लेखक परिचय

जयप्रकाश सिंह

जयप्रकाश सिंह

लेखक युवा पत्रकार और लोक-संस्कृति, लोक-ज्ञान तथा पर्यावरणीय विषयों के अध्येता हैं। अस्मिता -संकट के वर्तमान में दौर में 'भारतीय परिप्रेक्ष्य' के संधान में लगे हुए हैं। लेखक का मानना है कि भारतीय विशेषताओं की परख पश्चिमी कसौटियों पर किए जाने से ही भारतीयों में हीन-भावना और अंधानुकरण की प्रवृत्ति पनपी है। भारतीय विशेषताओं का भारतीय परिप्रेक्ष्य और कसौटियों पर मूल्यांकन करके विकास की सही दिशा और उर्जा प्राप्त की जा सकती है।

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गीता का प्रथम श्लोक ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे ‘ भारतीय मनीषा को उत्कृष्टतम अभिव्यक्ति देने वाले ग्रंथ की शुरुआत मात्र नहीं है , यह व्यवस्था की एक एक विशेष स्थिति की तरफ संकेत भी करता है। एक ऐसी जब सत्य और असत्य के बीच आमना-सामना अवश्यम्भावी बन जाता है। इस स्थिति में पूरी व्यवस्था व्यापक बदलाव के मुहाने पर खडी होती है। असात्विक शक्तियों की चालबाजियों, फरबों और तिकडमों से आम आदमी कराह रहा होता है। अभिव्यक्ति में असत्य हावी हो जाता है। परम्परागत सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक संरचनाओं में संडाध इस कदर बढ चुकी होती है कि अपने हितों के लिए मूल्य एवं आदर्श को ताक पर रखना सहज व्यवहार बन जाता है। राज और समाज को संचालित करने वाली शक्तियां इतनी मदमस्त हो जाती है कि उनके खिलाफ ‘लो इन्टेंसिटी वार’ अप्रासंगिक हो जाता है।

लेकिन इस स्थिति का एक सकारात्मक पक्ष भी होता है। वह यह कि सात्विक शक्तियां असात्विक शक्तियों की चुनौती को ताल ठोंककर स्वीकार करती है। इस कारण प्रत्यक्ष संघर्ष अपरिहार्य बन जाना है। दोनों पक्षों को एक-दूसरे के खिलाफ शंखनाद करना पडता है। चूंकि यह संग्राम धर्म की स्थापना के उद्देश्य से लडा जाता है इसलिए जिस भूमि पर सेनाएं डटती हैं, वह धर्मभूमि बन जाती है । इस स्थिति की एक विशेषता यह भी है कि अपने तमाम अच्छे आग्रहों के बावजूद संचार और संचारक (मीडिया और पत्रकार) असात्विक शक्तियों के पाले में ही खडे दिखायी देते हैं और उनकी भूमिका मात्र ‘आंखो देखा हाल’ सुनाने तक सीमित हो जाती है।

भारत जिस कालखण्ड से गुजर रहा है उसमें भी भारतीयता और अभारतीयता के बीच का संघर्ष तेजी से ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ की स्थिति की स्थिति की ओर बढ रहा है। हालांकि इस युद्व का क्षेत्र कुरुक्षेत्र तक सीमित न रहकर सम्पूर्ण भारत है। एक लम्बी योजना के तहत उन शक्तियों पर निशाना साधा जा रहा है जो वर्तमान प्रणाली में भारतीयता को स्थापित करने का प्रयास कर रही है, भारतीय प्रकृति और तासीर पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था को गढने के लिए प्रयत्नशील हैं।

इस बिन्दु पर भारतीयता और अभारतीयता के बीच के संघर्ष को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है। यह संघर्ष दिन, माह, और 100-50 वर्ष की सीमाओं को बहुत पहले ही लांघ चुका है और पिछले कई सौ वर्षो से सतत जारी है। कई निर्णायक दौर आए। कई बार ऐसा लगा कि भारतीयता सदैव के लिए जमींदोज हो गयी है लेकिन अपनी अदम्य धार्मिक जीजीविषा और प्रबल सांस्कृतिक जठराग्नि की बदौलत ऐसे तमाम झंझावातों को पार करने में वह सफल रही। 17वीं सदी तक भारतीयता पर होने वाले आक्रमणों की प्रकृति बर्बर और स्थूल थी। इस दौर के आक्रांताओं में सांस्कृतिक समझ का अभाव था और वे जबरन भारतीयता को अपने ढांचे में ढालने की कोशिश कर रहे थे।

