लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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हमारा प्रिय भारत देश महान है; पर यहां का मीडिया उससे भी अधिक महान है। जिस समाचार से उनकी प्रसिद्धि बढ़े और विज्ञापन से उनकी झोली भरे, उसे वे सिर पर उठा लेते हैं। यदि खबर दिल्ली के आसपास की हो, तो फिर कहना ही क्या ? याद कीजिये दिल्ली का निर्भया कांड, नौएडा का आरुषि और निठारी कांड। यदि चुनाव के दिन हों, तो फिर सोने में सुहागा हो जाता है। गोमांस पर हो रहा विवाद कुछ ऐसा ही है।

दादरी का बिसहाड़ा गांव दिल्ली से लगभग 50 कि.मी. दूर होने के कारण टी.वी. वालों के लिए बहुत सुविधाजनक स्थान है। यहीं गत 28 सितम्बर को अखलाक की इस संदेह में पीटकर हत्या कर दी गयी कि उसके घर में गोमांस रखा है। उसे बेटे दानिश को भी खूब मारा गया। पुलिस ने अब आरोपियों को पकड़ लिया है। अखलाक के परिवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 45 लाख रु. और एक नौकरी देने की घोषणा की है। अन्य कई दल और संस्थाएं भी उन्हें सहायता दे रही हैं। अखलाक का एक बेटा वायुसेना की नौकरी में है। अतः उसके परिवार को दिल्ली के वायुसेना आवास में बुला लिया गया है। उल्लेखनीय है कि 11 अक्तूबर को गांव की दो मुस्लिम लड़कियों की शादी में हिन्दुओं ने बढ़-चढ़ कर सहयोग दिया। इससे वह शादी उनकी हैसियत से भी अधिक शानदार हो गयी।

लोग मांसाहार के पक्ष या विपक्ष में हो सकते हैं; पर यह सौ प्रतिशत सच है कि भारत में गोमांस भक्षण कभी प्रचलित नहीं था। यद्यपि कुछ कुतर्की यहां भी संस्कृत ग्रन्थों को उद्धृत कर देते हैं। इस बारे में कुछ बातें समझना अत्यन्त आवश्यक है। जैसे हर अंग्रेजी किताब ईसाइयों की, हर हिब्रू पुस्तक यहूदियों की और अरबी-फारसी में लिखी हर किताब मुसलमानों की मजहबी किताब नहीं है, ऐसे ही संस्कृत की हर पुरानी पुस्तक धर्मग्रन्थ नहीं है। किसी समय यहां की मुख्य भाषा होने से नाटक, काव्य, उपन्यास, कहानी, निबन्ध, जासूसी कथा आदि संस्कृत में ही लिखे जाते थे। उनमें आज ही की तरह दस-बीस से लेकर सौ प्रतिशत तक कल्पना होती थी। ऐसे साहित्य को धर्मग्रंथ नहीं कह सकते।

एक बार विनोबा भावे ने अपने किसी लेख में कहा कि रामायण काल में लोग गोमांस खाते थे। पिलखुवा (उ.प्र.) निवासी भक्त रामशरण दास यह पढ़कर उनके पास पहुंच गये और इसे प्रमाणित करने को कहा। विनोबा जी ने कहा कि दक्षिण की एक रामकथा में यह लिखा है। इस पर भक्त जी ने कहा कि श्रीराम के बारे में हजारों किताबें लिखी गयी हैं; पर धर्मग्रंथ तो श्रीवाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत श्री रामचरित मानस ही हैं। उसमें कहीं ऐसा हो, तो बताइये। इस पर विनोबा जी चुप हो गये।

आजकल कई नेता पैसे देकर अपनी प्रशस्ति लिखवाते हैं, ऐसे ही राजा, सेठ और सेनापति तब करते थे। जैसे अंग्रजों ने कुछ विद्वानों को खरीद कर उनसे भारत का गलत इतिहास लिखवाया, ऐसी प्रथा तब भी थी। उन दिनों पुस्तकें हाथ से ही लिखी जाती थीं। वे प्रायः काव्यरूप में होती थीं, जिससे उन्हें याद रखना आसान हो। आज भी लोग लिखते या बोलते समय कई बार कविता आदि को गलत उद्धृत करते हैं। उसमें व्याकरण और मात्रा की गलती तो होती ही है, लेखक का नाम भी गलत होता है। कुछ लोग जानबूझ कर ऐसा करते हैं, तो कुछ अज्ञानवश। क्या ऐसा तब नहीं होता था ?

