लेखक परिचय

गौतम चौधरी

गौतम चौधरी

लेखक युवा पत्रकार हैं एवं एक समाचार एजेंसी से जुडे हुए हैं।

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-गौतम चौधरी

कोसी बाढ राहत पर एक बार फिर से राजनीति होने लगी है। इस बार की राजनीति के केन्द्र में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो हैं ही दूसरे तरफ से आधुनिक गुजरात के निर्माता कहे जाने वाले नरेन्द्र भाई मोदी का नाम जुड गया है। आखिर आपस में दोनों क्यों भिडे इसपर तो व्याख्या बांकी है लेकिन समस्या दोनों की यह है कि जहां एक ओर मोदी यह मान कर चल रहे हैं कि अगली बार संसदीय चुनाव में उनकी भारतीय जनता पार्टी उन्हें ही प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करेगी तो इधर नीतीश कुमार को भी लगने लगा है कि कमजोर पड रहा समाजनवादी खेमा हो न हो एक बार फिर से जीवित हो जाये और देवगौडा की तरह वे प्रधानमंत्री की कुर्सी हथिया लें। सीधे तौर कहें तो दोनों ओर से सियासी खेल जारी है। यही कारण है कि कोसी पर धमाचौकडी मचायी जा रही है। हालांकि नीतीश कुमार को मोदी ने ही छेडा है। मोदी छेडें या फिर मोदी के शुभचिंतक दोनों बात एक जैसी ही है। मोदी यह कहकार इस विवाद से अपना पल्ला नहीं झाड सकते हैं कि वह विज्ञापन जिसपर नीतीश भडक गये हैं, वह उन्होंन नहीं उनके सूरती समर्थकों ने छपवाया है। उल्लेखनीय है कि जिस विज्ञापन पर बवाल मचा, वह विज्ञापन सूरत में रहने वाले कुछ माडवाडी बिहारियों ने छपवाया था। इसके बाद नीतीश कुमार की त्योंरी चढ गयी और उन्होंने आनन फाानन में पत्रकार वार्ता बुला न केवल यह घोषणा कर दी की वे गुजरात सरकार के द्वारा दी गयी राशि लौटा देंगे अपितु भारतीय जनता पार्टी के देशभर से आये नेताओं के स्वागत में दिया गया भोज भी रर्द कर दी। लगे हाथ नीतीश कुमार ने गुजरात सरकार के द्वारा दिया गया पांच करोड रूपये का रकम भी वापस कर दिया। वापसी रकम के साथ जो पत्र गुजरात सरकार को प्राप्त हुआ है उसको सार्वजनिक करते हुए गुजरात सरकार के प्रवक्ता जयनारायण व्यास ने कहा कि इस पत्र में यह लिखा है कि जो पैसा बिहार सरकार ने गुजरात सरकार को वापस किया है वह मुख्यमंत्री राहत कोश में सन 2008 से ही पडा था। बिहार सरकार ने यह तय किया है कि पडे धनराशि को गुजरात को पुनः लौटा दिया जाये।

इस प्रकार की घटना को फूहर राजनीति से जोडकर देखा जा रहा है। इसमें कही कोई दोराय नहीं है कि ऐसा नीतीश कुमार ने केवल और केवल मत की राजनीति के कारण किया है। इस पूरे प्रकरण में बिहार के आपदा प्रबंधन मंत्री देवेश चंन्द्र ठाकुर और जनता दल युनाईटेड के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी की भूमिका तथा बयान की मिमांशा से साफ लगता है कि नीतीश और बिहार जदयु0 अब लालू प्रसाद यादल की राजनीतिक धारा पर काम करने लगी है। याद रहे लालू प्र0 यादव को जिन शक्तियों ने बरबाद किया वही शक्ति आज नीतीश कुमार के चारों तरफ घूमने लगी है। चाहे जिस किसी कारण से हो लेकिन जो नीतीश कर रहे हैं उसे ओछी राजनीति के अलावा और कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। इस प्रकार के ओछे कृत्य से निःसंदेह नीतीश की प्रतिष्ठा धुमिल हुई है। इसके साथ ही बिहार की प्रतिष्ठा पर भी बट्टा लगा है। नीतीश कुमार ने भाजपा नेताओं के सम्मान में दिये गये भोज को रर्द करके मागधी बरबरता का परिचय दिया है। लेकिन नीतीश को यह भी तो सोचना चाहिए कि बिहार में केवल मगध ही नहीं है अतिपु मिथला भी उसके साथ जुडी हुई है। जिसकी संस्कृति आतिथ्य सेवा की रही है। आखिर भोज रर्द कर नीतीश क्या साबित करना चाहते थे? जो भोज मुख्यमंत्री भाजपा नेताओं के सम्मान में दे रहे थे वह नीतीश कुमार के व्यक्तिगत पैसे से नहीं अपितु बिहार की जनता के पैसे से दिया जा रहा था। भोज रर्द कर नीतीश ने संकुचित मानसिकता का परिचय दिया है। एक बार तो ऐसा लगा कि ये वे नीतीश नहीं जिसे सुशासन बाबू के नाम से जाना जाता है। विवाद चाहे किसी प्रकार का हो लेकिन नीतीश कुमार ने भोज को रद्द कर बिहार खासकर मिथिला की संस्कृति की खिल्ली उडायी है। इस पूरे प्रकरण में सबसे घृणित राजनीति का पहलू यह है कि यह सब नीतीश कुमार ने केवल और केवल मुसल्लमानों के मतों को अपने पक्ष में करने के लिए किया है।

