लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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भीम राव आम्बेडकर के देश के मुसलमानों और भारत विभाजन को लेकर जो विचार थे , उनको लेकर अभी भी विवाद होता रहता है । वे भारत विभाजन के पक्ष में थे । लेकिन उनके इस स्टेेंड की आलोचना करने से पहले , यह समझना जरुरी है कि उनके तर्कों को समझा जाये । आम्बेडकर ने अपनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिये भारत विभाजन पर एक ग्रन्थ रचना भी की । उन्होंने भारत विभाजन को लेकर हिन्दू और मुसलमान दोनों पक्षों के तर्कों की निष्पक्ष होकर मीमांसा की है ।

दरअसल मुसलमानों को लेकर आम्बेडकर का सबसे बड़ा एतराज यह है कि कांग्रेस हर हालत में मुसलमानों के तुष्टीकरण में लगी हुई है । कांग्रेस मुसलमानों की नाजायज माँगों के आगे भी नतमस्तक हो जाती है , इसलिये उनकी माँगें बढ़ती जाती हैं । ळेकिन कांग्रेस आखिर यह क्यों करती है ? कांग्रेस की इच्छा है कि अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ी जा रही आजादी की लड़ाई में मुसलमान भी उसका साथ दें । लेकिन कांग्रेस यह साथ उनका तुष्टीकरण कर लेना चाहती है । कांग्रेस यह चाहती है कि उसे हिन्दू और मुसलमानों , दोनों की ही पार्टी माना जाये । इसलिये पार्टी मुसलमानों के आगे नतमस्तक होने के लिये भी तैयार है । इस काम के लिये कांग्रेस इस सीमा तक आगे आई कि उसने महात्मा गान्धी के नेतृत्व में भारत के मुसलमानों को लेकर खिलाफ़त आन्दोलन शुरु कर दिया । तुर्की के मुसलमान खलीफा के पद की केंचुली उतार रहे थे और और उसके ओटोमन साम्राज्य का अन्त हो रहा था ।तुर्की में कमाल पाशा अता तुर्क का प्रगतिशील नेतृत्व उभर रहा था । भारत के मुसलमानों का इससे कोई सम्बंध नहीं था । लेकिन भारत में कांग्रेस इसी लड़ाई में यहाँ के मुसलमानों को झोंक रही थी । डा आम्बेडकर को कांग्रेस की यह नीति समझ नहीं आ रही थी । कांग्रेस जितना इस जिद पर अड़ी थी कि उसे िहन्दु मुसलमान दोनों का प्रतिनिधि माना जाये , जिन्ना उतने ही ज्यादा हठी हो रहे थे कि मुसलमानों की एक मात्र प्रतिनिधि संस्था उनकी मुस्लिम लीग ही है । जिन्ना शायद कुछ सीमा तक ठीक थे लेकिन कांग्रेस इसे मानने को तैयार नहीं थी और अपनी जिद को ठीक ठहराने के लिये मुसलमानों के आगे दंडवत हो रही थी । आम्बेडकर की नज़र में कांग्रेस का यह तुष्टीकरण ही अनेक समस्याओं का कारण है । उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कांग्रेस मुसलमानों की हर अन्याय पूर्ण माँग को स्वीकार करती है लेकिन तथाकथित अछूत वर्ग को उनके न्यायपूर्ण अधिकार देने के लिये भी तैयार नहीं है । कम्युनल अवार्ड से मुसलमानों को उनकी संख्या से भी ज्यादा लाभ मिलें इस पर कांग्रेस को कोई आपत्ति नहीं , लेकिन यदि सरकार अछूतों को कुछ देने की बात करती है तो कांग्रेस इसे पचा नहीं पाती ।

