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-मनमोहन कुमार आर्य-  Arya Samaj

‘आर्य’ शब्द मनुष्य निर्मित शब्द न होकर परमात्मा की देन है जो उसने वेद के माध्यम से सृष्टि के आरम्भ में ही हमें दिया गया था। वेद वह ईश्वरीय ज्ञान है जो ईश्वर ने सृष्टि की आदि में चार ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा के हृदय में प्रेरणा द्वारा स्थापित किया। वेदों में अनेकों स्थानों पर मनुष्यों के लिए ‘आर्य’ शब्द का प्रयोग मिलता है। ‘आर्य’ शब्द एक गुणवाचक शब्द व नाम है जिसे हम सृष्टि के सभी मनुष्यों को बिना उनका निज नाम जाने सम्बोधन के लिए प्रयोग कर सकते हैं। यह ऐसा ही है जैसे अंग्रेजी में अनजान व्यक्ति या व्यक्तियों को सम्बोधन के लिए ‘जेन्टलमैन’ शब्द का प्रयोग करते हैं। जेन्टलमैन के अर्थ हैं ’विशिष्ट व्यक्ति। यही भावना व इससे कहीं अधिक प्रभावशाली शब्द आर्य है। पहला कारण तो यह हमें इस संसार के निर्माता ईश्वर से प्राप्त हुआ है। दूसरा इसके अर्थ देखने पर यह विदित होता है कि इसमें अनेकानेक गुणों का समावेश है। क्या ऐसे गुण संसार के किसी अन्य शब्द में हैं जिसका प्रयोग हम मनुष्यों के लिए करते हैं ? यदि नहीं है तो इसे अपनाने व अन्य अल्प गुण व अल्प भद्रभाव वाले शब्दों को छोड़ने में हमें क्यों आपत्ति है? आईये आर्य शब्द में निहित वाच्यार्थ व भावार्थ को देखते हैं। आर्य शब्द में श्रेष्ठ स्वभाव, धर्मात्मा, परोपकारी, सत्य-विद्यादि गुणयुक्त और आर्य देश में उत्पन्न होना व बसना आदि गुण व भाव निहित है। इसका यह भी अर्थ है आर्य दुष्ट स्वभाव से पृथक होता है, उत्तम विद्यादि के प्रचार से सबके लिए उत्तम भोग की सिद्धि और अधर्मी दुष्टों के निवारण के लिए निरन्तर यत्न करता है। अत: आर्य कहलाने वाले व्यक्ति सत्यविद्या आदि शुभ गुणों से अलंकृत होते हैं।

आर्य ज्ञानपूर्वक गमन करते हुए अपने उद्देश्य की पूर्ति करने वाले व्यक्ति को भी कहते हैं। आर्य, कृत्रिम जीवन व स्वभाव से दूर होता है व उसका जीवन व स्वभाव सत्य से पूर्ण होता है। आर्य असत्य से घृणा करता है व सत्य के प्रति उसमें स्वभाविक रूचि व उसे ग्रहण व धारण करने का स्वभाव होता है। इस प्रकार वह सत्यप्रिय, सत्यवादी, सत्यमानी व सत्यकारी होता है। आर्य वह होता है जो ईश्वरीय ज्ञान वेदों को अपना धर्म ग्रन्थ, प्रेरणा ग्रन्थ व उसके सृष्टिक्रम के अनुकूल, सत्य, ज्ञान, व्यवहारिक व मानवीय हित से संगत अर्थों के अनुसार जीवन-यापन करता है। वेद को पढ़ना-पढ़ाना व सुनना-सुनाना उसका परम धर्म होता है। वेद की शिक्षाओं को धारण व पालन कर ही आर्य बना जा सकता है। आर्य वह भी होता जो शान्ति व लोक कल्याण की भावना वालों से वैर या शत्रुता नहीं रखता। उसमें अहंकार नहीं होता जिससे वह कभी कोई दुष्कर्म नहीं करता और इस कारण कभी पतित भी नहीं होता। आर्य, पात्र व्यक्तियों व संस्थाओं को उनके पोषण व उद्देश्य की पूर्ति के लिए यथाशक्ति दान देता है। महर्षि दयानन्द के अनुसार धार्मिक, विद्वान, देव व आप्त