लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

Posted On by &filed under साक्षात्‍कार.


प्रस्तुति: अरुण तिवारी

प्रो जी डी अग्रवाल जी से स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का नामकरण हासिल गंगापुत्र की एक पहचान आई आई टी, कानपुर के सेवानिवृत प्रोफेसर, राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के पूर्व सलाहकार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में है, तो दूसरी पहचान गंगा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देने वाले सन्यासी की है। जानने वाले, गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं।
पानी, प्रकृति, ग्रामीण विकास एवम् लोकतांत्रिक मसलों पर लेखक व पत्रकार श्री अरुण तिवारी जी द्वारा स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी से की लंबी बातचीत के हर अगले कथन को हम प्रत्येक शुक्रवार को आपको उपलब्ध कराते रहेंगे यह हमारा निश्चय है।

आपके समर्थ पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिए फिलहाल प्रस्तुत है:
स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद – 17वां कथन

(बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी और रुङकी यूनिवर्सिटी में छात्र गुरुदत्त अग्रवाल के विद्रोही तेवर की दास्तान ने स्वामी सानंद के निजी अतीत में मेरी दिलचस्पी बढ़ा दी थी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद आगे की नौकरी और अनुभवों के बारे में जानने की मेरी जिज्ञासा देख, स्वामी जी ने उस हिस्से की परतें भी खोली। मुझे उनकी याद्दाश्त पर आज भी ताज्जुब है। मैने उन्हे तथ्यों और घटनाक्रमों को कुछ यूं बयां करते पाया, जैसे एक चलचित्र। सबसे अनुकूल यह रहा कि उन्होने मेरे किसी प्रश्न का उत्तर देने में ना-नुकुर नहीं की।: प्रस्तोता )

पहली नौकरी: सिंचाई विभाग

तिवारी जी, आगे की कुछ ऐसी रही कि इंजीनियरिंग के आखिर में मुझसे पूछा गया कि बिल्ंिडग में जाओगे कि इरीगेशन में जाओगे। मैं सिंचाई विभाग में चला गया। मुझे, आने-जाने वालों को बताने का काम सौंपा गया। तभी बनारस ंिहंदू यूनिवर्सिटी का एक ग्रुप आया। मैने स्टुडेन्ट्स को सब बताया। उस ग्रुप में जो टीचर थे, उन्होने मुझसे कहा – ’’ आपने जितने अच्छे से समझाया है, उससे लगता है कि आप एक अच्छे टीचर बन सकते हो।’’ यह बात मेरे दिमाग में बैठ गई। जगह निकली, तो मैने आई. आई. टी., कानपुर में नौकरी के लिए अप्लाई कर दिया; सेलेक्ट भी हो गया।

दूसरा ठिकाना: आई आई टी., कानपुर

मैने सिंचाई विभाग की नौकरी की, तो रिहंद बांध पर ही की। मुझे 335 रुपये पर रखा गया। 75 रुपये प्रोजेक्ट भत्ता वगैरह अलग थे। मकान-फर्नीचर था ही। फिर यमुना के लिए हुआ, तो कई भत्ते बंद हो गये। 25 रुपये का मकान लेना पङा। आने-जाने वालों के खर्च; दो छोटे भाइयों की पढ़ाई का खर्च.. कुल मिलाकर कम पङ रहा था। आई. आई टी., कानपुर में तनख्वाह भी बेहतर थी। सो, वहां चला गया।

विद्रोही तेवर ने दिलाया इस्तीफा

आई आई टी., कानपुर का क्या बताऊं; इमरजेंसी का वक्त था। उस वक्त वहां के डायरेक्टर थे – डाॅक्टर अमिताभ भट्टाचार्य। डाॅ. भट्टाचार्य, उस वक्त के शिक्षा मंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के निकट थे। सिद्धार्थ शंकर, इंदिरा गांधी के निकट थे। इस निकटता को कुछ ऐसा नशा था कि अमिताभ भट्टाचार्य स्वयं को इंदिरा गांधी ही मानते थे। मेरा क्या था कि मैं डाॅक्टर शुक्ला व दूसरे सभी जो जेल में बंद थे, उनसे जेल में मिलने जाता था। उनके परिवारों का ख्याल रखता था। बस, इसी को लेकर अमिताभ भट्टाचार्य, मुझे अपना दुश्मन मानने लगे। जब चुनाव के नतीजे आये, तो ढोल लेकर उनके निकट खूब नारे लगे -’’भट्टाचार्य को बतला दो, इंदिरा गांधी हार गई है।’’