भारत विभाजन पर लिखी अपनी पुस्तक थाटस आन पाकिस्तान में उन्होंने इसे व्यंग्य की शैली में लिखा है –“क्या हिन्दू शासक जाति ने , जो हिन्दूराजनीति पर अपना नियन्त्रण रखती है , अस्पृश्य और शूद्रों के हितों की अपेक्षा मुसलमानों के निहित स्वार्थों की सुरक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दिया है ? क्या श्री गान्धी अस्पृश्यों को तो कोई भी राजनैतिक लाभ देने का विरोध करते हैं , लेकिन मुसलमानों के पक्ष में वे एक कोरे चैक पर हस्ताक्षर करने के लिये तत्पर नहीं है क्या ? वास्तव में हिन्दू शासक जाति अस्पृश्यों तथा शूद्रों के साथ शासन में भाग लेने की अपेक्षा मुसलमानों के साथ शासन में भाग लेने को अधिक तत्पर दिखाई देती है । ” आम्बेडकर सवर्ण जाति के लोगों को ही हिन्दू शासक जाति कहते हैं । आम्बेडकर का यह प्रश्न कांग्रेस की मुस्लिम साम्प्रदायिक नीति की पोल तो खोलता ही है , लेकिन उनकी मूल चिन्ता यह है कि आखिर कांग्रेस द्वारा इतना पालने पोसने के बाद भी मुसलमान अलग देश की माँग क्यों कर रहे हैं ? आम्बेडकर का आगे का प्रश्न और भी उत्तेजना भरा है । कांग्रेस ने तो मुसलमानों को हिन्दुओं के अधिकारों पर कुठाराघात करते हुये पहले ही अधिक अधिकार दिये हुये हैं । उनका प्रश्न है –” क्या विधान सभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक नहीं है ? क्या कनाडा , दक्षिणी अफ्रीका और स्विटजरलैंड में जातियों की जनसंख्या के अनुपात से भी अधिक प्रतिनिधित्व उन्हें नहीं दिया गया है ? क्या जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व दिये जाने का भी मुसलमानों पर कोई प्रभाव पड़ा है ? क्या इससे विधानसभा में हिन्दुओं का बहुमत घटता नहीं है ? इसमें कितनी कमी आई है ? अपने आप को केवल ब्रिटिश भारत तक ही सीमित रखते हुये और केवल उसी प्रतिनिधित्व का लेखा जोखा रखते हुये , जो निर्वाचन क्षेत्रों को प्रदान किया गया है , में स्थिति क्या है ? भारत सरकार के अधिनियम १९३५ के अनुसार केन्द्रीय विधान सभा के निचले सदन में कुल १८७ स्थानों से हिन्दुओं की की संख्या १०५ और मुसलमानों की ८२ है । ( जोकि मुसलमानों के जनसंख्या अनुपात से कहीं ज्यादा है ) ।” लेकिन इसके साथ ही आम्बेडकर का शाश्वत प्रश्न फिर वहीं का वहीं है , इतने तुष्टीकरण के बाद भी मुसलमान भारत में क्यों नहीं रहना चाहते , वे भारत का विभाजन क्यों चाहते हैं ? इसका उत्तर उन्होंने बातचीत में कभी दत्तोपंत ठेंगड़ी को दिया था । उसका प्रसंग दूसरा था लेकिन महत्व सार्वकालिक है । मुसलमानों का विषय आने पर बाबा साहिब ने कहा — ” मुझे अच्छी तरह पता है कि जूता कहाँ काट रहा है । आप लोगों को काटने का अनुभव होने पर भी उसकी परवाह नहीं है । ” शायद इसीलिये आम्बेडकर मुसलमानों के लिये अलग देश बना देना चाहते थे क्योंकि उनको जूते के काटने का भी पता था और उन्हें उसकी परवाह भी थी । वे जानते थे कि जूता ज्यादा देर काटता रहा तो जहर सारे शरीर में फैल सकता है । लेकिन इससे भी एक बड़ा प्रश्न आम्बेडकर के सामने था । आखिर जूता काटता ही क्यों है ? इसका उत्तर भी बाबा साहेब को खुद ही देना था और उन्होंने दिया भी । वे जानते थे मतान्तरण से देर सवेर राष्ट्रान्तरण भी हो जाता है । अपने परम शिष्य शंकरानन्द शास्त्री को उन्होंने कहा- ईसाई या इस्लाम मजहब ग्रहण करने पर मेरे लोग राष्ट्रीयता ही खो बैठेंगे ।” लेकिन सैकड़ों साल की मुस्लिम गुलामी में जिन्होंने मजहब बदल लिया था अब बे ही काटने लगे थे । लेकिन इससे भी एक बड़ा प्रश्न अनुत्तरित था जिसका जवाब आम्बेडकर को देना था । क्या ये लोग फिर वापिस नहीं आ सकते ? यदि ऐसा हो जाये तो विभाजन का प्रश्न टल जाये ? इसका उत्तर उन्होंने ठेंगड़ी को दिया -हरिजन हिन्दु समाज का ही अंग है । फिर भी हरिजनों को हिन्दु समाज में आत्मसात नहीं किया जा सका । —– स्वर्ण हिन्दू समाज की जीर्ण शक्ति के बारे में मेरा परिचय है । इसलिये मैं कहता हूं कि विदेशी निष्ठा वाले लोगों को राष्ट्र शरीर में रख लेने से उन्हें बाहर कर देना ही श्रेयस्कर है । ” हिन्दु समाज की पाँचना शक्ति कमज़ोर हो गई है , यह बाबा साहेब जानते हैं । लेकिन समस्या का हल तो इस पाचन शक्ति को चुस्त दुरुस्त करने से ही निकलेगा । बे लाला हरदयाल द्वारा ,िहन्दुस्तान की सुरक्षा हेतु सुझायें गये एक सुझाव का ज़िक्र करते हैं । लाला हरदयाल ने कभी कहा था कि भारत की सुरक्षा तभी हो सकती है यदि अफगानिस्तान को फिर से िहन्दु बना लिया जाये और पश्चिमोत्तर