पुरूषों का नाम आर्य है। आर्य मांस भक्षण, मद्यपान, धूम्रपान, नाना अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं करता और ऐसे लोगों की संगति से सदैव दूर रहता जिससे यह दुर्गण उसको न लग जायें। समाज के अग्रणीय आर्यों के घरों में भोजन पकाने का कार्य अज्ञानी, मूर्ख व पवित्र कर्मों को करने वाले लोग करते थे जिनकी प्राचीन काल में सूद्र संज्ञा थी। सूद्र जाति सूचक शब्द न होकर ज्ञान की कमी वाले व्यक्तियों के लिए प्रयोग में लाया जाता है। गुण, कर्म व स्वभाव से सूद्र भी सत्यवादी, सत्यमानी, धर्मात्मा व गुणी होता है। गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित ब्राह्मणों, क्षत्रियों व वैश्यों की संगति से उसके अन्दर विद्या से इतर सभी गुण, कर्म व स्वभाव, शुद्धता व पवित्रता आदि गुण भी, आ जाते हैं व उसकी सन्तानें अध्ययनोपरान्त आर्य तथा गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार द्विज हो जाती हैं। आर्य ब्रह्मचर्य सेवी होते हैं और सन्ध्या, अग्निहोत्र आदि पंच महायज्ञों को विधि विधान के अनुसार करते हैं। वेदों में ईश्वर कहते हैं कि उन्होंने यह सृष्टि व भूमि आर्यों के लिए बनाई व उन्हें दी है, अनार्यों को नहीं। अत: अनार्यों को भी आर्य बनने का प्रयत्न, अर्थात आर्यों के गुण, कर्म व स्वभाव को धारण व पालन करके अपना कल्याण करना चाहिये।

आजकल वैदिक धर्मी व इतर धर्मावलम्बी लोगों में आर्यों की गुण ग्राहकता की प्रवृति का अभाव पाया जाता है। यह आश्चर्य है कि अभक्ष्य पदार्थ, पशु-पक्षियों के मांस व अण्डे आदि का सेवन करने व दूसरों का अहित करने वाले चतुर-चालाक लोग स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं और कोई खुलकर उनके आचरण को अनुचित कहने का साहस नहीं करता। हमारे चिन्तन के अनुसार इसका कारण उनका ईश्वर के सत्य-स्वरूप व कर्मफल के सत्य सिद्धान्तों को न जानना व न मानना है। वह तो पापों के क्षमा होने में वि’वास रखते हैं और शायद इसी कारण भी अनुचित कर्म या पाप कर्मों को करते हैं। वेदों के प्रमुख विद्वान तथा निरूक्त के प्रणेता आचार्य यास्क ‘आर्य’ को ईश्वर का पुत्र घोषित करते हैं। वेद के अनुसार आर्य “अमृतस्य पुत्र:” हैं। इसका तात्पर्य भी अविनाशी परमात्मा की तरह आर्य भी अविनाशी व मोक्ष सुख को प्राप्त करने वाले उसके ऐसे पुत्र हैं जिनकी कार्यों से वह अतीव प्रसन्नता अनुभव करता है। आर्य शब्द उनके लिए भी अभिहित है जो सदा से आर्यावर्त में रहते आये हैं तथा जो इस आर्यावर्त वा भारतवर्ष को अपनी जन्मभूमि, मातृभूमि, पितृभूमि, कुलभूमि व पुण्य-भूमि मानते हैं तथा अपनी जन्मभूमि की तुलना में अन्य किसी देश की भूमि को उच्च या महान नहीं मानते। आर्य की एक परिभाषा यह भी है कि आर्य कर्तव्यों का पालक और अकर्तव्यों का निरोधक तथा ई’वर की आज्ञानुकूल चलने वाला होता है। वह आठ गुणों यथा ज्ञान, सन्तोष, संयम, सत्याचरण, जितेन्द्रियता, दान, दया और विनय से युक्त होता है। पारसी मत की धर्म पुस्तक जिन्दावस्ता में कहा