लेखक परिचय

प्रतिमा शुक्ला

प्रतिमा शुक्ला

मूलत: लखनऊ से हूं। पत्रकारिता जगत में कार्यरत हूं। कविताएं, जनसरोकार के विषयों पर महिला और बाल कल्याण पर स्वतंत्र लेखन कार्य पिछले कई वर्षों से कर रही हूं। वर्तमान कार्यक्षेत्र नई दिल्ली हैं।

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प्रतिमा शुक्ला

दुनिया में हक से जीने का अधिकार सभी को है। आखिर अविवाहित मां बनने पर बच्चे का क्या दोष है। महिलाएं कई बार डर से बच्चे को फेंक देती हैं। अविवाहित मां काफी असुरक्षित महसूस करती हैं। अब ऐसी युवतियों को अपनी संतान के पिता का नाम बताना जरूरी नहीं होगा जो विवाह से पहले गर्भवती हो जाएगी। मामले में सुप्रीमकोर्ट ने ऐसी महिलाओं को बड़ी राहत दी है। कोई भी महिला बिन शादी के भी अपने बच्चे का पालन कर कानूनन अभिभावक बन सकती है जिसके लिए उसे पुरूष के साथ या नाम की जरूरत नहीं होगी। अब किसी भी महिला को अपने बच्चे या समाज को उसके पिता के नाम को बताने की जरूरत नहीं होगी। जिससे शायद नाजायज जैसे शब्द भी धूमिल हो जाएंगे।

इसके कई सकारात्मक पहलू है अविवाहित मां होने पर उसे समाज के तानों से मुक्ति मिलेगी तथा कहीं न कहीं उसके अन्तर आत्मविश्वास की भी भावना आएगी ।

आए दिन टीवी अखबारों में पढ़ने को मिलता है कि नवजात शिशु कहीं सड़क पर तो कहीं कूड़ेदान में मिलता है कई लड़कियां नासमझी में या यूं कहे समाज परिवार के डर से गर्भपात जैसा कुकर्म कर अपने नवजात शिशु को छोड़ना पड़ता है। कहीं पर तो पुरूष के शादी से मुकरने या पुरूष के छोड़ देने पर महिलाओं के पास कोई और रास्ता नहीं होता।

कम से कम इस फैसले से सिंगल मदर बनने की प्रथा भारतीय समाज में आएगी। जो अकेले ही अपने बच्चें का पाल सकती है। कोर्ट ने अपने फैसले में सही ही कहा कि मतलब न रखने वाले पिता से ज्यादा जरूरी है बच्चे का भविष्य। ऐसे में क्यों उसका बच्चा, बाप का नाम पाने के लिए संघर्ष करे?

एक समय अभिनेत्री नीना गुप्ता ने अपनी बेटी मसाबा की बिनब्याही मां बनकर विवाह की अनिवार्यता के खिलाफ आवाज उठाई थी। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब सुप्रीम कोर्ट ऐसी सभी मांओं को बच्चे की कस्टडी का कानूनी अधिकार दे देगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सामाजिक बदलाव की धीमी गति पर यकीन रखने वालों को एक झटका जरूर लगा होगा। लेकिन आज नहीं तो कल, वे जरूर समझ जाएंगे कि दुनिया हमेशा पुराने, जर्जर मूल्यों की पूंछ पकड़ कर आगे नहीं बढ़ती। भारत में लंबे समय से चली आ रही पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था ने बच्चों को पुरुष की संपत्ति बना रखा था, भले ही वह पिता का दायित्व निभाने को तैयार हो या नहीं।

भारतीय समाज के नजरिए से देखे तो बिन ब्याही मां अकेले अपने बच्चे की अभिभावक नहीं बन सकती उसे कहीं न कहीं पुरूष पर ही निर्भर होता था लेकिन जब कभी भी कोई महिला इसके विपरीत जाती है तो उसे कई अवरोधो विरोधों से गुजरना पड़ता है। कई बार लड़किया किसी पुरूष के साथ रिश्ते में होती है तो वे जब शादी से पहले गर्भवती हो जाती है तो वे पुरूषों पर शादी का दबाव डालने लगती है इस स्थिति में महिला और पुरूष दोनों ही मानसिक तनाव का झेलते है जहां महिलाओं को समाज, परिवार और होने वाले बच्चे को लेकर परेशान रहती है वहीं दूसरी तरपफ पुरूष जिम्मेदारी  उठाने में स्वयं को सक्षम नहीं समझते ऐसे में समाज और नैतिकता का ध्यान रख वे शादी के लिए सोचते है। पिफर तो जो शादी प्यार, विश्वास, सम्मान के साथ होना चाहिए वो भी एक दबाव में होती है जो सुखद बिल्कुल नहीं हो सकता।

