लेखक परिचय

हर्षवर्धन पान्डे

हर्षवर्धन पान्डे

लेखक युवा पत्रकार और शोध छात्र हैं

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हर्षवर्धन पाण्डे

२२ अप्रैल को जिस समय यूपीए सरकार अपनी सरकार के तीन साल पूरे होने का जश्न एक ओर मना रही थी उसी समय रायसीना हिल्स के लिए कांग्रेस अपने सहयोगियों की नब्ज टटोलने में लगी हुई थी….. ३ साल के इस जश्न में ना माया दिखी, ना ममता, ना करूणानिधि….. इस बार इस पार्टी में अगर किसी की तरफ कैमरे की नजरें गई तो वह मुलायम और लालू प्रसाद थे… कैमरे का फ्लैश इस पार्टी में मुलायम की तरफ सबसे ज्यादा चमक रहा था …. जैसे जैसे पार्टी शुरू हुई मुलायम ने पूरे आयोजन को अपनी उपस्थिति से कैश करवा लिया….. कुछ देर बाद कांग्रेस ने उनका सत्कार इस अंदाज में किया जिसका अनुमान कभी मुलायम ने भी नही लगाया होगा …..मुलायम को सीधे मंच पर बैठाया गया जिसने इन अनुमानों को बल देने का काम जरुर किया कि आने वाले दिनों में यूपीए के नए संकटमोचक मुलायम सिंह यादव बन सकते है……यह अलग बात है इस पार्टी में लालू पर कांग्रेस ने उतनी दरियादिली नही दिखाई जितनी वह उन पर उस दौर में दिखलाया करती थी जब वह रेल मंत्री एक दौर में यू पी ए की सरकार में हुआ करते थे ………..

इस मिजाज को पड़ पाना हर किसी के लिए आसान नही है… लेकिन यही राजनीती की नई बिसात है जिसके आसरे हर दल इस दौर में अपने को पाक साफ़ बताने में जहाँ तुला हुआ है वहीँ अपनी कुर्सी बचाने के लिए अपने विरोधियो से कोई भी समझौता करने को तैयार खड़ा दिखाई देता है…. यू पी ए में इस समय यही कशमकश चल रही है … लालू आज के दौर में अगर कांग्रेस के लिए बेगाने हो गए है और मुलायम उसके लिए फायदे का सौदा बन रहे हैं तो समझा जा सकता है यह नया रास्ता इस दौर में किस तरफ जा रहा है … मौजूदा समय में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती जहाँ अपनी सरकार बचे २ साल चलाने को लेकर खड़ी है, वहीँ उसकी नजरे रायसीना हिल्स पर अभी से लगी हुई है क्युकि इस पद की बिसात जिस रूप में बिछ रही है उसमे अकेले कांग्रेस के “यस मैन” आसानी से अपने प्रत्याशी को जिताने की स्थिति में जहाँ खड़े नजर नही आते वहीँ विपक्ष यूपीए प्रत्याशी के नाम सामने आने तक किसी भी रूप में अपने पत्ते फैकने की स्थिति में भी नही है…. ऐसे में सभी की नजरे मुलायम और ममता के दल के साथ लगी है जिस पर अभी मुलायम का रुख सबसे भारी पड़ रहा है शायद तभी मुलायम पर कांग्रेस डोरे डालने से बाज नही आ रही है…….

वैसे भी मुलायम उत्तर प्रदेश फतह करने के बाद से सातवे आसमान पर हैं… नेता जी ने भले ही अखिलेश के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता मार्च के महीने में साफ़ कर दिया लेकिन उनकी असली नजरे अभी भी केंद्र के सिंहासन को पाने में लगी हैं…. खुद सपा के कार्यकर्ता उनकी राष्ट्रीय राजनीती में भूमिका को खोजने में लगे हुए है…. अगर कांग्रेस का साथ मुलायम सिंह देने को आने वाले दिनों में तैयार हो जाते हैं तो उनको केंद्र में मंत्री पद का ” लालीपॉप ” दिया जा सकता है साथ ही उप राष्ट्रपति की कुर्सी के लिए कांग्रेस उनके भाई रामगोपाल यादव के नाम को आगे कर सकती है…ऐसे भी कयास हैं कि आने वाले दिनों में कांग्रेस अपने एक सहयोगी आरएलडी से किनारा कर अजित सिंह की नागरिक उड्डयन मंत्री पद से विदाई करा सकती है और इसके बेहतरीन विकल्प के रूप में नेता जी को नागरिक उड्डयन मंत्री का ताज दिया जा सकता है……

यह तय है आने वाले दिनों में यूपीए के बड़े संकटमोचक मुलायम बन सकते है … जिस तरीके से यूपीए सरकार मे महंगाई लगातार बढती जा रही है … रूपया लगातार गिर रहा है और मनमोहनी इकोनोमिक्स इस दौर में धराशायी हो रही है … उसके मद्देनजर ममता सरीखे कांग्रेस के सहयोगी कांग्रेस से कभी भी समर्थन वापस ले सकते है .. ऐसे में यू पी ए अभी से मुलायम की शरण में जाकर जहाँ अपने बचे २ साल चैन से काटना चाह रही है वहीँ वह आने वाले दिनों में चुनावो में फिर से अकेला चलो की नीति को अपना सकती है…..