गया है कि हम आर्यों के सम्मानार्थ हवन करते हैं जिन्हें मजदा परमेश्वर ने बनाया है। अहुरमजदा भगवान ने जरदुश्त से कहा कि मैंने आर्यों को भोजन, पशु समूह, धन, प्रतिष्ठा, ज्ञान-भण्डार और द्रव्य राशि से सम्पन्न किया है जिससे वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। ईरान के राजा तो अपने नाम से पूर्व आर्यमिहिर शब्द का प्रयोग किया करते थे। ऋग्वेद के मन्त्र “इन्द्रं वर्धन्तोअप्तुर: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्ण:।।’ में कहा है कि दस्युओं को निस्तेज व प्रभावहीन कर सारे विश्व को आर्य अर्थात श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाव युक्त करो वा बनाओ।

इन सब गुण व विशेषणों के अतिरिक्त आर्य वह भी होता है जो पूर्णत: अहिंसक हो और विपरीत किन्हीं परिस्थितियों में कभी निराशा न होकर आशावादी बना रहे तथा दुर्गति को प्राप्त होने पर भी पाप न करे। आर्य वीर होता है, कार्य कदापि नहीं होता। सिख मत के एक ग्रन्थ पंच प्रकाश में कहा गया है कि ‘जो तुम सिख हमारे आरज देवों सीस धर्म के कारज अर्थात् यदि तुम हमारे सिख शिष्य और आरज आर्य हो तो धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश अर्पित करो। आर्य की पहचान उसके सिर पर चोटी व कन्धे पर यज्ञोपवीत हुआ करता था। इन दोनों चोटी व यज्ञोपवीत के लिए सहस्रों व लाखों आर्यों ने अपने सीस बलिदान किये हैं। अपने यज्ञोपवीत संस्कार पर शिवाजी महाराज ने आज से लगभग 450 वर्ष पूर्व 7 करोड़ 10 लाख रुपये खर्च किये थे। इससे अनुमान किया जा सकता है कि आर्य कहलाने का क्या महत्व होता है। महाराणा प्रताप सहित अन्य अनेकों ने अपनी आन, बान व शान के लिए शब्दों में न कही जा सकने वाली दारूण विपदायें सही परन्तु अपना आर्यत्व का स्वाभिमान नहीं छोड़ा।

समस्त वेद को एक प्रकार से हम मानव को आर्य बनाने के विधान का पुस्तक भी कह सकते हैं। यह विधान किसी एक मनुष्य, जाति या समुदाय तक सीमित न होकर सारे संसार के प्रत्येक मानव, स्त्री व पुरुष, के लिए है और सभी समान रूप से इसक अधिकारी हैं। आर्य में सन्निहित गुणों, कर्मों व स्वभावों को धारण करने वा कराने के लिए ही महर्षि दयानन्द सरस्वती ने 10 अप्रैल, 1875 को मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना की थी। आर्य समाज के दस उद्देश्यों व नियमों को यदि देखें तो इसमें भी मनुष्यों को आर्य बनाने का ही विधान किया गया है। आर्य वह होता है जो यह मानता है कि सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उनका आदि मूल परमेश्वर है। आर्य, ईश्वर को सच्चिदानन्द स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तरयामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता जानता व मानता है एवं उसी की उपासना करता है, ईश्वर से भिन्न अन्य किसी की उपासना नहीं करता। आर्यों के लिए वेद ईश्वर से उत्पन्न सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है और वेद को पढ़ना व दूसरों को पढ़ाना, सुनना व अन्य