लेखक परिचय

देवेन्द्र कुमार

देवेन्द्र कुमार

स्वतंत्र पत्रकार

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-देवेन्द्र कुमार- politics
भाजपा के दूसरे पीएम इन वेंटिग और पोस्ट गोधरा कांड के बाद की राजनीति में चमकते सितारे नरेन्द्र मोदी ने लौह पुरुष के रूप में सम्मानित और देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल की याद में गुजरात के नर्मदा नदी का द्वीप साधु बेट से 3.2 किलामीटर की दूरी पर विश्व की विशालतम प्रतिमा लगाने की घोषणा की है । इसकी ऊंचाई 597 फीट और इसका आधार एरिया 790 फीट होगा । इसके लिए पूरे देश के किसानों से दान में लोहा मंगवाया जा रहा है । इसका नामांकरण स्टैच्यू औफ यूनिटी किया गया है। सरदार बल्लभभाई पटेल को सामने रख भाजपा के पीएम इन वेटिंग ने यह सवाल उछाला है कि मौलाना आजाद, डॉ. भीम राव अम्बेडकर सहित उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को जो गांधी-नेहरु खानदान के बाहर से थे, वह सम्मान-स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। केन्द्र प्रायोजित करीबन सारी योजनाएं गांधी-नेहरु परिवार की भेंट चढ़ गई। इनका जन्म दिन और पुण्यतिथि तक विस्मृत कर दिया गया।
इसी सवाल को केन्द्र में रख नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस की वंशवादी परंपरा पर हमला बोला है। कहना न होगा कि वंशवादी परंपरा कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजारी है । असामान्य परिस्थितियों के सिवा, जब तक यह विकल्पहीन नहीं हो गांधी-नेहरु परिवार से बाहर जा अपना नेतृत्व नहीं खोजता। गांधी-नेहरु परिवार से बाहर इसको अपना कोई तारणहार नहीं मिलता।
प्रधानमंत्री ने जब मोदी पर जब इतिहास-भूगोल बदलने का आरोप मढ़ा तब पलटवार करते हुए मोदी ने देश विभाजन का ठिकरा भी कांग्रेस के माथे ही मढ़ दिया। मोदी कांग्रेस पर लगातार हमले करते जा रहे हैं। कांग्रेस आज बचाव की मुद्रा में खड़ी दिख रही है। मोदी को लेकर आज कांग्रेस में अलग-अलग स्वर उभर रहे हैं । कोई मोदी को एक चुनौती मान रहा है तो कोई इसे सिरे से नकार रहा है। पर सवाल तो मोदी के द्वारा उठाये जा रहे प्रश्नों का है। आखिर सरदार पटेल, मौलाना आजाद, लालबहादुर शास्त्री का जन्मदिन और पुण्य तिथि भुला क्यों दी जाती हैं ? इसी कांग्रेस की ओर से नेहरु परिवार के बाहर से बने प्रधानमंत्री नरसिंहा राव जिसने उदारीकरण की शुरुआत की, मरणोपरान्त दिल्ली में दफन होने के लिए एक मुट्ठी जमीन नहीं मिली सकी। इनके नाम एक भी केन्द्र प्रायोजित योजनाएं नहीं चली। नेहरु गांधी परिवार ने देश और कांग्रेस को एक जागीर की तरह चलाया।
पर बड़ा सवाल सरदार पटेल के प्रति मोदी की इस आत्मीयता का है। क्या वाकई सरदार पटेल का चाल, चलन और चरित्र मोदी से मेल खाता है ? क्या जब मोदी धर्मनिरपेक्षता को छद्म कहकर खिल्ली उड़ाते है, तो वे पटेल के पास होते हैं ? क्या मोदी पटेल के नक्शे कदम पर चल रहे हैं ? क्या पटेल की विरासत के हकदार -हमसफर मोदी ही हैं ?
हम थोड़ा पीछे चले, आजाद भारत में कार्यवाहक प्रधानमंत्री का चयन हो रहा था। तब कांग्रेस अध्यक्ष सरदार पटेल थे। स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार। दावेदारी हो चुकी थी। कांग्रेस संगठन में पटेल की जबरदस्त पकड़ थी। पटेल का नाम आते ही नेहरु चेहरा उतर गया। ऐन वक्त पर पटेल को गांधी का निर्देश मिला अपना, नाम वापस लो और पटेल ने एक मिनट की देरी नहीं की। और इस प्रकार नेहरु निर्विरोध प्रधानमंत्री चुन लिए गया। यदि पटेल चाहते तो चुनाव लड़ सकते थे। सीतारमैया की पुनरावृति होती, पर साफ है कि पटेल में सत्ता की भूख नहीं थी। प्रधानमंत्री बनने का उतावलापन नहीं था। बाद के दिनों में गृहमंत्री और प्रथम उपप्रधानमंत्री के रूप में एक लौह पुरुष के सदृष्य पूरे देश को एक राजनीतिक ईकाई में परिर्वतित किया और तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाबजूद साम्प्रदायिक शक्तियों का डटकर मुकाबला किया। गांधी हत्या के बाद पहली बार आरएसएस पर प्रतिबन्ध पटेल के हाथों ही लगी। बाद में आरएसएस ने अपने को सिर्फ एक सांस्कृतिक संगठन माना, राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहने का आश्वासन दिया, तब प्रतिबन्ध हटा और आज आरएसएस की राजनीति जगजाहिर है। आरएसएस एक राजनीतिक पार्टी का रीमोट अपने हाथ में रखता है और अपने को सांस्कृतिक संगठन भी मानता है, यह है उसका दुमुंहापन।
रही बात इतिहास और भूगोल बदलने की, देश विभाजन की। गांधी ने भी कहा था कि पाकिस्तान का निर्माण हमारी लाश पर होगा। पर हालात बद से बदतर होती गई। आखिरकार टूटे दिल से स्वीकृति देनी पड़ी। और तब मोदी के कथित आराध्य पटेल कांगेस में ही थे। क्या मोदी बता सकते हैं कि पटेल विभाजन के विरोधी थे। यह कोई भावुक फैसला नहीं था। परिस्थितिजन्य लिया गया सर्वसम्मत फैसला था। पटेल की महानता इसमें है कि उस विकट दौर में भी धर्मनिरपेक्षता का दामन नहीं छोड़ा और नेहरु के साथ कंधा से कंधा मिलाकर धर्मनिरपेक्ष-समाजवादी भारत की नींव रखी। सवाल यह जरुर उठता है कि पटेल – नेहरु के रहते अधिकतर राज्यों के मुख्यमंत्री ब्राह्मण-सवर्ण ही क्यों बनते रहे ? क्या जातिवादी राजनीति की शुरुआत तब ही नहीं हो गई थी। सवर्ण-ब्राह्मणों का राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार बहुत बाद तक बना रहा। डॉ. लोहिया और मंडल आन्दोलन के बाद ही राजनीति की तस्वीर कुछ बदली।