जहां तक अंग्रेजों की बात है, 1857 के बाद उन्होंने अनेक दिशाओं में काम शुरू किया। कांग्रेस का गठन कर लोगों के मन का गुबार निकलने का रास्ता (सेफ्टी वाल्व) बनाया। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से लोग भारतीय भाषाओं को हीन मानने लगे। कई अंग्रेजों ने योजनापूर्वक संस्कृत पढ़ी। इधर उन्होंने कई भारतीय विद्वानों को खरीद लिया। इन दोनों ने मिलकर षड्यन्त्रपूर्वक हिन्दू धर्मग्रन्थों में कई हेरफेर कर दिये। उनके मनमाने अनुवाद और व्याख्याएं कीं। फिर उन्हें छापकर देश भर में प्रचलित कर दिया। ऐसे ग्रन्थों के आधार पर कुछ कुतर्की प्राचीन भारत में गोमांस खाने को तर्कसम्मत ठहरा रहे हैं।

हमें यह समझना होगा कि लाखों हस्तलिखित ग्रन्थ मुसलमान हमलावरों ने जला दिये थे। बाकी को अंग्रेज उठाकर ले गये। जो पुराने ग्रंथ लोगों पर हैं भी, नयी पीढ़ी उन्हें पढ़ नहीं सकती। वे उन्हें धूप-दीप दिखाकर फिर रख देते हैं। अतः पुरानी किताबों के नाम पर अंग्रेजों द्वारा षड्यन्त्रपूर्वक छापी गयी किताबें ही उपलब्ध हैं। उनके आधार पर कोई मत बनाना ठीक नहीं है।

गोमांस के समर्थक ये क्यों भूलते हैं श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप नंदिनी गाय की रक्षा के लिए अपने प्राण देने को तैयार हो गये थे। क्या कोई गोमांसभक्षी गाय के लिए प्राण देगा ? श्रीकृष्ण के गोपाल रूप को अपने काव्य में ढालकर सैकड़ों हिन्दू और मुस्लिम कवियों ने अपनी लेखनी पवित्र की है। भगवान भोलेनाथ का तो वाहन ही नंदी है। इन तीन प्रमुख हिन्दू देवों के साथ गोवंश का अटूट संबंध है। जैन पंथ में चींटी को भी मारना पाप है। भारतीय बौद्ध भी गोमांस नहीं खाते। सिख गुरुओं ने सदा गोवंश की रक्षा की बात कही है। अतः भारत में गोमांस खाने की बात प्रलाप मात्र है।

ऐसे बुद्धिजीवी ये नहीं बताते कि यदि प्राचीन भारत में गोमांस प्रचलित था, तो यह बंद कब से और क्यों हुआ; जिन वेदों में गाय की स्तुति के मंत्र हैं, वहां गोहत्या की बात कैसे आ गयी ? पर उनके पास इसका उत्तर नहीं है, चूंकि इस बारे में लिखने और लिखाने से पहले ही उनके आका भारत से भगा दिये गये।

कुछ लोग गोहत्या को मुसलमानों से जोड़ते हैं। ये ठीक नहीं है। अरब देशों में बकरा, दुम्बा और ऊंट, घोड़े आदि होते हैं। वहां उन्हीं को मारते हैं। उनके पर्व का नाम भी ‘बकरीद’ है, ‘गोईद’ नहीं; पर भारत में मुस्लिम हमलावरों ने हिन्दुओं की गाय के प्रति अतीव श्रद्धा देखी। अतः उन्हें चिढ़ाने के लिए वे गाय मारने लगे। यद्यपि कई मुस्लिम शासकों ने गोहत्या को प्रतिबंधित भी किया था। यदि कुरान में गोहत्या का समर्थन होता, तो वे कभी ऐसा नहीं करते।

पश्चिम में केवल गाय का दूध ही मिलता है, भैंस का नहीं। वे गाय को चार-छह साल दुहकर फिर खा लेते हैं। गोमांस वहां का सामान्य भोजन है। अतः जब अंग्रेज यहां आये, तो उन्होंने वधशालाएं खोलीं और इनमें मुसलमान कसाई रखे। इससे जहां उन्हें गोमांस मिला, वहां हिन्दू और मुसलमानों के बीच स्थायी दीवार खड़ी हो गयी। इस प्रकार ‘एक तीर से दो शिकार’ हो गये। फिर उन्होंने मुसलमानों से कहा कि गोहत्या तुम्हारा अधिकार है। आजादी के बाद यहां हिन्दू राज करेंगे और तुम्हारा यह अधिकार छिन जाएगा। अतः तुम्हें अलग देश मांगना चाहिए। जिन्ना जैसे नेता उनके बहकावे में आ गये और देश बंट गया। दुर्भाग्यवश अंग्रेजों का ये षड्यन्त्र हम आज तक नहीं समझ सके और इस विषय पर लड़ रहे हैं।