को सुनाना उनका परम धर्म है। आर्य सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहते हैं। वह सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य व असत्य को विचार कर करते हैं। संसार का उपकार करना अर्थात् सबकी शारिरीक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है और यही आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य भी है। वेदों की मान्यता के अनुसार आर्य सभी से प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार व यथायोग्य व्यवहार करते हैं। आर्य का ध्येय वाक्य है कि अविद्या का नाश व विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। वह ही आर्य हैं जो अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट नहीं रहते, अपितु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझते हैं। आर्य समाज का दसवां अन्तिम नियम है कि सभी मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम पालने में सब स्वतन्त्र रहें। आर्य समाज की स्थापना वेदों के ज्ञान को देश-विदेश में प्रचारित करने के लिए की गई थी। साथ ही देश-विदेश में फैले पाखण्ड, अन्धविश्वास, कुरीतियों व अज्ञान को मिटाकर वेद ज्ञान के अनुसार मानव जीवन को संवारने का प्रयास करना भी उसका उद्देश्य था। यद्यपि आर्य समाज की विचाराधारा का सारे विश्व पर व्यापक प्रभाव हुआ है, तथापि जो कुछ हुआ उससे कहीं अधिक होना अभी शेष है। इसके लिए हमें अपने संगठन को प्रभावाली बनाना है। आज हमारे संगठनों की मुख्य समस्या लोगों का धन, सम्पत्ति, पद व प्रतिष्ठा के मकड़जाल में फंसे होना है। यदि यह दूर हो जायें तो आर्य समाज का संगठन अपेक्षित उद्देश्य को पूरा करने में सक्षम व समर्थ हो सकता है।

हम समझते हैं कि यह कार्य हो नहीं पा रहा है। ऐसा न होने के कारण बहुत से लोग संगठन से पृथक होकर या तो स्वतन्त्र रूप से कार्य करते हैं या फिर शिथिल हो जाते हैं। हमारे आस-पास ऐसे शिथिल हो गये लोगो की बड़ी संख्या है। ऐसे लोगों को एकत्रित कर एक आजाद हिन्द फौज की तरह प्रत्येक जिले के स्तर पर संगठन बनाया जा सकता है जिसमें किसी भी आर्य समाज के पदाधिकारी को स्थान न देकर वही लोग हों जो अपने-अपने समाज के संगठन से असन्तुष्ट हों। वह संगठन में अपनी भूमिका स्वयं तय करें और महर्षि दयानन्द के स्वप्नों को साकार करने के लिए अपना श्रम, बल व पुरूषार्थ अर्पित करें। जो लोग आर्य समाज के संगठन से जुड़े हुए व उसमें सक्रिय हैं, उन्हें भी आर्य समाज के अपने दायित्वों को निर्धारित कर उस पर आचरण करना चाहिये। आर्य समाज में होने वाले साप्ताहिक सत्संगों के अतिरिक्त आर्य समाज के लगभग एक किमी. की परिधि में सघन प्रचार की योजना बनाकर उसमें सहयोग करना चाहिये। लोकसभा, विधानसभा व नगर निगम आदि के चुनाव की भांति अपने क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति या परिवार तक जाकर उन्हें वैदिक साहित्य भेंट करना चाहिये। इस अवसर पर कुछ लघु पुस्तकें उन्हें भेंट की जा सकती हैं जिनके