लेखक परिचय

जीतेन्द्र कुमार नामदेव

जीतेन्द्र कुमार नामदेव

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प्रत्येक देश का अपना ही कानून होता है। दरअसल कानून अपराधियों को प्रताडि़त करने के लिए नहीं बल्कि उनके विचारों में बदलाव लाने के लिए बनाये जाते है। उनके मस्तिष्क में कानून का डर बना रहें और वो समाज के सभ्य लोगों को परेशान न करें। इसीलिए उन्हें कानून की दृष्टि से सजा सुनाई जाती है। पूर्वकाल में राजा महाराजाओं की बात करें तो उस युग में हाथ के बदले हाथ और जान के बदले जान का प्रावधान हुआ करता था। लेकिन अब समय बदल गया है। लोग अपने अधिकारों के प्रति काफी हद तक जागरूक हो रहें हैं। भारतीय संविधान की बहुत ही कम धाराओं के अन्तर्गत मौत या फांसी की सजा का प्रवधान है उस पर भी भारतीय राष्ट्रपति के आदेश पर उन सजाओं को टाला जा सकता है। कहने का मतलब केवल इतना है कि अब अपराधियों को अपराध की सजा केवल जेल में समय बिताकर पूरी करनी होती है।

लेकिन जब कोई अपराधी अपराध के क्षेत्र में पहली बार कदम रखता है तो उसका सामना कानून के रक्षक कहें जाने वाले जल्लादों से होता है और फिर शुरू होता है कानूनी दहशत का गंदा खेल। पुलिस आपराधिक मामलों को जल्द निपटाने के चक्कर में गरीब व मासूम लोगों पर धावा बोलती है। जिन्हें पूछताछ के नाम पर थानों में बैठाया जाता है। फिर उन्हें झूठे मुकदमों में फसाने की बात कही जाती है या फिर बदले में सुविधा शुल्क ले देकर छोड़ने की बात की जाती है। एक आम आदमी जिसके मन में कानून का खौफ समाया होता है। वो या पैसे देकर मुक्त होता है या फिर पुलिस के बनाये हुए जाल में फस जाता है।

अब कहानी शुरू होती है जेल की, एक अपराधी के लिए शायद जेल उस मंदिर की तरह हो जो अपने काम से मिलने वाले धन को समय समय पर यहां चढ़ाने आता है। लेकिन एक निर्दोष व शरीफ इंसान जब जेल में पहली बार आता है। तो उसके लिए यह किसी खौफनाक पिंजड़े की तरह है जिसमें उस परकटे पंक्षी को कैद कर दिया हो।

पैसा बाहर की दुनिया के लिए तो जरूरी है लेकिन जेल की दुनिया के लिए बहुत-बहुत ही जरूरी है। यह बात इंसान को जेल में पहंुचने बाद पता चलती है। अब आप सोच रहें होंगे कि यह क्या बात हुयी जेल में सजा काटने के लिए अपराधियों को बंद किया जाता है जिनके खाने पीने का इंतजाम स्वयं सरकार का जिम्मा होता है। तो जनाब यह बात भी सही है लेकिन सरकारी खाना तो सिर्फ कागजों में अच्छा चढ़ाया जाता है लेकिन उनक कैदियों की थाली में परोसा जाने वाला खाना तो कुत्ते भी खाने से इंकार कर दें।

लेकिन कोई बात नहीं यहां भी चलता है पैसा का राज। कहते है कि पैसे के बलबूते पर क्या नहीं खरीदा जा सकता हैं ? सबकुछ जेल के अंदर भी।

जेलों में सरकारी केंटीनें अपराधियों को मुंह का जायका बदलने के लिए चाय, समोसा, कचैड़ी जैसे पकवान भी पैस करती हैं। जिसके बदले में बाहर की अपेक्षा लगभग तीन गुना पैसा भुगतान करना पड़ता है।

