लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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(१) सुस्वागतम् यवन देशे”

२६ अप्रैल २००७ को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम जी ग्रीस देश गए थे। वहाँ आप के स्वागत समारम्भ में ग्रीस के राष्ट्रपति श्री कार्लोस पम्पाडॅलिस ने

“राष्ट्रपति महाभाग। सुस्वागतम् यवन देशे”

इस संस्कृत वाक्य से अपने भाषण का प्रारंभ कर स्वागत किया था । अपने भाषण में उन्हों ने संस्कृत यह प्राचीन भारतीय भाषा है, और उसका सम्बंध ग्रीक भाषा से भी है, ऐसा कहा था।

(२)ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः

और, उसी वर्ष, जुलाई २००७ में, अमरिकी सेनेट का सत्र प्रारम्भ संस्कृत में वैदिक प्रार्थना, से हुआ था। गत २१८ वर्षों के अमरिका के इतिहास में ऐसी घटना पहली बार ही घटी थी । ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः के उद्गारों से प्रार्थना का अन्त हुआ , तो सेनेट में शान्ति छायी रही ; पश्चात् तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूँज उठा।

(३)वैदिक गणित

कुछ वर्ष पहले, एक अमरिकी सज्जन संस्कृत में छपी, वैदिक गणित (मॅथेमॅटिक्स) की पुस्तक के कुछ अंशो के अर्थ के विषय में चर्चा करने मुझ से समय माँगने आए थे। परामर्श के लिए उचित पारिश्रमिक शुल्क भी देना चाहते थे।

(४)शुद्ध देवनागरी

मेरी युनिवर्सीटी की फॅकल्टी के डीन, डॉ. फ़ॉन्टेरा जिन्होंने अहमदाबाद की मिलों के प्रबंधन पर ,पी. एच. डी. का शोध निबंध लिखा था, उस शोध के समय भारत भी रहे थे; वे अपने ऑफिस के प्रवेश द्वार पर शुद्ध देवनागरी में भी अपनी नाम पट्टिका लगाते थे। मेरा साक्षात्कार कर नियुक्ति करवाने में भी उनका योगदान था।

(५) जन्म सिद्ध, सर्वाधिकार

उपरि लिखित सच्चाइयां, आप को प्रमाणित करती हैं, कि, सारे संसार में, संस्कृत को उस के जानकार बडे आदर से देखते हैं। उसे जानने में गौरव का अनुभव करते हैं। जहाँ सारे संसार में संस्कृत को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, उस संस्कृत पर जिस देश का जन्म सिद्ध, परम्परा गत सर्वाधिकार है, या यूं कहे, कि एकाधिकार (Monopoly) ही है , उस भारत के लक्षण कुछ निराशा जनक ही प्रतीत होते हैं। कहीं मैं गलती तो नहीं कर रहा? नहीं नहीं। ऐसा अन्य विषयों में भी हुआ है।

(६)योगदान संस्कृत

* भारत को वास्तव में अपनी सर्वोत्कृष्ट भाषा देववाणी संस्कृत पर गर्व होना चाहिए, गौरव होना चाहिए।

संसार में १८ प्रमुख भाषा परिवार है, और सभी भाषा परिवारों में सबसे आगे यह भारोपिय भाषा परिवार अति समृद्ध और अति प्रगत माना जाता है। इस भाषा परिवार को ऐसा उन्नततम स्थान प्राप्त कराने में भी, और सारी भाषाओं को सिंचित कर पल्लवित और पुष्पित करने में भी योगदान संस्कृत का ही मानता हूँ। और भी मानते हैं।

(७)संस्कृत के साथ जुडने की होड

प्राच्यविदों में अपनी अपनी भाषा को संस्कृत के साथ जोडने की एक होड सी लगी थी।

अलग अलग प्राच्यविदों ने कभी इस भाषा परिवार को, जिस में संस्कृत है; कभी ’इन्डो-युरोपियन’, कभी ’इन्डो-जर्मन’, कभी ’इन्डो-आर्यन’, तो कभी ’इन्डो-इरानियन’ भाषा परिवार के नाम से उल्लेखित किया। पर हर नाम में ’इन्डो’ स्थायी रूप से रहा। क्यों? कारण था हर कोई गुट अपनी पहचान संस्कृत के साथ करने में गौरव मानता था।

पर हमें जिन्हे संस्कृत की समूचि धरोहर प्राप्त है, उन्हें, संस्कृत भाषा पर कितना गर्व-गौरव है?