एक सवाल नीतीश कुमार से पूछा जाना चाहिए कि आखिर मोदी में ऐसी कौन सी खामी है जो नीतीश को उनसे परहेज करने को विवश करता है? शायद नीतीश यह कहें कि गुजरात के दंगे में मोदी की भूमिका संदेहास्पद है। जिस समय मोदी कथित रूप से दंगा फसाद कर रहे थे उस समय नीतीश कुमार केन्द्र सरकार में हिस्सेदार थे और उनके महकमें ने ही इतना बडा फसाद खडा करने में सहयोग किया था। नीतीश उस समय क्यों नही केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिये? यह सवाल महत्व का है और इसपर जबरदस्त मिमांशा की जरूरत है। निःसंदेह नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार में सडक, पुल-पुलिया, बांध, बिजली आदि पर काम जोरदार हुआ हैलेकिन इसका श्रेय केवल मुख्यमंत्री को ही नहीं जाता है। प्रेक्षक जाकर देख लें जो विभाग भारतीय जनता पार्टी के मंत्री सम्हाल रहे हैं वह विभाग काम के मायने में प्रथम स्थान पर है लेकिन जो विभाग खुद मुख्यमंत्री या उनकी पार्टी के नेता सम्हाल रहे हैं उसमें घोर अनियमितता है। जरा कोसी के बाढ पर एक बार नजर दौराना चाहिए। उस समय बिहार के जल संसाधन मंत्री जनता दल यु. के विधायक थे। कोसी की बाढ कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी इसे मानवीय भूल की तरह देखा जाना चाहिए। कोसी आपदा पर कई आलेख आ चुके हैं उस समय के दूरदर्शन वाहिनियों ने भी बाढ के कारणों को छुपाया नहीं और ठीक ठाक जगह दिया। उस समय नीतीश कुमार के चहेते एक अभियंत्रा का नाम भी सामले आया था जिसने सहरसा के जिलाधिकारी के पत्रों पर कोई सज्ञान नहीं लिया। जानकारी में रहे कि जल संसाधन विभाग पहले कांग्रेस से जनता दल यु में आए रामाश्रय प्रसाद सिंह के पास था लेकिन एन मौके पर उनसे यह विभाग क्यों लिया गया? ये सवाल इतने कडवे हैं जिसका जवाब शायद नीतीश कुमार के पास हो? आजकल नीतीश कुमार के चर्चे सारेआम हो रहे हैं। कल तक वे ललन सिंह की गोद में बैठकर राजनीति कर रहे थे और आज उपेन्द्र कुशवाहा और शिवानंद तिवारी उनके सिपहसलार नियुक्त हुए हैं। जनता दल यु. को जिन लोगों ने खडा किया वे आज हाशिए पर ढकेल दिये गये हैं। मोनाजिर हसन, ललन सिंह, शिवानंद तिवारी, कांग्रेसी स्व0 उमाकंत चौधरी के लडके अजय और विजय ये कब के समाजवादी हैं, नीतीश कुमार से पूछा जाना चाहिए। बेगुसराय के रामजीवन सिंह, दरभंगा के गंगा सिंह, अरूण कुमार, भीमसिंह, सांसद दिगविजय सिंह, आदि लोग आज जनता दल यु. के साथ नहीं हैं। जदयु0 में तो उन्हीं गुंडों का बोलबाला है तो कभी लालू राज में मलाई मार रहे थे।

