लेखक परिचय

अवनीश सिंह

अवनीश सिंह

आज़मगढ़ जिले के एक छोटे से कसबे में जन्म और पालन पोषण | प्रारंभिक शिक्षा भी यहीं प्राप्त की| आगरा से कम्प्यूटर इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की| साहित्य,इतिहास व अध्यात्म में रूचि | वर्तमान निवास - ठाणे, महाराष्ट्र

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indiaइस धरती पर एक बड़ा सुन्दर देश भारत है| हालांकि आजकल पढ़े-लिखे सभ्य लोग इसे ‘इण्डिया’ कहते हैं पर चूँकि हम पर सभ्यता का नशा इतना नहीं गहराया है तो हम लोग इसे भारत ही कहते हुये आगे बढ़ते हैं|
कुछ दो तीन सौ वर्ष पहले की बात है| भारतवर्ष में कुछ सैलानी और बनिया आये| उन्हें यह भूमि इतनी रुचिकर लगी कि यहीं पर अपना डेरा डाल लिया| इस भूमि से उन्हें इतना प्रेम था कि इससे उपजा एक-एक दाना अपने मायके भेज देना चाहते थे ताकि वहां के लोग भी देख पायें और ऐसे महान देश से परिचय पा सकें| पर जैसा कि हमेशा होता आया है, हमारे देश में भी वही कहानी दोहरायी गयी| कुछ उपद्रवी तत्वों ने अनावश्यक रूप से उन्हें परेशान करना प्रारम्भ कर दिया| इन्हें अतिथि सत्कार की हमारी उज्ज्वल परम्परा का तनिक भी भान न था| खैर, जैसे तैसे इन लोगों ने उन प्यारे (?) सैलानियों को भगा दिया और हमारे देश के राजा बने “चाचा जी”|
“चाचा जी” ने इस देश की फिर से नींव रखी| उनकी भवन निर्माण शैली गज़ब की थी| उनका मानना था कि एक मंजिल को बनने में पाँच वर्ष लगते हैं| पाँच वर्ष बीतने पर अगली मंजिल का कार्य प्रारम्भ होना चाहिये और उसे बनाने में भी पाँच वर्ष ही लगने चाहिये| वो अलग बात है कि अब नींव दरक रही है, भवन हिल रहा है पर चाचा जी पर प्रश्न उठाना मूर्खता होगी| उन्होंने अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ सामग्री का प्रयोग किया था| वो तो उनके बाद के लोगों ने पहली मंजिल पूरी किये बिना ही आगे की मंजिलें बनानी शुरू कर दीं इसलिये पूरे ढाँचे में समस्या आने लगी और ये अर्धनिर्मित भारत भवन पीसा की मीनार की तरह झुक गया|
हमारे चाचा जी बड़े दोस्ताना स्वभाव के व्यक्ति थे| भारत के पड़ोसी “मीन” देश के राजा से इनकी बढ़िया दोस्ती थी| “मीन” को भारत इतना प्रिय है कि अक्सर उसके नन्हे शिशु “मत्स्य” अज्ञानतावश (?) अपना चारा ढूँढने भारत में चले आते हैं| कभी कभी तो जी भर के चबाते हैं| लद्दाख और अरुणाचल जैसे कई तालाब हैं जिनमें तैरना मीनियों को बड़ा प्रिय है| कहा जाता है कि “मीन” देश की नींव “माओ” नामक एक महान संत ने रखी थी| “माओ” के बारे में बहुत सी कथाएं प्रचलित हैं| लोग बताते हैं कि वो बहुत ही दयालु प्रकृति वे संत थे| अपने भक्तों के साथ साथ अपने विरोधियों का भी विशेष ध्यान रखते थे | उनको कर्म-कारण आदि से मुक्त करके मृत्युलोक के नारकीय जीवन से तत्काल मुक्ति प्रदान करते थे| उन्होने अपने समय के समाज की अशुद्धियों को जड़ से समाप्त करने का प्रण लिया था| उस समय की सबसे बड़ी अशुद्धि समाज मे पुरातनपंथियों के रूप में व्याप्त थी जो “पुराने रिवाज, तौर-तरीक़े, संस्कृति और पुरानी सोच” के गुलाम थे| संत माओ ने परशुराम की तरह प्रतिज्ञा की कि “मीन” को ऐसे नरों से विहीन कर दूँगा| अब उन्होने सांस्कृतिक शुद्धिकरण के लिये सर्वप्रथम इधर उधर साधना में जुटे सारे साधुओं को एकत्र किया| फिर उन्होने बड़े-2 हवन कुंडों की स्थापना की जिनमें रक्त की आहुति दी गयी| हवन इतने सफल हो रहे थे कि उनकी अग्नि की लपटें और धुंवा भी रक्तिम हो गये थे| पुरातनपंथियों को सामूहिक मोक्ष प्रदान किया गया| पुरातन लोगों से जुड़ी पुरातात्विक महत्व की जगहों का विनाश कर दिया गया ताकि नया सृजन हो सके| हवनकुंड की रक्तिम लपटों ने माओ को अब तक का सर्वश्रेष्ठ सन्त साबित कर दिया| तब से इनके भक्तों ने लाल रंग को अपना प्रतीक चिन्ह बना लिया|
