लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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अशुद्ध मुख से आती है दरिद्रता

डॉ. दीपक आचार्य

मनुष्य का शरीर धारण कर लेने से ही जीवन सफल नहीं हो जाता बल्कि मनुष्यता की पूर्णता और जीवन लक्ष्य पाने के लिए जिन सिद्धान्तों, आचार-विचारों और व्यवहारों की जरूरत होती है उनका पूरी तरह परिपालन करने से ही मनुष्य योनि की प्राप्ति धन्य हो सकती है।

आज पूरी दुनिया में बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या में कितने ही प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिन्हें मनुष्य का शरीर तो प्राप्त है किन्तु कितने प्रतिशत मनुष्यता है, इसका कोई ठौर नहीं।

यों तो हर युग में सभी प्रकार के लोगों का वजूद बना रहता है लेकिन दूसरे युगों की तुलना में कलियुग में मनुष्यों की विभिन्न और विचित्र श्रेणियां हैं जिनमें मानवीय गुणों और आदर्शों से सम्पन्न लोगों की भी कोई कमी नहीं है लेकिन दूसरी ओर ऐसे लोगों की भी कोई कमी नहीं है जिनकी हरकतों और आदतों को देखकर कहा जा सकता है कि इनका सिर्फ शरीर ही मनुष्य का है, बाकी सब बातों का भगवान ही मालिक है। मनुष्यत्व के जो लक्षण गिनाए गए हैं उनमें से कितने गुण हम में मिलते हैं, इस बात पर विचार किया जाना जरूरी है।

हर आदमी अपने पूर्व जन्म में किस योनि में रहा होगा? इसकी कल्पना करना असंभव नहीं है। व्यक्ति के चेहरे, उसकी मुद्राओं और शारीरिक सँरचनाओं के साथ ही आदतों का समेकित विश्लेषण किये जाने पर साफ संकेत मिल ही जाते हैं।

चौरासी लाख योनियों की अपनी पौराणिक कथाओं के अनुरूप हर जीवात्मा भिन्न-भिन्न कालों में अपने कर्मों के अनुरूप योनियां धारण करता रहता है। जो आज मनुष्य हैं वे कल कुछ भी हो सकते हैं, जो आज पशु हैं वे कभी मनुष्य योनि भी धारण कर सकते हैं। यह चक्र निरन्तर चलता रहा है और रहेगा।

आजकल लोगों में एक अजीब सी आदत घर कर गई है और वह है जुगाली। आदमी का मुँह कभी खाली नहीं रहता। उसे मुँह में हमेशा कुछ न कुछ ऐसा चाहिए जिसे चबाता हुआ रस लेता रहे।

इस अद्भुत रस की तलब आदमी के सोने या मौत होने तक बनी रहती है और यह तलब इतना उद्वेग पैदा कर देती है कि इसे पाए बगैर पूरा जीवन और संसार असार लगता है। विभिन्न प्रकार के विजातीय द्रव्यों और रसायनों के मिश्रण से बने गुटखों और तंबाखु को चबाने का आनंद लेने वालों सभी को पता है कि यह शरीर के लिए घातक है और इनके सेवन से कैंसर जैसे असाध्य रोग भी हो सकते हैं।

इसके बावजूद लोग इनका परित्याग नहीं कर पाते हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि इन लोगों की मन-बुद्धि और चित्त पर मलीनता का परदा तो है ही, साथ ही इनका दुर्भाग्य भी ऐसा है कि जो इनका साथ छोड़ने को तैयार नहीं। वरना सब कुछ जानते-बूझते हुए भी मनुष्य इस आदत को अपनाए रखे तो यह साफ हो ही जाता है कि बौद्धिक मलीनता की वजह से आत्मनियंत्रण की ग्रंथियों और आत्मविश्वास ने दगा दे ही दिया है।

कोई जगह ऐसी नहीं बची है जहाँ मुँह चलाते लोगों की भीड़ न मिले। हर तरफ ये लोग मुँह में कुछ न कुछ चबाते हुए, लार बनाकर गले उतारने का अजीब आनंद लेते हुए दिखाई देते हैं।

पहले यह जुगाली महानगरों और कस्बों-शहरों तक ही सीमित हुआ करती थी, अब छोटे-छोटे गाँवों तक भी इसका साम्राज्य पसर चुका है। चाय के बाद यदि किसी व्यसन ने हमारे घर-आँगन को प्रदूषित कर दिया है तो वह यही है।

दूध-दहीं और छाछ कहीं मिले न मिले, तम्बाखु और गुटकों के पाउच हर कहीं मिल ही जाते हैं। और इसी अनुपात में वे लोग भी मिल ही जाते हैं जो इनके आदी हो चले हैं। तम्बाखु और गुटखा वर्तमान युग का स्टेटस सिम्बोल बन गया है।

