आतंकवाद : आखिर सबक किससे लें ?

प्रमोद भार्गव

 मुंबई में ताजा श्रंखलाबद्ध आंतकी हमले के बाद जिस तरह से हमारे नेतृत्वकत्तार्ओं के अनर्गल बयानों की फेहरिश्त जारी हुई है, उससे जाहिर होता है कि वे जख्मों पर मरहम लगाने की बजाय नमक छिड़कने वाली बेदर्द दलीलें दे रहे हैं। इन दलीलों से सा्फ हो गया है कि हम उस अमेरिका से तो कोई प्रेरणा अथवा सबक नहीं लेना चाहते, जहां आतंकवाद से सख्ती से निपटने के कारण 9/11 के बाद कोई आतंकी हमला नहीं हुआ, किंतु अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान और इराक से अपनी तुलना करके आखिर वे देश की अवाम को क्या संदेश देना चाहतें हैं, यह जरूर समझ से परे है ? ये देश तो वैसे ही साप्रदायिक कट्टरता के चलते आतंकवाद के ऐसे गढ़ बन चुके हैं, जिनके लिए अब आतंकवाद भस्मासुर साबित हो रहा है। केंद्र सरकार के नुमाइंदे विस्फोटों की ठोस वजह बताने की बजाय यदि आतंकवादी मुल्कौं से भारत की तुलना कर बचाव की मुद्रा में आएंगे तो यह स्थिति जवाबदेही से मुकरने का पयोय साबित होगी, जिसे जनता कभी माफ नहीं करेगी। इस विस्फोट के सिलसिले में खुफियां तंत्र की नाकामी भी पेश आई है। हैरानी है कि उसे कड़ीबद्ध हमले की भनक तक नहीं लगी। इस वाबत ऐसा भी लगता है कि आतंकी हमलों में शहीद हुए जाबांजों की शहादत का जिस तरह से कथित कांग्रेसियों ने पूर्व में मखौल उड़ाया है वह खुफिया तंत्र और पुलिस के दुस्साहसी लड़ाकों का मनोबल तोड़ने वाला साबित हुआ है। नतीजतन वे अपने दायरे में सिमटते जा रहे हैं।

वैसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए2 राजनीति के हर मोर्चे पर नाकाम है। आतंकवाद, नक्सलवाद और माओवाद जैसी समस्याओं के समाधान बावत अभी तक केंद्र सरकार का कोई साफ रूख और पारदर्शी रवैया सामने नहीं आया है। जिस सकल घरेलू उत्पाद दर को वह 910 प्रतिशत तक पहुंचाने का इस चालू वित्तीय साल में डंका पीट रही थी उस पर भी घटी औद्योगिक उत्पादन दर और बैरोजगारी की ब़ती दर ने पानी फेर दिया है। देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में हुए इन ताजा हमलों का असर विकास की इन कथित दरों पर और देखने में आएगा। इसके बावजूद हमारे नेता इस विकट घड़ी में ऐसे बयान देंगे, तो अवाम को हताश तो करेंगे ही आतंकी संगठनों के हौसलों को भी पंख देंगे।

जिस मासूम राहुल गांधी की शक्ल में हम भावी प्रधानमंत्री का चेहरा देख रहे हैं, उनमें कितनी प्रतिउत्पन्न मति (आईक्यू ) है, यह उनके द्वारा कुछ दिनों के भीतर दिए दो बयानों से तय हो जाता है। किसानों के आंसू पोंछने भट्टा पारसौल पहुंचने पर राहुल गांधी ने कुछ उपलों (कंडे) के ढेर में लगी आग को देखकर कहा था कि भट्टा पारसौल में 74 किसानों को जिंदा जला दिया गया और कई महिलाओं के साथ पुलिस ने बलात्कार किया। इस बावत जांच हेतु उन्होंने स्थानीय किसानों के साथ एक ज्ञापन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी दिया था। लेकिन न तो एक भी ऐसी महिला मिली, जिसने थाने पहुंचकर कहा हो कि मेरे साथ दुराचार हुआ है और न ही ऐसा एक भी परिजन मिला जिसने कहा हो कि मेरे परिवार के व्यक्ति को जिंदा जला दिया गया। इस थोथे बयान की हवा मीडिया ने भट्टा पारसौल में घरघर दस्तक देकर निकाल दी थी। क्या किसी देश के भावी प्रधानमंत्री को इतनी भी समझ होना जरूरी नहीं कि वह उपलों की राख और मानव अस्थियों में भेद कर सके ?