आखिर यह पैसा कैदियों के पास आता कहां से है दरअसल कैदियों से मिलने के लिए उनके परिवारजन व जानने वाले लोग उन्हें जेल मेें मुलाकात के दौरान पैसे व जरूरत की सामग्री दे जाते हैं। जिसका इस्तेमाल वो अपने खाने पीने की वस्तुओं पर करते हैं। जेल के खाने से ऊब जाने के बाद कभी कवार कैदी उस पैसे से मुंह का जायका बदल लेते है। इसी लिए यह कहना गलत नहीं होगा कि जेल में भी पैसा बोलता है।

यह सारी बाते तो समझ में आती है लेकिन यह बात कुछ हजम नहीं होती कि जेल में अपराधियों को सुधारने का प्रयास किया जाता है। लेकिन अपराधी तो ओर भी ज्यादा बिगड़ जाते हंै। पैसे वाले अपराधी इसका गलत लाभ उठाते है। आपराधिक प्रवृति के लोग पैसे के बलबूते पर जेल के कानूनों को ताक पर रखकर मौज उड़ाते हैंै। क्योंकि घूसखोर व सुविधा शुल्क लेने वाले लोग यहां भी भरे पड़े हैं। जो थोड़े से लाभ के लिए आपको जेल के अन्दर वो सारी वस्तुएं मुहैया करा सकते हैं जो आपराधिक लोगों की जरूरत होती है। इसमें शामिल है जैसे गुटका, तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट व पान मसाला। जेल में इन सभी चीजों पर प्रतिबंध होने के वाबजूद इन्हें जेल में बेचा जाता है। लेकिन यह सब बाहरी दाम से लगभग पांच गुना मंहगे दिये जाते है। अब जब गैर कानूनी बस्तुओं का क्रेय करना है तो दाम भी तो ज्यादा चुकाने पड़ेंगे।

पैसे के बलबूते पर कुछ अपराधी अपनी सुकून की जिंदगी जेल में बिताते हैं। वो अपनी खुशामत भी कराते है और अपराधियों के नेता भी बन जाते हैं। जिनका पक्ष जेल के छोटे तबके के अधिकारी भी लेते हैं। वहीं मुसीबत के मारे गरीब अपराधी बेवसी की जिंदगी गुजारतें हैं और हर पल अपने बाहर की दुनिया की कल्पनाओं मंे खोये रहते हैं। वो हर वक्त अपनी बाहरी दुनिया में वापस जाने का ख्याल करते रहते हैं। ऐसे लोग ही जेल में बिताई जिंदगी को कभी भूल नहीं पाते वो उनकी जिंदगी का सबसे बुरा वक्त बन जाता है। जिससे बाहर निकलने के बाद वो कभी याद करना नहीं चाहते। ऐसे लोगों पर कानून का ’’अपराधियों को सुधारने’’ वाला पेन्तरा काम कर जाता है। लेकिन आपराधिक प्रवृति के अपराधियों के लिए तो यह मंदिर की दहलीज है जिसका वो माथा चुमते है। क्योंकि उन्हें कानूनी की सच्चाई पता और साथ में कानून के गुरगों की हकिकत भी। जिसका वो सही लाभ उठाते है।

पैसा दुनिया में हर वस्तु दिला सकता है। लेकिन क्या उन लोगों का खोया हुआ वक्त दुवारा नही दिला सकता है जो कई दिन, महिने व सालें जेल के अन्दर बिताई है। कई लोग बिना अपराध किये अपराधी बन जाते हैं और अपना पूरा जीवन जेल में बिता देते है। उन पर समाज की नजर में एक आपराधी की मौहर लग जाती है। उन परिवार में बहने, भाईयों की शादी संबंध की बात मानों सपने की तरह लगने लगती हैं। वहीं पूरी जिंदगी जेल में बिताने वाले बेगुनाह अपराधी अपने बेटे-बेटी की शादी नहीं देख पाते।

अपराधी सजा पाकर भी नहीं सुधरते तो कुछ बेगुनाह कानून का शिकार होकर अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा खो चुके होते हैं।

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