विषय हमारा धर्म एवं वेद, मनुष्य का यथार्थ धर्म क्या है?, धर्म और अधर्म, आर्य धर्म और कर्म फल सिद्धान्त, क्या मांसाहारी व मद्यपायी का अगला जन्म मनुष्य का ही होगा?, आर्य समाज की मान्यतायें, आर्य समाज का अतीत व इसके भविष्य की योजनायें, वेद का महत्व व अन्य मत-मतान्तर, ईश्वर का यथार्थ स्वरूप व हमारी पूजा पद्धतियां, मनुष्यों के पांच प्रमुख नित्य कर्म व हमारी दिनचर्या, वेदों के अनुसार जीवन से वर्तमान व भविष्य मे होने वाले व्यक्तिगत व सामाजिक लाभ व उन्नति आदि अनेकानेक विषयों पर स्वरचित व प्रकाशित व अन्यत्र प्रकाशित साहित्य मंगाकर लोगों को वितरित किया जा सकता है।

आर्य समाजों में विद्यार्थियों के लिए यह व्यवस्था हो कि प्रत्येक रविवारीय सत्सग में 12 से 20 वर्ष के विद्यार्थी का एक 5-10 मिनट का प्रवचन कराया जाये जिसका विषय उसे आर्य समाज मे एक माह या दो माह पहले दे दिया जाये। उस विषय से सम्बन्धित लिखित सामग्री भी उसे तैयारी करने के लिए पूर्व ही दे दी जाये। इससे युवक वर्ग को आर्य समाज से जोड़ा जा सकता है। सत्यार्थ प्रकाश का पाठ, भजन, सामूहिक प्रार्थना, स्वरचित कविता पाठ आदि विद्यार्थी व युवा वर्ग के युवक-युवतियों द्वारा ही सम्पन्न कराये जायें तो इसके अच्छे परिणाम हो सकते हैं। इसका प्रयोग हम वर्ष 1993-94 में देहरादून में कर चुके हैं। इसके साथ आर्य समाज के अधिकारियों को सपरिवार सत्संग में आने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिये। ऐसे व्यक्तियों को जो परिवार सहित आर्य समाज में वर्ष में अधिक से अधिक आयें, उन्हें पुरूस्कृत किया जाना चाहिये। हमें यदा-कदा अन्तरंग वा साधारण सभा की होने वाली बैठकों में यह विचार करना चाहिये कि वेदों के प्रचार को अधिक प्रभावशाली कैसे बनाया जा सकता है? आर्य समाज में केवल वैदिक विद्वानों के ही प्रवचन न हों अपितु यदा-कदा आर्यसमाज से इतर प्रतिष्ठित व्यक्तियों को देश, धर्म व संस्कृति से जुड़े विषयों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाये और उन्हें आर्य साहित्य ससम्मान भेंट किया जाये। हम अनुभव करते हैं इन सबका आर्य समाज के प्रचार व विस्तार पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा। आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य वेदों के अनुसार देश, समाज व व्यक्ति का निर्माण करना व न्याय व्यवस्था स्थापित करना है। वेद से अच्छी व्यवस्था कोई हो ही नहीं सकती है। यदि कहीं कुछ अच्छा है जो हमें अपने पास नहीं दिखता, तो उसे परीक्षा कर स्वीकार कर लेना चाहिये। हमारा मानना है कि आर्य समाज हर दृष्टि से श्रेष्ठतम समाज व संस्था होनी चाहिये। यदि नहीं है तो फिर हम अपनी संस्था को आर्य समाज नहीं कह सकते। हम नगरों की प्रत्येक आर्य समाज में एक अतिथिशाला की अनिवार्यता भी अनुभव करते हैं जहां अतिथियों के लिए कम से कम पांच कक्ष या कमरे हों। स्वच्छ बिछौने, स्वच्छ आधुनिक शौचालय व स्नानागार, भोजन, जलपान, चाय, काफी आदि की उचित मूल्य पर व्यवस्था भी