लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

Posted On by &filed under पुस्तक समीक्षा, साहित्‍य.


शादाब जफर ‘‘शादाब’’

लोकसभा में कार्यरत बचपन से आज तक मेरी दोस्ती की डोर में बंधे मेरे अज़ीज़ दोस्त शहजाद जी ने अभी कुछ दिनो पहले बडे से लिफाफे में बंद मुझे एक गजल संग्रह समीक्षार्थ दिया और बोले समीक्षा लिखनी है। मैने पूछा किस का है बोले मेरे साथ ही लोकसभा में है उन के भाई का है पुलिस उपाधीक्षक है, मैने पूछा शायर भी है, वो मुस्कुराकर बोले आप को ये ही देखना है। मैं वो लिफाफा घर ले आया परसो थोड़ी फुरसत मिली लिफाफा खोला, संग्रह पर मेरी जैसे ही पहली नजर पड़ी मैं दंग रह गया। सच मुझे शाहजहां का ताजमहल याद आ गया। ‘ये तय हुआ था’ कमल हातवी का गजल संग्रह नही वास्तव में संगमरमर की जगह शब्दो से बना एक खूबसूरत ताज महल था। सब से पहले में शायर कमल हातवी जी को उन के इस खूबसूरत ताज महल रूपी गजल संग्रह के लिये बहुत बहुत बधाई देना चाहूंगा। कमल जी ने इस संग्रह में 88 गजले, 24 नज्मे व 12 गीतो को बहुत ही खूबसूरती के साथ अपनी अभिव्यक्ति के जरिये एक ‘ये तय हुआ था’ के उन्वान से अनोखे अन्दाज में खूबसूरती के साथ संग्रह रूपी गुलदस्ते में समाया है। अपने दिल की तमाम ख्वाहिशे, प्रश्न और उत्तर गागर में सागर कि तरह से भरे है। इस बात को अगर यू कहा जाये कि शायर ने इस संग्रह में अपनी गजलों, नज्मों, गीतो को शब्दो की जबान और खूबसूरत जिस्म देकर ऐसा बना दिया की वो लोगो से गुफ्तुगू कर सके, उन के दुख दर्द कम कर सके। उन्हे नई सोच नई उडान दे सके। रोते हुए को हंसा दे और हँसते हुए को गम्भीर बना दे तो गलत नही होगा। शायर ने तमाम गजले, गीत और नज्म को बहुत ही आसान शब्दो में कहीं है। गजल कहने का अन्दाज, विषय सब के सब बहुत ही अच्छे है।

गजल संग्रह ‘ये तय हुआ था’ कि तमाम गजले आम आदमी के दिल को छूकर आसानी से दिल में उतर जाने का हौसला भी रखती है। शायद कमल जी इस बात को बखूबी जानते थे या फिर आम आदमी के बीच रहकर इस संग्रह का नाम ‘ये तय हुआ था’ रखा गया जो इस संग्रह की गजले पढने के बाद सार्थक होता हुआ नजर आ रहा है। कमल जी ने गजलो के जरिये जो कुछ भी कहा है उसे नज़र अंदाज नही किया जा सकता क्यो की उन्होने ग़ज़लो के माध्यम से समाज़ को जो आईना दिखया है वो सच्चा है। उन्होने कोरे कागज के सीने पर जो कुछ लिखा है वो सच्चा है। उन्होने अपनी बात रखते हुए सच बोला।