लोगों ने सोचा था कि आजादी के बाद गोहत्या बंद हो जाएगी, चूंकि गांधी जी इसे आजादी से भी अधिक महत्वपूर्ण कहते थे; पर हिन्दू विरोधी नेहरू के राज में गाय बेचारी बन गयी। कृषि विश्वविद्यालयों में गाय के बदले मछली, मुर्गी, भैंस और जरसी पर शोध होने लगे। बढ़ती जनसंख्या के कारण प्रति व्यक्ति खेती कम होती गयी। लोग दो-चार दिन को ट्रैक्टर किराये पर लेकर जुताई और कटाई कराने लगे। तेज वाहनों ने बैलगाड़ी की छुट्टी कर दी। हरित क्रांति के नाम पर रासायनिक खाद ने गोबर की खाद को बाहर कर दिया। इस प्रकार गोवंश आर्थिक तराजू पर तुल गया।

इधर राजनीतिक-सामाजिक संस्थाओं ने भी गोसंरक्षण और नस्ल सुधार पर ध्यान नहीं दिया। अच्छे नन्दी और 20-25 लीटर दूध देने वाली गाय अब नहीं मिलतीं। इन दिनों गोबर और गोमूत्र से अनेक दवाइयां, साबुन, मंजन, तेल, फिनाइल आदि दैनिक उपयोगी पदार्थ बन रहे हैं; लेकिन प्रचार के अभाव में वे आम जनता से दूर हैं। जबकि बड़ी फर्में प्रचार पर अरबों रुपया फूंकती हैं। यदि सरकारी अस्पताल, कार्यालय और कैंटीनों में अनिवार्य रूप से गोउत्पाद प्रयोग हों, तो इनके निर्माताओं को बहुत सहारा मिलेगा। हर राज्य में देसी गोवंश पर शोध करने वाले विश्वविद्यालय भी चाहिए।

जहां तक वर्तमान कानून की बात है, तो इसमें कई छेद हैं। अतः शासन को ‘बीफ’ की स्पष्ट परिभाषा करनी होगी। इस नाम पर भैंस के साथ गाय भी कट जाती है। अतः भैंस (बफैलो) के मांस को बीफ तथा गोवंश के मांस को गोमांस या ‘गीफ’ कहना चाहिए और इस पर कानूनी रूप से पूर्ण प्रतिबंध हो। कई राज्यों में दूध न देने वाली गाय काटने की छूट है; पर गर्भावस्था में गाय दूध नहीं देती। अतः वहां गर्भवती गाय कट जाती हैं। कई जगह अपंग गाय काटने की छूट है, तो काटने से पहले गोहत्यारे उसकी टांग तोड़ देते हैं।

यद्यपि पूर्वोत्तर भारत में कुछ हिन्दू गोमांस खाते हैं। अतः कुछ लोग उन्हें हिन्दू मानने पर आपत्ति करते हैं। इसका उत्तर संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने कई बार दिया है। (त्रिचूर 21.1.57/पंढरपुर 5.12.70) उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्माचार्य यदि अपने मठों से निकलकर इधर आएं और लोगों को समझाएं, तो वे इसे छोड़ देंगे। साथ ही उनके भोजन का भी प्रबन्ध करना होगा। भोजन तथा जानकारी के अभाव में वे गोमांस खाते हैं। इसका दोष उनसे अधिक हम पर है। वहां के हिन्दू सम्मेलनों में श्री गुरुजी प्रायः इसकी चर्चा करते थे। अब हिन्दू संस्थाओं के प्रसार से वहां गोमांस का प्रयोग घट रहा है। गोवंश की सम्पूर्ण हत्या विरोधी कानून बनाने से लोगों के मन में भय पैदा होगा। इससे गोहत्यारों को कटघरे में खड़ा करने में सहायता मिलेगी। अतः यह कानून बनना ही चाहिए।

गोशालाओं से ये समस्या आंशिक रूप से हल हो सकती है; पर पूरी तरह नहीं। गोवंश तो किसान के पास ही सुरक्षित रह सकता है। चूंकि खेती और गांव से गाय का अटूट संबंध है; पर शिक्षित युवक अब गांव में रहना नहीं चाहते। सरकार भी शहरीकरण के पक्ष में है। अतः गोरक्षा के लिए धर्म की दुहाई के साथ कुछ व्यावहारिक उपाय किसी छोटे क्षेत्र में सफल करके दिखाने होंगे। अंग्रेजी दवाओं के दुष्प्रभाव (साइड इफैक्ट), रासायनिक खाद और कीटनाशकों से पेट में पहुंचता जहर, घटते जलस्तर.. आदि से लोग चिंतित हैं। ऐसे में गोप्रेमी यदि कोई विकल्प देंगे, तो लोग इसे भी आजमाएंगे। अतः शासन और सामाजिक संस्थाओं को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

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1 Comment on "गोमांस पर अनावश्यक विवाद"

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amit pal
Guest

bahut hi acha h aapne dhanya bad is se ek nayi shakti milegi jo gauraksha k saath h

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