्म नाम से ही सही, लेकिन अपनी समस्या के समाधान हेतु एक प्रयास तो किया है! जिसका साफ मतलब है कि आप खुद भी इस प्रकार के सम्बन्धों से तंग आ चुकी हैं! ऐसे में आप उपहास की या मजाक की पात्र तो कतई भी नहीं हैं! जैसा कि यहॉं पाठकों का व्यवहार है!

मुझे याद है कि एक महिला पचपन वर्ष की आयु में अपने पौते को साथ लेकर मेरे पास आयी थी और उसने अकेले में बताया कि वह सौ से अधिक मर्दों से सम्भोग कर चुकी है और मौका मिलते ही नए की बॉंहों में जाना चाहती है! लेकिन अधिक पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि उसकी समस्या शारीरिक नहीं, या सेक्स की असीमित भूख नहीं, बल्कि मानसिक अधिक थी! जिसे मैं मनोशारीरिक समस्या कहता हूँ!
इसी प्रकार से मैं एक ऐसे अधिकारी का उल्लेख करना चाहूँगा जो 55 वर्ष की आयु में भी अपने सरकारी दौरों के दौरान अपने अमचे-चमचों से 16 से 20 वर्ष तक की लड़कियों की व्यवस्था करने का आग्रह किया करता था| यही नहीं, इसके एवज में वह अपने अमचों-चमचों को अपनी पदस्थिति का दुरुपयोग करके अनेक प्रकार के लाभ भी पहुँचाता था| उसका साफ कहना था कि व कई सौ स्त्रियों का भोग कर चुका है और अन्तिम क्षण तक करता रहेगा| 

इस प्रकार की समस्याओं के लिए वैवाहिक रिश्ते और यौन सम्बन्धों के बारे में हमारे समाज की रुग्ण मानसिकता भी एक सीमा तक जिम्मेदार है! हमें इस प्रकार के मामलों को मजाक में उड़ाने के बजाय इनके समाधान के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा! जो इस बारे में नहीं सोचना चाहते वे चाहें तो अपना और अपने पिता का डीएनए जांच करवा लें! डीएनए के परिणाम सामने आने पर समाज का ढांचा एक क्षण में भरभराकर गिर जायेगा|

फिर ये सलाह देने वाले तथाकथित महान पुरुष मुंह छिपाने के लिये भी जगह नहीं ढूँढ सकेंगे! आज नहीं आदिकाल से पुरुष परायी औरतों को अपनी कामतृप्ति के लिये लालायित करके, अपनी कामनाओं का साधन बनाता रहा है| ऐसी स्त्रियॉं बेशक शर्म और हया ओढकर सति-सावित्री बनकर ऐसे मर्दों का अनमने मन से साथ देती रही हों, लेकिन सच में उन्हें भी हमेशा से ज्ञात रहा है कि पुरुष की कमजोरी-स्त्री का कमनीय शरीर ही है| प्रारम्भ से आज तक स्त्री पुरुष के अधीन रही है| जिसमें आर्थिक निर्भरता भी बड़ा पीड़ादायक कारण रहा है, जिसके चलते एक स्त्री एक पुरुष के समक्ष अपनी देह को समर्पित करती रही है, लेकिन इसका यही एक मात्र कारण नहीं है|

प्रस्तुत समस्या को सामने रखें तो यह आज की एक सुशिक्षित और आधुनिका कहलाने वाली ऐसी स्त्री की पीड़ा है, जो अपने आपको पुरुष से कम नहीं मानती हैं| और यहीं से दाम्पत्य जीवन या दाम्पत्य सुख का बिखराव शुरू हो जाता है| जैसे ही एक स्त्री प्रकृतिप्रदत्त अपने अमूल्य स्त्रैण गुण को त्यागकर पुरुष की भांति दिखने और पुरुष की भॉंति आचरण करने का दिखावा या नाटक करने लगती है तो वह अपने स्वाभाविक स्त्रैण गुण को तो खो ही देती है| साथ ही साथ वह कभी भी पौरुष गुणों को अपनी देह में स्वीकार या अपना नहीं पाती है| ऐसे में उसका अवचेतन न तो सम्पूर्णता से स्त्रैण ही रह पाता है और न हीं पौरुष गुणों को स्वीकार कर पाता है|

