लेखक परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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एक लड़की थी गोरी नारी सुंदर गोल मटोल| यह तो नहीं मालूम उसने कितने बसंत पार किये थे किंतु वह जवान थी और कुँवारी भी|उसके बाप का मकान बीच शहर में था| लड़की यदा कदा मकान की छत पर खड़ी हो जाती और् धूप अटारी पर खड़ी खोले सिर के बाल वाली कहावत चरितार्थ करती रहती| सामने के मकान में रहने वाले बिगड़े नवाब‌ से उसकी आंखें चार हो गईं| कहतें जिसकी आंखें चार हो जाती हैं वह उन्नति की सीढ़ियां बहुत जल्दी चढ़ जाना चाहता है| लड़का सामने के दरवाजे से उसके घर में घुसने लगा|लड़की ने समझाया कि मज़नूजी सामने के दरवाजे से न आया करें वरना हम जल्दी ब्दनाम हो जायेंगे |मुहल्ले के सारे लोग देखते हैं|

“तो प्यारी लैला मैं क्या करूँ,तुम्हारे बिना तो एक पल भी नहीं रह सकता,मजनूं ने अपनी मजबूरी बताई| लड़की परेशान थी मज़नू को भुलाना संभव नहीं था|बदनामी के साथ साथ वह अपने बाप से भी डरतीथी|उसने इतिहास के पन्ने पल्टे,शीरी फरिहाद लैला मजनूं

सोनी महिवाल, रूपमती बाज़बहादुर और मस्तानी बाज़ीराव से प्रेरणा ली|उसके दिल ने कहा”लैला अक्ल से काम ले,पीछे का दरवाज़ा खोल दे और इसी दरवाज़े सॆ मजनूं को आने दे|हर्र लगेगी और न फिटकरी और तेरा रंग भी चोखा होता रहेगा| फिर क्या था पिछला दरवाज़ा खुलने लगा|

दोपहर को लोग जब अपने घरों में मंत्रियों की तरह आराम फरमा रहे होते,लड़की का बाप सरकारी काम से सरकार कोचूसने

गया होता ,माँ गैर सरकारी काम से अपने कमरे में सो रही होती और भाई देश के विकास के लिये अपनी बीवी के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा होता,लड़की पिछला दरवाज़ा खोल देती और मजनू जी अंदर आ जाते|अब कविता की पंक्तियाँ’धूप अटारी में पड़ी ले सूरज को संग हो जातीं|सिलसिला चल पड़ा|लैला मजनूं और पिछला दरवाज़ा जैसे एकाकार होकर एक दूसरे में आत्मसात हो गये|

एक दिन मिस्टर मजनूं को एक जूनियर मजनूं ने लड़की घर में घुसते देख लिया|

“तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाये” जूनियर मज़नूं गुर्राया|

“जैसा एक मज़नूं दूसरे मज़नूं के साथ करता है|” मजनू सीनियर ने लापरवाही से जबाब दिया|उसने हिंदुस्तानी सिकंदरों और पौरवों का इतिहास बांचा था|फिर क्या था दोनों मजनू लड़की के घर में घुसने लगे|क्रमिक और सिलसिलेवार विकास की पायदाने चढ़ते हुये मजनुओं की संख्या बढ़ने लगी| हज़ारों मजनुओं के लड़की के कमरे मे घुसने से आखिरकार भंडा फूट गया| लड़की गर्भवती हो गई|बिना सौभाग्यवती हुये गर्भवती हो जाना हमारे समाज में कलंक माना जाता है|लड़की के बाप को लड़की कि करतूत मालूम पड़ गई|माँ को जानकारी मिल गई|भैया को पता लग गया |सारा शहर स्तब्ध रह गया|अब सर्च हो रही रही है इतने सारे मजनूं लैला के कमरे में कैसे घुसे|पिछले दरवाज़े का निरीक्षण् हो रहा है,दरवाज़े की लंबाई चौड़ा नापी जा रही है|लोगों को लड़की के बाप पर शक है|मजनुओं की मिली भगत से बाप ही लड़की शोषण करवा रहा था| सरकारी सेवा सुंदरी में आवटन नामक शैतान दीवार फाँदकर भीतर कूदता रहा और सरकार के बाप को भनक भी नहीं पड़ी,इस विषय पर हमारे देश के नौजवान और नौजवाननियायें रिसर्च कर पी.एच. डी. कर

सकते हैं| पिछले दरवाजे की महिमा का बखान पुराने ग्रंथों में भी मिलता है| पुराने घरों में शौचालय पीछे की तरफ ही रहते थे|सफाई करने वाले पीछे के पीछे आकर सफाई कर जाते थे|अभी भी सफाई हो रही है किंतु मल के बदले में माल साफ हो रहा है|बड़े बड़े सब घुटाले पीछे के दरवाजों से हो रहें हैं| यार लोग समझते हैं कि सब काम सनातनी ढंग से हो रहा हैपर भाई साहिब देखिये न क्या हो रहा है|अरबों खरबों रुपयों का पता ही नहीं चलता कहां गये|हमने जितनी भी गिनती प्राथमिक शालाओं पढ़ी थी मसलन इकाई, दहाई ,सैकड़ा हज़ार दस हज़ार लाख दस लाख करोड़ दस करोड़ अरब दस अरब खरब दस खरब नील दस नील पदम दस पदम शंख दस शंख ….बस उसके बाद………इल्ले इससे ज्यादा घुटाल कैसे गिनोगे| वे तो कहते हैं कि हम इतना खायें कि तुमतो क्या तुम्हारे बाप भी नहीं गिन पायेंगे | तभी तो पकड़ने वाले मशीन लिये नोट गिनते रहते हैं और यह भी कूत नहीं सकते कि खाने वाले ने कितने सूंत लिये|मेरा एक सवाल है कि यदि आप चालीस‌ हज़ार रुपये प्रति माह कमाते हैं तो दो लाख करोड़ कमाने में आपको कितने साल लगेंगे|प्लीज़ बतायें न|

पिछला दरवाजा तो प्रायः हर घर में होता है

पिछले दरवाजे से न जाने क्या क्या होता है

जिस घर में पिछला दरवाजा नहीं लगा

उसका मालिक अपनी किस्मत को रोता है|

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2 Comments on "कमाल पिछले दरवाजे का-प्रभुदयाल श्रीवास्तव"

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आलोक
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प्रभु दयाज जी बहुत अच्छा काम है आपका बधाई
सम्पर्क करे आलोक यादव संपादक समाजवादी आनदोलन 08445636162

एल. आर गान्धी
Guest

बहुत खूब….

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