२००५ में मुलायम ने परमाणु करार पर जिस प्रकार यू पी ए की नैया पार लगाई थी इस बार भी वह राष्ट्रपति चुनावो में कांग्रेस की पसंद को विभिन्न दलों के बीच ले जाकर उस प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाते नजर अगर आएँगे तो इसमें किसी को कोई आश्चर्य शायद ही होगा क्युकि इसके एवज में वह अपने उत्तर प्रदेश के लिए केंद्र से बड़ा पैकेज लेने का मौका भी शायद ही छोड़ेंगे ……रायसीना हिल्स की इस बार की जंग दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ी हो गई है ….पांच राज्यों के चुनाव परिणामो ने जहाँ कांग्रेस और भाजपा सरीखी बड़ी पार्टियों के समीकरण पूरी तरह गड़बड़ा दिए है वही राष्ट्रपति को लेकर नए नए नामो के कयास लगने शुरू हो गए है.. किसी एक नाम पर शायद सहमति इस बार बन पाये…. ऐसे में छोटे छोटे दलों की भूमिका प्रभावी होने की पूरी सम्भावनाये दिख रही है जहाँ मुलायम “ट्रंप कार्ड ” साबित हो सकते है….

कांग्रेस को अपनी पसंद के प्रत्याशी को राष्ट्रपति बनाने के लिए या तो अपने सभी सहयोगियों को साथ लेकर चलना होगा या फिर सहयोगियों के द्वारा सुझाये गए नाम पर अपनी मुहर लगाने को मजबूर होना पड़ेगा … वैसे इस बार राष्ट्रपति पद की चाबी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सरीखे राज्यों के पास है जिनका संख्याबल यू पी ए और एन डी ए जैसे दलों के गणित पर भारी पड़ सकता है….. कांग्रेस में इस समय यह भी चल रहा है अगर वह अपने प्रत्याशी को जिताने में कामयाब रहती है तो उपराष्ट्रपति का पद वह अपने सहयोगियों सपा, तृणमूल जैसी पार्टियों को देने में कोई हिचक नही दिखाएगी…. वहीँ भाजपा भी इस पशोपेश में उलझ रही है किसी भी तरह ममता, माया, अम्मा को साथ लेकर यू पी ए को डेमेज किया जाए जिसमे नवीन पटनायक जैसे नेता उसका साथ दें…..

 

राष्ट्रपति का पद भारत में सम्मानजनक है …..जिसके चुनाव में संसद के दोनों सदनों और राज्यों के विधान मंडल के सदस्य भाग लेते हैं देश में इस समय कुल ७७६ सांसदों के वोट की ताकत ५,४९,४०८ है जबकि ४१२० विधायको के वोट की ताकत ५,४९,४७४ है … इस समय कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है उसके पास ३,३०,४८५ वोट है जो राष्ट्रपति के लिए पड़ने वाले कुल १०,९८,९९२ वोटो कि तुलना में बहुत कम हैं…..अगर इस बिसात में यू पी ए के अन्य १२ सहयोगियों को भी साध लिया जाए तो यह आंकड़ा ४,५९,४८३ तक पहुचता है जो कुलवोट का महज ४० फीसदी ही है …. जबकि सभी जानते है राष्ट्रपति के लिए आंकड़ा ५० फीसदी से एक अधिक का होना जरुरी है….

कांग्रेस के पास लोक सभा में अपने खुद के बूते और सहयोगियों को लेकर जहाँ बहुमत है वहीँ राज्य सभा में अपने सहयोगियों को साथ लेने के बाद भी उसकी राह इस साल आसान नही दिखती …..यही स्थिति भाजपा की भी है .. उसके विधायको और सांसदों की ताकत इस बार के चुनावो में २,२५,३०१ है … और एन डी ए के घटक दलों का कुनबा भी अगर उसने साध लिया तो यह आंकड़ा ३,०४,७८५ तक ही पहुचता है…..यानी कुल वोट का तकरीबन ३५ फीसदी…….

