लेखक परिचय

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान युवा पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. आपने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों दैनिक भास्कर, अमर उजाला और हरिभूमि में कई वर्षों तक सेवाएं दीं हैं. अनेक साप्ताहिक समाचार-पत्रों का सम्पादन भी किया है. ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है. आपने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लिए लेखन भी जारी है. आपकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक एक किताब प्रकाशित हो चुकी है, जिसे काफ़ी सराहा गया है. इसके अलावा डिस्कवरी चैनल सहित अन्य टेलीविज़न चैनलों के लिए स्क्रिप्ट लेखन भी कर रही हैं. उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल संपादन और लेखन के लिए आपको कई पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भी शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली है. आप कई भाषों में लिखती हैं. उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और रशियन अदब (साहित्य) में ख़ास दिलचस्पी रखती हैं. फ़िलहाल एक न्यूज़ और फ़ीचर्स एजेंसी में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं.

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-फ़िरदौस ख़ान

हिन्दुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. हालत यह है कि बेटे के लिए दुल्हन तलाशने वाले मुस्लिम वाल्देन लड़की के गुणों से ज़्यादा दहेज को तरजीह (प्राथमिकता) दे रहे हैं. हालांकि ‘इस्लाम’ में दहेज की प्रथा नहीं है. एक तरफ जहां बहुसंख्यक तबक़ा दहेज के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहा है, वहीं शरीयत के अलमबरदार मुस्लिम समाज में पांव पसारती दहेज प्रथा के मुद्दे पर आंखें मूंदे बैठे हैं.

क़ाबिले-गौर है कि दहेज की वजह से मुस्लिम लड़कियों को उनके पैतृक संपत्ति के हिस्से से भी अलग रखा जा रहा है. इसके लिए तर्क दिया जा रहा है कि उनके विवाह और दहेज में काफ़ी रक़म ख़र्च की गई है, इसलिए अब जायदाद में उनका कोई हिस्सा नहीं रह जाता. ख़ास बात यह भी है कि लड़की के मेहर की रक़म तय करते वक़्त सैकड़ों साल पुरानी रिवायतों का वास्ता दिया जाता है, जबकि दहेज लेने के लिए शरीयत को ‘ताक़’ पर रखकर बेशर्मी से मुंह खोला जाता है. उत्तर प्रदेश में तो हालत यह है कि शादी की बातचीत शुरू होने के साथ ही लड़की के परिजनों की जेब कटनी शुरू हो जाती है. जब लड़के वाले लड़की के घर जाते हैं तो सबसे पहले यह देखा जाता है कि नाश्ते में कितनी प्लेटें रखी गईं हैं, यानी कितने तरह की मिठाई, सूखे मेवे और फल रखे गए गए हैं. इतना ही नहीं दावतें भी मुर्ग़े की ही चल रही हैं, यानि चिकन बिरयानी, चिकन कोरमा वगैरह. फ़िलहाल 15 से लेकर 20 प्लेटें रखना आम हो गया है और यह सिलसिला शादी तक जारी रहता है. शादी में दहेज के तौर पर ज़ेवरात, फ़र्नीचर, टीवी, फ़्रिज, वाशिंग मशीन, क़ीमती कपड़े और ताम्बे- पीतल के भारी बर्तन दिए जा रहे हैं. इसके बावजूद दहेज में कार और मोटर साइकिल भी मांगी जा रही है, भले ही लड़के की इतनी हैसियत न हो कि वो तेल का ख़र्च भी उठा सके. जो वाल्देन अपनी बेटी को दहेज देने की हैसियत नहीं रखते, उनकी बेटियां कुंवारी बैठी हैं.

मुरादाबाद की किश्वरी उम्र के 45 बसंत देख चुकी हैं, लेकिन अभी तक उनकी हथेलियों पर सुहाग की मेहंदी नहीं सजी. वह कहती हैं कि मुसलमानों में लड़के वाले ही रिश्ता लेकर आते हैं, इसलिए उनके वाल्देन रिश्ते का इंतज़ार करते रहे. वो बेहद ग़रीब हैं, इसलिए रिश्तेदार भी बाहर से ही दुल्हनें लाए. अगर उनके वाल्देन दहेज देने की हैसियत रखते तो शायद आज वो अपनी ससुराल में होतीं और उनका अपना घर-परिवार होता. उनके अब्बू कई साल पहले अल्लाह को प्यारे हो गए. घर में तीन शादीशुदा भाई, उनकी बीवियां और उनके बच्चे हैं. सबकी अपनी ख़ुशहाल ज़िन्दगी है. किश्वरी दिनभर बीड़ियां बनाती हैं और घर का काम-काज करती हैं. अब बस यही उनकी ज़िन्दगी है. उनकी अम्मी को हर वक़्त यही फ़िक्र सताती है कि उनके बाद बेटी का क्या होगा? यह अकेली किश्वरी का क़िस्सा नहीं है. मुस्लिम समाज में ऐसी हज़ारों लड़कियां हैं, जिनकी खुशियां दहेज रूपी लालच निग़ल चुका है.