ऐसा नहीं कि उन्हें भारत विभाजन की कल्पना से दु:ख नहीं होता था । वे तो अपनी बात ही यहीं से शुरु करते हैं कि प्रकृति ने ही भारत को अखंड़ बनाया है । उनके अनुसार — “हमें इस मौलिक तथ्य को नहीं भूलना चाहिये कि प्रकृति ने भारत को एक एकल भौगोलिक इकाई के रुप में निर्मित किया है । यह ठीक है कि भारतीय लड़ रहे हैं और कोई भी यह भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि वे कब लड़ना बन्द करेंगे । लेकिन इस तथ्य को स्वीकारने पर भी आखिर यह तो सोचना पड़ेगा कि इसका अर्थ क्या है ? केवल यह कह देना कि भारतीय विवादी होते हैं , इस तथ्य को तो नहीं मिटा सकता कि भारत एक भौगोलिक इकाई है । इसकी एकता उतनी ही प्राचीन है जितनी प्रकृति स्वयं । भौगोलिक एकता के अलावा, यहाँ अत्यन्त प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक एकता भी रही है । इसी सांस्कृतिक एकता ने ही तो यहाँ के राजनैतिक और जातीय अलगाव को झेला है । पिछले १५० साल से तो सांस्कृतिक , राजनैतिक , आर्थिक , वैधानिक और प्रशासनिक संस्थांए एक सांझे उदगम स्थल से कार्य कर रही है । पाकिस्तान को लेकर किसी भी विवाद के सन्दर्भ में यह तथ्य आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता की मूलत: भारत में आधारभूत एकता विद्यमान है । ”

अब इस भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अखंड भारत को क्यों विभाजित किया जाना चाहिये, उसके आम्बेडकर ने व्यावहारिक कारणों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया । उनके सामने एक ही प्रश्न था कि क्या मुसलमानों की निष्ठा भारत के प्रति रह पायेगी ? क्या मुसलमान अभी भी यही नहीं सोच रहे कि भारत में अंग्रेजों ने सत्ता मुसलमानों से छीनीं थी , अत: जब वे यहाँ से जायें तो स्वभाविक ही सत्ता वापिस उनको मिलनी चाहिये ? जिस वक्त कांग्रेस भारत में मुसलमानों के लिये खिलाफत आन्दोलन चला रही थी , उस समय भी जब मुस्लिम नेतृत्व के एक वर्ग को लगा कि इस्लामी बर्चस्व को स्थापित करने के लिये बाहर के मुस्लिम देशों से भी सहायता लेने में कोई हर्ज नहीं है तो उन्होंने अफगानिस्तान के बादशाह को भारत पर आक्रमण करने के लिये निमंत्रित करने में हिचक नहीं दिखाई । ़यही चिन्ता आम्बेडकर को थी । ब्रिटिश सत्ता के समाप्त हो जाने के बाद मुस्लिम समाज यदि अपने आप को इस देश की धरती से जोड़ न सका और हिन्दोस्तान में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करने के लिये विदेशी मुसलमान देशों की ओर सहायता के लिये देखने लगा तो इस देश की स्वतंत्रता पुनः: ख़तरे में नहीं पड़ जायेगी ?

