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Archive for the Category ‘गजल’


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गजल:नये पत्ते डाल पर आने लगे-सजीवन मयंक

गजल:नये पत्ते डाल पर आने लगे-सजीवन मयंक सजीवन मयंक नये पत्ते डाल पर आने लगे । फिर परिंदे लौटकर गाने लगे ।। जो अंधेरे की तरह डसते रहे । अब उजाले की कसम खाने लगे ।। चंद मुर्दे बैठकर श्मशान में । जिंदगी का अर्थ समझाने लगे ।। उनकी ऐनक टूटकर नीचे गिरी । दूर तक के लोग पहिचाने लगे ।। जब सियासत का नया नक्शा ...

February 14th, 2012 | लेखक : प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 10 views | No Comments »
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गज़ल ; पैगाम मेरा लेकर जो बादे सबा गई – सत्येंद्र गुप्ता

गज़ल ; पैगाम मेरा लेकर जो बादे सबा गई – सत्येंद्र गुप्ता पैगाम मेरा लेकर जो बादे सबा गई पैगाम मेरा लेकर जो बादे सबा गई सुनते हैं नमी आँख में उनके भी आ गई। मैं आईने के सामने पहुँची जिस घडी मेरी बुराई साफ़ नज़र मुझको आ गई। एक मैकदा सा बंद था उसकी निगाह में मदहोश कर गई मुझे बेखुद बना गई।      

February 7th, 2012 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 26 views | No Comments »
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गज़ल ; झुकी तो हया हो गई – सत्येंद्र गुप्ता

गज़ल ; झुकी तो हया हो गई – सत्येंद्र गुप्ता झुकी तो हया हो गई झुकी तो हया हो गई उठी तो दुआ हो गई। बढ़ी इतनी दीवानगी मुहब्बत सजा हो गई। तुम्हारे बिना जिंदगी बड़ी बेमज़ा हो गई। अजाब मुस्कराहट तेरी सरापा कज़ा हो गई। हुई तुमसे क्या दोस्ती ये दुनिया खफा हो गई।      

February 7th, 2012 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 20 views | No Comments »
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गज़ल ; मैखाने में जरा कभी आकर तो देखिये – सत्येंद्र गुप्ता

गज़ल ; मैखाने में जरा कभी आकर तो देखिये – सत्येंद्र गुप्ता मैखाने में जरा कभी आकर तो देखिये मैख़ाने में जरा कभी आकर तो देखिये एक बार ज़ाम लब से लगाकर तो देखिये। दुनिया को तुमने अपना बनाया तो है मगर हमको भी कभी अपना बनाकर तो देखिये। तुम हाले दिल पे मेरे हंसोगे न फिर कभी पहले किसी से दिल को लगाकर तो देखिये। जिसकी तुम्हे तलाश ...

February 7th, 2012 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 27 views | No Comments »
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गज़ल ; हर अदा में कमाल था – सत्येंद्र गुप्ता

गज़ल ; हर अदा में कमाल था – सत्येंद्र गुप्ता हर अदा में कमाल था कोई हर अदा में कमाल था कोई आप अपनी मिसाल था कोई। उसके आशिक थे मिस्ले-परवाना हुस्न से मालामाल था कोई। उससे छुटकारा मिल गया हमको एक जाने बवाल था कोई। वो मिला है न मिल सकेगा कभी एक दिल में ख्याल था कोई। बेचकर खून रोटियाँ लाया भूख से यूँ निढाल था कोई। भीगी आँखों ...

February 7th, 2012 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 8 views | No Comments »
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गज़ल ; देवी देवता सखा सहोदर – प्रभुदयाल श्रीवास्तव

गज़ल ; देवी देवता सखा सहोदर – प्रभुदयाल श्रीवास्तव देवी देवता सखा सहोदर सबके सब बेकार हो गये ज्योंही मां उतरी आंखों में सपने सब साकार हो गये||   जैसे गये रसोई में तो मां की सूरत याद आई लोटा थाली डोंगे मग्गे सब मां के आकार हो गये||   जब जब भी तड़्फा हूं मां की किसी तरह‌ सूरत देखूं सारी रात दिखाऊं मां को ...

January 30th, 2012 | लेखक : प्रभुदयाल श्रीवास्तव | 29 views | No Comments »
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गज़ल ; हवा से न कहना – सत्येंद्र गुप्ता

गज़ल ; हवा से न कहना – सत्येंद्र गुप्ता हवा से न कहना, वो सब को बता देगी तेरा हर ज़ख्म दुनिया को दिखा देगी। तू डूबा हुआ होगा अपने गम में कहीं वो जमाने भर में बहुत शोर मचा देगी। चाहना उसे दिल से एक फासला रखकर शुहरत बिगड़ गई तो हस्ती मिटा देगी। तू दरिया प्यार का है, वो चाँद सूरत है जिंदगी हर ...