राजस्थान के बाड़मेर की रहने वाली आमना के शौहर की मौत के बाद पिछले साल 15 नवंबर को उसका दूसरा निकाह बीकानेर के शादीशुदा उस्मान के साथ हुआ था, जिसके पहली पत्नी से तीन बच्चे भी हैं. आमना का कहना है कि उसके वाल्देन ने दहेज के तौर पर उस्मान को 10 तोले सोना, एक किलो चांदी के ज़ेवर कपड़े और घरेलू सामान दिया था. निकाह के कुछ बाद ही उसके शौहर और उसकी दूसरी बीवी ज़ेबुन्निसा कम दहेज के लिए उसे तंग करने लगे. यहां तक कि उसके साथ मारपीट भी की जाने लगी. वे उससे एक स्कॉर्पियों गाड़ी और दो लाख रुपए और मांग रहे थे. आमना कहती हैं कि उनके वाल्देन इतनी महंगी गाड़ी और इतनी बड़ी रक़म देने के क़ाबिल नहीं हैं. आख़िर ज़ुल्मो-सितम से तंग आकर आमना को पुलिस की शरण लेनी पड़ी.

राजस्थान के गोटन की रहने वाली गुड्डी का क़रीब एक साल पहले सद्दाम से निकाह हुआ था. शादी के वक़्त दहेज भी दिया गया था, इसके बावजूद उसका शौहर और उसके ससुराल के अन्य सदस्य दहेज के लिए उसे तंग करने लगे. उसके साथ मारपीट की जाती. जब उसने और दहेज लाने से इंकार कर दिया तो पिछले साल 18 अक्टूबर को उसके ससुराल वालों ने मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया. अब वो अपने मायके में है. मुस्लिम समाज में आमना और गुड्डी जैसी हज़ारों औरतें हैं, जिनका परिवार दहेज की मांग की वजह से उजड़ चुका है.

यूनिसेफ़ के सहयोग से जनवादी महिला समिति द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दहेज के बढ़ रहे मामलों के कारण मध्य प्रदेश में 60 फ़ीसदी, गुजरात में 50 फ़ीसदी और आंध्र प्रदेश में 40 फ़ीसदी लड़कियों ने माना कि दहेज के बिना उनकी शादी होना मुश्किल हो गया है. दहेज को लेकर मुसलमान एकमत नहीं हैं. जहां कुछ मुसलमान दहेज को ग़ैर इस्लामी क़रार देते हैं, वहीं कुछ मुसलमान दहेज को जायज़ मानते हैं. उनका तर्क है कि हज़रत मुहम्मद साहब ने भी तो अपनी बेटी फ़ातिमा को दहेज दिया था. ख़ास बात यह है कि दहेज की हिमायत करने वाले मुसलमान यह भूल जाते हैं कि पैग़ंबर ने अपनी बेटी को विवाह में बेशक़ीमती चीज़ें नहीं दी थीं. इसलिए उन चीज़ों की दहेज से तुलना नहीं की जा सकती. यह उपहार के तौर पर थीं. उपहार मांगा नहीं जाता, बल्कि देने वाले पर निर्भर करता है कि वो उपहार के तौर पर क्या देता है, जबकि दहेज के लिए लड़की के वाल्देन को मजबूर किया जाता है. लड़की के वाल्देन अपनी बेटी का घर बसाने के लिए हैसियत से बढ़कर दहेज देते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें कितनी ही परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े.

