लेखक परिचय

नीरज वर्मा

नीरज वर्मा

1998 से सक्रिय, टी.वी.पत्रकारिता की शुरुवात , 16 सालों का तज़ुर्बा, राजनीति-आध्यात्म-समाज और मीडिया पर लगातार लेखन ! एक्टिव ब्लॉगर ! हिन्दी-मराठी-अंग्रेजी-भोजपुरी पर ख़ासी पकड़ ! अघोर-परम्परा पर, पिछले कई सालों से लगातार शोध !

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-नीरज वर्मा-   banaras

भारतवर्ष ! उसका एक बड़ा और अहम हिस्सा उत्तर-प्रदेश ! और उत्तर-प्रदेश का बेहद अहम् हिस्सा वाराणसी / काशी / बनारस ! मोक्ष की नगरी – तीर्थाटन की नगरी – और औघड़-दानी भगवान शिव की नगरी ! हिन्दुस्तानी संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक ! विदेशों में सर्वाधिक लोकप्रिय भारतीय शहर ! एक अजीब सा शहर ! “आज” और “कल” को बेहद करीब से समेटा हुआ ! हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका घाट पर- जीवन के अंत और सत्य का एहसास कराने कराने वाली- जलती लाशें और अपने को जाते देखते हुए उनके “अपने” ! और महज़ 100 मीटर के फासले पर जीवन जीने की ज़िंदादिली और मस्ती भरा संसार ! बेहद कम फासला ! दो हकीकतः करीब-करीब गलबहियां करती हुईं ! सैकड़ों की संख्या में बिंदास घूमते विदेशी और दूसरी तरफ लखनवी तहजीब से बे-खबर अपने पुराने अक्खड़पन और बे-फिक्र अंदाज़ में सदियों से लोगों को आकर्षित करता बनारस और इस शहर के लोग ! शानो-शौकत की ज़िंदगी (जिसका सपना कई करोड़ भारतीय आज भी देखते हैं ) छोड़, इस शहर का लुत्फ़ उठाने विदेशी यहां क्यों आते हैं और बसने की  इच्छा क्यों रखते हैं – ये शोध का विषय है ! इस शहर में जिंदा तो जिंदा, मुर्दों को भी नमस्कार (हाथ जोड़ने ) का चलन है ! बड़े शहरों में, जहां, छद्म अध्यात्म कॉरपोरेट जगत का हिस्सा बनने को बेताब है, वहीं बनारस में गाहे-बगाहे ऐसी शख्सियत मिल जाती हैं कि विज्ञान को नमस्कार करने वाले मजबूरन खुद दंडवत हो जाते हैं ! लोग कहते हैं काशी, इस दुनिया की सबसे प्राचीन नगरी है- सबसे पुराना शहर ! इस खिताब पर बहस हो सकती है, पर ज़िंदगी और मौत के नज़ारे को बड़ी आसानी से समेटे इसकी पहचान पर नहीं ! ये पहचान  बे-मिसाल है ! ये शहर जीना सिखाता है , मौत को चिढ़ाता है ! मुंह में पान की पीक और भांग वाली ठंडे, भले ही सिगरेट और बीयर पीने वालों को नागवार गुज़रे पर तथा-कथित आधुनिकता को मुंह चिढ़ाते – बनारसियों की ये अपनी ईज़ाद की हुई “पाषाणकाल” शैली है ! “जीवन जब तक है – मस्ती से जियो ” – ये शायद काशीवासियों का अनुवांशिक अंदाज़ है !
वक़्त के साथ-साथ इस शहर की आबो-हवा भी बदली है ! दो मायनों में- १) यहाँ के लोग, विदेशी पहनावा-ओढ़ावा, बोल-चाल के तौर-तरीकों से प्रभावित होने की गुंजाइश पैदा कर रहे हैं २) विदेशी लोग , यहाँ के पहनावा-ओढ़ावा, बोल-चाल के तौर-तरीकों से प्रभावित होने की गुंजाइश पैदा कर रहे हैं ! दो-विपरीत दिशाओं को समेट लेना , शायद, इस शहर का पुराना अंदाज़ है !
आज बड़े-बड़े शौपिंग मॉल्स , विदेशी साजो-सामान की चमक-दमक काशी के मिजाज़ को फीका कर रही है ! ये खतरनाक संकेत है ! इतिहास और वर्तमान गवाह है -विदेशी अपने अतीत और वर्तमान पर हमेशा इठलाते-इतराते रहे हैं और आज भी हैं ! वो जानते हैं -कि- हर शख्स ,हर शहर, हर मुल्क  की अपनी एक पहचान होती है ! ये पहचान ही  उसे दूसरों से अलग खड़ा करती है ! ये पहचान बनाने का जूनून ही है ,जो महानगरों में इंसान को इंसान बने रहने से गुरेज़ करता है और दुनिया भर में परमाणु शक्ति से दूसरों को मटियामेट कर देने का डंका पीटने का माद्दा देता है (अमेरिका अपनी इस , विध्वंसक , पहचान पर शर्मसार हो सकता है ) ! मामला सिर्फ काशी तक रहता तो कोई बात नहीं- पर काशी उन शहरों में से एक है  , जो हिन्दुस्तान को संस्कृति के नाम पर आज भी इतराने और ताल ठोंकने का मौक़ा देता है !  काशी की अपनी बनी-बनायी पहचान भी इसके “पुराने” होने को लेकर ही है ! पुरातनता गयी तो काशी फिसल जायगी-बदल जायगी ! “सबसे प्राचीन” होने का गौरव ही तो इसे “आदिम युग के शहरों में ” नंबर वन के खिताब पर टिकाया हुआ है !
उम्मीद ! उम्मीद इस बात कि- दो विपरीत धाराओं को आसानी के साथ समेट कर अपने अस्तित्व को बचाए रखना इस शहर का पुराना और भरोसेमंद हुनर है , जो आदि-अनादी काल से कायम था और रहेगा ! ज़रूरत हमें भी है – खुद को ज़िंदा रखने के साथ-साथ इस शहर को भी !
यहां खोजो तो कई फ़साने हैं
कुछ चाहने वाले तो कुछ उकसाने वाले हैं
कुछ खाने-तो कुछ खिलाने वाले भी हैं
बहुतेरे भाईचारा निभाने वाले भी हैं
कई दीवाने भी हैं- कई मैखाने भी हैं
इस शहर के अंदाज़ के कई पैमाने भी हैं
कौन ना मर मिटेगा इस शहर पर
जहां बेधड़क इश्क फरमाते
ज़िंदगी और मौत जैसे खूबसूरत अफ़साने भी हैं

One Response to “वाह रज़ा बनारस, वाह !”

  1. शिवेंद्र मोहन सिंह

    जिया राजा बनारस जिया……. बनारस कि विशेषताओं को समेटे हुए बहुत सुंदर लेख


    सादर,

    Reply

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