January 29th, 2012 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 30 views | 2 Comments »
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गज़ल ; जंग लगे हथियारों में – सत्येंद्र गुप्ता

जंग लगे हथियारों में अब नई धार लगानी है नये अंदाज़ में वन्दे-मातरम की आवाज़ सुनानी है। नहीं खेलने देंगे किसी को हम अपने सम्मान से भ्रष्टाचार की होली भी तो हमको ही जलानी है। सशक्त और समर्द्ध राष्ट्र अपना हमें बनाना है इसके लिए हम को कोई नई चाल अपनानी है। घोटालों का ताना बाना ...

January 28th, 2012 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 21 views | No Comments »
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गजल-सत्येन्द्र गुप्ता

गजल-सत्येन्द्र गुप्ता मेले कीमुलाक़ात नहीं होती जल्दी में कभी दिल से कोई बात नहीं होती। वो जो हो जाती है जेठ के महीने में बरसात वो मौसमे -बरसात नहीं होती। चुराते दिल को तो होती बात कुछ और नज़रें चुराना यार कोई बात नहीं होती। डर लगने लगता है मुझे खुद से उस घडी पहरों जब उन से मेरी ...

December 28th, 2011 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 66 views | 2 Comments »
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ग़ज़ले-ये आजमा के देख लिया इस जहान में

ग़ज़ले-ये आजमा के देख लिया इस जहान में शादाब जफर ‘‘शादाब’’ ग़ज़ले ये आजमा के देख लिया इस जहान में रूसवाइ्रयो का डर है फक्त झूठी शान में   में गुनहागार हूँ मेरी बख्शिश को ऐ खुदा हाफिज कुरान भेज मेरे खानदान में   खुशबू लबो की उस के ना बरसो बरस गई जिसने करी है गुफतुगू ऊर्द्व जबान मे   छोटे तुम्हे सलाम करे आला मानकर क्यो जी रहे ...

December 20th, 2011 | लेखक : शादाब जाफर 'शादाब' | 45 views | No Comments »
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गजल:मौसम कभी मुक़द्दर को मनाने में लगे हैं

गजल:मौसम कभी मुक़द्दर को मनाने में लगे हैं मौसम कभी मुक़द्दर को मनाने में लगे हैं मुद्दत से हम खुद को बचाने में लगे हैं। कुँए का पानी रास आया नहीं जिनको वो गाँव छोड़ के शहर जाने में लगे हैं। हमें दोस्ती निभाते सदियाँ गुज़र गई वो दोस्ती के दुखड़े सुनाने में लगे हैं। बात का खुलासा होता भी तो कैसे सब हैं कि ...

December 15th, 2011 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 73 views | 1 Comment »
Posted in Category: गजल | Tags: gazal, Satyendra Gupta, गजल, सत्येंद्र गुप्ता

लेकिन किसी के दिल को दुखाना भी नहीं है…..

लेकिन किसी के दिल को दुखाना भी नहीं है..... इक़बाल हिंदुस्तानी बच्चे की ज़िद है महंगी बहाना भी नहीं है, मिट्टी के खिलौनों का ज़माना भी नहीं है। दुश्मन से डरके हाथ मिलाना भी नहीं है, मेरे सिवा तो कोई निशाना भी नहीं है। चाहता नहीं उसे मैं, छिपाना भी नहीं है, उस शख़्स को इस ग़म में रुलाना भी नहीं है। जीना है सर को ...

November 30th, 2011 | लेखक : इक़बाल हिंदुस्तानी | 89 views | No Comments »
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गली गली मैख़ाने हो गये

गली गली मैख़ाने हो गये गली गली मैख़ाने हो गये कितने लोग दीवाने हो गये। महक गई न दूध की मूंह से बच्चे जल्दी सयाने हो गये। हम प्याला हो गये वो जबसे रिश्ते सभी बेगाने हो गये। जाम से जाम टकराने के हर पल नये बहाने हो गये। हर ख़ुशी ग़म के मौके पर छलकते अब पैमाने हो गये। जबसे बस गये शहर जाकर अब ...

November 29th, 2011 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 79 views | 1 Comment »
Posted in Category: गजल | Tags: Gazals

पड़ौसी पड़ोसी है हिंदू न मुस्लिम…….

पड़ौसी पड़ोसी है हिंदू न मुस्लिम.......  इक़बाल हिंदुस्तानी हरेक तश्नालब की हिमायत करूंगा, समंदर मिला तो शिकायत करूंगा। अगर आंच आई किसी जिंदगी पर, हो अपना पराया हिफ़ाज़त करूंगा। अभी तो ग़रीबों में मसरूफ हूँ मैं, मिलेगी जो फुर्सत इबादत करूंगा। तरक्की की ख़ातिर वो यूं कह रहा था, मैं जिस्मों की खुलकर तिजारत करूंगा। ज़मीर अपना बेचंू जो दौलत कमाउ, अब इक रास्ता है सियासत ...

