आज का मनुष्य अपने जन्मदाता और स्वयं के ज्ञान से अनभिज्ञ

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-मनमोहन कुमार आर्य

क्या हम अपने आप और अपने जन्मदाता को जानते हैं। हमें लगता है कि संसार के 99 प्रतिशत लोग न तो अपने आप को जानते हैं न अपने जन्म दाता को ही जानते हैं। इस न जानने का मुख्य कारण अविद्या है। विद्या उसे कहते हैं कि जिससे पदार्थों का यथार्थ ज्ञान होता है। मनुष्य को यह ज्ञान कैसे हो कि वह कौन है, उसका स्वरूप क्या है, किसने उसे उत्पन्न किया, किस उद्देश्य से किया व मनुष्य जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है? इसका सही उत्तर केवल मनुष्य को बनाने वाली सत्ता ही दे सकती है। क्या उस सत्ता से इन प्रश्नों का उत्तर जाना जा सकता है तो हमारा उत्तर हां में है। उस सत्ता से इन प्रश्नों का उत्तर कैसे जाना जा सकता है, इस प्रश्न का उत्तर है कि इस संसार व मनुष्य आदि प्राणियों को बनाने वाली सत्ता इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र व्यापक है। उसने इस संसार में अनन्त सूर्य, चन्द्र, पृथिवी व अन्य लोक लोकान्तरों को बनाया है। यदि उसने बनाया है तो यह निश्चित है कि वह सभी रचनायें ज्ञान पूर्वक करता है। इसका अर्थ है कि वह ज्ञानी वा सर्वज्ञ है। उसकी सर्वज्ञता का ज्ञान सृष्टि की रचना को देखकर और उसका अध्ययन करके भी मिलता है। यह भी जानने योग्य बात है कि ज्ञान केवल चेतन सत्ता में ही निहित व समाहित होता है। इससे यह ज्ञात होता है कि जिस सत्ता से यह संसार व हम सब बने हैं वह एक चेतन, सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापक सत्ता है। अब यदि उस सत्ता ने हमें अर्थात् हमारे शरीर को बनाया और हमारी आत्मा जो कि ज्ञान व कर्म आदि गुणों के कारण एक चेतन तत्व है, तो वह मनुष्य व अन्य प्राणियों को अपने जीवन निर्वाह के लिए आवश्यकता के अनुरूप ज्ञान भी अवश्य देगा। यह भी जरूरी है कि उसके द्वारा वह ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में प्रथम दिनों में ही देना समीचीन व तर्क संगत है। यह जान लेने के बाद संसार में प्राचीन सत्य ज्ञान की पुस्तकों पर विचार करें तो वेद ही विश्व का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है जिसे विदेशी व अपने देश के सभी लोग सबसे प्राचीन स्वीकार करते हैं। यह वेद ज्ञान ही ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है जो सर्वव्यापक ईश्वरीय सत्ता ने सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को दिया था। इसका पूरा वर्णन महर्षि दयानन्द कृत सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में उपलब्ध है जिसे वहां देखा जा सकता है।

 

किसी वस्तु के विषय में यथार्थ ज्ञान वही दे सकता है जो उसका निर्माण करता है। आजकल जो उद्योग व कम्पनियां जिस उत्पाद को बनाती हैं, वही उसके विषय में यथोचित जानकारी दिया करती हैं। ऐसा नहीं होता कि बनाये तो कोई और उसकी जानकारी दूसरा कोई दे। यह बात अलग है कि यदि बनाने वाले से सही जानकारी मिल जाये तो फिर उसको जान व समझ कर दूसरे उसे उचित मात्रा में जान जाते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग कर उनके उत्पाद की मरम्मत आदि कर लिया करते हैं। मनुष्य को जिस सत्ता ने बनाया है उसी सत्ता का दिया हुआ ज्ञान वेद है। अतः वेद में ही मनुष्य के जन्मदाता का ज्ञान हो सकता है। वेदाध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि आत्मा को शरीर से संयुक्त करने वाला परमात्मा है। उपनिषदों में भी इसका इसी रूप में वर्णन प्राप्त होता है। ईश्वर ऐसा इस लिए कर पाता है क्योंकि वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म है और जीवात्मा के भीतर भी व्यापक है। यदि हम घर के अन्दर हैं तो ज्ञान होने पर उसकी अन्दरूनी खराबियों को ठीक कर सकते हैं। अन्दर की खराबियों को ठीक करने के लिए अन्दर होना या बाहर से अन्दर जाना आवश्यक होता है। ईश्वर पहले से ही सब वस्तुओं वा पदार्थों के अन्दर व बाहर व्याप्त है। वह ज्ञान व सर्व शक्तियों से युक्त है अतः वह आत्मा को उसके कर्मों के अनुसार माता-पिता के शरीरों में प्रविष्ट कराकर व वहां उनके शरीर का निर्माण कर उन्हें जन्म देता है। जन्म के बाद एक शिशु में जो शारीरिक वृद्धि होती है उसके लिए उसे उचित आहार विहार की आवश्यकता होती है परन्तु शरीर व उसके सभी अंगों में वृद्धि ईश्वर व उसके बनाये हुए नियमों से ही होती है। मनुष्य अपनी भूख के निवारण के लिए जो भोजन करता है, गोदुग्ध व फलों आदि का सेवन करता है, उसे पता भी नहीं होता कि इसी आहार से शरीर के भीतर किस प्रकार की रसायनिक व अन्य क्रियायें हो रही हैं और कैसे उससे रस, मांस, मज्जा, अस्थि व रक्त आदि पदार्थ बन कर शरीर को पोषण व वृद्धि के लिए आवश्यक तत्व प्रदान हो रहे हैं। यह सब जो हो रहा है उसका यदि कोई वास्तविक कर्ता है तो वह आंखों से न दिखने वाला सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक परमेश्वर ही है। इसका अन्य कोई उत्तर नहीं है। विज्ञान भी आज तक इसका उत्तर नहीं दे सका। इसका कारण है कि हमारे वैज्ञानिक ईश्वर को जानने का प्रयास नहीं करते। वह भौतिक पदार्थों को तो मानते हैं परन्तु अभौतिक सत्तायें, ईश्वर व जीवात्मा, को जानने व मानने का समुचित प्रयास ही नहीं करते हैं।

