लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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बुजुर्ग संरक्षक और मार्गदर्शक बनें

– डॉ. दीपक आचार्य

लगता है जैसे सब कुछ ठहर सा गया है। पुराने लोगों का जमघट इस कदर हावी है कि नई पौध को आगे आने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है और इस वजह से पुरानी पीढ़ी कहीं स्पीड़ ब्रेकर तो कहीं दूसरी-तीसरी भूमिकाओं में धुँध की तरह इतनी छायी हुई है कि अँधेरा छँटने का नाम तक नहीं ले पा रहा है।

बात राजनीति के गलियारों से लेकर समाजसेवा, समाजसुधार, शिक्षा और आम आदमी के जीवन से जुड़े सभी क्षेत्रों की है जहाँ कमोबेश सभी जगह यही हालत है।

आदमी का भ्रम कहें या समाज का दुर्भाग्य कि किसी भी आदमी को अपनी बुजुर्गियत का भान नहीं होता और हर किसी को लगता है जैसे अभी वो जवान है। काल की गति तीव्र होती है लेकिन उसका अहसास बहुत मंद-मंद होता है। बुढ़ापे की सारी निशानियाँ इस तरह आकार लेती हैं कि सहसा किसी को अनुभव नहीं होता और धीरे-धीरे वह क्षण आ पहुँचता है जब आदमी हर दृष्टि से क्षरण को मानने लगता है।

समाज में ज्ञान-वृद्धों और अनुभवी लोगों को समाज के लिए दिशा प्रदान करने वाला मार्गद्रष्टा कहा गया है लेकिन आज यह पुरानी पीढ़ी कितनी मार्गदर्शक रह गई है उसे सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं।

हमारे जीवनधर्म में गृहस्थाश्रम के बाद वानप्रस्थाश्रम का विधान है जिसमें व्यक्ति अपने आपको पूरी तरह समाज की सेवा के लिए अर्पित कर देता है और समाज का जितना अधिक भला कर सकता है, उसे करना होता है। लेकिन आजकल के बुजुर्गों को देख लगता है कि वानप्रस्थाश्रम का उनके जीवन में कोई महत्त्व नहीं रह गया है या यों कहें कि पूरी जिन्दगी गृहस्थाश्रम ही चलता रहता है और वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम तो मनुष्य की जिन्दगी से गायब ही हो गया है।

हालांकि इस भीड़ में कई चेहरे हर इलाके में ऎसे होते हैं जो समाज के लिए जीते हैं और मरते दम तक जनता तथा समाज की निष्काम सेवा का व्रत धारण किए रहते हैं। मगर ऎसे लोगों की संख्या अब दिनों दिन कम होती जा रही है।

जिन्दगी के कई वर्षों तक अर्थसंग्रह में रमे रहने वाले लोग भी चाहते हैं कि मरते दम तक उनकी नौकरी सुरक्षित रहे और हर कहीं वे ही वे छाये रहें। कई तो रिटायरमेंट के बाद भी फिर से नौकरियों में रमे हुए हैं।

एक जमाना था जब आदमी समाज और जनता की सेवा करता था और इसी में उसे आत्मतुष्टि व सुकून का अहसास होता था। पर अब न समाज से उनका कोई सरोकार है न सेवा धर्म से। जीवन के अंतिम समय तक अर्थोपार्जन ही इनका एकमेव लक्ष्य रहा है और इस लक्ष्य के आगे समाज के सारे नैतिक मूल्य और संस्कार गौण होते जा रहे हैं।

बरसों तक काम कर चुके लोग पैसों के मोह के आगे नतमस्तक हैं और इस मामले में थकान जैसी कोई स्थिति उनके जीवन में नहीं है। समाज में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या बेतहाशा बढ़ती जा रही है और इसके बावजूद ये पुराने वटवृक्ष ऎसे पसरे हुए हैं कि नई पौध को पनपने और सुरक्षित पल्लवन के अवसर तक नसीब नहीं हो पा रहे हैं।

नए खून को जो जगह मिलनी चाहिए उन सभी जगहों पर पुरानों का बेवजह डेरा है और लगता है जैसे धनार्जन की आँधी में सब कुछ स्वाहा होता चला जा रहा है। अमीर और अमीर होते जा रहे हैं व गरीबों और जरूरतमन्दों को अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।