इन हालातों में स्त्री का कोमल मन स्त्री मन की संवेदनाओं के बजाय वितृष्णा और नफरत से भर जाता है, लेकिन इसके साथ-साथ प्रकृति अपना काम करती रहती है और शरीर की आकांक्षाएँ लगातार जन्म लेती और मरती रहती हैं| ऐसे में ऐसी स्त्रियों का पुरुष से मिलन, पुरुष के समक्ष अपने आपको समर्पित करने के लिये नहीं, बल्कि मजे लूटने के एक मात्र उद्देश्य के लिये होता है| जिसमें स्त्री अधिकतर अवसरों पर चरम-बिन्दु या तृप्ति या ऑर्गेज्म पर नहीं पहुँच पाती हैं| यह अवस्था अर्थात् तृप्ति या ऑर्गेज्म तो स्त्री की पुरुष के समक्ष हार या समर्पण का स्वाभाविक प्रतिफल होता है, जबकि ऐसी आधुनिका नारियों का अवचेतन तो इतना रुग्ण हो चुका होता है कि वे पुरुष के समक्ष अपना सबकुछ समर्पित करके हार जाने के बजाय कुछ भी समर्पित नहीं करके सब कुछ पा लेने की लालसा लिये और बिना दिल से जुड़े केवल शरीर का अपनी शर्तों के अनुसार मनचाहा मिलन (संसर्ग) करने में अपनी शान समझती हैं| जिन्हें, उनके तथाकथित प्रेमी भी एक देह से अधिक कुछ नहीं समझते हैं और जो पुरुष सिर्फ देह से जुड़ता है, वह स्त्री को वह सब कभी नहीं दे सकता जो एक स्त्री की प्रकृतिप्रदत्त आकांक्षा होती है|

विज्ञान भी इस बात को स्वीकार कर चुका है कि एक सामान्य पुरुष सामान्यत: सम्भोग को यौनांगों और दिमांग तक ही सीमित मानता है, जबकि एक स्त्री का रोम-रोम सम्भोग करता है| स्त्री के रोम-रोम को यौनानन्द से आप्लावित करने वाले कोई विरले ही समझदार पुरुष होते हैं| इसलिये सदा से स्त्री को सम्भोग में असन्तोष और अतृप्ति का दर्द विरासत में मिला है| ऊपर से स्त्री ने अपने स्त्रैण गुणों को त्यागकर स्वयं को हर क्षेत्र में पुरुष के समान प्रदर्शित करने का आत्मघाती व्यवहार जीवन में अपनाया| इसी के साथ-साथ विज्ञान ने स्त्री को अनचाहे गर्भ से मुक्ति दे दी है| स्त्री शिक्षा का तेजी से प्रचार-प्रसार हुआ है| स्त्री घर की दहलीज से बाहर निकलकर कामकाजी महिला बन गयी है| उसे स्कूल से कॉलेज होते हुए दफ्तर तक पहुँचते-पहुँचते सेक्स की अनेक खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरते हुए अनेक प्रकार की फंतासियों और अनेक प्रकार के पुरुषों की असलियत के साथ-साथ स्त्री शरीर की पुरुष की नजर में महत्ता का अहसास भी होता जाता है| इसी के साथ-साथ स्त्री मुक्ति, स्त्री सशक्तिकरण, स्त्री के अधिकार, स्त्री-पुरुष की बराबरी जैसे अनेक मिथकों या सम्भावनाओं या सच्चाईयों से भी वह दो-चार होते हुए अपने कौमार्य को विवाह पूर्व खो चुकने के अपराधबोध से ग्रस्त होकर भी आधुनिका कहलाने और मनचाहे तरीके से सेक्स सुख पाने की कभी पूर्ण न हो सकने वाली आत्मघाती पीड़ा को झेलते हुए कशमशाकर रह जाती है|

स्त्रैण गुणों से रिक्त ऐसी स्त्री में निष्ठा, प्रतीक्षा, विश्‍वास, कोमलता, माधुर्य, सरलता, नम्रता, उदारता, समर्पण, सुघड़ता, दयालुता आदि नैसर्गिक गुण धीरे-धीरे विनष्ट होने लगते हैं, जो सफल दाम्पत्य के लिये अपरिहार्य होते हैं| केवल इतना ही नहीं, बल्कि आज के समय में पुरुष भी पहले से भी अधिक गये-गुजरे हो चुके हैं, वे मानकर चलते हैं कि स्त्रियॉं भी अब पुरुषों से कम यौनाचारी नहीं हैं| ऐसे में विवाह के बाद आपसी विश्‍वास, समर्पण और सम्मान का भाव दोनों ओर से गायब हो जाता है| ऐसे में इन विवाहित जोड़ों में आपस में बंधे रहने के लिये तथाकथित प्यार ही एक मात्र आधार शेष रह जाता है, जो भी खोखला और अनेक पूर्व खट्टे-मीठे अनुभवों पर आधारित प्यार की जूठन ही शेष बचता है, जिसका आधार हृदय की पवित्र धारा नहीं, बल्कि बदन की ठण्डी हो चुकी आग होती है| जिसे जलाये रखने का दिखावा करते हुए और आपस में एक-दूसरे से सच्चा प्यार करते रहने का नाटक करते हुए कितने समय तक साथ रहा जा सकता है? यह पहले दिन से ही असम्भव कार्य है| जिसका अन्त वही होना है जो इस मामले में इन महिला ने लिखा है|