हैरत की बात यह भी है कि बात-बात पर फ़तवे जारी करने मज़हब के ठेकेदारों को समाज में फैल रहीं दहेज जैसी बुराइयां दिखाई नहीं देतीं. शायद इनका मक़सद सिर्फ़ बेतुके फ़तवे जारी कर मुस्लिम औरतों का जाना हराम करना ही होता है. इस बात में कोई दो राय नहीं कि पिछले काफ़ी अरसे से आ रहे ज़्यादातर फ़तवे महज़ ‘मनोरंजन’ का साधन ही साबित हो रहे हैं. भले ही मिस्र में जारी मुस्लिम महिलाओं द्वारा कुंवारे पुरुष सहकर्मियों को अपना दूध पिलाने का फ़तवा हो या फिर महिलाओं के नौकरी करने के ख़िलाफ़ जारी फ़तवा. अफ़सोस इस बात का है कि मज़हब की नुमाइंदगी करने वाले लोग समाज से जुड़ी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते. हालांकि इसी साल मार्च में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिम समाज में बढ़ती दहेज की कुप्रथा पर चिंता ज़ाहिर करते हुए इसे रोकने के लिए मुहिम शुरू करने का फ़ैसला किया था. बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य ज़फ़रयाब जिलानी के मुताबिक़ मुस्लिम समाज में शादियों में फ़िज़ूलख़र्ची रोकने के लिए इस बात पर भी सहमति जताई गई थी कि निकाह सिर्फ़ मस्जिदों में ही करवाया जाए और लड़के वाले अपनी हैसियत के हिसाब से वलीमें करें. साथ ही इस बात का भी ख़्याल रखा जाए कि लड़की वालों पर ख़र्च का ज़्यादा बोझ न पड़े, जिससे ग़रीब परिवारों की लड़कियों की शादी आसानी से हो सके. इस्लाह-ए-मुआशिरा (समाज सुधार) की मुहिम पर चर्चा के दौरान बोर्ड की बैठक में यह भी कहा गया कि निकाह पढ़ाने से पहले उलेमा वहां मौजूद लोगों बताएं कि निकाह का सुन्नत तरीक़ा क्या है और इस्लाम में यह कहा गया है कि सबसे अच्छा निकाह वही है जिसमें सबसे कम ख़र्च हो. साथ ही इस मामले में मस्जिदों के इमामों को भी प्रशिक्षित किए जाने पर ज़ोर दिया गया था

सिर्फ़ बयानबाज़ी से कुछ होने वाला नहीं है. दहेज की कुप्रथा को रोकने के लिए कारगर क़दम उठाने की ज़रूरत है. इस मामले में मस्जिदों के इमाम अहम किरदार अदा कर सकते हैं. जुमे की नमाज़ के बाद इमाम नमाज़ियों से दहेज न लेने की अपील करें और उन्हें बताएं कि यह कुप्रथा किस तरह समाज के लिए नासूर बनती जा रही है. इसके अलावा औरतों को भी जागरूक करने की ज़रूरत है, क्योंकि देखने में आया है कि दहेज का लालच मर्दों से ज़्यादा औरतों को होता है.

अफ़सोस की बात तो यह भी है कि मुसलिम समाज अनेक फ़िरकों में बंट गया है. अमूमन सभी तबक़े ख़ुद को ‘असली मुसलमान’ साबित करने में ही जुटे रहते हैं और मौजूदा समस्याओं पर उनका ध्यान जाता ही नहीं है. बहरहाल, यही कहा जा सकता है कि अगर मज़हब के ठेकेदार कुछ ‘सार्थक’ काम भी कर लें तो मुसलमानों का कुछ तो भला हो जाए.

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3 Comments on "अब दहेज का शिकार हो रही हैं ‘हव्वा की बेटियां’"

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Umarah
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Yeh bohot hi dukhd hai..aur isse bhi zyada dikhad yeh baat hai ki musalmaan dahej lene ke liye mazhab ka sahara lene lage hain!

Voice of the People
Guest
इस्लाम को लोग कम जानते हैं और दुनिया के दस्तूर को आज इस्लाम समझने लगे हैं और बेवजह परेशां होते हैं. इस्लाम में दहेज़ को सिदक कहते हैं और यह वोह रक़म है जो पति अपनी पत्नी को प्रेम प्रकट करने के लिये बतौर तोहफा देता है. अगर कोई पति यह न देना चाहे और पत्नी इसकी मांग करे तोह पति को देना होगा. इसको इस प्रकार से भी कह जा सकता है की शादी करते वक़्त यह पति की ज़िम्मेदारी है की वोह पत्नी के रहने को घेर, और घेर के ज़रूरी सामान जमा करे और बीवी को बतौर… Read more »
Sheeba Aslam Fehmi
Guest

फ़िरदौस जी की बात सही है. पूरे दक्षिण – एशिया ख़ास कर भारतीय मुसलमानों में दहेज (उर्दू में जहेज़) के प्रति लालच बढ़ा है. लड़केवाले खुलेआम दहेज़ में अपेक्षित सामान या पैसा मांग रहे हैं.
इस पर लगातार लिखिए फ़िरदौस जी.
sheeba_atplus@yahoo.com

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