पुराने लोगों को चाहिए कि वे समाज के लिए संरक्षक और मार्गदर्शक की भूमिका को अपनाते हुए आगे आएं न कि खिलाड़ियों के रूप में मैदान में डटे रहें। इनकी धन कमाने की मनोवृत्ति का ही दुष्परिणाम है कि नई पीढ़ी को इनके अनुभवों और ज्ञान का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है।

जिन लोगों के जिम्मे अनुभव बाँटने का काम है, समाज की सेवा कर सकते हैं, वे सरकारी और गैर सरकारी गलियारों में कुर्सियों में धँसे हुए हैं। इनमें से अधिकतर की हालत यह है कि वर्तमान पीढ़ी इन्हें ससम्मान स्वीकार तक नहीं कर पा रही है लेकिन अर्थ के मोह में निर्लज्ज और बेशरम होकर भी भिड़े हुए हैं।

इन तमाम हालातों से सामाजिक विषमता की स्थितियाँ सामने आ रही हैं और योग्य लोगों को आत्मनिर्भर जीवन पाने के अवसरों से सायास वंचित रखा जा रहा है।

बात नौकरियों की ही नहीं बल्कि समाज-जीवन के उन सभी क्षेत्रों की है जो आम आदमी से जुड़े हुए हैं। यह चर्चा शिक्षा, साहित्य से लेकर उन सभी गलियारों की है जहाँ नए जमाने की हवाआें को बहने का पूरा मौका मिलना चाहिए।

अपने ही इलाकों में देखें तो कितने लोग ऎसे हैं जो हमेशा मंच और आतिथ्य तथा संभागीत्व तलाशते हैं और दूसरों को कोई मौका देना तक नहीं चाहते। जहाँ कुछ बटोरने का मौका मिलता है, हाथ फैलाये आगे आ जाते हैं और जो कुछ मिल जाए स्वीकार कर कीर्तिगान करने लगते हैं।

कई तो ऎसे हैं जो मुख्य भूमिका में होने पर ही निमंत्रण स्वीकार करते हैं, जबकि कई ऎसे हैं जो हमेशा चाहते हैं कि उन्हें ही मौका मिले। इन हालातों में नई पीढ़ी के प्रतिभावान लोग हमेशा हाशिये पर चले जाते हैं और उन अंकुरों का हमेशा निर्ममता से संहार होता रहता है।

होना तो यह चाहिए कि जो लोग बुजुर्ग और ज्ञान-वृद्ध हैं उन्हें स्वयं आत्मानुशासन अपनाते हुए संरक्षक और मार्गदर्शक की भूमिका में सामने आकर नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित एवं प्रे्ररित करने का बीड़ा उठाना होगा। मगर ऎसा होता नहीं है और पुरानी पीढ़ी के कई सठियाये हुए लोग हर हमेशा समाज व परिवेश की छाती पर छाए रहने की कोशिश में तमाम हथकण्डों को अपनाते रहते हैं।

समाज के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभाओं के पलायन और मार्गान्तरण का यह भी सबसे बड़ा कारण है जिस पर उन सभी लोगों को गंभीरता से सोचना होगा जिनके लिए जीवन के वे दिन करीब आते जा रहे हैं जब हरेक को वापस वहाँ लौटना ही होता है जहाँ से आये हैं क्योंकि संसार का यह सच है कि जो आया है उसे जाना होगा।

मगर जाने से पहले ऎसे काम कर जाएं कि लोग हमें याद रखें, गुजरने के बाद यह नहीं कहें कि चलो अच्छा हुआ, चला गया वरना किसी को आगे आने का कोई मौका तक नहीं मिल पाया।

इन लोगों की हठधर्मिता और छायावादी प्रकृति का ही परिणाम है कि लोग बेवजह व जबरदस्ती छाये रहने वाले लोगों की शीघ्र मुक्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करना कभी नहीं भूलते।

इन सभी हालातों में नए खून को मौका मिलना चाहिए, बुजुर्गों को भी चाहिए कि वे संरक्षक, प्रेरक और प्रोत्साहक तथा सुविधादाता की भूमिका में आगे आकर नई पौध के पल्लवन और विकास का बीड़ा उठाएं।

आज ऎसा नहीं हो पाया तो फिर सभी को सोचना होगा कि स्पीड़ ब्रेकर पर से होकर गुजरते हुए हर आदमी गालियां ही देता है, कोई भी स्पीड़ ब्रेकर की सराहना कभी नहीं करता।

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