खैर, हम किन बातों में फंस गये| हम भोला की बात कर रहे थे| भोला इस देश के हरित और उर्वर भूमि उत्तर प्रदेश की पैदाइश है| यथा नाम, तथा गुण, भोला अत्यन्त भोला है| गाँव की धूल में धूसरित उसका बचपन उसकी दृष्टि से बड़ा ही शानदार था| उस मूर्ख को क्या मालूम कि उसने शहर रुपी आधुनिक स्वर्ग (?) में जन्म न पाकर कितनी नेमतों से हाथ धो दिया है| खैर, किसी तरह भोला के भी भाग्य जागे और उसे उच्च शिक्षा के लिये राजधानी जाने का अवसर मिला|
राजधानी आकर भोला को पता चला कि वह कितना वंचित था| उसे शहर में एक से बढ़कर एक नयी चीजें मिलीं| उसकी ख़ुशी का पारावार न था| शिक्षा के लिए उसका नामांकन राजपरिवार के मुखिया चाचाजी के नाम पर बने एक संस्थान में हुआ| वैसे वहाँ रहने वाले लोग उसे एक भारत से अलग राज्य समझते हैं और बड़े गर्व से इसे जेएनयू कहते हैं| संस्थान में पहुंचकर भोला को एक और दिव्य ज्ञान हुआ| भोला को पता चला कि भारत के मनीषियों से भी भारी-भरकम (कई कुंतल के) मनीषी विदेशों की पावन धरती पर अवतरित हुये हैं पर मूढ़ भारतीय राम से आगे बढ़ते ही नहीं हैं| जो भी पुरनिया थोड़ा पढ़ लिख लिए, बस उसी राम की कहानी लिखे जा रहे हैं| ये भी कोई ज्ञान है भला|
जैसे जैसे भोला के ज्ञान चक्षु खुलते गये, नये ज्ञान से परिपूर्ण विद्वजनों ने उसकी सहायता बढ़ा दी| उसे भिन्न भिन्न रूपों में ज्ञान की गोलियां खिलाई गयीं, बुद्धि के इंजेक्शन दिये गये| बड़ी बीहड़ किस्म की चर्चायें की गयीं| कुछ ज्ञानी सफाईकर्मियों ने भोला के मगज से सारा कचरा निकाल कर पूरा दिमाग स्वच्छ किया| इस प्रकार धीरे धीरे भोला का शुद्धिकरण किया गया और उसे नया विचार ग्रहण करने योग्य बनाया गया| अब भोला को २४ कैरेट शुद्ध और सर्वोत्तम धर्म में दीक्षा देने की तैयारी प्रारम्भ कर दी गयी| इस शुद्धिकरण में उसका सहपाठी अशोक उसकी भरपूर सहायता कर रहा था|
सर्वप्रथम, हम इस धर्म से परिचित हो लेते हैं| यह धर्म यूरोप के परम ज्ञानी मार्क्स बाबा के द्वारा चलाया गया था| उन्होंने घनघोर तप से अपनी चेतना को पूरे विश्व के मजदूरों तक विस्तृत कर लिया था| उनके बारे में प्रसिद्द है कि वे चेतना के उच्चतम स्तर पर पहुँच चुके थे| उन्होंने ग़रीबों और मजदूरों को संगठित रहने की शिक्षा दीं| इनके अनुयायियों के घर में बहुधा आपको इनके कोट-पैंट वाले चित्र मिल जायेंगे| कुछ लोग इसे “नास्तिक धर्म” कहते हैं परन्तु इनके अनुयायी आस्तिकों के भी बाप हैं| ऐसा माना जाता है कि वो व्यक्ति पूजा के अत्यधिक विरुद्ध थे पर उनके अनुयायियों ने कबीर के अनुयायियों की तरह उनकी एक न सुनी और उन्हें इतिहासपुरुष और कलियुग के तारनहार का दर्जा दे दिया| इन्होंने भावी पीढ़ी के मार्गदर्शन के लिये बहुत से ग्रन्थों की रचना की जिनमें “कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” और ‘’दास कैपिटल” का महत्त्व गीता और रामायण के समकक्ष है| सन्त माओ भी इन्हीं के एक प्रचण्ड भक्त थे| सन्त माओ ने इनके दर्शन में कुछ सुधार भी किये जैसे कि पुरातनपंथियों को तत्काल मोक्ष की व्यवस्था और धर्म की लाल यूनिफ़ार्म|