November 3rd, 2011 | लेखक : इक़बाल हिंदुस्तानी | 123 views | 1 Comment »
Posted in Category: गजल | Tags: hindu, India, muslims, pakistan, पड़ौसी पड़ौसी है हिंदू न मुस्लिम

ऐसी महंगाई में क्या करे आदमी

ऐसी महंगाई में क्या करे आदमी शादाब जफर "शादाब’’ ऐसी महगॉई मै क्या करे आदमी पेट बच्चो का कैसे भरे आदमी   खू पसीना बहा कर भी रोटी नही कैसे अपना गुजारा करे आदमी   बिक चुके सारे नेता मेरे देश के कैसे सरहद पे जाकर लडे आदमी   चन्द सिक्को मै कानून बिकने लगा किस से फरियाद अपनी कहे आदमी   हम सफर पा के होता था खुश ...

October 9th, 2011 | लेखक : शादाब जाफर 'शादाब' | 80 views | No Comments »
Posted in Category: गजल | Tags: Inflation, महंगाई

पेड़ गिरा तो उसने दिवार ढहा दी

पेड़ गिरा तो उसने दिवार ढहा दी पेड़ गिरा तो उसने दिवार ढहा दी फिर एक मुश्किल और बढ़ा दी। पहले ही मसअले क्या कम थे उन्होंने एक नई कहानी सुना दी। फूल कहीं थे सेज कहीं बिछी थी मिलन की कैसी यह रात सजा दी। क्या खूब है जमाने का दस्तूर भी जितना क़द बढ़ा बातें उतनी बढ़ा दी। चीखते फिर रहे हैं अब ...

October 1st, 2011 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 63 views | No Comments »
Posted in Category: गजल |

गजलें

गजलें आदमी के खून का ही आदमी प्यासा मिला गॉव से पहुंचा बाहर तो हर तरफ धोखा मिला   सेठ के बच्चे खिला कर घर जो पहुंची राम दीन अपना बच्चा सुबह से भूखा उसे रोता मिला   दे दिया नारा चलो स्कूल इस सरकार ने टाट, शिक्षक, श्याम पट स्कूल मे कुछ ना मिला   सुन के मेरी नौकरी ...

September 28th, 2011 | लेखक : शादाब जाफर 'शादाब' | 109 views | No Comments »
Posted in Category: गजल | Tags: ghazals, गजले

बह रही इस मुल्क में कैसी बयार देखिए….

बह रही इस मुल्क में कैसी बयार देखिए....  हिमकर श्याम कल के रहजन बन गये शहरयार, देखिए वैशाखियों पे चल रही ये सरकार, देखिए   तारीकियाँ, मायूसियाँ, तबाहियाँ और बलाएँ बह रही इस मुल्क में कैसी बयार देखिए   दुकान सजाये बैठे हैं सदाक़तो ईमान बेचने रिश्वतों पे चल रहा सारा कारोबार, देखिए   किस मुक़ाम पे जा पहुँची तर्जे सियासत यहाँ हुकूमतों में बैठे जम्हूरियत के ठेकेदार देखिए   हदे ...

September 28th, 2011 | लेखक : हिमकर श्‍याम | 121 views | No Comments »
Posted in Category: गजल |

दौरे-उल्फत की हर बात याद है मुझे

दौरे-उल्फत की हर बात याद है मुझे दौरे-उल्फत की हर बात याद है मुझे तुझसे हुई वह मुलाकात याद है मुझे। बरसते पानी में हुस्न का धुल जाना दहकी हुई वह बरसात याद है मुझे। तेरा संवरना उसपे ढलका आंचल संवरी बिखरी सी हयात याद है मुझे। सर्द कमरे में गर्म साँसों की महक हसीं लम्हों की सौगात याद है मुझे। दिल में उतरके रहने ...

August 6th, 2011 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 130 views | 1 Comment »
Posted in Category: गजल |

हाथों में रची मेहँदी और झूले पड़े हैं

हाथों में रची मेहँदी और झूले पड़े हैं हाथों में रची मेहँदी और झूले पड़े हैं पिया क्यों शहर में मुझे भूले पड़े हैं। आजाओ जल्दी से अब रहा नहीं जाता कि अमिया की ड़ाल पर झूले पड़े हैं। सावन का महीना है मौका तीज का पहने आज हाथों में मैंने नए कड़े हैं। समां क्या होगा जब आकर कहोगे गोरी अब तो तेरे नखरे ...

July 27th, 2011 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 82 views | No Comments »
Posted in Category: गजल | Tags: Mehandi, हाथों में रची मेहँदी

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