 

मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसे भाषा का ज्ञान भी नहीं होता, अतः अन्य किसी विषय का ज्ञान होने की तो अपेक्षा ही नहीं की जा सकती। आज का सारा संसार मध्यकालीन अविद्याजन्य मत-मतान्तरों के चक्र में फंसा हुआ है। उन मत-मतान्तरों को ईश्वर व जीवात्मा विषयक समुचित वा पूर्ण ज्ञान नहीं है, भौतिक जगत का भी पूर्ण ज्ञान नहीं है, अतः वह आज भी अज्ञान व अविद्याजन्य मध्यकालीन मान्यताओं को ढो रहे हैं। जो मनुष्य पैदा होता है वह या तो किसी मत-मतान्तर या फिर नास्तिक मत में पैदा होता है। उसके माता-पिता उसे अविद्या की वही बातें बतातें हैं जिन्हें वह स्वयं मानते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि उनकी सन्तान भी उन्हीं बातों को यथावत् स्वीकार कर लेती है। सभी मत-मतान्तर अपने मत के विपरीत सत्य मान्यताओं, सिद्धान्तों व बातों को स्वीकार नहीं करते अपितु उनसे द्वेष करते हैं। ऐसा न करें तो उनका महत्व समाज में समाप्त होता है। अतः वह येन केन प्रकारेण अपने मत के किसी अनुयायी को अपने से बाहर जाकर सत्य का अनुसंधान करने की अनुमति नहीं देते और न स्वयं ही करते हैं। इसका परिणाम जो होता है वह आज सबके सामने है। सभी मतों में अविद्या फैली हुई है। किसी को ईश्वर व जीवात्मा के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान नहीं है।

 

