लेखक परिचय

निधि सक्‍सेना

निधि सक्‍सेना

दिल्ली में जन्म। राजस्थान स्कूल ऑफ आटर्स जयपुर, वनस्थली, भारतीय विद्या भवन, फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट पूना वगैरह से कला-पत्रकारिता-टीवी की पढ़ाई, लिखाई। फ़िलहाल, जयपुर में निवास। कम उम्र की समझदार और मौलिक रचनाकार हैं। स्कल्पचरिस्ट और पेंटर होने की वज़ह से कला की परख तो उन्हें है ही, वे दूरदर्शन-नेशनल के कला परिक्रमा कार्यक्रम से भी जुड़ी रही हैं। उनकी कलाकृतियों का बहु-बार प्रदर्शन हुआ है। नारी-विमर्श की पैरोकार निधि डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाती हैं और फ़िलहाल जयपुर दूरदर्शन के लिए धारावाहिक राग रेगिस्तानी का स्वतंत्र निर्माण, लेखन और निर्देशन कर रही हैं।

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स्त्री केंद्रित चित्र, पुरुष चित्रकार और स्त्री कलाकार की समीक्षा-दृष्टि

कला किसके लिए! इसके हज़ारों जवाब हैं, लेकिन मुकम्मल कोई नहीं, शायद इसीलिए ये सवाल अब तक मौजूं है। क्या कला इंसान के लिए, उसकी तक़लीफ़ बयां करने के लिए है? या रसना-नयन तृप्ति के लिए है…विलास का साधन है…? कला को लेकर विमर्श की ये धारा अलग-अलग तरीकों से परवान चढ़ती रही है। पिछली बार जयपुर में हुई एक ख़ास कला प्रदर्शनी के बहाने औरतों की नज़र में क्या है पुरुष? इसकी चर्चा  हुई…। आज एक और कला-नोट आपके लिए पेश है…, लेकिन इस बार कलाकार ने खुद के चित्रों के बारे में नहीं बताया, ना ही कोई और उनका काम मूल्यांकित कर रहा है…। विषय स्त्री पर है, चित्रकार पुरुष हैं और समीक्षा दृष्टि एक स्त्री की, एक चित्रकार की है…।

पहले चित्रकार के बारे में..ये हैं…रामकृष्ण अडिग। अडिग कौन हैं?

युवा पत्रकार डॉ. दुष्यंत के शब्दों में, `अडिग एक विचित्र जीव हैं। कभी वैश्विक सिनेमा के घोर दर्शक…कभी भारतीय शास्त्रीय और अल्पज्ञात विदेशी संगीत के गुणी रसिक। बिरले गंभीर साहित्य पाठक…और सबसे पहले तथा आखिरकार एक सजग और विशिष्ट चित्रकार। इस विचित्र से जीव का कलाकर्म अपने समय के साथ आंख मिलाने के पागलपन में रचा हुआ है…’

इन्हीं अडिग की ताज़ा चित्र प्रदर्शनी पर अपनी नज़र डाल रही हैं युवा चित्रकार निधि सक्सेना। स्त्री को पोट्रे करते अडिग और उनके काम के निकष में जुटी एक अन्य स्त्री, वो भी चित्रकार…यही इस आलेख की खासियत है। एक बात और, जो उल्लेखनीय है…कुछ चीजें जब लुप्तप्राय हो जाती हैं, तो ललचाती हैं और, और ज्यादा…काश बची रहती…तो काम आती…ऐसी ही हो गई है ईमानदारी। आदतन हो, ज़ुबान में हो, चाहे भाषा में हो या फिर व्यवहार में…, ये दिखती नहीं, कभी दिखे भी तो नाटकीयता से लबालब लगती है। निधि सक्सेना अपने काम और लहजे के साथ आत्मिक तौर पर ईमानदार हैं…ये उनकी ताक़त है और यही उनकी भाषा में भी दिखती है। यहां बहुत-से दोहराव हैं, जो भाषा की `देह’ पर मुग्ध हो जाने वालों को अखरेंगे, लेकिन निधि के लिए ये सहज है, मौलिक है और अपनी अभिव्यक्ति का तरीका भी…भूमिका इतनी ही, अब सीधे लेख – मॉडरेटर

और अब मोहतरमा


ज्यादा वक्त नहीं बीता, जब रामकृष्ण अडिग के चित्रों की प्रदर्शनी जयपुर के जवाहर कला केंद्र में लगाई गई. पांच पेंटिंग और 16 पेंसिल वर्क थे। अडिग ने प्रदर्शनी का नाम रखा मोहतरमा. यूं तो पढ़ने वाले मोहतरम-मोहतरमाएं आप समझदार हैं! तो शब्द समझाने की ज़रूरत नहीं, लेकिन क्या करें, भूमिकाएं हमेशा से आगे और आगे आती रही हैं। हिंदी में मेम साहब, उर्दू में मोहतरमा और अंग्रेजी में मैडम काफ़ी मज़ेदार शब्द हैं। यूं तो ये काफी तहज़ीब से महिला की बुलाहट का औपचारिक शब्द है! लेकिन अक्सर इसका इस्तेमाल दूसरे ही रूप में रंग देता है। व्यंग्य करने के लिए ही मोहतरमा कहा जाता है और व्यंग्य के उस स्वर में मैडम या मोहतरमा सुनने पर महिलाओं के कान से जी तक जल जाते हैं। तो चित्रकार अडिग आपकी बनाई महिलाओं की 21 आकृतियों में मोहतरमा का कौन सा स्वर है?