अब डायरेक्टर भट्टाचार्य की कलाबाजी देखिए। मोरार जी सरकार में पी.सी. चुंदर शिक्षा मंत्री बने। वह भी बंगाल ही थे। तो भट्टाचार्य ने पी. सी. चुंदर से भी दोस्ती बना ली। इसके बाद वह हमें बुलाकर कहते थे – ’’बोलो, क्या कर सकते हो ?’’

मैने आई. आई. टी., कानपुर की नौकरी से इस्तीफा देने का निर्णय लिया। कोई और नौकरी हाथ में नहीं थी; फिर भी मैने इस्तीफा दे दिया। मैं जानता था कि घर जाउंगा, तो सबसे ज्यादा खुश मेरे बाबा ही होंगे। यही हुआ।

दो साल खेती-बाङी

मैने अपने एक 30 एकङ के बाग का मैनेजमंेट संभाला। छोटे भाई के साथ मेरी ज्यादा निकटता थी। मैं खेत पर ही रहता था; वहीं पहली मंजिल पर। मैं टेªक्टर चला लेता था। इस तरह ढाई साल खेती की। हां, वहां बैठे-बिठाये कन्सलटेन्सी आ जाती थी, तो कर लेता था। तभी मैने वल्र्ड बैंक की कन्सलटेन्सी भी की। कलकत्ता शहर के सीवेज की डिजायन बनाई। हालांकि उस डिजायन का उपयोग नहीं हुआ, लेकिन वह समय की बात थी।

तीसरी नौकरी: केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

डाॅ. निलय चैधरी – यादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थे। वह मुझसे परिचित थे। वह मुझे बुलाते रहते थे। सीपीसीबी (केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) के चेयरमैन हुए तो उन्होने मुझसे कहा कि सीपीसीबी के मेम्बर सेक्रेटरी होकर आ जाओ। मैने कहा कि मैं अब नौकरी नहीं करना चाहता। नौकरी के मेरे अनुभव अच्छे नहीं है।
उन्होने कहा – ’’अनुभव भूल जाओ। आ जाओ। तुम्हारी जरूरत है।’’
मैने कहा कि मैं अप्लाई नहीं करूंगा। उन्होने जो किया हो। सी आई इंक्वायरी घर आई। मैने ज्वाइन किया। वहां भी वही हुआ।

एक अनुभव: प्राइवेट बनाम पब्लिक

एक डाॅ. मोहन्ती थे। डाॅ. मोहन्ती व सरकार चाहती थी कि प्रदूषण के प्रावधानों को का प्राइवेट सेक्टर पर तो कङाई पर पालन हो, पर पब्लिक सेक्टर पर नरमी बरती जाये। इस पर मेरा मतभेद हुआ। मैने कहा -’’ पाॅल्युशन इज पाॅल्युशन; तो फिर पारर्शियल्टी क्यों ?’’

