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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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shikshशिक्षा यानि व्यक्ति के विकास का आधार। किस देश ने कितना विकास किया है ये उस देश में साक्षरता की दर से निश्चित किया जाता है। प्रत्येक देश में एक विभिन्न शिक्षा प्रणाली प्रचलित है। भारत ने यूं तो समय के साथ साथ शिक्षा के क्षेत्र में बहुत विकास किया है। जहां पहले हमारे देश के बच्चों की पढ़ाई गुरूकुल में होती थी व बच्चों को शिक्षा ग्रहण करने दूर दूर आश्रमों में जाना पड़ता था। वहीं कई सालों तक रह कर छात्रों को धर्म व अस्त्र शस्तों की शिक्षा दी जाती थी।

भारत ने भले ही विश्व में श्रेष्ठ कुछ सम्मानित विशेषज्ञ पैदा किये हो लेकिन इस बात को कोई झुठला नहीं सकता कि भारत की शिक्षा प्रणाली अभी भी अन्य देशों के मुकाबले बहुत पिछड़ी है। विश्वविद्यालय अनूदान आयोग की 2002 की रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में विश्वद्यिालय के स्तर की 290 संस्थायें, 13,150 कालेज, 4.27 लाख शिक्षक और 88 लाख उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र है। लेकिन हमारे देश की जनसंख्या के सामने ये आंकड़े काफी शर्मनाक है। जिस देश में विश्व के दूसरे नंबर की आबादी हो और शीघ्र ही नंबर एक बनने की राह पर हो, जिस देश की ताकत देश बड़े शक्तिशाली देश भी आश्चर्यचकित हो रहे हों उस देश के ये आंकड़े वाकई काफी निराशाजनक हैं। यूनेस्को की विश्व शिक्षा रिपोर्ट 2000 के अनुसार भारत में 13 से 23 वर्श की आयु के मात्र 6.9 प्रतिशत नौजवान ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जबकि शर्म की बात तो ये है कि इससे कहीं अकधिक प्रतिशत तो तीसरी दुनिया के गरीब देशों में है। हमारे देश में भी लोगों के मन में भम्र है कि डाक्टरर्स व वैज्ञानिक तैयार करने में हमारा देश विश्व में सबसे उपर है जो मात्र दिल को दिलासा देने वाला कोरा झूठ है। भारत इस क्षेत्र में भी कहीं नीचे है।

आज हम व्यवसायिक शिक्षा के दौर से गुजर रहे हैं जहां आम डिग्रीधारकों की कोई पूछ नहीं है। बी.ए. या एम करने वाले 1500 मासिक वेतन पर काम कर रहे है। आज केवल उसे छात्र का भविष्य उज्जवल समझा जा रहा है जो नामी यूनिवर्सिटी से व्यवसायिक शिक्षा ग्रहण करता है। लेकिन अब व्यवसायिक शिक्षा के लिये ये विश्वविद्यालय छात्रों से लाखों रूपये की मांग कर रहे है। अब ऐसे में स्वभाविक है कि गरीब छात्र कुशाग्र होने के बाबजूद कभी भी इतनी महंगी शिक्षा नहीं ग्रहण कर सकते। अभी एक साल पहले ही एक प्रमुख समाचारपत्र ने एक रिर्पोट प्रकाशित की थी जिसमें आंकड़े साफतौर पर ये दर्शा रहे थे भारत में नौकरीपेशा लोगों में मात्र 8 प्रतिशत लोग ही वास्तविक रूप में नौकरी के हकदार हैं क्योकि उनकी शिक्षा अभी इस काबिल नहीं थी जिससे उन्हे प्रैटिकल नालेज मिलती। हमारे देश में एक शिक्षित इन्सान वो है जो अपने हस्ताक्षर कर सकता हो। और हम फिर अपने अधूरे आंकड़ों को देखकर हम संतोष कर लेते है। लेकिन आखिर इस शिक्षा का भी क्या फायदा है। एक और बात आज धीरे धीरे देश में बेसिक शिक्षा पतन की तरफ जा रही है। क्योंकि आज देश का हर छात्र व्यवसायिक शिक्षा ग्रहण करना चाहता है। हर कोई डाक्टर, इंजीनियर, मैनेजर या ऐसा ही कुछ बनना चाहता है। हमारे विद्यार्थी ये तो जानते है कि शेक्सपीयर कौन है व उसने कौन कौन सी कहानियां व नाटक लिखे है। परंतु हमारे देश के बहुत कम लोग ही अपने उपराष्ट्रपति का नाम बता पायेंगे। अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की हिन्दी अत्यंत दयनीय होती है। क्या अच्छी शिक्षा मात्र अच्छी अंग्रेजी बोल पाना है ? भारतीय बोर्ड परीक्षाओं का हाल तो और भी बुरा है। स्कूल अपना रिजल्ट अच्छा दिखाने के लिये विद्यार्थियों को जी भर के नकल करवाते है। आखिर ऐसे नंबरों से भविश्य कैसे बन सकता है। पाठयक्रम ऐसे रखे गये है जिनका व्यवहारिक क्षेत्र में कोई महत्व नहीं है। आज देश में धीरे धीरे शिक्षा संस्थानों की बाड़ आ चुकी है। बाहे बगाये कई निजी कंपनियों ने जालंधर, देहरादून, दिल्ली, मुबंई आदि प्रमुख स्थानों में अपने शिक्षण संस्थान खोल दिये र्है जिनका मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना है। छात्रों के भविश्य से इन्हें कोई लेना देना नहीं है। इनमें से कई संस्थानों को यूजीसी ने लाल झंडी दिखाई है, फिर भी ये सिर्फ अपने धंधे को बढ़ाने में लगे है। ऐसे में बढ़िया से भी बढ़िया नौकरी की बाट जोह रहे नौजवान छात्रों की जिम्मेवारी और बढ़ जाती है।

आज हमारे देश में कई विश्वविद्यालयों ने विदेशी कालेजों के साथ सांठगांठ की है और वे इसी चीज के जरिये पैसा कमा रहे है। परंतु शायद नौजवान ये नहीं सोचते है जिन विदेशी कालेजों के लोभ में वे पैसा लगा रहे है वे खुद वहां के घटिया कालेजों में शामिल किये जाते हैं। हमारे देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा की स्थिति से हर आदमी अवगत है। परंतु मजबूरी के कारण फिर भी मां बाप अपने बच्चों को ऐसे स्कूलों व कालेजों में शिक्षा दिला रहे है। एक अच्छे निजी विश्वविद्यालय में एम बी ए करने के लिये कम से कम 5 से सात लाख तक और डाक्टरी के लिये 15 लाख रूपये तक खर्चने पड़ सकते है। आखिर एक आम भारतीय आदमी इतने रूपयों का जुगाड़ कहां से करेगा। ये बड़े संस्थान अधिकतर उन्ही क्षेत्रों में खोले गये हैं जिन क्षेत्रों में अधिकतर धनी व्यक्ति निवास करते है। छात्रों को लुभाने के लिये ये शिक्षण संस्थान पूरी ताकत के साथ अपने अपने विद्यालयों का प्रचार करने में जुटे है। जिस बात का पता इससे चलता है कि पिछले पांच वर्शों में प्रिंट मीडिया में विज्ञापन देने में शिक्षा क्षेत्र तीसरे नंबर पर पहुंच चुका है। अखबार के पन्ने कालेजों की एड से पटे होते हैं। ऐसे में उंची दुकान फीका पकवान वाली बात चरितार्थ होती है। युवाओं को समझना चाहिये कि विश्वविद्यालय मात्र दिखाने के लिये नही बल्कि वास्तव में शिक्षाग्रहण करने के लिये अपनाना चाहिये अत: पुरी तरह संतुश्टि करने के बाद ही किसी भी स्कूल या विश्वविद्यालय में एडमिशन लें। सरकार को भी ये समझना चाहिये कि जनता की गंणवत्ता व जीवन स्तर में वृध्दि के लिये अच्छी शिक्षा बहुत मायने रखती है अत: जरूरी है कि शिक्षण प्रणाली में अब बदलाव किया जाये व छात्रों को आज के दौर व भविष्य के लिये तैयार करने पर जोर दिया जाये।

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2 Comments on "आधारहीन शिक्षा – राजेश कुमार"

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Saurabh Tripathi
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Hon’ble Rajesh Ji
Apne jo kaha sahi kaha aapka bhaut bhaut dhanayvad jo aapne ye mudada uthaya
saurabhtripathi
saurabh211001@gmail.com

rajesh kumar
Guest

read must this article.. & write ur comment.. kyo ki education kafi serious vishay hai.. Rajesh from dehradun

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