अब इस जंग में कोई प्रदेश सबसे ज्यादा अहम् साबित हो सकता है तो वह उत्तर प्रदेश ही हमें दिख रहा है … जहाँ की चाबी सही मायनों में नेताजी के पास है…. ८० सांसदों वाले इस प्रदेश में सबसे ज्यादा ८३,८२४ वोटो पर सीधा मुलायम का नियंत्रण जहाँ है वही ममता के पास अपनी तृणमूल के ४५,६४० वोट की ताकत है… वहीँ जयललिता भी तमिलनाडु फतह करने के बाद गदगद हैं क्युकि उनके पास भी ३५,३९२ वोटो की बड़ी ताकत है जो यू पी ए के गणित को डगमगा सकती है…. …..सभी राज्यों के तकरीबन ५,४९, ४७४ वोटो में १५ फीसदी वोट अकेले उत्तर प्रदेश , पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के हैं जो इस बात को बता रहे है कि इस बार रायसीना की जंग में इन तीन राज्यों की तिकड़ी का ही कमाल अगर हमें देखने को मिले तो किसी को कोई आश्चर्य नही होना चाहिए…..

रायसीना के लिए योग्य प्रत्याशी खोजने में सभी दलों के लिए नई कड़ी का काम अगर कोई कर सकता है तो वह बेशक सोनिया गाँधी हो सकती है … २००७ में भी उन्होंने चुनाव होने से ठीक पहले प्रतिभा पाटिल का दाव खेलकर सभी को चौंका दिया था….उस समय प्रतिभा ताई का नाम दूर दूर तक इस पद के लिए संभावित उम्मीदवारों की सूची में नही था…. वह तो राजस्थान में ब्रह्मकुमारी विश्वविद्यालय के एक समारोह में अपना संबोधन कर रही थी…….तभी प्रतिभा ताई के फ़ोन की घंटी बजी और सोनिया ने उनके नाम पर अपनी हामी भर दी…. इस बार भी अगर किसी एक नाम पर सहमति नही बनती तो शायद यही हो सकता है सोनिया जो दाव चलेंगी उस पर किसी को कोई एतराज नही होगा… वैसे भी इस देश में कांग्रेस नेहरु गाँधी परिवार के “ओरा “तले अपने पत्ते फैकती है जहाँ मुख्यमंत्री से लेकर विधान सभा चुनावो में प्रत्याशी चयन का जिम्मा दस जनपद की चाटुकार टोली संभाला करती है … अगर इस बार सोनिया कि नही चली तो दस जनपद से कोई नया नाम चुनाव से ठीक पहल्रे सामने लाया जाएगा .. और इन सब के बीच कांग्रेस के ट्रबल शूटर इस मुहिम में यू पी ए के सहयोगियों को साथ लेने के काम को हमेशा की तरह अंजाम देते नजर आ सकते हैं…..

वैसे बताते चलें अभी तक कांग्रेस ने इस पद के लिए प्रत्याशी के नाम का ऐलान नही किया है… जो नाम सामने आ रहे है वह सब मीडिया की उपज ही हैं…. इस कड़ी में सबसे पहला नाम कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी का है जिन्होंने अगला लोक सभा चुनाव ना लड़ने की बात को कुछ समय पहले दोहराया था ……लेकिन कांग्रेस में कई लोग प्रणव दा के लिए समर्थन देंगे इसमें संशय बना है…. खुद मनमोहन भी अपनी सरकार के इस संकटमोचक को रायसीना हिल्स भेजकर अपने लिए संकट खड़ा नही करना चाहते … क्युकि यह बात किसी से छुपी नही है यह यू पी ए सरकार अपनी दूसरी पारी में अगर किसी के बूते चल रही है तो वह प्रणव मुखर्जी ही हैं जिन्होंने हर संकट पर यू पी ए के सहयोगियों को अपने साथ साधने का काम किया है……सोनिया राष्ट्रपति पद पर मनमोहन जैसे अपने किसी विश्वासपात्र को अगर बैठाना चाह रही है तो इसमें आश्चर्य जैसा कुछ भी नही है…. क्युकि सोनिया की हर बिसात का रास्ता दस जनपद से होकर जाता है और यह सभी को अच्छे से मालूम है आज के दौर में दस जनपथ का पूरी तरह से कांग्रेसीकरण हो गया है…. .. ऐसे में वह अपने किसी यस मैन के लिए ही रायसीना का दरवाजा खोलेगी……इस कड़ी में प्रणव मुखर्जी की राह आसान नही है क्युकि सोनिया पूर्व में राजीव के साथ प्रणव के व्यवहार को भली भांति जानती हैं … साथ ही वह प्रणव की अवसरवादिता से भली भांति वाकिफ भी हैं ……..ऐसे में प्रणव के राष्ट्रपति बनाये जाने की राह आसान नही लगती…..