’नेशनल टैक्सटाइल कारपोरेशन’ पब्लिक सेक्टर की कंपनी है और ’एंग्लो टैक्सटाइल्स’ प्राइवेट सेक्टर की। मैने दोनो को नोटिस दिया था। वे नहीं आये। मैने फिर लिखा कि मेरा उद्देश्य यह है कि चर्चा करके ट्रीटमेंट प्लांट लगायें। दोनो ही नहीं आये, तो मैने दोनो के खिलाफ केस दायर कर दिया। केस दायर होने पर ’एंग्लो टैक्सटाइल्स’ वाले आये। बातचीत के बाद वे ट्रीटमेंट प्लांट लगाने का तैयार हो गये। उन्होने इस संदर्भ मंे एक एफीडेविट (शपथपत्र) भी दिया। अतः मैने उनके खिलाफ केस वापस ले लिया। एन टी सी के खिलाफ केस चलता रहा। कोर्ट ने मिल को बंद करा दिया। अब एन टी सी वालों ने क्या किया कि भारत सरकार के टैक्सटाइल सेके्रटी को पकङा। उन्हे कुछ समझाया होगा। हमारे टी एन खोसू साहब थे। उन्होने मुझे बुलाया। मैने उन्हे स्थिति बताई। मैं एन टी सी वालों के पास भी गया। एन टी सी वालों का रुख यह था कि जब पैसा होगा, तब बनायेंगे। अभी नहीं बनायेंगे।

टी एन खोसू साहब, मुझे टैक्सटाइल सेके्रटरी के पास ले गये। सेके्रटरी महोदय खङे तक नहीं हुए; बोले कि बैठिए। हम बैठे तो बोले – ’’क्या पियोगे ?’’
मैने कहा – ’’कुछ भी।’’

उन्होने काॅफी के लिए घंटी बजाई। फिर बोले – ’’ यह क्या किया आपने ? नोटिस विद्ड्रा कर लीजिए।’’

खोसू साहब ने उन्हे समझाने की कोशिश की। खोसू साहब ने कहा कि यदि एन. टी. सी. साल भर में ट्रीटमेंट प्लांट लगाने का एफीडेविट दे दे, तो केस विद्ड्रा कर लेंगे। खोसू साहब ने उन्हे डेढ़ साल तक वक्त देने की बात कही।
टैक्सटाइल सेक्रेटी ने कहा कि लिखकर नहीं दे सकते। खोसू साहब ने कहा – ’’ तो फिर क्या बात सकती है ?’’ इसके खोसू साहब खङे हो गये। हम बाहर आ गये। बाद में खोसू साहब पर क्या दबाव पङे, लेकिन मैं पीछे नहीं हटा।
एक तो यह घटना घटी। दूसरी घटना, यमुना जी को लेकर थी।

एक अनुभव: प्रदूषण बोर्ड

हम यमुना सफाई को लेकर सारा अध्ययन कर चुके थे। दिल्ली के सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता कम थी और सीवेज ज्यादा था। यह 1983 की बात है। सोनिया विहार का 100 एमजीडी का वाटर प्लांट सेंक्शन होने को था। नियम था कि जब तक उद्योग का एसटीपी चालू नहीं हो जाता, कोई उद्योग चालू नहीं किया जा सकता। मैं तो वाटर ट्रीटमेंट प्लांट को भी एक उद्योग ही मानता हूं।

मैं कह रहा था कि जब तक 90 एमजीडी का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लग जाता, सोनिया विहार वाटर ट्रीटमेंट प्लांट सेंक्शन न हो। उस वक्त दिल्ली जल बोर्ड नहीं था; ’दिल्ली सीवेज एण्ड वाटर अंडरटेकिंग’ था। काशीनाथ जैन, उसके सुपरिटेंडिंग इंजीनियर थे। मैं उनसे मिला। उनके सामने अपनी बात रखी। उन्होने कहा -’’90 एमजीडी के एसटीपी में तो बहुत पैसा लगता है। सरकार पैसा देगी, तब होगा। आप ऐसा करो कि हमारे खिलाफ कोर्ट में केस कर दो। कोर्ट का आॅर्डर होगा, तो हम सरकार से पैसा मांग लेंगे।’’

मैने यह बात अपने चेयरमैन डाॅ. निलय चैधरी के सामने रखी। वह मान गये। उन्होने मंजूरी दे दी। मैने कागज तैयार किए। बोर्ड से मंजूरी के लिए भेजा। बोर्ड की मीटिंग में चार-पांच आइटम थे। निलय चैधरी, पहले चार आइटम तक तो रहे। पांचवें यानी यमुना वाले मामले का नंबर आया, तो मिनिस्ट्री जाना आवश्यक बताकर चले गये।….

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz