लेखक परिचय

कल्पना डिण्डोर

कल्पना डिण्डोर

जिला सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी, बांसवाड़ा

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समाजसेवा और राजनीति के शिखर पुरुष

जनजाति कल्याण के पुरोधा भीखा भाई

कल्पना डिण्डोर

वागड़ के गांवों से निकलकर जयपुर और दिल्ली तक में धाक जमाने वाली शख्सियतों को पैदा करने वाली यह पुण्य धरा धन्य है जहाँ विद्वजनों, लोकनायकों, संतों और इतिहास पुरुषों की लम्बी श्रृंखला जाने कितने युगों से निरन्तर प्रवाहमान है। वागड़ की पुण्य धरा की कोख ने ऎसे कई-कई सूरज उगाए हैं जिन्होंने वागड़ को देश से लेकर दुनिया के क्षितिज तक नाम कमाते हुए माही धरा को गौरव दिया है। इसी परम्परा में एक गौरवशाली हस्ती शुमार हैं-भीखा भाई।

राजस्थान और राष्ट्रीय राजनीति में दशकों तक आदिवासियों के मसीहा और विकास पुरुष के रूप में धाक जमाने वाले भीखा भाई ने समाजसेवा, शासन-प्रशासन कौशल और बहुआयामी विकास तथा आदिवासी उत्थान से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में जो ऎतिहासिक कर्मयोग का परिचय दिया है उसे युगों तक नहीं भुलाया जा सकेगा।

वागड़ अंचल के डूंगरपुर जिले में सागवाड़ा के समीप छोटे से गांव बुचिया बड़ा में अवतरित भीखा भाई ने अपनी प्रतिभा, साहस और अद्भुत मेधावी व्यक्तित्व के साथ देश में अजीम शखि़्सयत के रूप में जो पहचान बनायी, वह सदियों तक वागड़ अंचल को गौरव प्रदान करती रहेगी।

इस महान शखि़्सयत भीखाभाई का जन्म 28 अप्रेल 1916 को डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा क्षेत्र अन्तर्गत बुचिया बड़ा गांव मेें सामान्य जनजाति परिवार में घीवा भाई के घर थावरी बाई की कोख से हुआ। घर की संघर्षपूर्ण परिस्थितियों के दौर में भीखा भाई में बचपन से ही प्रतिभा दिखने लगी थी।

उन्होंने अपने बूते भविष्य संवारने और खुद कुछ बन कर अपने समाज के विकास में जुटने का संकल्प लिया और उस दिशा में आगे बढते ही गए। कितनी ही बाधाएं उनके सामने आयीं लेकिन इस अदम्य आत्मविश्वासी व्यक्तित्व की राह वे रोक नहीं पायी।

भीखा भाई ने इन्टरमीडिएट, बीए, एल.एल.बी. आदि कई उपाधियां श्रेष्ठतम अंकों के साथ उत्तीर्ण की। उन्होंने महाराणा भूपाल कॉलेज उदयपुर तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के मेधावी एवं सर्वश्रेष्ठ छात्र के रूप में आपने ख़ास पहचान भी बनायी।

सागवाड़ा में ब्राह्मण परिवारों के सम्पर्क तथा पारिवारिक संस्कारों और संत-महात्माओं के सान्निध्य की वजह से धर्म-कर्म के प्रति रुचि और संस्कार उनमें बचपन से ही विद्यमान रहे। वे हनुमानजी के परम भक्त थे तथा रोजाना उनकी दिनचर्या की शुरूआत हनुमानजी के दर्शन के बगैर नहीं होती थी। घर से निकलते ही सबसे पहले वे हनुमानजी के दर्शन करते, उसके बाद ही सामान्य दिनचर्या की शुरूआत करते। हनुमानजी के परम भक्त भीखा भाई प्रति मंगलवार एवं शनिवार को उपवास रखते। हनुमान चालीसा का पाठ करना वे कभी नहीं भूलते।

सहृदय भीखाभाई के मन में आम आदमी के प्रति प्यार और आत्मीयता का जज्बा था। यही वजह है कि लोग उन्हें बाबूजी कहकर संरक्षक के रूप मेें उन्हें आदर और सम्मान देते थे। भीखा भाई की याददाश्त किसी कम्प्यूटर से कम नही थी बुढ़ापे में भी उन्हें हर बात याद रहती। यहां तक कि स्थानीय ग्रामीण का नाम हो या सागवाड़ा-डूंगरपुर से लेकर जयपुर, दिल्ली तक के टेलीफोन नम्बर। ये सब उन्हें कण्ठस्थ थे।

भीखा भाई अपने क्षेत्र में जनसंपर्क एवं भ्रमण के दौरान जब भी किसी से मिलते यदि कोई युवा होता तो उसके दादा- परदादा के नाम ही उन्हें याद दिलाते और बुजुर्ग होता तो उसके आजादी के पूर्व की जनजाति और क्षेत्र की हालत के बारे में चर्चा जरूर करते। भीखा भाई वागड़ क्षेत्र में किसी भी कार्यकर्ता की मृत्यु हो जाने पर व्यक्तिशः उपस्थित होकर परिवारजनों को सांत्वना देते। भीखा भाई अल्प संख्यक समुदाय के हर त्योहार पर उनके बीच जाते और मनाते।