‘ये तय हुआ था’ प्रस्तुत गजल संग्रह को कमल जी ने, उन तमाम रिश्तो के नाम किया है जिन्हे दुनिया बेमानी समझती है। वही अपनी जीवन संगनी और बेटे को भी समर्पित किया है। उन्होने जिस अन्दाज और जिन शब्दो का सहारा लिया है वो बहुत ही अच्छे बन पड़े है। शायर अपने इस गजल संग्रह को कुछ यू समर्पित करता है, मैं अपनी शरीके-हयात शोभा और अपने नूर-ए-चश्म विराट की तारीफ यूं करूंगा कि जिंदगी की तमाम उलझनो से दूर रखते हुए मुझे शायरी के लिये इतना वक्त दिया कि मैं एक धुंधली तस्वीर को साफ करने में कामयाब हुआ और वह तस्वीर आप के सामने आज आ पाई। इन थोड़े से शब्दो में मुझे शायर का पत्नी प्रेम कालिदास और शकुन्तला, साहिर और अमृता प्रीतम, हीर राझे से कम नही लगता है। वही अपने बेटे के बारे में उन का ये कहना ’’ थकी हारी इन ऑखो को वो चेहरा याद आता है, हरे पेड़ो को जब देखो तो बेटा याद आता है। कहा जा सकता है कि शायर कमल हातवी जी ने अपनी शायरी की वसीयत अपने परिवार के नाम की है। पर ऐसा नही कि शायर कमल हातवी अपनी जननी मॉ और उस पिता को भूले हो जिन्होने कभी हंस कर कभी डाट कर कभी दुलार कर उन्हे आज इस मुकाम तक पहुंचा दिया। अपने प्रिय माता पिता को अपनी बात कहते हुए अपने इन भगवानो को कुछ यू याद करते है। मेरे पूज्यपिता श्री मायाराम सिंह और मेरी पूज्यनीय माता जी श्रीमति नन्हा देवी के बारे में सिर्फ इतना ही कहना चाहॅूगा कि हर जन्म में ये ही मेरे मां, बाप हों। इन के पॉव धो धोकर यदि मैं सारे जीवन पियू तब भी इनका क़र्ज़ अदा नही कर सकता।

शायर अपने बचपन का जिक्र कुछ यू करते हुए कहता है।

बाप के शानो पे बचपन कितना प्यारा हो गया

हमने जिस पे उंगली रख दी वो हमारा हो गया’’

जिन्दगी की हकीकत, बेशर्म और बेदर्द जमाने में आज बेटियो को पालना कितना मुश्किल होता चला जा रहा है शायद ये तमीज़ कमल को उन के पेशे ने बहुत ही खूबसूरती से सीखा दी है तभी तो वो कहते हैं।

सर से बेटी के जो हट जाये हया की चादर

ओढ ले अच्छा है मां बाप कज़ा की चादर

दुनिया और महबूबा की बेवफाई को भी शायर खूब समझता है उसे पता है। साँसो की डोर कब टूट जाये। इस जिन्दगी का इक पल का भी भरोसा नही। दुनिया में कुछ करना है क्योकि ये दुनिया उन्हे ही याद रखती है जो अपनी जिन्दगी में दुनिया को कुछ दे जाते है कमल जी एक गज़ल कुछ ऐसा ही कुछ संदेश देती हुई नजर आती है।

तेरी यादो ने दिल की हुक्मरानी छीन ली मुझ से

कि जिंदा भी रक्खा और जिंदगानी छीन ली मुझ से

मिटा कर रख दिया हालात ने हर नक्ष माज़ी का

नए लम्हात ने दुनिया पुरानी छीन ली मुझ से

इस संग्रह की एक बहुत ही खूबसूरत गजल का जिक्र कुछ यू करना चाहता हूँ कि महबूब और महबूबा की बात शायर अक्सर अपनी गजलो में करते हैं पर कमल जी ने अपनी महबूबा को जिस तरह से याद किया वो भी शाहजहाँ की याद दिलाता है, के मानो वो उन के सामने खडी है और वो लफ्ज़ो से उस की याद में उस की तस्वीर बना रहे हो।

तन्हाईयो का लुत्फ ग़मो का मजा न जाए

तू आए या न आए तेरा आसरा न जाये

पलकें झपक न जाए कही नींद आ न जाए

आँखों के सामने से वो चेहरा चला न जाए

जवानी की हसीन यादो और अपने बहके कदमो के साथ ही एक ग़ज़ल में शायर ने चिनारों के दरख्तो को याद करते हुए कहा है।

कोहरा सा छा रहा है नज़रो के आसपास

छुप जाए आओ हम भी चिनारो के आसपास

कई शायरो ने आंसुओ के उन्वान पर एक से एक खूबसूत शेर कहे है पर यहा भी कमल जी ने एक नया मोजू लेकर शेर कहा है।

ये आँसू है इन्हे आँखों से ग़म के साथ बहने दो

मिया ठहरे हुए पानी में बीमारी पनपती है।

नौकरी की वजह से शायद अपने बच्चो को कमल कम वक्त कम दे पाये और अपने दादा, दादी से ज़िंदगी की बारीकिया सीख कर कमल जी के बच्चे बडे हुए उन बच्चो के प्रति दादा दादी की निभाई जिम्मेदारी का जिक्र कमल जी ने जिस तरह ग़ज़ल की जुबान में किया वो बहुत ही खूबसूरत बन पडा हैं, बानगी देखे।