अन्त में यह भी लिख दूँ कि आज भी सच्ची स्त्री, सच्चे पुरुष और सच्चा प्यार जिन्दा है| आज भी एक दूसरे पर जान लुटाने को बेताब पति-पत्नियों का वजूद कायम है| आज भी पति-पत्नी दाम्पत्य जीवन के रसास्वादन का महत्व समझने और दूसरों को समझा सकने योग्य भी हैं, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम रह गयी है| जिसकी वजह बहुत सारी हैं| कुछ का ऊपर उल्लेख किया गया है| यौन शिक्षा के नाम पर या एड्स से बचाव के नाम पर या स्त्री-पुरुष की समानता के नाम पर जो कुछ सरकार और मार्केट द्वारा टीवी और इण्टरनेट पर खुलेआम परोसा जा रहा है, वह हमारे सहज सम्बन्धों को हमशा के लिये बर्बाद कर रहा है| दुष्परिणाम सामने हैं, हर मोहल्ले में इस प्रकार के स्त्री और पुरुष आसानी से मिल जायेंगे, जो हर पल घुट-घुट कर जीने को विवश हैं और पल-पल मर रहे हैं| जिससे व्यभिचार और अनेक प्रकार की शारीरिक और मानसिक बीमारियों को बढावा मिल रहा है| समाज में नित नयी शारीरिक और मानसिक विकृत्तियॉं जन्म ले रही हैं| जिनके चलते अनेक लोग हत्या और आत्महत्या कर रहे हैं| जिनके वास्तविक कारणों को समझे या समझाये बिना तथाकथित समझदार और एक्सपर्ट समाधान सुझाकर ऐसे लोगों के जीवनों को अधिक बर्बाद कर रहे हैं|

अन्त में मेरी सलाह है कि ये जो भी महिला हैं, या इन जैसी परिस्थितियॉं का सामना कर रहे जो भी स्त्री या पुरुष हैं| जो हजारों ही नहीं लाखों की संख्या में मौजूद हैं| उन्हें चाहिये कि अपनी शर्म और शंकोच को त्यागकर किसी योग्य और विश्वसनीय दाम्पत्य सलाहकार को ढूँढे और उसके समक्ष अपनी पीड़ा को ईमानदारी से प्रस्तुत करें| इस प्रकार के स्त्री-पुरुषों की समस्याएँ वास्तविक हैं और इनका समाधान संभव है! लेकिन एक बात याद रखने की है, विशेषकर स्त्रियों के लिये कि वे समस्याओं से निजात पाने के लिये सहानुभूतियों पर निर्भर रहना छोड़कर समाधान तलाशें| क्योंकि आलौकिक यौन सुख और सच्चा दाम्पत्य सुख सहानुभूतियों के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि सच्चे और व्यावहारिक समाधान से ही मिल सकता है|

इसी प्रकार सफल दाम्पत्य का आधार केवल किताबी सिद्धान्त नहीं हैं, बल्कि स्त्री-पुरुष का आपसी और सच्चा विश्वास और सद्व्यवहार है| एक महत्वपूर्ण बात यह और कि यदि स्त्री को सच में ही केवल यौन-सुख ही नहीं, बल्कि यौनानन्द की वास्तविक तृप्ति की सुखानुभूति का स्वप्निल सुख भोगना है, तो पहली बात तो यह समझने की है कि यह सुख पुरुष की नकल करने वाली स्त्रियों को तो कभी भी नहीं मिल सकता| इसके लिये उन्हें स्त्री के सभी स्वाभाविक गुणों को अपने अन्दर जिन्दा करना होगा और पूर्ण-स्त्रैणता के साथ स्त्री को सच्चे-नैसर्गिक हृदय से और बिना नाटक किये अन्तरंग क्षणों में पुरुष के हाथों पराजित होने में सुखानुभूति के सच्चे अहसास को सीखना, समझना और सच्चे पुरुष साथी पर दिल खोलकर उंडेलना होगा| क्योंकि प्रकृति की सच्चाई यही है कि एक स्त्री बिना हारे, जीत नहीं सकती| स्त्री की सच्ची हार में ही स्त्री की सच्ची और चिरस्थायी जीत का रहस्य छिपा है|

2 Responses to “बिना हारे, स्त्री जीत नहीं सकती!”

  1. बी एन गोयल

    B N Goyal

    इसे एक अनुसंधानात्मक लेख कहेंगे | इस प्रकार की समस्याएं प्रायः विभिन्न पत्रिकाओं के समस्या समाधान के कालम में पढ़ी जा सकती हैं | जिन महिलाओं को उद्धरत किया गया है वे एक विशेष प्रकार की रुग्णता से पीड़ित हैं | कारण भी समझा जा सकता है | ये स्त्रियाँ आप से किसी उपचार की अपेक्षा करती हैं न की आप की हंसी या व्यंग्य | इन का उपचार एक मनो-चिकित्सक ही कर सकता है |

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