ऋषि दयानन्द के जीवन पर यदि दृष्टिपात करें तो वह असाधारण संस्कारों व प्रारब्ध को लेकर पैदा हुए थे। उन्हें माता-पिता द्वारा शिवरात्रि के दिन व्रत व पूजा करने के लिए कहा जाता है। उन्हें शिव के बारे में जो बताया जाता है वह मन्दिर की शिव मूर्ति में चरितार्थ नहीं होता तो वह मूर्ति पूजा करना हमेशा के लिए छोड़ देते हैं। उन्हें इसके किसी परिणाम की परवाह नहीं होती। उनकी बहिन व चाचा की मृत्यु होती है तो वह जन्म व मृत्यु से जुड़े प्रश्नों पर विचार करने लगते हैं। इसके समाधान न मिलने पर वह परेशान हो जाते हैं और उनमें वैराग्य उत्पन्न हो जाता है। अतः इन व ऐसे अनेक प्रश्नों के समाधान के लिए वह उस समय घर छोड़ कर चले जाते हैं। यह वह समय था कि जब वैराग्य की भावनाओं को जानकर उनके माता-पिता उन्हें विवाह के बन्धन में कसने व जकड़ने का प्रबन्ध करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वह देश भर में भ्रमण करते हैं, स्थान स्थान पर जाकर धार्मिक विद्वानों व योगियों से अपने प्रश्नों का समाधान करने को कहते हैं। योग सीखते हैं। उपलब्ध सभी धार्मिक व अन्य ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं। विद्वानों व योगियों की खोज में उत्तराखण्ड के पर्वतों को पैदल ही नाप लेते हैं। अन्त में उन्हें स्वामी विरजानन्द सरस्वती नाम के विद्वान संन्यासी का ज्ञान होता है जो मथुरा में एक संस्कृत पाठशाला चलाते हैं। स्वामी दयानन्द उनके शरणागत हो जाते हैं और तीन वर्षों तक उनसे विद्याध्यन कर विद्या में स्नान कर पूर्ण विद्वान बन जाते हैं। वह वेदों को प्राप्त करते हैं और अपनी अपूर्व विद्या, योगबल व तप से उनके अर्थों को जानकर इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वेदों का ज्ञान विज्ञान सृष्टिक्रम के अनुकूल होने के साथ सभी भ्रमों को दूर कर मनुष्य को निर्भ्रान्त करने वाला है। गुरु की आज्ञा का पालन करने के लिए वह सत्य ज्ञान वेदों का प्रचार आरम्भ कर देते हैं। विपक्षी विद्वानों से शास्त्रार्थ एवं ज्ञान चर्चायें करते हैं और देश के अनेक भागों में जाकर सत्य ज्ञान वेदों का प्रचार करते हैं। घीरे धीरे उनके प्रचार से लोग उनकी तर्क व युक्ति संगत बातों को स्वीकार करने लगते हैं। लोगों की प्रार्थना पर वह सत्यार्थप्रकाश व अन्य ग्रन्थों का लेखन व प्रकाशन करते हैं। वेदों के प्रचार के लिए आर्यसमाज की स्थापना करते हैं। सभी मत-मतान्तरों के आचार्यों को ज्ञान चर्चा के लिए आमंत्रित करते हैं। कुछ आते हैं और वेदों के सिद्धान्तों के सम्मुख निरुत्तर या परास्त हो जाते हैं। बहुत से असलियत जानकर डर कर सामने आते ही नहीं हैं। इस प्रकार वह धार्मिक सिद्धान्तों व मान्यताओं में दिग्विजय करते हैं। समाज व देश उनके लिए महत्वपूर्ण था। वह सभी अंधविश्वासों, कुरीतियों व असमानताओं को दूर करने के लिए वैदिक मान्यताओं को मानने का शंखनाद करते हैं। समाज से उनके समर्थन में अनेक लोग निकलते हैं। समाज में सुधार होना आरम्भ हो जाता है और उनके देश की आजादी के विचारों के प्रचार से आजादी के आन्दोलन की नींव पड़ती है। आने वाले समय में वह देश व समाज सुधार करने वाले सर्वाधिक प्रभावशाली नेता सिद्ध होते हैं।

 

वेद एवं वेद सम्मत वैदिक साहित्य के अनुसार ईश्वर, जीव व प्रकृति अनादि व नित्य मौलिक पदार्थ हैं। यह अनादि होने के कारण अमर व अनन्त भी हैं। जीव जन्म मरण धर्मा है और ज्ञान व विवेक को प्राप्त होकर मुक्ति को प्राप्त होता है। ईश्वर नित्य मुक्त है। जीवों के कर्मों के फल प्रदान करने के लिए वह इस सृष्टि को बनाता व चलाता है। मनुष्य जो शुभ व अशुभ कर्म करता है उसे वह भोगने ही पड़ते हैं। संसार में कोई भी मनुष्य, स्वयं ईश्वर भी किसी के अशुभ व पाप कर्मों को न तो क्षमा करता है न क्षमा कर सकता है। इन सभी विषयों को सत्यार्थप्रकाश पढ़कर आसानी से समझा जा सकता है। सत्य के पिपासु व अभिलाषियों को सत्यार्थप्रकाश सहित वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिये। इससे सब भ्रान्तियां दूर हो जाती हैं। मनुष्य को जन्म उसके प्रारब्ध के अनुसार सुख व दुख भोगने और तप व साधना से मुक्ति प्राप्त करने के लिए परमात्मा देता है। माता-पिता इस कार्य में सहयोगी बनते हैं। वह ईश्वरीय व्यवस्था का पालन करने वाले निमित्त मात्र हैं। न माता-पिता को और न किसी बड़े से बड़े डाक्टर को शरीर की रचना व उसके उपचार का पूर्ण ज्ञान है। ईश्वर ही सभी विद्याओं को जानने वाला व उसे वेद के रूप में देने वाला है। तपस्वियों को भी चिन्तन मनन करने पर वह ज्ञान देता है जिससे नये नये अनुसंधान होकर मनुष्यों को सुख मिलता है। हमने जिस विषय का विचार किया था उसका उत्तर अपनी बुद्धि व विवेक से दिया है। पाठक इस विषय का ऋषि ग्रन्थों की सहायता से अध्ययन करके यथार्थ स्थिति जान सकते हैं। सभी मतों के आचार्यों को पूर्वाग्रह छोड़कर वेद की शरण में आकर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना चाहिये। इसी में उनकी, विश्व की, मनुष्य व प्राणीमात्र की भलाई है। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

 

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