लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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ndmaशैलेन्द्र चौहान

खबर है कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और चमोली ज़िलों में भारी बारिश के बाद बादल फटने और भूस्खलन में कम से कम 30 लोग मारे गए हैं जबकि करीब 40 लोग लापता बताए जा रहे हैं। आशंका है कि वे मलबे में दबे हो सकते हैं या तेज़ पानी के बहाव में बह गए हो सकते हैं। पिथौरागढ़ के ‌बस्तड़ी और नौलेरा गांव में बादल फटने की घटना के बाद पांच लाशें निकाली जा चुकी हैं। इस बीच प्रभावित इलाकों में सेना को बुला लिया गया है। बताया जा रहा है कि एनडीआरएफ के जवान भी बचाव और राहत के काम में जुट गए हैं। इन इलाकों में खेती को भी नुकसान पहुंचा है। लोगों के खेत और पशु बह गए हैं और मकान मलबे में दब गए हैं। मौसम विभाग ने राज्य में 72 घंटे तक भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। विगत वर्षों में उत्तराखंड में हुई भारी तबाही को देखते हुए हमें आपदा प्रबंधन सीख लेना चाहिए था। उत्तराखंड में भारी बारिश और अचानक आई बाढ़ की भयावहता के मद्देनजर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने की योजना बनाई थी। उत्तराखंड त्रासदी के बाद एनडीएमए के पूर्व उपाध्यक्ष शशिधर रेड्डी ने कहा था कि उत्तराखंड समेत देश के अन्य हिमालयी प्रदेश बारिश, बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं के साथ भूकंप के प्रभाव वाले क्षेत्र भी माने जाते हैं। ऐसे में हम यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में अगर प्राकृतिक आपदा आए, तो हमारे पास इससे निपटने की पूरी व्यवस्था पहले से हो। नई सरकार ने अब यह उपाध्यक्ष पद समाप्त कर दिया है। इसके के स्थान पर एक तीन सदस्यीय समिति गठित की गई है जिसमें एक वैज्ञानिक, एक आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ एवं एक सेवा निवृत सेना अधिकारी शामिल हैं। इस देश में जब लोग बाढ़ में डूब रहे होते हैं, भूकंप के मलबे में दब कर छटपटाते हैं या फिर ताकतवर तूफान से जूझ रहे होते हैं, भूस्‍खलन, बादल फटने से लोग मर रहे होते हैं तब दिल्ली में फाइलें सवाल पूछ रही होती हैं कि आपदा प्रबंधन किसका दायित्व है? कैबिनेट सचिवालय? जो हर मर्ज की दवा है। गृह मंत्रालय? जिसके पास दर्जनों दर्द हैं। प्रदेश का मुख्यमंत्री? जो केंद्र के भरोसे है। या फिर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण? जिसे अभी तक सिर्फ ज्ञान देने और विज्ञापन करने का काम मिला है। एक प्राधिकरण सिर्फ 65 करोड़ रुपये के सालाना बजट में कर भी क्या सकता है। ध्यातव्य है कि इस प्राधिकरण के मुखिया खुद प्रधानमंत्री हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) पर आपदाओं के समय में और प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिए नीतियों, योजनाओं और आपदा प्रबंधन के लिए दिशा निर्देश बनाने की जिम्मेदारी है। राष्ट्रीय आपदा अनुक्रिया बल (एनडीआरएफ) प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के लिए विशेष प्रतिक्रिया के प्रयोजन के लिए गठित किया गया है। एनडीआरएफ का गठन डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के सन 2006 में वैधानिक प्रावधान अंतर्गत प्राकृतिक आपदा एवं मनुष्य निर्मित आपदा से निपटने के लिए किया गया था। इसमें बीएसएफ, सी आर पी एफ, इंडो तिबेत बॉर्डर पुलिस एवं सी आई एस एफ उर्फ़ केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल प्रत्येक संगठन से दो बटालियनें शामिल की गई थीं। जिस देश में बाढ़ हर पांच साल में 75 लाख हेक्टेयर जमीन और करीब 1600 जानें लील जाती हो, पिछले 270 वर्षो में जिस