यही स्थिति हामिद अंसारी के साथ भी है… वह एक मुस्लिम हैं और वर्तमान में उप राष्ट्रपति की कुर्सी संभाल रहे हैं लेकिन जिस तरीके से कलाम का नाम एक बार फिर सियासतदानो के बीच इस दौर में उमड़ घुमड़ रहा है इन सबके मद्देनजर हामिद अंसारी का दावा इस पद के लिए नरम पड़ता जा रहा है…..दलित राष्ट्रपति के नामो पर भी कांग्रेस में इस समय मंथन चल रहा है जिसमे सुशील कुमार शिंदे से लेकर मीरा कुमार तक रेस में बने हैं…. वही इस पद के लिए पिछली बार की तरह डॉ कर्ण सिंह का दावा भी मजबूत नजर आ रहा है क्युकि उनकी सोनिया के साथ निकटता किसी से छिपी नही है … साथ ही वह दस जनपद के सबसे विश्वास पात्रो में से एक हैं……

 

इसी कड़ी में पूर्व गृह मंत्री और वर्तमान राज्यपाल शिवराज पाटिल का नाम भी सामने आ रहा है जिनकी साफ़ सुधरी छवि पर कांग्रेस अपने सहयोगियों की मुहर लगा सकती है लेकिन उनकी सबसे बड़ी दिक्कत महाराष्ट्र से होने को लेकर है…. इस बार भी अगर नए राष्ट्रपति के लिए महाराष्ट्र से प्रत्याशी को आगे किया जाता है तो देश में विभिन्न दल इस पर अपना विरोध जताने की स्थिति में है……. पूर्वोत्तर से नया राष्ट्रपति चुने जाने के लिए अटकले इस समय तेज हैं जिसमे आसाम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का नाम हवा में तैर रहा है …. वह हैट्रिक लगाकर लगातार तीसरी बार आसाम के मुख्यमंत्री बने हैं….. लेकिन उनके नाम के साथ जनजातीय राष्ट्रपति की गूँज संगमा ने अपने साथ लगा दी है……… बीते दिनों जयललिता, नवीन पटनायक को अपने साथ साधकर उन्होंने देश में नयी बहस को जन्म देने का काम किया है कि क्या इस बार नया राष्ट्रपति जनजातीय हो और जो पूर्वोतर का प्रतिनिधित्व करे ……? लेकिन संगमा के नाम को लेकर शरद पवार ने अभी तक अपना समर्थन नही किया है वहीँ सोनिया भी संगमा के अतीत को देखते हुए उनके नाम पर शायद ही सहमत होंगी क्युकि ९० के दशक में तारिक अनवर, शरद पवार , संगमा की तिकड़ी ने उनके विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से बगावत कर दी थी…… लेकिन संगमा भाजपा से भी अपने लिए समर्थन मांग रहे हैं …. आडवानी को छोड़कर किसी भाजपा के बड़े नेता ने अभी तक उनके नाम का समर्थन नही किया है और इस समय आडवानी किस तरीके से हाशिये पर खड़े हैं यह सभी अच्छे से जान रहे हैं …. ऐसे में राष्ट्रपति की जंग इस बार रोचक होने के पूरे आसार नजर आ रहे है…….

 

वैसे इस पद के लिए सबसे ज्यादा काबिल अगर कोई इस समय दिख रहा है तो वह पूर्व राष्ट्रपति कलाम हैं…. कलाम के नाम का दाव अगर मुलायम इस बार फिर चल दें तो देश की सियासत में एक मुस्लिम उम्मीदवार को आगे करने के नेताजी के दाव का जहाँ पूरे देश के मुस्लिम समर्थन करेंगे वहीँ नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, जयललिता, ममता, शरद पवार , प्रकाश सिंह बादल जैसे लोग नए राष्ट्रपति के लिए सर्वसम्मति बनाने की दिशा में एक नई लीक पर चलने का साहस जुटा सकते हैं जिसके बाद मजबूर होकर भाजपा और कांग्रेस को उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करना होगा……. लेकिन मौजूदा दौर में नए राष्ट्रपति का रास्ता भी सौदेबाजी के आसरे ही गुजरता नजर आ रहा है जहाँ हर दल २०१४ के लिए अपने लिए नई बिसात बिछा रहा है और अपने दल के लिए केंद्र से मिलने वाले फायदे को ही देख रहा है…………. ऐसे में रायसीना हिल्स की यह जंग किस मुकाम पर जाएगी कह पाना मुश्किल ही है…..?

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