मेरे मां, बाप से पाई है उसने तरबीयत ऐसी

कि अब बेटी मेरी तितली पकडकर छोड देती है।

शायर कमल हातवी के कलम की सोच किस कदर ऊंची है गजल कहने का उन का अन्दाज बिल्कुल अलग, और खास है। ये शेर उन्होने कितनी सादगी के साथ कह दिया है वो खुद भी नही जानते होगे।

कोई लज़्ज़त नही मौहब्ब्त में

हुस्न जब तक की बेवफा न मिले

जमाना किस कदर तेजी से बदल रहा है हम सब देख रहे है, आज बेटी को कुछ लोग बोझ समझने लगे है वही मां बाप की सोच और बच्चो की सोच में तेजी से बदलाव आया है, उन की आँखों में नये नये ख्वाब, नई उड़ान, नई रोशनी, और नई सोच जमाने को बदलने में लगी है। ऐसे में शायर कितने साफ दिल से अपनी बात शेर की जबान में कहता है।

जवानी ढल गई ऊंची हवेली के ख्यालों में

सफ़ेदी आ गई अब तो मेरी बेटी के बालो में

 

शायर किसी प्रकार की नाम शौहरत का तरफदार नही है तभी तो वो कहता है।

मेरी पहचान से कम है मेरे अहसास की कीमत

सरे-बाजार रक्खू आईने को दिल नही करता

इस ग़जल संग्रह में जिन्दगी के हर एक पहलू को बडी सादगी के साथ ग़ज़ल में बांधा गया है शायर कहता है।

मरीज-ए-गम को बचाने के सौ तरीके है

तुम आना चाहो तो आने के सौ तरीके है

आज इस नये दौर में इन्सान कितना मसरूफ हो चुका है, इस मंहगाई ने ऐ तरफ जूहा बच्चो से उन का बचपन छीन लिया है वही मां, बाप को पैसा कमाने के चक्कर में अपने जिगर के टुक्डो, अपने बच्चो की कोई फिक्र नही शायर ने इस पर भी बहुत ही खूबसूरती के साथ कलम उठाया है।

न जाने किस कदर मसरूफ है मां, बाप दोनो ही

नया बचपन सबक लेता है घर की नौकरानी से

पाक रिश्तों, पाक बातो का ज़िक्र किस तरह किया जाता है शायर इस हुनर से भी वाकिफ है। कयो कि जिस अंदाज में ये शेर कहा गया है यकीनन एक पाक दामन, पाक सीरत और पाक अहसासात की तर्जुमानी करने वाला फरिश्ता सीरत इन्सान ही इतना खूबसूरत शेर कह सकता है जिसे पढकर कई रातो की नींद अगर कुर्बान न हो जाये तो फिर इस शेर की लज्ज़त ही क्या।

तुम्हारे उसके मरासिम है क्या खुदा जाने

मगर वो हो के तुम्हे बावजू पुकारता है

ग़ज़ल संग्रह ‘ये तय हुआ था’ की ऐसी न जाने कितनी ग़ज़ले हैं जिन्हे बार बार पढने को मन करता है कुछ गीत ऐसे है जिन्हे पढ कर इन्सान अपने अतीत में खो जाता है। कितनी ऐसी नज़्मे है जो नजर के रास्ते दिल में उतर जाने का हुनर रखती है। शायर कमल हातवी यकीनन उर्दू अदब में अपना नाम और अपनी गज़ले लोगो के दिलो में पहुंचाने में कामयाब हुए है। कामयाबी कब उन के कदम चूमले, कब वो अदब के आसमान पर चाँद की तरह चमकने लगे इस का फैसला इनशाअल्लाह बहुत जल्द होगा। क्यो कि अभी तो ग़ज़ल संग्रह ‘ये तय हुआ था’ एक फूल की शक्ल में खिला है। इस की खुश्बू से कौन कौन मदहोश होता है ये देखना बाकी है। एक बार फिर शायर कमल हातवी जी को ‘ये तय हुआ था’ के लिये मेरी जानिब से बहुत बहुत मुबारकबाद .

 

 

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1 Comment on "पुस्तक समीक्षा ; ‘ये तय हुआ था’"

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LAIQ CHODRY
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वास्तव में गजल संग्रह ‘ये तय हुआ था’ बहुत ही खुबसूरत है। इस में कही गजले दिल में उतर जाने कर दिलकष हुनर रखती है। भाई षादाब जी और कमल हातवी जी को बधाई

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