इसी का उत्तर आम्बेडकर तलाश रहे थे । वे लिखते हैं–“कोई इस बात की अनदेखी नहीं कर सकता कि स्वतंत्रता पा लेना उतना महत्वपूर्ण नहीं है ,जितना उसे बनाये रखने के लिये पक्के साधनों का पा लेना । स्वतंत्रता को मज़बूत रखने वाली तो अन्ततोगत्वा एक भरोसेमन्द फौज ही है । ऐसी फौज जिस पर हर समय और किसी भी परिस्थिति में , देश के लिये लड़ने हेतु विश्वास किया जा सके । भारत में तो सेना संयुक्त ही होगी, जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही होंगे । मान लीजिये किसी विदेशी शक्ति का भारत पर आक्रमण होता है तो क्या सेना के मुसलमानों का भारत की रक्षा के लिये भरोसा किया जा सकता ?मान लीजिये हमलावर मुसलमानों का हममजहब हों तो क्या वे भारत की रक्षा के लिये उनका मुकाबला करेंगे या फिर उनकी तरफ़ हो जायेंगे ? यह सवाल बहुत ही महत्व का है । लेकिन इस प्रश्न का उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि सेना में शामिल मुसलमानों को अलग राष्ट्र के सिद्धान्त , जो पाकिस्तान की नींव में है ,कि छूत कंहा तक लग गई है । यदि उन्हें यह छूत लग गई है तो मान लेना चाहिये कि भारत की सेना ख़तरनाक हो गई है । भारत की आजादी की संरक्षक होने की बजाय वह उसके लिये ख़तरा पैदा करने वाली और धमकी देने वाली बन जायेगी । यह मेरा दृढ़ विश्वास है । ” इस्लामी राष्ट्र की छूत उत्पन्न हो जाने के बाद भारत की मुस्लिम समस्या का यह नीर क्षीर विवेचन आम्बेडकर का है । अपनी इस स्थापना के बाद ही वे पाकिस्तान का समर्थन करते हैं ।

 

आम्बेडकर का प्रश्न है कि इस स्थिति में और विकल्प क्या है ? ंउनका प्रश्न सामयिक भी था और सटीक भी । लेकिन कांग्रेस तो इस प्रश्न का सामना करने को ही तैयार नहीं थी । मुसलमानों के मनोविज्ञान को सामने दीवार पर लिखा देख कर भी वह पढ़ने को तैयार नहीं थी । नेहरु आकाश में रह कर भारत की खोज कर रहे थे । महात्मा गान्धी ज़मीन पर रहते थे लेकिन वे मुसलमानों को लेकर मृगतृष्णा के शिकार थे । लेकिन आम्बेडकर को भारत को जानने के लिये न आकाश में उड़ने की ज़रुरत थी और न ही गान्धी की तरह मृगतृष्णा का शिकार होने की । आम्बेडकर उन गली मुहल्लों में से गुज़रकर बड़े हुये थे , जो असली भारत था ।

इस विश्लेषण के बाद आम्बेडकर का कहना है कि कुछ अंग्रेज शासक यह कैसे कह सकते हैं कि भारत का विभाजन भारत के हित में नहीं है । इस्लामी राष्ट्र के सिद्धान्त की छूत से ग्रस्त मुसलमान भारत के लिये अराजकता का कारण हो सकते हैं । लेकिन हिन्दु भी भारत विभाजन का विरोध करते हैं । आम्बेडकर कहते हैं—- ”

मैं विश्वास करता हूं कि या तो वे जानते नहीं कि भारत की स्वतंत्रता में निर्धारक कारक कौन से हैं या फिर वे भारत की रक्षा के प्रश्न पर एक स्वतंत्र देश के नाते विचार नहीं करते बल्कि वे शायद सोचते हैं कि स्वतंत्रता के बाद भी किसी आक्रमण की स्थिति में अंग्रेज ही सुरक्षा का काम करेंगे । यह दृष्टिकोण ही ग़लत है । यदि यह मान भी लिया जाये कि भारत का विभाजन न हो और अंग्रेजों को सुरक्षा का जिम्मा दे दिया जाये । हो सकता है वे यह काम बेहतर ढं़ग से कर सकते हों । असल प्रश्न यह है कि विभाजन न होने की स्थिति में क्या भारतीय खुद स्वतंत्र भारत की रक्षा कर सकेंगे ? मैं फिर दोहराता हूं कि इसका एक ही उत्तर है । भारतीय स्वतंत्रता की रक्षा एक ही स्थिति में कर सकेंगे, यदि भारत की सेना अराजनैतिक रहती है । अराजनैतिक का अर्थ है कि पाकिस्तान के जहर से अछूती । मैं भारतीयों को सेना के इस स्वरुप पर विचार किये बिना स्वराज्य की बातें करने की वाहियात आदत के खिलाफ़ चेतावनी देता हूं । राजनैतिक सेना भारत की स्वतंत्रता के लिये सबसे बड़ा ख़तरा बनेगी । यह स्थिति सेना के न होने से भी घातक है । ”