18वीं सदी में आए आक्रांताओं ने धर्म और संस्कृति में छिपी भारतीयता की मूलशक्ति को पहचाना और उसे नष्ट करने के व्यवस्थागत प्रयास भी शुरु किए। इस दौर में भारतीयता पर दोहरे आक्रमण की परम्परा शुरु हुई। बलपूर्वक भारतीयता को मिटाने के प्रयास यथावत जारी रहे साथ ही भारतीयों में भारतीयता को लेकर पाए जाने वाले गौरवबोध को नष्ट करने के एक नया आयाम आक्रांताओं ने अपनी रणनीति में जोडा। 1990 के बाद मीडिया-मार्केट गठजोड के कारण लोगों में तेजी से रोपी जा रही उपभोक्तावादी जीवनशैली के कारण भारतीयता पर आक्रमण का एक नया तीसरा मोर्चा भी खुल गया।

मीडिया-मार्केट गठजोड का भारतीयता से आमना-सामना अवश्यम्भावी था क्योंकि भारतीयता त्यागपूर्वक उपभोग के जरिए आध्यात्मिक उन्नति के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने की बात कहती है जबकि दूसरा पक्ष उपभोग को ही जीवन का चरम लक्ष्य मानता है और अंधाधुध उपभोग पर आधारित जीवन-शैली को बढावा देता है। भारतीयता पर आक्रमण करने वाले इस त्रिकोण के अन्तर्सम्बंध आपस मे बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते। कहीं-कहीं तो वे एक-दूसरे पर जानलेवा हमला करते हुए भी दिखते है। लेकिन भारतीयता से इन तीनों को चुनौती मिल रही है। इसलिए इस त्रिकोण ने भारतीयता के समाप्ति को अपने साझा न्यूनतम कार्यक्रम का हिस्सा बना लिया है।

इस अभारतीय त्रिकोण के उभार के कारण संघर्ष की प्रकृति और त्वरा में व्यापक बदलाव दिखने लगे हैं। पहले दोनों पक्षों के बीच अनियोजित अथवा अल्पयोजनाबद्व ढंग से विभिन्न मोर्चों पर छोटी-मोटी लडाईयां होती रहती है। अब सुनियोजित और व्यवस्थित तरीके से भारतीयता पर आक्रमण हो रहे और उसके अस्तित्व को समाप्त करने प्रयास किए जा रहे हैं। भारतीयता की वाहक शक्तियां भी चुनौती को स्वीकार करने के मूड में दिख रही है, इसलिए अब महासंग्राम का छिडना तय सा दिख रहा है।

पिछले 2 वर्षो सें ‘हिन्दू आतंकवाद’ की अवधारणा को रोपने का जो प्रयास किए जा रहा है और उसका जिस तरह से प्रतिवाद हो रहा है, वह भावी महासंग्राम का कारण बन सकता है। हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा अभारतीय शक्तियों का एक व्यवस्थित और दूरगामी प्रयास है। इस अवधारणा के जरिए वे पश्चिम में तेजी से फैल रही आध्यात्मिकता पर आधारित उदात्त और समग्र भारतीय जीवनशैली को दफनाना चाहती हैं।

योग और आयुर्वेद के प्रति सम्पूर्ण दुनिया की नई पीढी जिस तरह से आकर्षित हुई है। इसी तहर कई संस्थाएं और संत पश्चिम में आध्यात्मिकता की अलख जगा रहे हैं, और वहां नई पीढी इसकी तरफ तेजी से आकर्षित हो रही है। इस आकर्षण भाव के कारण भारतीयता विरोधी त्रिकोण के हाथ-पांव फूल गए है। भारतीयता की छवि को संकीर्ण और कट्टर पेश कर यह त्रिकोण उसके प्रति तेजी से पनप रहे आकर्षण भाव को भंग करना चाहता है। ‘हिन्दू आतंकवाद’ का नया शिगूफा छोडकर इस त्रिकोण ने भारतीयता की ध्वजावाहक शक्तियों को भारत में ही घेरने की रणनीति बनायी है।