भारतीय उपमहाद्वीप ने दुनिया में आए 23 सबसे बड़े समुद्री तूफानों में से 21 की मार झेली हो और ये तूफान भारत में छह लाख जानें लेकर शांत हुए हों, जिस मुल्क की 59 फीसदी जमीन कभी भी थरथरा सकती हो और पिछले 18 सालों में आए छह बड़े भूकंपों में जहां 24 हजार से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हों, वहां आपदा प्रबंधन तंत्र का कोई माई-बाप न होना आपराधिक लापरवाही है। सरकार ने संगठित तौर पर 1954 से आपदा प्रबंधन की कोशिश शुरू की थी और अब तक यही तय नहीं हो सका है कि आपदा प्रबंधन की कमान किसके हाथ है। भारत का आपदा प्रबंधन तंत्र इतना उलझा हुआ है कि इस पर शोध हो सकता है। आपदा प्रबंधन का एक सिरा कैबिनेट सचिव के हाथ में है तो दूसरा गृह मंत्रालय, तीसरा राज्यों, चौथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन या फिर पांचवां सेना के। समझना मुश्किल नहीं है कि इस तंत्र में जिम्मेदारी टालने के अलावा और क्या हो सकता है। गृह मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी का यह कहना, ‘आपदा प्रबंधन तंत्र की संरचना ही अपने आप में आपदा है। इससे क्या तात्पर्य लगाया जाये? प्रकृति के कहर से तो हम जूझ नहीं पा रहे, अगर मानवजनित आपदाएं मसलन जैविक या आणविक हमला हो जाए तो फिर सब कुछ भगवान भरोसे ही होगा’, भी यही जाहिर करता है। उल्लेखनीय है कि सुनामी के बाद जो राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण बनाया गया था, उसका मकसद और कार्य क्या है यही अभी तय नहीं हो सका है। सालाना पांच हजार करोड़ से ज्यादा की आर्थिक क्षति का कारण बनने वाली आपदाओं से जूझने के लिए इसे साल में 65 करोड़ रुपये मिलते हैं और काम है लोगों को आपदाओं से बचने के लिए तैयार करना। पर बुनियादी सवाल यह है कि आपदा आने के बाद लोगों को बचाए कौन? यकीन मानिए कि जैसा तंत्र है उसमें लोग भगवान भरोसे ही बचते हैं। गत वर्ष चेन्नई में बारिस का कहर कोई एक माह तक जारी रहा। कोई दो सौ लोगों की जान चली गई। नवंबर के महीने में चेन्नई में करीब 120 सेमी. बारिश हुई । इस बारिश ने पिछले 100 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। चेन्नई के एयरपोर्ट पर भी पानी भर गया। हवाई उड़ान और ट्रेनें कैंसल कर दी गईं थी। स्कूल-कॉलेज इंडस्ट्रीज और सरकारी ऑफिस सब बंद रहे। आंध्र प्रदेश के कोस्टल जिलों में भी भारी बारिश, श्रीकालाहस्ती, सत्यवेदु और प्रकासम जिले के कई इलाकों में हालात बिगड़े रहे। शहर में आर्मी, नेवी, एनडीआरएफ और कोस्ट गार्ड ने एक साथ मोर्चा संभाला। सरकार ने वहां जो राहत कार्य किया उसे कतई पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। भारी बरसात और तबाही के बाद सरकार नहीं चेती। भारत में लोगों को आपदा से बचाना या तत्काल राहत देना किसकी जिम्मेदारी है?..हमें नहीं मालूम ! हमारी छोड़िए..पांच दशकों से सरकार भी इसी यक्ष प्रश्न से जूझ रही है। दरअसल आपदा प्रबंधन तंत्र की सबसे बड़ी आपदा यह है कि लोगों को कुदरती कहर से बचाने की जिम्मेदारी अनेक की है और किसी एक की नहीं।

सोलह सौ किलोमीटर से अधिक के समुद्री किनारे तथा भूकंप के मामले में सक्रिय अफगानिस्तान से प्लेट जुड़ा होने के कारण गुजरात पर हमेशा आपदाओं का खतरा बना रहता है। इसलिए गुजरात में इजरायल का एक्वा स्टिक लिसनिंग डिवाइस सिस्टम ख़रीदा गया था। ब्रीदिंग सिस्टम, अंडर वाटर सर्च कैमरा, आधुनिक इन्फेलेटेबल बोट, हाई वाल्यूम वाटर पंपिंग आदि..। यह उपकरण जमीन के नीचे बीस मीटर की गहराई में दबे किसी इसान के दिल की धड़कन तक सुन लेता है। मोटर वाली जेट्स्की बोट और गोताखोरों को लगातार 12 घटे (आम ब्रीदिंग सिस्टम की क्षमता 45 मिनट तक आक्सीजन देने की है) तक आक्सीजन