लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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 सिद्धार्थ शंकर गौतम

गृह मंत्री पी चिदंबरम की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं| कभी हिन्दू आतंकवाद तो कभी संघीय ढाँचे से छेड़छाड़, चिदंबरम बतौर गृहमंत्री अब तक विवादित ही रहे हैं| अब तो कांग्रेस और सरकार के अंदरखाने भी यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या चिदंबरम सच में पार्टी तथा सरकार के लिए परेशानी का सबब बन गए हैं? ताज़ा विवाद के अंतर्गत इस बार उनको विपक्षी दलों ने नहीं वरन न्यायालय ने करार झटका दिया है| इस बार उनकी साख से ज्यादा उनकी कुर्सी को खतरा हो रहा है| मद्रास उच्च न्यायालय ने उनकी लोकसभा सदस्यता को चुनौती देने वाली याचिका रद्द करने की अपील ठुकरा दी है। इससे उन्हें २००९ में छल से लोकसभा चुनाव जीतने के आरोप में निचली अदालत में ट्रायल का सामना करना पड़ेगा। हाँ, चिदंबरम को उच्च न्यायालय ने इतनी राहत अवश्य दी है कि उनपर मतदाताओं को धमकाने एवं पैसे बांटने के अलावा बेटे कार्ति को एजेंट बनाने के आरोप रद्द कर दिए गए हैं| यानी चिदंबरम पर जिन बिंदुओं पर मुकदमा चलेगा उनमें मतदाताओं को प्रभावित करने, सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग, वोटिंग मशीनों में छेड़छाड़ से लेकर दोबारा मतगणना में गड़बड़ी जैसे आरोप शामिल हैं। उनपर आरोप है कि उन्होंने तमिलनाडू की शिवगंगा सीट से २००९ का लोकसभा चुनाव वोटों की गिनती में धांधली करवा कर जीता था| उनपर यह आरोप उनके निकटतम प्रतिद्वंदी रहे एआईएडीएमके के कन्नापन ने लगाया है|

 

दरअसल उस चुनाव में कन्नापन चिदंबरम पर शुरुआत से ही बढ़त बनाए हुए थे और उनको विजयी भी घोषित कर दिया था किन्तु बड़े ही नाटकीय घटनाक्रम में निर्वाचन अधिकारी ने एक मतपेटी की पुनः गणना करवाई जिसके फलस्वरूप चिदंबरम अप्रत्याशित रूप से ३३५४ वोटों से विजयी घोषित हुए थे| बस कन्नापन ने भी इस धांधली के विरुद्ध ९ जून २००९ को मद्रास उच्च न्यायालय में चिदंबरम के खिलाफ मुकदमा दायर किया था जो वे आज तक लड़ रहे हैं| अब जबकि मद्रास उच्च न्यायालय ने भी चिदंबरम के खिलाफ २९ में से २७ आरोपों पर ट्रायल चलाने का आदेश दे दिया है और कहा है कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाये रखने बाबत पर्याप्त सबूत हैं तो चिदंबरम की आगे की राह कठिन नज़र आती है| हालांकि चिदंबरम के पास उच्चतम न्यायालय जाने का रास्ता बचा है और वे निश्चित रूप से वहां अपने बचाव हेतु जायेंगे किन्तु २००९ से २०१२ तक का जो समय चिदंबरम ने बतौर सांसद तथा केंद्रीय मंत्री व्यतीत कर दिया है, यदि उनपर आरोप साबित होते हैं तो क्या यह कन्नापन के साथ अन्याय नहीं होगा? एक व्यक्ति जो अपने हक़ के लिए सच्चाई की लड़ाई लड़ रहा है, न्यायालयीन प्रक्रिया में हो रही देरी उसका कितना नुकसान करेगी? मान लीजिये, कन्नापन को बतौर फरियादी जीत भी मिलती है तो जो सपने उन्होंने जनता की भलाई के लिए देखे थे, क्या बाकी बचे थोड़े से समय में वे उन्हें पूरा कर पायेंगे? कदापि नहीं|

 

ऐसे ने यह सवाल मुखर हो जाता है कि आखिर हमारे देश में चुनाव शिकायत संबंधी याचिकाओं के निपटारे में इतनी देरी क्यूँ? क्यूँ नहीं मुकदमा दायर करने के साल छह माह में ही इनका निपटारा हो जाता? जिन पर चुनाव में धांधलियों के आरोप लगते हैं वे अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करते हैं और मुक़दमा भी चलता रहता है| फैसला आने तक तो आरोपी राजनीति के सारे खट्टे-मीठे अनुभवों से दो-चार हो लेता है और पुनः मैदान में आ धमकता है| ऐसे में नामात्र की सज़ा होना भी चुनाव में धांधलियां करने वालों के हौसले पुख्ता करती है और दूसरे भी उन्हीं का अनुसरण करते हैं| अतः चुनाव में धांधली संबंधी याचिकायों के निपटारे हेतु एक विशेष ट्रायल कोर्ट बनाए जाने की आवश्यकता है ताकि उचित न्याय का निर्धारण हो सके और आम आदमी के मन-मस्तिष्क में लोकतंत्र के प्रति आदर-सम्मान का भाव बरकरार रहे| जहां तक बात चिदंबरम के ऊपर लगाए गए आरोपों की है तो जब तब क़ानून का फैसला नहीं आ जाता उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता किन्तु ऐसा फैसला किस काम का जो उनके पदच्युत होने के बाद आए? चिदंबरम को लेकर बबाल मचा रहे विपक्षी दल तथा उनकी अपनी सरकार में उनके खिलाफ चल रही हवा ने चिदंबरम सहित सरकार का काफी नुकसान किया है और अब हालिया विवाद से चिदंबरम को लेकर राजनीति होना तय है|

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