इस पूरे प्रकरण में मीडिया की अतिउत्साही भूमिका भी देखने लायक है। 2 वर्ष पहले तक किसी पंथ को आतंकवाद से न जोडने का उपदेश देने वाला मीडिया बिना किसी सबूत और साक्ष्य के हिन्दू आतंकवाद शब्द को बार-बार दोहरा रहा है। मजेदार तथ्य यह है कि हिन्दू आतंकवाद शब्द को मीडिया के जरिए आम-लोगों से परिचित पहले करवाया गया और उसकी पुष्टि के सबूत बाद में जुटाए जा रहे हैं। एक अवधारणा के रुप में हिन्दू आतंकवाद हाल के दिनों में ‘मीडिया ट्र्रायल’ का सबसे बडा उदाहरण है।

सबसे पहले मालेगांव प्रकरण में हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया गया। इस प्रकरण में सांगठनिक स्तर पर अभिनव भारत तथा व्यक्तिगत स्तर साध्वी प्रज्ञा का नाम उछाला गया। मालेगांव विस्फोट प्रकरण में मीडिया को तमाम मनगढंत कहानियां उपलब्ध कराने के अतिरिक्त आजतक जांच एजेंसियां कोई ठोस सबूत नहीं इकट्ठा कर पायी हैं। अभिनव भारत जैस अनजान जैसे संगठन को लपेटने पर भी भारतीयता पर कोई आंच आती न देख अब इस त्रिकोण ने भारत और विश्व के सबसे बडे सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को हिन्दू आतंकवाद से जोडने का कुत्सित प्रयास शुरु कर दिया है। संघ इस त्रिकोण के निशाने पहले भी सबसे उपर रहा है। क्योंकि आतंकवाद, धर्मान्तरण और खुली अर्थव्यवस्था की विसंगतियों के प्रति संघ आमजन को जागरुक करता रहा है। इस कारण पूरे भारत में धीरे-धीरे इस त्रिकोण के खिलाफ एक प्रतिरोधात्मक शक्ति खडी होती जा रही थी ।

अब इन शक्तियों ने संघ के एक वरिष्ठ और दूरदर्शी प्रचारक इन्द्रेश का नाम, जिन्हे मुसलमानों को भी संघ के कार्य से जोडने के लिए विशेष रुप से जाना जाता है, अजमेर बम विस्फोट में घसीटा है। यह त्रिकोण इन्द्रेश के नाम को अजमेर बम विस्फोट से जोडकर एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश कर रहा है। इससे जहां एक तरफ त्रिक़ोण के सर्वाधिक सशक्त प्रतिरोधी की राष्ट्रवादी और लोककल्याणकारी छवि को धूमिल किया जा सकेगा, वहीं इस्लामिक आतंकवाद के समकक्ष हिन्दू आतंकवाद शब्द खडा कर मुसलमानों

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4 Comments on "असात्विक शक्तियों की चालबाजियां – जयप्रकाश सिंह"

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श्रीराम तिवारी
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जिसमें झूंठ फरेब हो .लोगों को बरगलाया जाता हो .महिलाओं का अपमान हो .संविधान से इतर सत्ताकेंद्र स्थापित करने की लालसा हो .वर्चस्व की भावना हो तथा धरम जात की पुरातन सड़ीगली व्यवस्था से महामोह व्याप्त हो ऐसी ऐनक लगाकर सत्य को परिभाषित करना बेईमानी है …सत्य को असत्य बताना अमानवीयता है ……

अवनीश राजपूत
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AVENESH SINGH AZAMGARH

वाकई जोरदार तर्क है आपके लेख में
गड़बड़ी कहाँ है और इसका “मूल” कहाँ है, यह सभी जानते हैं, लेकिन स्वीकार करने से कतराते, मुँह छिपाते हैं, … और ऐसे लोग ही या तो “सेकुलर” कहलाते हैं या “बुद्धिजीवी”।
आप किस कड़ी में आते है

मिहिरभोज
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न हाथ एक शस्त्र हो..
न हाथ एक अस्त्र हो…
रुको नहीं ,,,बढे चलो…बढे चलो

हरपाल सिंह
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aap jaise logo ki desh ko sakt jarurat hai asatya ka daman karate rahiye aur satya ko prakashit

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