भारत में उनके भक्त बहुतायत में हैं और भोला भी उसी भक्तमंडली में दीक्षित हो रहा था| अब उसको उसके धर्म और ज्ञान की कमियाँ बताई जाने लगीं| और ये भी कि ये नया धर्म कितना पूर्ण है| अब भोला को धीरे-२ बुरा लगना प्रारंभ हुआ| गुरु जी बोले – “तुम्हारे राम ने क्या किया है? जो तुम राम के खूंटे से बंधे हुए हो? जरा बताओ तो क्या किया है तुम्हारे भगवान राम ने|” गुरूजी का पूरा जोर “तुम्हारे” शब्द पर था| भोला ठहरा भोला, इतना तो उसने सोचा न था पर भोला ने भी कुछ दिमाग लगाया और बड़ा तर्कपूर्ण उत्तर दिया कि चलिये, थोड़ी देर के लिये सोचिये कि मैं राम का खूंटा छोड़ने को तैयार हूँ| पर आप भी तो मुझे नये खूंटे से बाँध रहे हैं| मैं छूटा कहाँ बंधन से| अब गुरूजी के मस्तक पर तेज आ गया| उन्होंने समझाया- ‘अरे मूर्ख, ये बंधन नहीं है, मुक्ति है| और जिसे तू खूंटा कह रहा है वह खूंटा नहीं है| तू नासमझ है| देख , यह हरा भरा चारागाह है, जितना चाह उतना मुंह मार| अगर राजधानी के चारागाह से पेट न भरे  तो बीहड़ों में भी जा सकते हो|’ अब भोला के कान खड़े हो गये| बोला – ‘बीहड़ों में ही जाना है तो राम क्या बुरे हैं| आखिर किष्किन्धा में जो मदद उन्होंने की, ऐसी कोई मिसाल है क्या? आखिर मैं राम को क्यूँ छोडूँ? मेरी जमीन में राम हैं, पवन में राम हैं, हमारे सुख में राम हैं, दुःख में राम हैं, जन्म में, मरण में, विवाह में, विकास में, विनाश में हर जगह हैं मेरे राम| कहाँ जाऊँगा मैं उन्हें छोड़कर? ’ गुरूजी अब समझ गये थे कि सारी मेहनत व्यर्थ गयी| ये तो कुपात्र निकला, मूर्ख कहीं का| फिर उन्होंने अंतिम प्रयत्न किया कि चलो, हमेशा के लिए नहीं तो कुछ ही दिन के लिये राम को तजो और हमारी मंडली में आओ| फिर तुम खुद ही समझ जाओगे|
भोला की सहज और मूढ़ बुद्धि ने ऐसी बात की जो उसे कतई नहीं कहनी चाहिये थी| बोला – ‘यही निमंत्रण मैं आपको देता हूँ| अपनी मण्डली से कहिये कि कुछ दिन राम नाम भजे, अन्य देवताओं व संतों को भूल जाये, राम को समझे और राममय हो| फिर अपना निष्कर्ष बताये|’ भोला का इतना कहना था कि गुरूजी ने उसको तुरंत चले जाने के लिये कहा और बोले कि ठीक है, मैं इस पर विचार करूंगा| विश्वस्त सूत्रों से खबर मिली है कि गुरूजी आज तक उस पर विचार कर रहे हैं और अनिर्णय की स्थिति में हैं| एक और खबर है पर इस पर विश्वास मत करियेगा| कुछ मूर्ख कहते हैं कि उसके बाद से गुरूजी व उनके शिष्यों ने भोला से कभी बात नहीं की|
भोला के सहपाठी और अब तक के उसके पथप्रदर्शक की भूमिका निभाने वाले अशोक को ये बात नागवार गुजरी| अशोक को लाल रंग में रंगे अभी थोड़ा ही समय हुआ था| उस पर लाली भरपूर मात्रा में छायी हुई थी| वह नयी पीढ़ी का अघोषित प्रवक्ता था जिसकी बातों और साँस से भी सिर्फ लाल रंग ही टपकता था| अशोक स्टार प्रचारक था या दूसरे शब्दों मे कहें तो सन्त का रंगरेज था| नये लोगों लाल रंग मे रंगने के लिये उसने तमाम विधियाँ विकसित की थीं| उसने भोला को समझाया – “तुम्हें गुरुजी से ऐसे बहस नहीं करनी चाहिये थी|” भोला ने पूछा – “क्यों? मैंने क्या गलत कहा?”