नौसिखिया राहुल का अब मुंबई हमले पर बयान आया है कि खुफिया तंत्र समेत अनेक उपायों की बदौलत 99 फीसदी हमले रोके जा चुके हैं, लेकिन हर आतंकी हमले को रोकना नमुमकिन है। अफगानिस्तान, ईरान और इराक में अमेरिकियों पर हमले जारी हैं। जिस व्यक्ति को एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर रही है, क्या आतंकवाद का गढ़ बने चुके देशों से अपने देश की तुलना करने वाले राहुल को इतनी आसानी से जनता प्रधानमंत्री के रूप में मंजूर कर लेगी ? इधर उनकी गलतबयानी के बचाव में आए दिग्विजय सिंह बोलते हैं कि भारत पाकिस्तान से बेहतर स्थिति में है। आखिरकार क्या हमारी सुरक्षा की चुनौतियां राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक चुस्ती इतने शिथिल हो गए हैं कि हम अपने देश की तुलना आतंकवादी देशों से करने लग जाएं ? क्या हम देश को पकिस्तान पोषित आतंकवाद का गढ़ बनाना चाहते हैं ? क्या राहुल उन 99 फीसदी संभावित हमलों की सूची दे सकते हैं, जिन्हें खुफिया तंत्र और प्रशासन की सर्तकता के चलते रोका गया ? जो धमाके निर्दोष लोगों की जान लेने की तसदीक कर रहें हैं, वे तो रोके नहीं जा पा रहे, लेकिन जो आतंकवादियों की असावधानी अथवा तकनीकी गड़बड़ी से नाकाम साबित हो रहे हैं, उन्हें वे सरकारी तंत्र की कामयाबी बता रहे हैं ? मुंबई के तीन भीड़ से भरे रहने वाले इलाके झाबेरी बाजार, ओपेरा हाउस, और दादर में क्रमानुसार धमाके होते हैं और हमारी जासूसी एजेंसियों व पुलिस तंत्र को खबर तो क्या भनक तक नहीं लगती ?

गृहमंत्री पी. चिदंबरम का हमले के बाद पत्रकारों को दिए इस बयान के भी कोई मायने नहीं हैं कि मुंबई पुलिस ने 26 नवंबर 2008 के आतंकी हमले के बाद आतंकियो के कई हमलों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। नतीजतन पिछले 31 महीनों में पुणे में जर्मनी बेकरी पर हुए हमले को मिलाकर महज दो ही बड़े आतंकवादी हमले हुए हैं। यहां गौरतलब है कि 26/11 के हमले के बाद एक मजबूत आतंकवाद विरोधी दस्ता खड़ा किया गया था, आखिर वह इन दो हमलों को रोकने में सक्षम साबित क्यों नहीं हुआ ? यही नहीं केंद्र में कांगेस द्वारा सत्ता संभालने के बाद इन सात सालों में राष्ट्र 15 बड़े आतंकवादी हमले झेल चुका है। इनमें 670 से भी अधिक निर्दोष प्राण गंवा चुके हैं। कई अपंगता का आजीवन अभिशाप झेलने को विवश हुए हैं। अकेले मुंबई में पांच सालों में तीन बड़े आतंकी हमलों में 370 लोगों को जान से हाथ धोने पड़े हैं। मारे गए इन लोगों के परिजनों को तो नेता अपने घड़ियाली आंसुओं से जीवनदान दे नहीं सकते ? लेकिन इस तरह के बयान देकर उनकी हताशा को तो और गहरा करने से बचें।

