लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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good-news-for-employees-payhike_संदर्भः- सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागूः-

प्रमोद भार्गव
केंद्रीय मंत्री मण्डल ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू कर दी हैं। केंद्रीय कर्मचारियों की इस खुशहाली से जहां सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद की जा रही है, वहीं इससे महंगाई बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। समाज में विभिन्न तबकों के बीच आयगत असमानता की खाई और चौड़ी होगी। इससे न केवल विकास के रास्ते में मुश्किलें खड़ी होंगी,बल्कि जो लोग क्रयशक्ति की दृष्टि से हाशिये पर हैं,उन्हें जीवन-यापन में और कठिनाईयां पेश आ सकती हैं। गोया, कर्मचारियों को खुशहाली के ये उपहार सरकारी खजाने के लिए छठे वेतन आयोग की तरह निराशाजनक साबित हो सकते हैं। क्योंकि इससे राजकोष पर सालाना करीब 1 लाख करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ेगा। पूर्व सैनिकों को समान रैंक, समान पेंषन देने के लिए भी सरकार को हर साल 70 हजार करोड़ अतिरिक्त खर्च करने हैं। जाहिर है, इस बोस से अर्थव्यवस्था की गति और धीमी ही पड़ेगी। इन वेतनमानों का अनुकरण भविष्य में रेलवे, बैंक और राज्य सरकारों को भी करना होगा। गोया, इनमें भी विकास की गति धीमी पड़ना तय है। जबकि ये राज्य अपना खर्च अपनी आय के स्रोतों से उठाने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे ही विसंगतियों के चलते राष्ट्रिय नमूना सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट आगाह कर चुकी है कि आयगत विसंगतियों के चलते करीब साढ़े चार करोड़ नए लोग इस साल के अंत तक गरीबी रेखा के नीचे आ जाएंगे।
सरकारी कर्मचारियों के लिए एक तय समय सीमा में वेतन आयोग गठित होता है। आयोग की सिफारिषों के मुताबिक वेतन-भत्तों में बढ़ोत्तरी भी की जाती है। ताकि उन्हें,बढ़ती महंगाई और बदली परिस्थितियों के परिदृष्य में आर्थिक कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़े। इसीलिए 69 साल पहले 1946 में जो पहला वेतन आयोग बना था,उसने 35 रूपए मूल वेतन तय किया था। 1959 में दूसरे आयोग ने इसे बढ़ाकर 80 रुपए किया। 1973 में तीसरे ने 260,चौथे ने 1986 में 950 किया। वहीं पांचवें आयोग ने इसे एक साथ तीन गुना बढ़ाकर 3050 रुपए कर दिया। छठे ने इसे बढ़ाकर 7730 रुपए किया, जबकि छठे वेतन आयोग ने मूल वेतन में 20 प्रतिशत वृद्धि की सिफारिष की थी। किंतु डाॅ मनमोहन सिंह सरकार ने अतिरिक्त उदारता बरतते हुए, इसे लागू करते समय दोगुना कर दिया था। अब सातवें आयोग की सिफारिषों के फलस्वरूप केंद्र सरकार के कर्मचारियों का अधिकतम वेतन ढाई लाख रुपए और न्यूनतम वेतन 18000 रुपए होगा। इस तरह से ये वेतन सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों से ज्यादा हो जाएगा। गोया, इस विसंगति से इनके अहम् को ठेस लगना स्वाभाविक है। लिहाजा संसदों द्वारा वेतन-भत्तों को बढ़ाने की मांग उठना लाजिमी है। आगे-पीछे सरकार को यह मांग भी मानना पड़ेगी।
इन वेतन वृद्धियों से केंद्र सरकार के 33 लाख वर्तमान कर्मचारियों और 52 लाख सेवानिवृत्त कर्मचारियों और 14 लाख सशस्त्र बलों को लाभ मिलेगा। चूंकि ये सिफारिशें जस की तस अमल में लाई गई हैं, इसलिए वेतन-भत्तों में 23.55 प्रतिशत की वृद्धि हो गई है, जो राजकोषीय घाटे पर 0.65 प्रतिशत का असर डालेगी। मसलन पहले वित्तीय वर्ष 2016-17 में ही खजाने पर 1.2 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ बढ़ने की उम्मीद है। तय है,राजकोषीय घाटे को पूर्व निश्चित सीमा में लाने की सरकार की कोशिश खटाई में पड़ने जा रही है। क्योंकि आम बजट में राजकोषीय घाटे को 2015-16 में सकल घरेलू उत्पाद दर के 3.9 फीसदी तक और 2017-18 तक तीन फीसदी तक लाने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन लगता है,इन सिफारिषों के लागू होने के बाद अगले दो-ढाई साल तक सरकार इससे उपजने वाली आर्थिक खाई में संतुलन बिठाने में ही लगी रहेगी। नए औद्योगिक विकास और खेती को किसान के लिए लाभ का धंधा बनाए जाने के उपायों से बुरी तरह पिछड़ जाएगी। इन वेतन वृद्धियों से मंहगाई का ग्राफ भी उछलेगा। जिसका सामना न केवल किसान-मजदूर,बल्कि असंगठित क्षेत्र से आजीविका चला रहे हर व्यक्ति को करना पड़ेगा। हालांकि सरकार को यह मुगालता है कि वेतन-वृद्धि से निवेष के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनेंगी। नतीजतन घरेलू मांग बढ़ेगी और रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा होंगे।