उसका प्रचार प्रसार करने में, और उसका संसार में, डंका बजाने में कितनी रूचि है? और नहीं, तो बताइए क्यों नहीं?

(८) संस्कृतिक दूत

हम चाहते तो सहस्रो संस्कृत पण्डितों को प्रोत्साहित कर सारे संसार में भेजते। वे वहां पर हमारे संस्कृतिक दूत के भांति भी काम करते, और हमारे लिए संसार भर में सद्‌ भावना ही फैलाते। हमें व्याख्यानों के लिए यदि, आमंत्रित किया जाता है, तो वह गीता के किसी विषय पर, हिन्दु दर्शन पर, चार पुरूषार्थों पर, परिवार की भारतीय प्रणाली पर इत्यादि इत्यादि ….ऐसे विषयों पर बुलाया जाता है। कोई हमें सेक्युलरिस्म पर व्याख्यान देने नहीं बुलाता।

(९)विल ड्युरांट

अमरिकन इतिहासकार विल ड्युरांट, संस्कृत और भारत के विषय में क्या कहता है ?

“भारत हमारे वंशगत, प्रजाति की मातृ भूमि थी, और संस्कृत युरपकी भाषाओं की जननी: वह हमारे दर्शन शास्त्र की जन्मदात्री थी; अरबों द्वारा हमें प्राप्त हुए गणित (के ज्ञान) की माता, बुद्ध द्वारा प्रसारित, इसाइ संप्रदाय के आदर्शों की भी जननी वही है। ग्राम पंचायत की परंपरा से प्राप्त, स्वशासन और जनतंत्र की जननी भी, भारत ही है। भारत माँ अनेकविध परंपराओं से हम सभी की माँ ही है।”

(१०)विल्यम जोन्स

सर विल्यम जोन्स (ब्रिटीश प्राच्यवेत्ता ) क्या कहता है ?

“संस्कृत भाषा जो कुछ भी उसकी प्राचीनता हो, अद्भुत गठन (संरचना ) वाली,

युनानी(ग्रीक) से अधिक परिपूर्ण, लातिनी(लॅटीन) से अधिक शब्द-समृद्ध, और (लातिनी और युनानी) दोनों से अधिक सूक्ष्मता से, परिष्कृत (साफ ) की गई भाषा है।”

सारे संस्कृतज्ञ यदि उद्धरित किए जाएं, तो पन्ने के पन्ने नहीं एक छोटीसी पुस्तक भर जाएं।

(११)संस्कृत को मृत भाषा नहीं “अमृत भाषा”

प्रत्येक निर्णय का प्रभाव-क्षेत्र और प्रभाव की काल-परिधि अलग अलग होती है। कुछ निर्णय देश को कुछ समय के लिए ही, प्रभावित करते हैं। कुछ निर्णय सारे राष्ट्र को, लम्बे काल तक प्रभावित करते ही रहते हैं।

इस लिए हरेक निर्णय समान महत्वका नहीं होता।

पर संस्कृत को मृत भाषा घोषित करना किसी भी दृष्टिसे बहुत गम्भीर और दीर्घ काल तक विपरित प्रभाव पैदा करने वाला निर्णय है। इसे, बन्दर के हाथ में आरी दे कर या दिया सलाइ थमा कर उत्तेजित करने जैसा निर्णय मानता हूं।

ऐसे निर्णय का फल हमारी बाद की पीढियों को अननुमानित काल तक भुगतना पडेगा।

कौन सी शक्तियां ऐसी संस्कृति द्रोही, संस्कृत द्रोही, ज्ञानद्रोही, राष्ट्र द्रोही, निर्णय के पीछे हो सकती है ?