इन मामलों में पुरूष अक्सर पीछे भागते है और महिलाए अपने सम्मान की खातिर उन पर निर्भर हो जाती है। क्या बच्चे के लिए पुरूष का नाम जरूरी माना जाता है भले ही पुरूष उस बच्चे को अपना नाम देना चाहे या नहीं। कम से कम इस पफैसले से महिलाओं को अपने बच्चें के बाप का नाम नहीं बताना पडे़गा जो स्वयं ही उसे अपना नाम न देना चाह रहा हो। ऐसे में महिलाए स्वयं ही सक्षम हो सकेंगी अपने बच्चें को पालने और उनकी अभिभावक बनने की।

भारतीय समाज में हमेशा अविवाहित माँ के मामले में पिता के नाम पर ज्यादा जोर दिया जाता है जिसकी शायद इस फैसले के बाद अब कोई जरूरत नहीं रह गई। इस फैसले से न केवल बच्चे की सुरक्षा बढ़ेगी बल्कि मां की भी सुरक्षा बढ़ेगी। अविवाहित लड़कियां कई बार मां बन जाती हैं। बाद में पुरुष उसे स्वीकारने को तैयार नहीं होता है। ऐसी स्थिति में बच्चा असुरक्षित हो जाता है। मां के बारे में भी लोग गलत सोचने लगते हैं। ऐसे में मां की ममता की तो बात ही छोडि़ए उसके आत्मसम्मान तक की बात कोई नहीं सोचता था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ऐसी महिलाओं को ताकत मिलेगी।

वैसे सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कहीं न कहीं भारतीय समाज के रीतियों परम्पराओं के खिलाफ है पर कहीं न कहीं यह एक रोशनी है जो महिलाओं के सम्मान को बनाएं रखेगी।

जगजीत सिंह की एक गजल की चंद पंक्तियां अभी मेरे जहन में आ रही है कि…

प्यार का पहला खत लिखने में, वक्त तो लगता है

नए परिंदों को उड़ने में, वक्त तो लगता है

जी हां, नए परिंदों को उड़ने में वक्त लगता है  ठीक वैसे ही परिवर्तन होने में वक्त तो लगता है। फैसले को सामाजिक तौर पर अपनाने में भी काफी वक्त लगेगा क्योंकि भारतीय समाज अपने पुराने दकियानूसी रीतियों से ऐसे जकड़ा हुआ है जिसे तोड़ना इतना आसान नहीं होता, महिलाओं के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। इसको भारत जैसे देश में सामाजिक तौर पर लागू होने कम से कम 10 से 15 साल लग जाएंगे।

वैसे देखा जाए तो नैतिक रूप से महिलाएं अपने बच्चे की संरक्षक होती ही हैं अब वो विवाहित हो या अविवाहित यदि महिलाएं ही ध्यान नहीं देंगी फिर बच्चे का क्या होगा।

इस देश में जहां बाप का नाम इतना ज्यादा ओवररेटेड है, यह फैसला यकीनन खुशी देने वाला है। अगर बाप का नाम ओवररेटेड न होता तो, जानता है मेरा बाप कौन है जैसे जुमले इतने पॉप्युलर न होते। कभी आपने सुना है किसी को यह कहते हुए, जानता है मेरी मां कौन है? बच्चे को उसके बाप का नाम नहीं मिला यानी उसकी तो जिंदगी ही बर्बाद हो गई।  पिता का नाम पाने के लिए लोग गर्भवती रेप पीडि़ता की शादी उसी रेपिस्ट से कराने की कोशिश की जाती है जिसने पीडि़ता की जिन्दगी ही बर्बाद कर दी। क्या कोई लड़की कभी उस शख्स से शादी करने चाहेगी जिसने उसका रेप किया है?

क्या कोई लड़की कभी एक रेपिस्ट को अपने बच्चे का पिता बनाना चाहेगी? और क्या रेपिस्ट के शादी कर लेने से उसका गुनाह खत्म, कम हो जाता है? सिर्फ इस लिए कि उसने बच्चे को अपना नाम देने जैसा महान काम कर दिया? पर लोग भूल जाते है कि रेपिस्ट ने ही तो इन गुनाह का जिम्मेदार है। इन्ही चंद सवालों के उधेड़बुन में कहीं भी हम महिलाओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाते है।  कम से कम इस पफैसले के आने के बाद भारतीय समाज का महिलाओं के प्रति रवैया बदलेगा उन्हें सिंगल मदर कहलाने में समाज को कोई आपत्ति नहीं होगी।  शायद यह फैसला आगे चलकर एक सामाजिक बदलाव की पहचान साबित हो।

 

 

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