हमें अपने देश की तुलना कथित आतंकवाद को आश्रय देकर प्रोत्साहित कर रहे देशों की बजाय उन पश्चिमी देशों से करनी चाहिए जहां एक हमले के बाद आतंकवादी दूसरा हमला करने में कामयाब नहीं हुए। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि इन देशों ने आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं किया। अमेरिका में हुए 9/11 के हमले के बाद वहां के राजनीतिक नेतृत्व ने आतंकवाद से लड़ने की जो इच्छाशक्ति जताई, उसके चलते दूसरा आतंकी हमला संभव नहीं हुआ। ब्रिटेन, स्पेन और चीन भी पहले आतंकी हमले के बाद सख्ती से पेश आए। लिहाजा इन देशों मं भी हमलों की पुनरावृति नहीं हुई। शून्य की इस अवधारणा (जीरो टॉलरेंस) को भारत में भी अमल में लाया जा सकता है, बशर्ते राजनीतिज्ञ मजबूत इच्छा शक्ति दिखाएं। वोट की राजनीति को फिलाहल देश की संप्रभुता व अखण्डता के लिए खूंटी पर टांग दें। अफजल गुरू जैसे आतंकवादियों को तुरंत फांसी दें। भारत से आतंवाद हमेशा के लिए निर्मूल करने के लिए यह एक सुनहरा अवसर है क्योंकि अमेरिका के दबाव में पाकिस्तान ने आतंकवादियों के खिलाफ मुहिम छेड़ी हुई है, लिहाजा आतंकवादी अपनी आत्मरक्षा के रास्ते तलाशने में उलझे हैं। इसलिए वे भारत में आतंकी हमलों की नई योजना नही बना पा रहे। लेकिन जब हमारे नेतृत्वकर्ता देश की सुरक्षा की तुलना अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों से करने की बजाय आतंकवादी देशों से करेंगे तो देश आतंकवाद से महफूज कैसे रहेगा ?

1 COMMENT

  1. अभी अभी मैंने एक टिप्पणी आतंकवाद सम्बन्धी एक अन्य लेख के सन्दर्भ में लिखी है ,उसीको मैं यहाँ थोड़े संशोधन के साथ दुहराने की गुस्ताखी कर रहाहूं.
    सच पूछिए तो यह सब दिखाता है की हम एक तो कायर हैं और दूसरे आज भी हम स्वार्थ से उपर नहीं उठ सकें हैं इस बात को जितना जल्द हर भारतीय समझ ले उतना ही अच्छा है.महाकवि दिनकर ने कुरुक्षेत्र में लिखा था ,
    क्षमा शोभती उस भुजंग को,
    जिसके पास गरल हो .
    उसको क्या जो स्वयं,
    विष रहित विनीत सरल हो.
    अब इस बात पर विचार कीजिये की हम आखिर इतने कायर क्यों हैं,तो इसका उतर यही है की वीरता चरित्रता से आती है,चरित्रहीनता से नहीं. हर आतंकी हमले के बाद हमारा आपसी विवाद भी इसमें एक प्रमुख भूमिका निभाता है.बीजेपी कुछ बोलता है तो कांग्रेस कुछ और.कांग्रेस का तो और बुरा हाल है.वहाँ
    तो मन मोहन सिंह कुछ कहते हैं तो राहुल और दिग्विजय सिंह का सम्मिलित स्वर कुछ और ही इंगित करता है..बहुत बार हमारे उपर आतंकी हमलों की तुलना अमेरिका के ९/११ से की जाती है और कहा जाता है की वहाँ फिर हमला क्यों नहीं हुआ? जब हम बार बार इनसे जूझने को वाध्य हो जा रहे हैं, तो आपलोग शायद भूल गये की हमला बुश के समय हुआ था,जो रिपब्लिकन पार्टी के थे,पर किसी डेमोक्रेट ने यह आवाज भी नहीं उठायी थी की यह सब बुश की नीतियों के चलते हुआ और इसको अमेरिका पर हमला मानकर सब एक जुट होकर लड़े और आज भी लड़ रहेहैं.सरकार बदल गयी,पर निति नहीं बदली.क्या हम ऐसा कर सकते हैं?
    एक अन्य बात भी है.हमले से कौन प्रभावित होता है ?अगर २६/११ को छोड़ दिया जाए तो केवल वे लोग प्रभावित होते हैं ,जिनके जान की कीमत ५ लाख रूपये है.अगर इन हमलों में १००० जानें भी जाती हैं तो खर्च आया महज ५० करोड़ रूपये.सरकार भी खुश और मृतक के परिजन भी खुश .अगर सरकार वह सब करने लगे जिससे इन सब हमलों पर लगाम लगे तो खर्च भी अनेक गुना ज्यादा और राजनैतिक लाभ भी कम . .है न घाटे का सौदा? तो फिर चलने दीजिये यह सब मरने दीजिये लोगों को बढाते जाइए वोट बैंक या तो मुसलमानों और पाकिस्तान को इसका जिम्मेदार ठहरा कर या फिर दिग्विजयी भाषा बोलकर,जिसमें इन सब हमलों का जिम्मेदार संघ परिवार है.ऐसे यह दूसरी बात है की दिग्विजय सिंह जैसे खतरनाक पागल को खुलेआम घूमने देना भारत के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रहाहै..

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