अशोक – “तुमने सही क्या कहा? तुम्हारे अंदर तनिक भी इतिहासबोध है कि निरे बुद्धू ही हो?”
भोला – “कैसा इतिहासबोध?”
अशोक- “तुम्हें पता नहीं है क्या कि इस देश में जितना कुछ अच्छा हो रहा है उसके पीछे सिर्फ लाल रंग की प्रेरणा कार्य कर रही है| हमारे प्रथम राजा ‘चाचा जी’ को भी लाल रंग से बहुत लगाव था| तुमने कभी सोचा कि चाचा को गुलाब इतने प्रिय क्यों थे? कभी इस पर गौर किया कि उन्हें बच्चों से इतना लगाव क्यूँ था?”
भोला (चकित होते हुये उत्सुकता से) – “मैंने तो कभी नहीं सोचा| क्या कारण था? मुझे भी बताओ|”
अशोक – “वो इसलिये क्योंकि गुलाब का रंग लाल होता है| और बच्चों को भी ‘लाल’ कहते हैं| अब समझे उनकी सिद्धांतनिष्ठा| यहाँ तक कि उन्होने अपने नाम में भी लाल लगा रखा था|”
भोला – “अच्छा !, ये तो मुझे पहली बार किसी ने बताया है|”
अशोक – “तुम्हें तो ये भी पता नहीं होगा कि शादी की रात पर दुल्हन लाल जोड़ा क्यों पहनती है?”
भोला ने प्रश्नवाचक दृष्टि से अशोक को देखा| अशोक ने उसकी जिज्ञासा का सम्मान करते हुये आगे की बात कही|
अशोक – “क्योंकि औरत सर्वहारा वर्ग की है| और शादी की रात्रि मे ही वह शपथ लेती है कि आज से शोषक को कभी चैन से नहीं रहने देना है, उसकी पूँजी पर पूरा कब्जा करना है और उसको आजीवन कारावास की सजा देनी है| बड़ी अजीब बात है कि तुम्हारे पूर्वजों को ये सब पता था पर तुम पाखंडियों ने सब गुड़ गोबर कर दिया|”
भोला- “ये सब तो हमें किसी ने कभी बताया ही नहीं|”
अशोक – “तुम्हें तो और भी बहुत सी बातें नहीं पता होंगी| तुम लोग सत्यनारायण की कथा सुनते हो, पूरी कथा में पंडित बस यही बताता है कि इसने सुनी तो इतना फायदा हुआ, उसने नहीं सुनी तो तबाह हो गया पर इतना डराने के बाद भी कथा नहीं सुनाता| तुम सुनने का आग्रह भी नहीं करते|”
भोला – “अरे सचमुच, कथा तो कहीं है ही नहीं|”
अशोक (उत्साहित होकर) – “और सुनो, तुम्हारे गरुण पुराण में मानव को जिस तरह से कीड़े-मकोड़ों से भी बदतर प्रस्तुत किया गया है, जैसी अमानवीय सजाओं का वर्णन है कि उसे पढ़कर उबकाई आती है|”
भोला- “हाँ, गरुण पुराण अप्रासंगिक है आज| हम तो उसे कब का नकार चुके हैं|”
अशोक – “और मनु स्मृति? उसको भी नकार चुके हो?”
भोला – “अवश्य, आप बताइये| आपने किसी को मनुस्मृति पढ़ते देखा?”