इनका सेवन करने वाले लोगों के मुँह हमेशा जुगाली करने के आदी रहते हैं। इनके मुँह इस कदर अभ्यस्त हो जाते हैं कि लगातार चलते ही रहते हैं। अलग-अलग किस्म के गुटखों का सेवन करने वालों को हमेशा इस बात का भ्रम रहता है कि यह मुखवास उनके मुँह को अच्छी सुगंध दे रहा है।

जबकि इसकी हकीकत तो वे लोग ही जानते हैं जो अधिकतर समय इनके साथ रहने को विवश हैं। किसी भी गुटखा लत पसंद आदमी की बीवी या बच्चों के मन को भाँपने का कोई यंत्र विकसित हो जाए तो साफ तौर पर सामने आएगा कि एक को भी यह पसन्द नहीं है और सभी का मानना यही होगा कि यह दुर्गन्ध इतनी तीखी होती है कि पास बैठने का मन नहीं करता, साथ होने की बात तो दूर है। फिर बार-बार पिच-पिच करने और थुकने की आदत भी इसकी हमजोली हो ही जाती है।

जुगाली का स्वभाव सिर्फ पशुओं का होता है। ऐसे में आदमी जब जुगाली करने लगता है तब यह स्पष्ट और निश्चित मानना चाहिए कि या तो वह पूर्व जन्म का पशु है अथवा पशुता उसके भीतर घुस आयी है।

ऐसे लोगों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का अध्ययन किया जाए तो यह साफ पता चलता है कि जुगाली की शुरूआत से ही उनमें पशुभाव, संग्रह वृत्ति आदि की आदतें प्रगाढ़ और परिपक्व होने लगती हैं।

जो लोग जुगाली के आदी हो जाते हैं उनकी कही हुई किसी बात का सामने वाले पर कोई असर नहीं होता क्योंकि जिस दिन से ये लोग गुटखे-तम्बाखु का सेवन आरंभ करते हैं उसी दिन से इनका बौद्धिक नियंत्रण करने वाली शक्ति पलायन कर जाती है। धर्मशास्त्रों के अनुसार सरस्वती का निवास व्यक्ति की जिह्वा के अग्रभाग पर होता है और वह स्थान सदा पवित्र रहना चाहिए। इस स्थान पर अभक्ष्य भक्षण करने से सरस्वती उस जिह्वा हो छोड़ कर चली जाती है।

यही कारण है कि ऐसे जुगाली वाले लोग अपने जीवन में कभी भी दृढ़ निश्चयी या कर्मयोगी नहीं हो सकते क्योंकि उनका विवेक और प्रत्युत्पन्नमति समाप्त हो जाती है। यही कारण है कि जुगाली करने वालों का वाणी माधुर्य भी समाप्त हो जाता है और उनकी आवाज भारी, कर्कश और मन्द हो जाती है जिसका कोई प्रभाव नहीं रहता।

इसके साथ ही इनके मुँह से जो भी वाणी निकलती है वह भी गंदे रसायनों और दुर्गन्ध भरे आवरण से होकर बाहर निकलती है और इस कारण इनके द्वारा उच्चारित होने वाला हर शब्द दूषित होता है।

अधिकांश परिवारों में कलह का यह सबसे बड़ा कारण होता है। हो भी क्यों न, पौराणिक मान्यता है कि तम्बाखु और गुटखों का सेवन कर लेने मात्र से कलियुग उस व्यक्ति में प्रवेश का मार्ग पा लेता है और उसके बाद उसकी मन-बुद्धि पर अधिकार कर लेता है। फिर जब अन्दर कलियुग होगा, रोजाना उसे खुराक मिलेगी तो बाहर कलह तो होगा ही।

इस एकमात्र जुगाली की आदत से व्यक्ति के जीवन में दरिद्रता का प्रवेश हो जाता है क्योंकि ऐसे व्यक्तियों का जब मुख उच्छिष्ट रहता है तब इनके मुख से जब-तब उच्छिष्ट ही बिखरता रहता है।

ये जुगाली वाले लोग भले ही अपने आपको कितना ही बड़ा समझें, इनके जीवन में हमेशा कष्टों का क्रम बना ही रहता है। जुगाली वाले लोग कितने ही सम्पन्न हों, इनमें दरिद्रता इस कदर घर कर जाती है कि एक न एक दिन सारी सम्पन्नता समाप्त हो जाती है और ये अपने पुराने जन्म को याद करते हुए वहीं पहुंच जाते हैं जहाँ जुगाली करना शरीर धर्म है।

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