जब बांग्लादेश का उदय हुआ तब आजाद भारत में भी भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास-भूगोल बदला। और तब इंदिरा गांधी को वाजपेयी ने दूर्गा की उपाधि दी थी। यदि मोदी का इशारा इस ओर है, तब वे ठीक राह पर हैं, पर उनकी मंशा तो कुछ और ही है। वह भूल गए कि इतिहास में इतिहास और भूगोल बदलने का मौका इन्हें और इनके दूसरे वाले लौह पुरुष को भी मिला था। अपनी लोहागीरी दिखलाने का अवसर भी था, पर तब वे चूक गये। कारगिल पर पाकिस्तानी धुसपैठियों ने कब्जा कर लिया था और इनके लौह पुरुष को महीनों तक इस धुसपैठ की खबर ही नहीं लगी। कारगिल जीत का जश्न हम चाहे जितना मना ले, पर सच्चाई यह भी है कि इसका खात्मा घुसपैठियों को बाहर निकलने का सेफ पैकेज देकर किया गया। यह चूक कहां से हुई, मोदी इसका भी अध्ययन करें । इतिहास में पहली बार भारतीय अस्मिता का प्रतिक भारतीय संसद पर हमला हुआ, आतंकियों को विमान से कांधार छोड़ा गया, पर तब यह लोहागीरी क्यों नहीं चली ?
निश्चित रूप से कांग्रेस वंशवादी राजनीति के सहारे चलती रही है। इसका चरित्र उच्चवर्णीय रहा है। दलित-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को सिर्फ एक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। पर इससे पटेल की विरासत मोदी के पास नहीं चली जायेगी। इस देश में लौह पुरुष सिर्फ एक हैं- सरदार बल्लभ भाई पटेल। एक ऐसा लोहा जिस पर कभी जंग नहीं लगा, लग नहीं सकता। न तो मोदी की करनी से और न ही कांग्रेस की वंशवादी राजनीति से और न ही गांधी-नेहरु परिवार के बाहर के नेताओं के प्रति उपेक्षा की प्रवृति से। हां, एक बात और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जिस बयान के प्रत्युत्तर में मोदी ने कांग्रेस पर ही इतिहास-भूगोल बदलने का आरोप चस्पा कर दिया दरअसल वह बयान ही दुरुस्त नहीं था। मोदी जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं वह सिर्फ इतिहास बदलती है। अपनी विचारधारा के अनुरूप इतिहास का पुनर्लेखन की कोशिश इसी प्रवृत्ति का हिस्सा है। और वैसे भी जिसका अपना कोई समृद्ध अतीत नहीं होता वह दूसरों की विरासत में सेंधमारी ही तो करेगा। नहीं तो मोदी के पास डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉ. हेडगवार भी तो हैं पर मोदी को तो प्रकारान्तर से पिछड़ावाद की राजनीति करनी है। सरदार पटेल का पत्ता इसके लिए फिट है और लोहागिरी इसी कवायद का हिस्सा।

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