भीखा भाई अपने गुरुजनों और संगी साथियों के साथ-साथ उनके परिवारजनों से भी गहन मेल मिलाप रखते थे। हिन्दी और आंग्ल भाषा दोनों पर उनका अधिकार था। अधिकारियों से वार्ता हो या महानगरों के कार्यक्रम या फिर विदेश यात्राएं। हर कहीं उन्होंने धाराप्रवाह अंग्रेजी की धाक जमायी। भीखा भाई जनजाति के पहले ऎसे व्यक्ति थे जिनके अंग्रेजी ज्ञान का कोई मुकाबला नहीं था। जितना धाराप्रवाह वे बोलते थे इतना ही धाराप्रवाह वे लिखते भी थे।

जनजाति वर्ग में कानूनविद, शिक्षाविद्, कुशल शासक-प्रशासक और राजनेता के साथ ही लोकप्रिय समाजसेवी के रूप में उन्होंने जो छाप छोड़ी, वह बेमिसाल है। भीखा भाई जनजाति के पहले कानून के ज्ञाता व्यक्ति थे।

यों पड़ा भीखा भाई नाम

भीखा भाई के बचपन का नाम उदा था। बाल्यावस्था में एक बार गंभीर रूप से बीमार हो गये। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने से उपचार कराना असम्भव था। ऎसी स्थिति में माता-पिता ने सागवाड़ा के प्रसिद्ध भीखमशाह की दरगाह में लेटाकर मन्नत ली जिससे वे शीघ्र स्वस्थ हो गये तब उनका नाम भीखा भाई रखा गया। इनका बचपन अन्य सजातीय बालकों की तरह अभावों में ही बीता मगर पढ़ाई के प्रति रुचि अधिक होने से हर कक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए।

लोक सेवा करते हुए स्पर्श किया राजनीति के शिखरों का

भीखा भाई ने 1935 में 10वीं उत्तीर्ण करने के बाद 1937 में महाराणा कॉलेज उदयपुर से इंटरमीडिएट और 1939 में आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद 1941 में बनारस विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की।

विधि स्नातक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात वकालात का कार्य प्रारंभ किया और 1942 से 1948 तक डूंगरपुर रियासत में मुंसिफ मजिस्टे्रट भी रहे। लेकिन बाद में अग्रिम पंक्ति के स्वाधीनता सेनानी स्व. भोगीलाल पण्ड्या एवं अन्य स्वतंत्रता सेनानियों तथा तत्कालीन स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों से प्रेरणा प्राप्त कर प्रजा मण्डल के आन्दोलन मेें कूद पड़े। शिक्षा और समाजसेवा के जरिये लोक जागरण का शंख फूंकने वाले भीखा भाई ने राजनीति को लोक सेवा का माध्यम बनाया और अपना पूरा जीवन जनता की सेवा में समर्पित कर दिया।

सन् 1948 में तत्कालीन डूंगरपुर रियासत में कांग्रेस की लोकप्रिय उत्तरदायी सरकार सरकार में शिक्षामंत्री बने। सन् 1952 में प्रथम आम चुनाव से बांसवाड़ा से लोकसभा सदस्य चुने गये। वे 1953 से 1955 तक पिछड़ी जाति आयोग के सदस्य भी रहे।

संगठन में अहम् भूमिका निभायी

भीखा भाई सन् 1952 में वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य बनाए गए। सन् 1966 से 1992 तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। सन् 1965 से 1972 तक प्रान्तीय कांग्रेस चुनाव समिति के सदस्य रहे। 1972 से 1977 तक राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारिणी सदस्य व राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के आदिवासी प्रकोष्ठ के संयोजक रहे। सन् 1978 से 92 तक डूंगरपुर जिला कांंग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और इसी दौरान् तीन वर्षों तक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष पद पर भी रहे।

भीखा भाई ने सन् 1958 में जापान में सामाजिक कार्यों पर हुए सम्मेलन में भारत का नेतृत्व किया किया जबकि सन् 1959 में नवें अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य चुने गये।

सन् 1957 में भीखाभाई सागवाड़ा सुरक्षित क्षेत्र से विधान सभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए तथा 11 अप्रेल 1957 में सुखाड़िया मंत्रिमंडल में उपमंत्री बने। सन् 1962, 1967, 1972 के चुनावों में वे सागवाड़ा क्षेत्र से विधान सभा के लिए लगातार निर्वाचित हुए और सुखाड़िया मंत्रिमंडल में काबिना मंत्री बने।

स्व. भीखा भाई 9 जुलाई 1971 से 16 मार्च 1972 तक बरकतुल्ला खां सरकार में भी मंत्री रहे। उन्होंने सन् 1972 से 1974 व 1994 से 1997 तक राज्य की अनुसूचित जाति, कल्याण समिति के सभापति के पद को गौरवान्वित किया। सन् 1980 में बांसवाड़ा क्षेत्र से लोक सभा के सदस्य निर्वाचित हुये। वे राष्ट्रीय पिछड़ा जाति आयोग के अध्यक्ष भी रहे हैं। नवम्बर 1993 में वे सागवाड़ा क्षेत्र से विधायक चुने गये। सन् 1994 से 1995 तक पुस्तकालय समिति के सभापति रहे। ग्यारहवीं विधान सभा के लिये भी वे इसी क्षेत्र से निर्वाचित हुये। सन् 1998 से 2002 तक वे अशोक गहलोत सरकार में वे काबिना मंत्री रहे। कुछ समय तक वे उदयपुर जिले के प्रभारी मंत्री भी रहे। सन् 1986 से 89 तक श्री भीखा भाई राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष रहे ।

आदिवासियों के मसीहा

आदिवासियों के कल्याण और आदिवासी अंचलों के उत्थान में वे ताजिन्दगी लगे रहे। आदिवासियों के नेता और मसीहा के रूप में उन्होंने दशकों तक राज किया। देश के महान राजनेताओं के मन में भी भीखा भाई के प्रति अगाध आस्था का ज्वार लहराता रहा। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी उन्हें भीष्म पितामह तथा पूर्व प्रधानमंत्री स्व. नरसिंहाराव उन्हें जनजाति वर्ग के पितामह के रूप में संबोधित करते थे।

आदिवासियों के विकास के लिए जीवन समर्पित कर देने वाले इस महान शख्स ने सन् 1954 में गठित भील सेवा संघ के बरसों तक संस्थापक अध्यक्ष पद के साथ ही राजस्थान आदिम जाति सेवक संघ के संस्थापक सदस्य रहे और पिछड़े वर्ग के कल्याण हेतु गठित अनेक संस्थाओं में विभिन्न पदों पर कार्य किया। जन सेवा के क्षेत्र में दलित वर्ग के उत्थान एवं कल्याण को लेकर अनेक अवसरों पर उन्होंने अपनी क्षमताओं और ऊर्जाओं का प्रयोग करते हुए लोक सेवा के आदर्श स्थापित किए।

विभिन्न राष्ट्रीय आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्य, संगठन में अनेक महत्वपूर्ण पदों आदि पर रहने के साथ ही वे राजस्थान में अनेक बार विधायक, उप मंत्री, केबिनेट मंत्री, अजजा कल्याण समिति सहित विभिन्न समितियों के सभापति रहे और अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी। सन् 1965 में जेनेवा में अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अधिवेशन में भारत का प्रतिनिधित्व करने के साथ ही अपने जीवनकाल में उन्होंने जापान, बर्मा, इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड, हांगकांग, स्वीट्जरलैण्ड, इंग्लैण्ड, फ्रांस, इटली, यूगोस्लाविया, लेबनान, कुवैत आदि देशों की यात्रा की तथा कई प्रतिनिधि मण्डलों का नेतृत्व किया।

उच्चस्तरीय सम्मानों से बढ़ाया मातृभूमि का गौरव

आदिवासियों के उत्थान तथा आदिवासी क्षेत्र विकास के लिए उनकी उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भीखा भाई को सन् 1986-87 में महाराणा मेवाड़ फाउण्डेशन द्वारा उन्हें पूंजा अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा कई प्रतिष्ठित सम्मानों और पुरस्कारों से उन्हें नवाजा गया।

वागड़ को खुशहाल बनाने का स्वप्न

हॉकी एवं फुटबाल खेलों के साथ ही परम्परागत खेलों, मेलों, पर्वों, उत्सवों में में उनकी रुचि रही। भीखा भाई का सपना था कि वागड़ में पानी का ज्यादा से ज्यादा से रुकाव हो और ऎसी व्यवस्थाएं की जाएं कि माही सागवाड़ा नहर का कार्य जल्द पूरा हो और माही के पश्चिमी कांठे के खेतों में हरियाली का प्रसार हो। भीखा भाई जनजाति के हर व्यक्ति से उम्मीद रखते थे कि वह ज्यादा से ज्यादा शिक्षा ग्रहण करे साथ ही माली हालत में सुधार लाने के हर संभव प्रयास करे।

भीखा भाई शासन व्यवस्था में रह कर यहां जनता में लोकप्रिय रहे लोग उन्हें बाबूजी के नाम से संबोधित करते थे वहीं व्यवहार उन्होंने अपने समाज के साथ भी रखा और शासन के बड़े नेता के रूप में स्थापित हुए। आंचलिक विकास के लिए उन्होंने कोई कमी नहीं रखी। आदिवासियों के उत्थान और उन्हें विकास की मुख्य धारा में लाने के लिए दिन-रात जुटे रहे इस महान यौद्धा ने पांच जून को 2002 को उदयपुर में प्रातः 10.45 बजे अंतिम साँस ली और संसार को अलविदा कह दिया।

भीखा भाई आज हमारे बीच नहीं हैं मगर उनके कर्मयोग से परिपूर्ण व्यक्तित्व और कार्यों की सुगंध आज भी व्याप्त है जो युगों-युगों तक नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।

 

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