अशोक (उत्तेजित होकर) – “तुम लोग चोरी छिपे पढ़ते हो, जब हम सो जाते हैं तब पढ़ते हो| तुम सब के सब ढोंगी हो| तुमने मार्क्स से कुछ नहीं सीखा|”
अब भोला के तैश में आने की बारी थी|
भोला – “अच्छा ! सारा ज्ञान आपने ही ले लिया| तभी मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन को ब्रम्हा, विष्णु, महेश की तरह पूजते हो|”
भोला ने अनर्थ कर दिया| मार्क्स पर टिप्पणी ! अशोक के लिये यह असह्य था| फिर भी उसने बहुत जब्त का परिचय दिया और भोला से चर्चा जारी रखी| उसने कहा – “हम किसी को नहीं पूजते, हम प्रेरित होते हैं| पूजते तो तुम लोग हो| धर्म का अन्धकार छाया है तुम पर| और तुम्हारा तुलसिया, बीबी ने लात मार दी तो राम भजने लगा और उसी उन्माद में जो गप्प लिख दी उसी को तुम पढ़े जा रहे हो बड़े मजे से| बांह पिराई तो हनुमान बाहुक लिख मारा| तुम सब हमेशा से पाखंडी हो| साहित्य को ही देखो, जाने कितने जनवादी कवियों ने एक से एक महान रचनायें लिखीं पर तुम पढ़ते क्या हो? सांप्रदायिक कविता ‘सरस्वती वंदना’, निराला घोर सांप्रदायिक था| ऐसे हिन्दू देवियों की वंदना लिखकर उसने साहित्य को भी दूषित कर दिया है और तुम सब इसी के लिये उसे सर पे चढ़ाये रहते हो| मुझे सब पता है तुम्हारे पैंतरे| भक्त पर भक्ति का दौरा पड़ता है तो वो कहता है “मुझे तो कुछ महसूस ही नहीं हो रहा. मैं तो भक्ति के सागर में डूबा हूँ”| इस धर्म, भक्ति और आध्यात्मिकता ने ही सारा सत्यानाश किया है | और सत्यानाश भी किसका? सर्वहारा का| तुम सब इतने बड़े घाघ हो कि सर्वहारा को धर्म का झुनझुना पकड़ा रखा है| देखना, एक दिन फिर से माओ बाबा आयेंगे और बाबासूय यज्ञ करेंगे| फिर से दक्षिण जैसी अपवित्र दिशा में साधना करने वालों को पुनः बैकुंठ धाम भेजा जायेगा|”
भोला ने कहा: अच्छा, एक दिन फिर से वे आएंगे? अर्थात तुम भी उनके अवतार की राह देख रहे हो?
अशोक को बहुत तेज क्रोध आया, एकदम दुर्वासा छाप| तमक कर बोला – “हाँ हाँ, लेंगे| तुम्हारा क्या बिगड़ता है बे| तब से बहस किये जा रहा है| हर युग में एक मार्क्स और एक माओ जन्म लेंगे और तुम जैसे ढोंगियों से धरा को मुक्त करेंगे तुम क्या सझते हो संभवामि यूगे यूगे पर तुम्हारा एकाधिकार है? सुनो, जब जब इस दुनिया में पूंजीवादी पाप बढ़ेगा, सर्वहारा की रक्षा के लिए मार्क्स, माओ लेनिन जन्म लेते रहेंगे और तुम्हारे जैसे प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ वर्ग को तो पहले खत्म करेंगे| बाद में पूंजीवादियों से निपट लिया जाएगा| तुम सब डरते हो बाबा से, उनके पुण्य प्रताप से, बस हमेशा उनकी निंदा में लगे रहते हो गधों| कभी उनके उपदेशों को समझा तुमने? कैसे समझोगे, तुम पर तो  तुलसिया का नशा छाया है ”
भोला अवाक था|
भोला ने निःश्वास ली और मन ही मन सोचा कि आज इन साम्प्रदायिक (?) कवियों के जाते ही तुम्हारा साहित्य संसार बिना ग्राहक का बाजार हो गया है पर प्रकट में कुछ न बोला| भोला के दिमाग में बचपन में गाँव के रमई काका के बताये नीतिवचन तैर रहे थे, “उपदेशो हि मूर्खाणाम् प्रकोपाय न शान्तये।” उसे अटल बिहारी वाजपेयी की वो कविता भी याद आयी जो उन्होंने लेनिन की समाधि देखकर लिखी थी|

“क्या सच है, क्या शिव, क्या सुंदर?
शव का अर्चन,
शिव का वर्जन,
कहूँ विसंगति या रूपांतर?

वैभव दूना,
अंतर सूना,
कहूँ प्रगति या प्रस्थलांतर?”
जब भोला दरवाजे से बाहर निकला तो बाहर उसे दो परछाइयाँ दिखाई दीं, बहुत दुखी और उदास| ध्यान से देखा तो पता चला कि संत मार्क्स और माओ की भटकती आत्मायें हैं| संत मार्क्स अपना सर पीट रहे थे और माओ बाबा अपने बाल नोच रहे थे|

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