तरोताज़ा सुघड़ साजा

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तरोताज़ा सुघड़ साजा, सफ़र नित ज़िन्दगी होगा; जगत ना कभी गत होगा, बदलता रूप बस होगा ! जीव नव जन्म नित लेंगे, सीखते चल रहे होंगे; समझ कुछ जग चले होंगे, समझ कुछ जग गये होंगे ! चन्द्र तारे ज्योति धारे, धरा से लख रहे होंगे; अचेतन चेतना भर के, निहारे सृष्टि गण होंगे !… Read more »

अज्ञान में जग भासता !

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अज्ञान में जग भासता, अणु -ध्यान से भव भागता; हर घड़ी जाता बदलता, हर कड़ी लगता निखरता ! निर्भर सभी द्रष्टि रहा, निर्झर सरिस द्रष्टा बहा; पल पल बदल देखे रहा, था द्रश्य भी बदला रहा ! ना सत रहा जीवन सतत, ना असत था बिन प्रयोजन; अस्तित्व सब चित से सृजित, हैं सृष्ट सब… Read more »

अनुभूत करना चाहते

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अनुभूत करना चाहते अनुभूत करना चाहते, कब किसी की है मानते; ना जीव सुनना चाहते, कर के स्वयं ही समझते ! ज्यों वाल बिन अग्नि छुए, माँ की कहाँ है मानता; जब ताप को पहचानता, तब दूर रहना जानता । एक बार जब कर गुज़रता, कहना किसी का मानता; सुनना किसी की चाहता, सम्मान करना… Read more »

सुलगा हुआ जग लग रहा

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सुलगा हुआ जग लग रहा, ना जल रहा ना बुझ रहा; चेतन अचेतन सिल-सिला, पैदा किया यह जल-जला । तारन तरन सब ही यहाँ, संस्कार वश उद्यत जहान; विधि में रमे सिद्धि लभे, खो के भरम होते सहज । आत्मीय सब अन्तर रहे, माया बँधे लड़ते रहे; जब भेद मन के मिट गये, उर सुर… Read more »

हर एक पल कल-कल किए

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हर एक पल कल-कल किए, भूमा प्रवाहित हो रहा; सुर छन्द में वह खो रहा, आनन्द अनुपम दे रहा । सृष्टि सु-योगित संस्कृत, सुरभित सुमंगल संचरित; वर साम्य सौरभ संतुलित, हो प्रफुल्लित धावत चकित । आभास उर अणु पा रहा, कोमल पपीहा गा रहा; हर धेनु प्रणवित हो रही, हर रेणु पुलकित कर रही ।… Read more »

छलका रहा होगा झलक

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छलका रहा होगा झलक, प्रति जीव के आत्मा फलक वह मूल से दे कर पुलक, भरता हरेक प्राणी कुहक । कुल-बिला कर तम- तमा कर, कोई हृदय में सिहा कर; सिमटा कोई है समाया, उमगा कोई है सिधाया । सुध में कोई बेसुध कोई, रुधता कोई बोधि कोई; चलते रहे चिन्ता दहे, चित शक्ति को… Read more »

नज़्म

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-राघवेन्द्र कुमार “राघव”- किसी की तासीर है तबस्सुम, किसी की तबस्सुम को हम तरसते हैं । है बड़ा असरार ये, आख़िर ऐसा क्या है इस तबस्सुम में ।। देखकर जज़्ब उनका, मन मचलता परस्तिश को उनकी । दिल-ए-इंतिख़ाब हैं वो, इश्क-ए-इब्तिदा हुआ । उफ़्क पर जो थी ख़ियाबां, उसकी रंगत कहां गयी । वो गवारा… Read more »

रहते हुए भी हो कहां

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-गोपाल बघेल ‘मधु’- (मधुगीति १५०६२१) रहते हुए भी हो कहाँ, तुम जहान में दिखते कहाँ; देही यहाँ बातें यहाँ, पर सूक्ष्म मन रहते वहाँ । आधार इस संसार के, उद्धार करना जानते; बस यों ही आ के टहलते, जीवों से नाता जोड़ते । सब मुस्करा कर चल रहे, स्मित-मना चित तक रहे; जाने कहाँ तुम… Read more »

खोया हूं मैं

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–मनीष सिंह-    खोया हूँ मैं हक़ीक़त में और फ़साने में , ना है तुम बिन कोई मेरा इस ज़माने में।   तुम साथ थे तो रौशन था ये जहाँ मेरा , अब जल जाते हाथ अँधेरे में शमा जलाने में।   यूँ तो मशरूफ कर रखा है बहुत खुद को , फिर भी आ… Read more »

दिल का घाव नासूर बना

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उफ़ अपने दिल की बात बतायें कैसे दिल पर हुए आघात जतायें कैसे| दिल का घाव नासूर बना अब मरहम लगायें कैसे कोई अपना बना बेगाना दिल को अब यह समझायें कैसे| कुछ गलतफहमी ऐसी बढ़ी बढ़ते-बढ़ते बढती गयी रिश्तें पर रज जमने सी लगी दिल पर पड़ी रज को हटायें कैसे| उनसे बात हुई… Read more »