सरकार को इस बाबत यह सोचने की जरूरत है कि देश में मौजूद कुल नौकरियों में से करीब 8.5 प्रतिशत संगठित क्षेत्र में हैं। शेष असंगठित क्षेत्रों में हैं। जहां न तो वेतन-भत्तों में समानता है और न ही सामाजिक सुरक्षा की गारंटी है। देश की सबसे बड़ी आबादी कृषि और कृषि आधारित मजदूरी पर आश्रित है। लेकिन इन दोनों ही वर्गों की आमदनी की कोई गारंटी नहीं है। ऐसे में जिन राज्यों को सूखा व ओलावृष्टि का सामना करना पड़ेगा, उन्हें फसल उत्पादन से जुड़े वर्गों की रक्षा करना मुश्किल होगा ? जबकि सरकारीकर्मियों की नौकरी में स्थायित्व है। कार्य-स्थितियां अनुकूल हैं। जबावदेही की कोई गारंटी नहीं है। स्वास्थ्य बिगड़ने और पर्यटन पर जाने पर भी वेतन मिलते हैं। बावजूद भ्रष्टाचार, कदाचरण एवं निरंकुशता अपनी जगह बदस्तूर हैं। जबकि इन्हीं स्थितियों में असंगठित क्षेत्र के लोगों का काम प्रभावित होता है, नतीजतन उन्हें आर्थिक हानि उठानी पड़ती है।
इन सब हालातों को ही दृष्टिगत रखते हुए स्वामीनाथन आयोग ने सिफारिश की थी कि हर फसल पर किसान को लागत से डेढ़ गुना दाम दिया जाए। डाॅ मनमोहन सिंह की सरकार ने तो इसे नजरअंदाज किया ही,नरेंद्र मोदी की राजग सरकार ने भी इसे सिरे से खारिज कर दिया है। जबकि पिछले आम चुनाव में भाजपा ने इसे अपने चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल किया था। सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका के सिलसिले में मोदी सरकार ने न्यायालय को उत्तर दिया है कि ‘सरकार किसान को फसल उत्पादन के लागत मूल्य की डेढ़ गुना धनराशि देने पर कोई विचार नहीं कर रही है।‘ जबकि जरूरी तो यही था कि सरकार खेती-किसानी से जुड़े लोगों की आमदनी बढ़ाने के उपाय तो करती ही,असंगठित क्षेत्र में कार्यरत करोड़ों लोगों की आय बढ़ाने के तरीके भी तलाशती ?
दरअसल केंद्र सरकार और उसके रहनुमाओं को यह भ्रम है कि महज केंद्रीय कर्मचारियों की वेतन वृद्धि से बाजार में तेजी आ जाएगी। सरकार को उम्मीद है कि इस राशि को जब कर्मचारी खर्च करेंगे तो भवन,वाहन, इलेक्ट्रोनिक एवं संचार उपकरणों की बिक्री बढ़ेगी। लेकिन सरकार को यहां विचार करने की जरूरत है कि केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या बहुत सीमित है और इनमें से ज्यादातर सभी आधुनिक सुविधाओं से अटे पड़े हैं। अधिकांष कर्मचारियों के पास हर बड़े शहर में आवास हैं और परिवार के हरेक सदस्य के पास वाहन सुविधा है। वैभव और विलास का यह जीवन उन्हें उत्तरदायित्व से विमुख कर रहा है। बावजूद सरकारी कर्मियों को उत्तरदायी बनाने पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अन्ना आंदोलन के दिनों में समयबद्ध सेवा सुनिश्चित करने का कानून बनाने की बात उठी थी, लेकिन वह आई-गई हो गई। जबकि इसे कानून बनाने के अजेंडे में लाने की जरूरत है। हालांकि पहली बार किसी वेतन आयोग ने यह नया सुझाव दिया था कि कर्मचारियों को कार्य-प्रदर्शन के आधार पर पुरस्कृत व पदोन्नत किया जाए। एक तरह से इस उपाय को जवाबदेही सुनिश्चित करने का तरीका कहा जा सकता है। किंतु सिफारिशें लागू करते समय इस सुझाव पर अमल नहीं किया गया। जबकि बढ़े हुए वेतन के साथ भ्रश्टाचार मुक्त लोकदायित्व की अपेक्षा तो करनी ही थी। क्योंकि अंततः कर्मचारियों को जो वेतन भत्ते मिलते हैं,उस धन का निर्माण कृषि, प्राकृतिक संपदा का दोहन, पशुधन से मिलने वाली राशि और उद्यमियों से मिलने वाले कर ही हैं। इसलिए समूची प्रशासनिक व्यवस्था को समाज के प्रति उत्तरदायी बनाए जाने के साथ-साथ पारदर्षी भी बनाया जाना जरूरी था, लेकिन सरकार ने यह अवसर खोकर एक बड़े वर्ग को नाराज करने का मौका दे दिया है।
चुनांचे इस इजाफे से अर्थव्यवस्था को बहुत बड़े पैमाने पर गति मिलने वाली नहीं है। तत्काल मिलती भी है तो वह लंबी काल अवधि तक टिकने वाली नहीं है। यह तो तभी संभव है,जब उन असंगठित क्षेत्रों के समूहों की भी आमदनी बढ़े,जो देश की बड़ी आबादी का हिस्सा हैं और क्रयशक्ति के लिहाज से हाशिये पर हैं। मगर हाशिये पर पड़े इन लोगों पर निगाह ही नहीं डाली जा रही है, शायद इस आशंका से की कहीं पूंजीवादी प्राथमिकताओं को बदलने की जरूरत ही न पड़ जाए ? लिहाजा कर्मचारियों को खुशहाल बनाए जाने की ये सौगातें आम आदमी को राहत पहुंचाने वाली नहीं हैं।

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