अडिग के सभी चित्रों में महिला अपनी ही आकृति में उलझी और बंधी हुई दिखाई देती है। हर फ्रेम में महिला की वह उलझी आकृति अकेली है! कहीं-कहीं उस उलझी आकृति में गोलाकार लय भी है और साथ में शहरी जीवन के कुछ भौतिक बिंब भी हैं। क्या अडिग की ये महिलाएं ब्यूरोक्रेट, दंभी, अति-अति आधुनिक, वाचाल, अभिमानी रूप हैं! दरअसल, महिलाओं के दो ही रूप कलाओं में अधिकतर सर्टिफाइड रहे हैं। एक तो आंख में पानी वाली मां और दूसरा अल्ट्रा मॉडर्न आज़ादी में मिनी स्कर्ट को पैराशूट बनाकर उड़ने वाली औरत…लेकिन ये दोनों ही रूप औरत के शोकेस पीस हैं।

उसका एकदम निजी रूप भी है, जो उसका खुद का, अपने लिए मैं वाला रूप है। जिसमें औरत खुद अपना खोया-पाया वाला हिसाब रखती है। अडिग की मोहतरमा दरअसल वही हैं। औरत का स्वयं वाला निजी स्वरूप।

21 कलाकृतियों में एक मध्यवर्गीय औरत के बनने और बने रहने की दौड़ है। ये सदी का अंतिम सत्य तो नहीं है, लेकिन अधिकांशतः होता यही है कि दुनिया में दफ्तर में पन्ने पर या किसी चित्र में बनने औऱ बने रहने की भागदौड़ में व्यस्त औरत आखिरकार अकेली ही होती है…और और अकेली होती जाती है।

चर्चित किताब winner stands alone के कवर पर भी औरत अकेली ही खड़ी है, यानी जीतोगी तो अकेली ही रहना होगा…औरत को साथ और जीत में से एक चीज चुन लेनी चाहिए। शायद इसीलिए अडिग की औरत भी एकल ही है।

कई लोग कहेंगे, ऐसा नहीं है…यह भयानक feminist approach है. नहीं…ना अडिग का, ना मेरा ही ये इरादा है कि मैं men verses woman वाली जंग को ज़रा और हवा दें या उसकी आग में मिट्टी का तेल डालें…लेकिन कुछ तो है…कभी फेमिनिस्ट मूवमेंट शुरू हो जाते हैं-कभी इस विचार को पूरी तरह नकारते हुए ढांपा-काटा और लुप्त ही कर दिया जाता है…फिर भी कहानियों-कविताओं और चित्रों में महिलाओं के अलग-अलग रूप और बातें होती हैं। आखिर ये क्या है…और इस पर बात होनी चाहिए। कोई साहब यह भी कहेंगे कि चित्रों के रंग, संख्या और टेक्स्चर के बारे में बात करें…लेकिन साहब अडिग ने ये चित्र बनाए क्यों हैं? कोई भी चित्र क्यों बनाता है…विचार के लिए ही ना ताकि विचार पर बात हो सके और बात आगे बढ़ सके। लेकिन चित्रों के विचार पर बात करना हम भूल गए हैं….नहीं भूले नहीं हैं…तभी तो समीक्षाएं जारी हैं, लेकिन विचार हम रंगों के बीच गोल कर गए हैं। तो आइए मोहतरमाओं पर फिर वही युगों-युगों से चली आ रही और जारी रहने वाली जली-कटी-भुनी women verses men वाली बहस…बहस खेलें…शायद मोहतरमा पर बात और बहस कुछ मुकम्मिल हो और अडिग के चित्रों की मोहतरमा के ज़रिए औरत के निज की समझी-नासमझी वाले दरवाज़े पर खटखट कर पाएं।

फ़ोटो–– रामकृष्ण अडिग

मोहतरमा…पेंटिंग

मोहतरमा-1, पेंसिल स्केच

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6 Comments on "कला समीक्षा: और अब मोहतरमा"

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Satish
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ही ग्रेट हाउ रु एंड थिस मत्तेर इस वैरी गुड

alpana verma
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Waah!
bahut hi badhiya sameeksha ki aap ne Nidhi.
Adeeg ji ki painting bahut pasand aayi.
Sketch bhi bolta sa lagta hai.

sadhak ummedsingh baid
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चित्रकार की कल्पना, पकङ ना पाये मनवा.
मगर समीक्षा खूब है, निधि पा गया ये सधवा.
पाया निधि,( की) और चित्र देखने की भी दृष्टि पाई.
कला-समीक्षा करने की औकात भी आई.
कृतज्ञ साधक इस ट्टिपणी में रखता मन साकार.
पकङ ना पाये मनवा वो कल्पना करे चित्रकार.

ANILREJA
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सर, निधि सक्सेना का अर्तिक्ले और पनितिंग इस अब्सोलुतेल्य उप तो थे मार्क . बेस्ट ऑफ़ लुक्क एंड प्राय तो गोद फॉर ग्रेट व्रित्तिंग एंड सेंसीटिवे व्रिते-उप फॉर मकिंग पोपले मोरे इन्फोर्मतिवे. बेस्ट ऑफ़ लुक्क-अनिल रेजा, मुंबई

rajendra
Guest

एक जन्मजात कलाकार की मौत होने पर शरीर पड़ा रह जाता है और सिवाय पथराई आँखों के जिनमे कोइ बिम्ब बनाता ही नहीं वेसी कुछ हालत होती है जब ऐसे चित्र देखनो को मिलते हैं जिन्हें समझाना मुश्किल है उनमे सौंदर्य ढून्ढ निकालने की पारखी नज़र हर किसी के पास होती भी नहीं इस लिए आधुनिक कला दुरूह होती नज़र नहीं आती?

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