आम्बेडकर तो इससे भी आगे की स्थिति पर विचार करते हैं । उनका कहना है –” सेना देश में किसी भी सरकार को उस समय संभालती है जब कोई विद्रोही तत्व उसे चुनौती देता है । मान लीजिये तात्कालिक सरकार कोई ऐसी नीति अपनाती है , मुसलमानों का एक वर्ग जिसका घोर विरोध करता है । कल्पना करें इस नीति का पालन करवाने के लिये सरकार को सेना का इस्तेमाल करना पड़ता है । तो क्या सरकार सेना के मुसलमानों पर भरोसा कर सकती है कि वे उसका आदेश मानेंगे और मुसलमान विद्रोहियों को गोली मार देंगे ? यह फिर इसी बात पर निर्भर करेगा कि मुसलमानों को पाकिस्तान की छूत किस सीमा तक लग चुकी है । यदि उन्हें यह छूत लग चुकी है तो विभाजन न होने की स्थिति में भारत एक सुरक्षित और विश्वसनीय सरकार नहीं बना सकता । ” यहाँ तक आम्बेडकर का प्रश्न था वे मानते थे कि मुसलमानों को यह छूत लग चुकी है । भारत विभाजन का उनका पूरा थीसिस ही उनके इस विश्वास और निष्कर्ष पर टिका हुआ है । भावनात्मक स्तर पर विभाजन के मुद्दे पर उनसे सहमत या असहमत होने का अधिकार सभी को है ।सेना में मुसलमानों के व्यवहार को लेकर उनकी चिन्ता उनके निष्कर्षों का एक सीमान्त है , लेकिन यही विश्लेषण सामान्य मुसलमान पर भी लागू होता है । लेकिन देश की मुस्लिम समस्या पर उनके चिन्तन की अवहेलना आज भी नहीं की जा सकती । आज जब आजादी के पैंसठ साल बाद की स्थिति को देखते हैं तो लगता है आम्बेडकर का पिछली शताब्दी के पाँचवें दशक में किया गया विश्लेषण आज भी उतना ही प्रासांगिक है जितना उस समय था । कांग्रेस समेत सभी दल राजनैतिक हित साधना के लिये उसी प्रकार मुस्लिम तुष्टीकरण में लगे हैं , जिसका संकेत बाबा साहेब ने १९४० में दिया था । बल्कि अब तो स्थिति और भी भयानक हो गई है । लोकतन्त्र की पश्चिमी शैली ने वोट बैंक के लालच में अनेक राजनैतिक दलों को स्वतंत्रता पूर्व की कांग्रेस के रास्ते पर डाल दिया है । राजनैतिक दलों की इस कमजोरी को भांप कर मुस्लिम नेतृत्व एक बार फिर भारत में अपने बहुमत के क्षेत्रों को रेखांकित करने में जुट गया है । इतना ही नहीं बल्कि नये क्षेत्रों को मुस्लिम बहुल बनाने के काम में भी जुट गया है ताकि वक्त बेवक्त काम आये । अरसा पहले केरल में सी पी एम ने मल्लापुरम् जिला का निर्माण करके वही काम किया था जिसका आरोप आम्बेडकर गान्धी पर लगाते थे । आज कांग्रेस मुसलमानों के तुष्टीकरण में इतना आगे निकल गई है कि सच्चर और रंगनाथ कमेटियां बना कर उनके लिये कोरे चैक तैयार किये जा रहे हैं । गान्धी को आम्बेडकर ने यही तो कहाथा कि आप मुसलमानों को खुश करने के लिये उन्हें कोरा चैक दे रहे हो । यदि कांग्रेस उस समय मुस्लिम तुष्टीकरण के रास्ते पर न चलती तो शायद भारत विभाजन की नौबत न आती । लेकिन यदि आज भी समस्या को तुष्टीकरण के माध्यम से ही सुलझाने की कोशिश की जाती रही तो परिणाम शायद और भी भयानक निकलें ।

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2 Comments on "भीम राव आम्बेडकर ,भारत विभाजन और मुस्लिम समस्या— डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री"

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शशिभूषण राय
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शशिभूषण राय

कुलदीप जी के विचार आज के समय में प्रासंगिक है।

parshuramkumar
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चौकिये मत हम सब उस असत्य को आज वास्तव मानते है, पर वह एक विकृत असत्य है जो नेहरु के शासन काल में बड़ी ही चतुराई से फैलाया गया.. आतंकवाद से लड़ने की किसी भी नीति का मूल आधार यही होना चाहिए कि हम आतंकवादियों की किसी भी मांग को किसी भी हालात में नहीं मानेंगे।हमारे हाल के इतिहास में इसनीतिपर विलकुल भी अमल नहीं किया गया। जबसे हमने 1947 में मुसलिम आतंकवादियों के दबाब में पाकिस्तान बनाने की मांग को स्वीकार किया है तब से हम दबाब में बार-बार आतंकवादियों के आगे घुकने टेक देते हैं। आतंकवादियों के सामने… Read more »
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