होनी चाहिये। आज की परिस्थितियों में यह आवश्यक नहीं है कि आर्य समाज में दो-तीन दिन के प्रवास पर आने वाले से आर्य समाज के अधिकारी का लिखा हुआ पत्र मांगा जाये। कोई भी व्यक्ति जो अपने मान्य परिचय पत्र की फोटो कॉपी देता है, उसे अतिथिशाला में स्थान मिल जाना चाहिये। अधिकारी व कर्मचारियों का व्यवहार उन आगन्तुकों के प्रति अपने परिवार जैसा होना चाहिये। एक बार हम वर्षा के कारण मार्ग के किनारे एक धार्मिक संस्था में रूक गये। हमें आश्चर्य हुआ कि वहां के कर्मचारी व अधिकारियों ने अपने आसन छोड़ दिये और हमें बैठने का अनुरोध किया। ऐसा प्रिय व्यवहार किया जिसकी हमें उनसे अपेक्षा नहीं थी। ऐसा सम्मानजनक व प्रिय व्यवहार हमें अपने जीवन में किसी अपरिचित आर्य समाज से मिला ही नहीं है जबकि आर्य समाजों में जाने पर हुए कटु अनुभव तो अनेक हैं। अत: आर्य समाज का व्यवहार में व्यापक दृष्टिकोण को अपनाना व दूरदर्शिता से काम लेना संस्था व संगठन के लिए हितकारी है।

समय-समय पर आर्य समाज की शिरोमणि सभायें व संस्थायें आर्य महासम्मेलन आयोजित करती रहती हैं। हमारी दृष्टि में यह आयोजन बहुत ही आवश्यक एवं उपयोगी हैं। इन आयोजनों में हमें आर्य समाजों की वर्तमान स्थिति पर विचार कर उन्हें अधिक प्रभावशाली नये दिशा निर्देश देने चाहियें। जिस आर्य समाज की कोई विशेष उपलब्धि हो उसे पुरस्कृत भी करना चाहिये जिससे अन्य उसका अनुकरण कर सकें। विद्वानों को ऐसा चिन्तन प्रस्तुत करना चाहिये जिससे आर्यों का मार्गदर्शन हो। समाज द्वारा उपेक्षित विद्वानों व वृद्ध सदस्यों को अपने आसपास के आर्य समाजों में जाते रहना चाहिये और वहां जो भी अच्छाइ व कमियां दृष्टिगोचर हों, उन्हें सम्बन्धित सभा के अधिकारियों को सुधार के लिए लिखित व मौखिक पहुंचाना चाहिये। इस बात की चिन्ता नहीं करनी चाहिये कि वह जिस आर्य समाज की कमियां सूचित कर रहे हैं, वहां के अधिकारी व सदस्य उनसे नाराज हो जायेंगे। यदि खेत में समय पर फसल को बोना व काटना, खाद, पानी, निराई, गुडाई आदि कार्य नहीं होगा तो फिर उस फसल से आशानुरूप फल की प्राप्ति नहीं होगी। हां, विद्वानों को आप्त पुरूष बनकर निष्पक्ष रूप से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना चाहिये। उनका उद्देश्य अपना व्यक्तिगत राग-द्वेष पूरा करना या निज लाभ व हानि नहीं होना चाहिये। निष्पक्ष भाव से ऐसा करने से समाज व आर्य समाज के मिशन के उद्देश्य की पूर्ति का लाभ होगा जिसका श्रेय मुख्य या गौण रूप से उन समालोचक बन्धुओं को भी मिलेगा।

सभी महासम्मेलनों में अनेक विषयों के साथ-साथ सरकारी एंवं निजी कार्यालयों व जीवन में हिन्दी के व्यवहार व प्रयोग की समीक्षा, विदेशी भाषा की स्थिति, हिन्दी के प्रयोग से समस्त देशवासियों को लाभ, हिन्दी को न अपनाने व अंग्रेजी को जारी रखने से आम आदमी को होने वाली कठिनाई व हानि पर व अन्य अनेक बिन्दुओं पर विचार होकर मांग-प्रस्ताव पारित किये जाने चाहिये। इसी प्रकार गोरक्षा व मांसाहार पर भी सारगर्भित विचार व समीक्षा