महाराणा प्रतापसिंह का पवित्र स्मारक स्थल है कुम्भलगढ़

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राकेश कुमार आर्य महाराणा का व्यक्तित्व चित्रण महाराणा प्रताप भारतीय स्वातंत्रय समर के इतिहास के एक दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। प्रताप एक ऐसा नाम है जिसको सुनकर हर व्यक्ति संसार के ताप-संताप, प्रलाप और विलाप छोडक़र केवल प्रताप से भर जाना चाहता है, एक ऐसा नाम जो राष्ट्र का ‘प्रताप’ भी है और ‘सिंह’ भी है।… Read more »

संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा Part 11

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अकबर की बहुत सी विजयों के उपरांत भी महाराणा प्रताप महान हैं राकेश कुमार आर्य , अकबर का महिमामंडन उचित नही अब हम अकबर पर पुन: चर्चा करते हैं। अकबर चित्तौड़ को लेने में सफल हो गया और हमारे इतिहासकारों द्वारा उसे महान होने का गौरव भी दे दिया गया। हम उसे प्रचलित इतिहास में… Read more »

भाषा-विज्ञान में साम्राज्यवादी षड्यंत्रों से सावधान !

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मनोज ज्वाला यूरोप के रंग-भेदकारी औपनिवेशिक साम्राज्यवादियों ने सम्पूर्ण विश्व, विशेष कर भारत पर अपना दबदबा कायम रखने और जबरिया उसका औचित्य सिद्ध करने तथा स्वयं को सर्वोपरी स्थापित करने के लिए एक ओर उपनिवेशित देशों की ऐतिहासिक सच्चाइयों व सांस्कृतिक विरासतों एवं सामाजिक संरचनाओं को तदनुरुप तोड-मरोड कर विकृत कर दिया , वहीं दूसरी… Read more »

राणा उदयसिंह, जयमल और फत्ता की वीरता और मुगल बादशाह अकबर

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राकेश कुमार आर्य अकबर के शासनकाल को इतिहास में 1556 से 1605 ई. के मध्य माना गया है। इस काल में दिल्ली और चित्तौड़ की वीरता और हमारे वीर योद्घा महाराणा प्रताप का बार-बार उल्लेख होता है। अकबर के काल में चित्तौड़ का किला ही हमारे शौर्य और प्रताप का वह दुर्ग बन गया था,… Read more »

11 जुलाई : विश्व जनसंख्या दिवस

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डा. राधेश्याम द्विवेदी दुनिया में हर साल 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का महत्त्व तेजी से बढ़ती जनसंख्या से सम्बन्धित बिन्दुओं , चिन्ताओं तथा सम्भावनाओं पर सारी दुनिया के विकसित तथा विकासशील देशों के लोगों का ध्यान आकर्षित करना है। पहली बार यह कार्यक्रम सन् 1987 में मनाया गया… Read more »

संस्कृति पर हमला हो चुका है

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राकेश कुमार आर्य इस्लाम और ईसाइयत इन दोनों ने भारत में आकर इस देश की संस्कृति को मिटाने का हर संभव प्रयास किया। यदि यह क्रम बीते कल की बात हो गयी तो हम भी इसे ‘गड़े मुर्दे उखाडऩे’ की नीति मानकर छोड़ देते। किंतु दुर्भाग्य से यह क्रम आज भी थमा नही है। जो… Read more »

दक्खिन का दर्द

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संजय चाणक्य ‘‘ तेरा मिजाज तो अनपढ़ के हाथों का खत है! नजर तो आता है मतलब कहां निकलता है!!’’ मेरी नानी बचपन में कहती थी कि दक्खिन की ओर मुह करके खाना मत खाओं,दक्खिन की ओर पांव करके मत सोओं। गांव में बड़े-बुजुर्ग कहते थे कि गांव के दक्खिन टोला में मत जाना। हमेशा… Read more »

नागार्जुन की कविता का भावबोध

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शैलेन्द्र चौहान बाबा नागार्जुन को भावबोध और कविता के मिज़ाज के स्तर पर सबसे अधिक निराला और कबीर के साथ जोड़कर देखा गया है। वैसे, यदि जरा और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। उनका कवि-व्यक्तित्व… Read more »

संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा Part 10

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महाराणा का राजधर्म भी यही था यह था भारत का राजधर्म। महाराणा प्रताप इसी राजधर्म की रक्षार्थ अकबर से संघर्षरत रहे। हमारा राजधर्म व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का उद्घोषक था। व्यक्ति के विचार-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उदघोषक था। अकबर राजधर्म की परिभाषा तक नही जानता था। ऐसे बादशाहों की बादशाहतें क्रूरता पर अवलंबित होती हैं।… Read more »

संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा Part 9

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कुछ आदर्शों को लेकर महाराणा करते रहे अकबर से युद्घ राकेश कुमार आर्य इतिहास के पन्नो से  भारत में राजधर्म की महत्ता भारत का क्षात्र धर्म अति व्यापक है। महाभारत ‘शांति-पर्व’ (63 : 29) में कहा गया है :- सर्वेत्यागा राजधर्मेषु दृष्टा:। सर्वादीक्षा राजधर्मेषु योक्ता। सर्वाविद्या राजधर्मेषु युक्ता:। सर्वे लोका: राजधर्मेषु प्रविष्ठा। इसका अभिप्राय… Read more »