सोचिए।

सोचिए।

जी हां आपका अनुमान सही है।

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23 Comments on "॥अमृत भाषा संस्कृत॥- डॉ. मधुसूदन उवाच"

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आर. सिंह
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मुदगल जी इस विषय पर इतनी चर्चा हो चुकी है की अब इसे आगे बढाने का दिल तो नहीं चाहता ,पर मेरे जिस कथन का स्पष्टीकरण आपने चाहा है,उसमे मेरे कहने का अर्थ सिर्फ यह था की मेरी जानकारी के अनुसार संस्कृत कभीआम जनता में बोली जाने वाली भाषा नहीं बन सकी और न इसे आम जनता में आने दिया गया. मेरे विचार से बहुत सोची समझी साजिशके अंतर्गत इसे अभिजात वर्ग तक सीमित कर दिया गया था,जिससे इसका एक विशेष स्थान बना रहे और इसके जानने वाले हमेशा समाज में विशिष्ट स्थान रख सकें यह कार्य मुस्लिमों के भारत… Read more »
Jeet Bhargava
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सिंह साहब द्वारा जापानियों की अंगरेजी वाया संस्कृत सीखने की बात वाकई में कमाल की है.
कुछ सप्ताह पूर्व मैंने इंटरनेट पर लेख पढ़ा था कि विदेश में किसी शोध अध्ययन से पता चला है कि संस्कृत के अध्ययन से मानसिक विकास में तीव्रता आती है. ..!!
मजे की बात है कि ये सब भारत या भारतीय नहीं बल्कि जापानी और अन्य विदेशी कर रहे हैं.
हमारे यहाँ तो संस्कृत घर की मुर्गी दाल बराबर है. और इसकी पैरवी करना साम्प्रदायिकता भी…!!

डॉ. मधुसूदन
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देखा हमारा लाभ?
आर सिंह साहब ने जो लिखा है।
“ऐसे समाचार आया है कि जापनी लोग संस्कृत का अध्ययन कर रहे हैं क्योंकि इससे उन्हें अंग्रेजी सीखने में आसानी होती है.पता नहीं संस्कृत के लिए यह शगुन है या अशगुन.”
सिंह साहब,
आप हम भी तो डिक्षनरी में कोष्ठक मे लिखे देवनागरी से अंग्रेज़ी के उच्चारण सीखते थे। चीनी जपानी वगैराह कैसे सीखेंगे?
उनके पास तो उच्चारानुसारी लिखने की सुविधा नहीं है।कोइ बोलकर बताए तभी? इस लिए शायद हमारे अंग्रेज़ी उच्चारण, चीनी ,जपानियों से मैं ने अधिक शुद्ध पाए हैं।
देखा हमारा लाभ?

आर. सिंह
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मैं जो कहना चाहता हूँ ,वह यह है कि मेरे विचार से संस्कृत के पतन या अवनति के वास्तविक दोषी वे ही हैं,जिनकी जिम्मेवारी थी कि वे संस्कृत का विकास करें .उसे जन मानस की भाषा बनाएं.जैसे गुरुकुलों में उस समय सबको स्थान पाना संभव नहीं था उसी तरह सब लोग संस्कृत भी नहीं पढ़ सकते थे.यह अभिजात वर्ग की भाषा थी.साधारण जनता की पहुँच से या तो यह बहुत पहले बाहर हो चुकी थी या यह कभी भी जन साधारण की भाषा बनी ही नहीं..जातक कथाओं के संस्कृत में नहीं होने का भी यही कारण है यह भी हो… Read more »
Rekha Singh
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डाक्टर मधु भाई का यह संस्कृत ज्ञान एवं अन्य भारतीय भाषाओं का ज्ञान उन्हे संस्कारी , बुद्धजीवी राष्ट्रावादी माता पिता से मिला है |वह प्रोफेसर संस्कृत के नहीं किसी और विषय के है |उनकी ९६ बर्षीय माता जी भी तीन भाषाऔ गुजराती मराठी हिंदी की बहुत ही जानकार है , कुल मिलाकर कहने का मतलब है की हमारी संस्कृति का धारा प्रवाह इसी तरह से चलता है |जो व्यक्ति अंग्रेजी के साथ संस्कृत भी पढ़ा लिखा होगा वह सरदार पटेल की तरह भारत के बारे मे सोचेगा, मात्रभूमी के बारे में सोचेगा और निर्णय लेगा और जो सिर्फ अंग्रेजी पढ़ा… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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बहन रेखा जी।
सप्रेम नमस्कार।
माताजी की ओरसे आपको आशीष।
कुछ सकुचाया सा अनुभव कर रहा हूँ।
धन्यवाद।

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