होकर सरकार को प्रस्ताव भेजे जाने चाहिये। आर्य समाज के प्रचार प्रसार के लिए एक अभिनव योजना यह बना सकते हैं कि स्कूलों की छुट्टियों के अवसर पर युवा विद्यार्थियों को साथ लेकर गली, मुहल्लों व बस्तियों में जाकर मौखिक वेद प्रचार किया जाये जिस प्रकार की ईसाई बन्धु करते हैं। पूर्व कथन के अनुसार देश काल व परिस्थिति के अनुरूप साहित्य रचकर व प्रकाशित कर उसे वितरित भी किया जा सकता है। यदि इस प्रकार की योजना बनेंगी तो निश्चित रूप से समाज में जागृति आयेगी और आर्य समाज को लाभ होगा। सम्मेलन से पूर्व आर्य समाजों से यह जानकारी प्राप्त कर कि किसने कितने सत्यार्थ प्रकाश त्रैमासिक, छमाही या वार्षिक वितरित किये, उससे विद्वानों, वक्ताओं व श्रोताओं को अवगत कराना चाहिये और अन्य सभी को ऐसा करने की प्रेरणा करनी चाहिये। आर्य समाज की वैब पर सत्यार्थ प्रकाश एवं प्रमुख ग्रन्थों की अनेक भाषाओं की पीडीएफ बनाकर अपलोड करनी चाहिये जिससे दुनियाभर में लोग इनसे लाभ उठा सके। हमने कल ही पारसी मत की लगभग ३९५ पृष्ठों की धर्म पुस्तक “जन्द-अवेस्ता” के अंग्रेजी अनुवाद व संस्करण को अपने कम्प्यूटर पर प्राप्त किया है। बाइबिल, अन्य धर्म पुस्तकें व अन्य सामग्री भी नेट पर उपलब्ध हैं। आज के समय में प्रचार में यह कार्य आवश्यक एवं सहायक है। हमारे विद्वानों को आर्य महासम्मेलन में विद्वानों को प्रचार के नये-नये तौर तरीकों, विधियों व प्रचार योजनाओं पर विचार व्यक्त करने चाहिये जिससे सम्मेलन में भाग लेने वालों का मार्गदर्शन हो। पण्डित लेखरामजी ने अपनी वसीयत में कहा था कि लेख या लेखन का कार्य जारी रहना चाहिये। हमें आज आर्य समाज की विचारधारा, सिद्धान्तों व मान्यताओं को सर्वोत्कृष्ट व सर्वोत्तम सिद्ध करने वाले लेख व अन्यों के पाखण्ड, कुरीतियों, अन्धविश्वासों व अज्ञान को आर्य समाज के 6ठे नियम के अनुसार विस्तृत तर्कों व प्रमाणों के साथ प्रस्तुत कर विरोधियों की अज्ञानमूलक मान्यताओं को अस्वीकार्य बनाना चाहिये। ऐसे अनेकानेक विषय हो सकते हैं जिन पर विचार कर हम अपना भावी पथ निर्धारण कर सकते हैं।

आर्य, वेदों के अनुसार जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति को कह सकते हैं। वैदिक मान्यताओं के अनुरूप जीवन उत्कृष्ट जीवन होता है। ऐसा हमारे एक लेख ‘वैदिक जीवन पद्धति श्रेष्ठ व सर्वोत्तम’ (वेदवाणी दिसम्बर 2013 व जनवरी 2014) में सोदाहरण प्रस्तुत किया गया है। ऐसा सर्वोत्कृष्ट जीवन संसार के प्रत्येक व्यक्ति का होना चाहिये। इसी के प्रचार के लिए महर्षि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना की थी। आर्य महासम्मेलन आर्य समाज को गतिशील बनाने एवं लक्ष्य प्राप्ति में सहायता व दिशा-निर्देश देने का कार्य करता है। सभी आर्यों, आर्य समाज के अधिकारियों व कार्यकर्ताओं को वर्तमान एवं भावी आर्य महासम्मेलनों में प्रस्तुत विद्वानों व आर्य नेताओं के विचारों को मनन कर उससे लाभ उठाना चाहिये।

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