लेखक परिचय

विशाल शर्मा

विशाल शर्मा

विशाल शर्मा बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय के जनंसचार एवं पत्रकारिता विभाग के परास्नातक के छात्र है एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से सामाजिक एवं राजनीतिक मुट्टों को उठाते रहें है।

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 विशाल शर्मा

‘‘उत्तर प्रदेश जहाँ चुनाव की सरगर्मियां जोरो पर है। हर राजनीतिक पार्टी वादो की भरमार कर रही है। अपने अपने चुनावी घोषणा पत्रों को और लुभावना बनाने के लिए आतुर है लेकिन ये घोषणा पत्र आम जन मानस की वास्तिवक समस्याओं से कहीं दूर प्रतीत होते है। ‘‘

समय गतिशील है। उसकी गतिशीलता से ही आम जन मानस भी गतिशील है। उत्तर प्रदेश मे आजकल चुनावी समय तो बडी ही तेजी से चल रहा है ओर उससे भी कहीं ज्यादा तेजी से चल रहे है राजनीतिक पार्टियों के चुनाव प्रचार। प्रचार की तेजी तो इस कदर चल रही है कि अगर गाडी भी साथ छोड़ दे तो पैदल भाग कर अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए आतुर है। पर ये आतुरता हमेशा इसी समय मे क्यूं होती है ? हर उस साधारण नागरिक की तरह मेरे मन मे भी यह सवाल बार-बार आता है और जबाब उसके बारे मे फिर वही चुप्पी ओर एक साँस के साथ या तो सोच मे डूब जाना या फिर वही चक्कलस के लिए कोई भी विषय पकड लेना। बात उत्तर प्रदेश मे अगर प्रगति के होने की कही जाये तो सबसे पहले प्रगति तो राजनीतिक पार्टीयों की देखने लायक है। सन् 1951 मे जहाँ इनकी संख्या महज 14 थी आज 143 है ओर इसी तरह यह निरन्तर आगे बढने के लिए प्रयत्नशील भी है।

आज हर राजनीतिक पार्टी अपने एजेडें को जनता के सामने इस कदर बढा चढा कर पेश कर रही है जैसे सबकी उम्मीदों का एक मात्र समाधान सिर्फ उनके ही पास हो। इस चुनावी जंग मे सिर्फ वो ही साफगोई से लबरेज है बाकी सब दागदार है। यही बात तो पिछले चुनाव मे भी कही गई थी उससे पहले भी इसी तरह के वक्तव्य दिये जाते रहे हैं फिर इस बार ऐसा क्या नया है ? नया है ना ! पहले से कहीं ज्यादा लुभावने घोषणा पत्र, ऐसे-ऐसे आफॅर की मल्टीनेशनल कंपनीयों का प्रंबध तंत्र भी सुनकर सकते मे आ जाये, वादो की भरमार पहले से कई गुनी ज्यादा कर दी गई है, झूठ का ऐसा पिटारा खोला गया है कि जिसमें वोट की खातिर जाने कैसे-कैसे सब्जबाग दिखाये जा रहे है।

कुल मिलाकर नयी दिखावटी पैकिंग मे सामान वही घिसा पिटा पुराना है। आम आदमी की समस्या एवं उसके लिए जिन बुनियादी चीजों की जरूरत है उनसे तो दूर दूर तक भी किसी राजनीतिक पार्टी को मतलब नही है। मतलब अगर है तो वो है सिर्फ अपने पेट भरने के लिए, कैसे आम जन मानस का पेट काटा जाये, कैसे अपनी तिजोरियों को ओर बड़ा किया जाये, कैसे भी इस सत्ता सुख को प्राप्त करके अपने मनचाहे कार्यो को अंजाम दिया जाये। सरकार चाहे किसी की भी हो आम आदमी की परवाह किसे है। क्योंकि जिस आम आदमी की परवाह की बात की जा रही है उसकी परवाह को तो पहले ही जाति, धर्म, क्षेत्रीयता ओर ना जाने किस-किस तरह से इस कदर बाँट दिया जाता है कि वो कुछ कहने की स्थिति मे बचती ही कहाँ है। बात 22 साल से उत्तर प्रदेश की राजनीति से दूर कांग्रेस पार्टी की की जाये या सत्ता भोगने वाले अन्य दलों की हर पार्टी ने महज अपने फायदे के लिए ही सत्ता का उपयोग किया है। क्या इसी के लिए जनता ने इन्हें चुना है कि उनके बीच मे रहकर, उनका ही पेट काटा जाये। अपने चुनावी ऐजेडों मे जिन घोषणाओं का पिटारा खोला जाता है क्या वो सिर्फ दिखावे के लिए ही होते है ? असल जिंदगी से उनका शायद दूर-दूर तक कोई नाता ही नही होता है। अगर असल जिंदगी से उनका नाता होता तो आज प्रदेश की जनता ऐसे दोराहे पर ना खडी होती कि आखिर वो चुने तो चुने किसे। इस बार किसे आजमायें ओर कब तक आजमाये। आजमाइश का ही ये दौर तो आजकल चलन मे है क्योंकि पिछली बार जो अपना कहकर वोट बटोर ले गया था आज वो किसी दूसरे के साथ खडा है और अब जो वोट माँगने आ रहा है इसकी क्या गांरटी है कि ये अपने बीच रहेगा कि नही।मकसद साफ है कि जब भी वोट का समय आता है राजनीतिक पार्टियों को जनता की याद तभी आती है ओर जनता भी बेचारी इतनी भोली होती है कि नेताजी के एक बार पुचकारने मात्र से ही फिर से बहकने के लिए तैयार हो जाती है। राजनीतिक दल इसी भावना को कैश कर लेते है ओर फिर से सत्ता पर काबिज होकर उसी जनता का खून चूंसते है जिसने उन्हे चुना है। तब वह जनता अपने आप को एक बार फिर से ठगा महसूस करती है। ऐसे मे जनता की भी यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह ऐसे मौका परस्त लोगों के हाथ मे अपनी बागडोर ना सौपें जिनकी कथनी ओर करनी मे अन्तर हो।

राजनीतिक दलों को चाहिए कि वो कम से कम अपने चुनावी ऐजेडों मे आम आदमी की उन वास्तविक समस्याओं को जरुर जोडें जिसकी बुनियादी स्तर पर उसे सर्वाधिक जरूरत है। ख्याली पुलाव पकाने से कब तक भला होगा। जरूरत है तो वास्तविकता से जुडकर विकास की नई राहों को चूमने की ओर वो तभी संभव है जब आम जन मानस की उन तमाम आवश्यकताओ को समझा ओर सुलझाया जाये जिसके निदान के लिए जनता द्वारा उन पर विश्वास जताया गया है। अगर ऐसा हो पाया तो शायद फिर से राजनीतिक पार्टियों को अपने चुनावी घोषणा पत्रों को इतना लुभावना ओर प्रलोभनकारी बनानें की जरूरत नही पडेगी क्योंकि नतीजा तब वास्तविकता के साथ सच्चाई के रुप मे सबके सामनें परिलक्षित होगा।

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