उपलब्ध कराने वाला अंडर वाटर ब्रीदिंग एपेरेटस भी है। नीदरलैंड का हाइड्रोलिक रेस्क्यू इक्विपमेंट भी है, जो मजबूत छत को फोड़ कर फर्श या गाड़ी में फंसे व्यक्ति को निकालने का रास्ता बनाता है। गुजरात ने अग्निकांड से निपटने के लिए बड़ी संख्या में अल्ट्रा हाई प्रेशर फाइटिग सिस्टम भी खरीदे हैं। आम तौर पर आग बुझाने में किसी अन्य उपकरण से जितना पानी लगता है, यह सिस्टम उससे 15 गुना कम पानी में काम कर देता है। इसे अहमदाबाद के दाणीलीमड़ा मुख्य फायर स्टेशन ने डिजाइन किया है। यह आग पर पानी की एक चादर सी बिछा कर गर्मी सोख लेता है। अमेरिका के सर्च कैमरे तथा स्वीडन के अंडर वाटर सर्च कैमरे भी अपनी राहत और बचाव टीमों को दिए हैं। ये उपकरण जमीन के दस फीट नीचे तथा 770 फीट गहरे पानी में भी तस्वीरें उतार कर वहां फंसे व्यक्ति का सटीक विवरण देते हैं। अमरीका की लाइन थ्रोइंग गन से बाढ़ में या ऊंची बिल्डिंग पर फंसे व्यक्ति तक गन के जरिए रस्सा फेंक कर उसे बचाया जा सकता है। अब ये सब किस स्थिति में हैं पता नहीं। इन उपकरणों का उपयोग देश के दूसरे भागों में भी किया जाना चाहिए। रखे रखे इनके निष्क्रिय होने की संभावना अधिक होती है। वर्तमान में आपदा प्रबन्धन का सरकारी तंत्र देखें ता कैबिनेट सचिव, गृहमंत्रालय, राज्यों में मुख्यमंत्री, राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन विभाग और सेना इस तंत्र का हिस्सा हैं। यह भी सच है कि हमारे देश में आपदा प्रबन्धन की स्थिति ज्यादा ही लचर है। हमारे आपदा प्रबन्धन की कमजोर कड़ी लगभग हर आपदा में ढीली दिखी, लकिन हमने उसे मजबूत करन का प्रयास नहीं किया। मीडिया की भाषा में यह ‘प्रशासनिक लापरवाही’ अथवा न्यायपालिका की भाषा में ‘आपराधिक निष्क्रियता’ है। प्रभावी आपदा प्रबन्धन की पहली शर्त है जागरूकता और प्रभावित क्षेत्र में तत्काल राहत एजेन्सी की पहुंच। यदि लोगों में आपदा की जागरूकता नहीं है तो तबाही भीषण होगी और राहत में दिक्कतें आएंगी। आपदा सम्भावित क्षेत्र में तो लोगों को बचाव की बुनियादी जानकारी देकर भी आपदा से होने वाली क्षति को कम किया जा सकता है। आपदा प्रबन्धन के बाकी तत्वों में ठीक नियोजन, समुचित संचार व्यवस्था, ईमानदार एवं प्रभावी नेतृत्व, समन्वय आदि काफी महत्वपूर्ण हैं। हमारे देश में व्यवस्था की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि यहां सब-एक दूसरे पर जिम्मेवारी डालते रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक औसतन 5 से 10 हजार करोड़ की आर्थिक क्षति तो प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदाओं से उठाते हैं लकिन इससे जूझन के लिये आपदा प्रबन्धन पर हमारा बजट महज 65 करोड़ रुपये है। इस धनराशि में अधिकांश प्रचार आदि पर ही खर्च हो जाता है। प्रशिक्षण की अभी तो तैयारी भी नहीं है। वर्ष 2005 में आपदा प्रबन्धन अधिनियम संसद ने पारित कर दिया है। इसके बाद से ही राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण का गठन किया गया है। प्राधिकरण के पूर्व सदस्य के. एम़ सिंह कहते हैं, ‘‘इतने कम समय में हमसे ज्यादा अपेक्षा क्यों रखते हैं? वक्त दीजिये हम एक प्रभावी आपदा प्रबन्धन उपलब्ध कराएंगे।’’ राज्य सरकारों को भी अपना आपदा प्रबन्धन तंत्र मजबूत और प्रभावी बनाना चाहिए। बाढ़ प्रभावित इलाके में स्थानीय मदद से प्रत्येक गांव या दो-तीन गांवों पर एक आपदा राहत केन्द्र की स्थापना कर वहां दो-तीन महीन का अनाज, पर्याप्त साधन, जरूरी दवाएं, पशुओं का चारा, नाव, मोटर बोट, तारपोलीन व अन्य जरूरी चीजों का बाढ़ से पूर्व ही इन्तजाम सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

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