भारतीय जनता पार्टी से नीतीश के तल्ख तेवर के पीछे बिहार में ईसाई – माओवादी गठबंधन की राजनीति भी काम कर रही है। बिहार सरकार में भाजपा के साथ होने से इन दोनों विध्वंसक शक्तियों को जगह नहीं मिल रही है। बिहार सोशल इस्टीट्यूट चलाने वाले आन्घ्र के कैथोलिक फादर प्रकाश लूईस नीतीश के अभिन्न मित्रों में से हैं। प्रकाश की पृष्टभूमि सन चौहत्तर के आन्दोलन से जुडा है। सूत्रों की माने तो नीतीश प्रकाश पर भडोसा करते हैं। प्रकाश को बिहार और झारखंड के कैथोलिक समूह में तेज तर्रार माना जाता है। ईसाई रणनीति के जानकारों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी के साथ होने के करण प्रकाश अपने एजेंडे को आगे नहीं बढा पा रहे हैं। इधर नीतीश कुमार को कांग्रेस पार्टी की ओर से भी सह मिल रहा है। ऐसे में नीतीश भाजपा से अपना नाता तोडने के लिए भाजपा को उक्साने लगे हैं। नीतीश को समझने वालों का मानना है कि नीतीश गठबंधन तोडने का ठिकडा भी भाजपा के सिर ही फोडना चाहते हैं। यही नहीं बिहार में ऐसे कई जदयु मंत्री हैं जिसका आज भी माओवादियों के साथ बढिया संबंध है। बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी पर तो माओवादी समर्थक होने का, कई बार आरोप लग चुका है। उदय नारायण चौधरी नीतीश के नजदीकी नेताओं में हैं। नीतीश ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अरविन्द्र पांडेय जैसे माओवाद पर शिकंजा कसने वाले पुसिल सेवा के अधिकारी को कई सालों तक मुख्यालय में बिठाकर रखा यह साबित करता है कि नीतीश कही न कही माओवादी संगठन के दबाव में हैं। याद रहे रफिगंज राजधानी एक्सप्रेस हादसे में माओवादी षड्यंत्र का पर्दाफास अरविन्द्र पांडेय ने ही किया था। ज्यों ही इस बात का खुलासा हुआ पांडेय मुख्यालय स्थानांतरित हो गये। इसके अलावा सीपीआई माले न्यू डेमोक्रेटिक के भूमिगत महासचिव अरविन्द्र सिंहा नीतीश के खास दोस्त में से हैं। यही नहीं नीतीश सरकार में ऐसे कई अधिकारी हैं जिनकी पृष्टभूमि चरम साम्यवादियों की रही है। ये तमाम शक्तियां नीतीश को अपने खेमे में लाना चाहती है। भाजपा का साथ होने से सरकार इन शक्तियों के गिरफ्त में नहीं जा सकती है। कयास यह भी लगाया जा रहा है कि इन तमाम बिन्दुओं को ध्यान में रखकर भी नीतीश भाजपा से कन्नी काटना चाहते हों। कहने सुनने और देखने में नीतीश-मोदी विवाद एक सामान्य राजनीतिक घटना लगे लेकिन पर्दे के पीछे खेल कुछ और ही खेला जा रहा है। भाजपा को इन तमाम बिन्दुओं पर विचार कर आगामी रणनीति बनानी चाहिए, अन्यथा भाजपा बिहार में भी उडीसा की तरह 10 साल पीछे चली जाएगी। इस घटना से एक बात तो साफ हो गया है कि नीतीश भी वही करने वाले हैं जो उनके पूर्ववर्ती करपूरी ठाकुर और लालू प्र0 यादव कर चुके हैं। जानकारी में रहे कि बिहार में तीन ऐसे दौर आये जब जनसंघ और भाजपा ने समाजवादियों को सहयोग कर सत्ता पर बिठाया लेकिन समाजवादियों ने भाजपा को दो बार तो दगा दिया है। वर्तमान विवाद तीसरी बार खडा हो रहा है। खासकर बिहार के समाजवादियों की यही रणनीति रही है। नीतीश उससे अलग नहीं दिख रहे हैं। यहां भाजपा को सतर्क रहने की जरूरत है। वर्तमान गतिरोध में बिहार भाजपा थोडी सतर्क भी दिख रही है। जिस प्रकार बिहार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ0 सी0 पी0 ठाकुर ने साहश दिखया और प्रदेश सरकार के दो मंत्रियों ने उनका साथ दिया उससे यह लगता है कि भाजपा अब फिर से पुरानी गलती दुहराने वाली नहीं है।

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2 Comments on "ईसाई-माओवादी षड्यंत्र के गिरफ्त में नीतीश"

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keshav kumar
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बहुत अच्छा पर मागधी बर्बरता शब्द ठीक नहीं लगा .

sanjay
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नीतीश कुमार ने भाजपा नेताओं के सम्मान में दिये गये भोज को रर्द करके मागधी बरबरता का परिचय दिया है। लेकिन नीतीश को यह भी तो सोचना चाहिए कि बिहार में केवल मगध ही नहीं है अतिपु मिथला भी उसके साथ जुडी हुई है। जिसकी संस्कृति आतिथ्य सेवा की रही है. ये घटिया सोच मिथिला की संस्कृती में तो नहीं थी शायद लेखक मगध के संस्कार और संस्कृती से वाकिफ नहीं हैं विचारो से मध्यकाल के वर्बर मुग़ल की सोच झलकती है वर्ना मगध के वारे नितीश जी जैसे सत्तालोलुप उदहारण हो ही नहीं सकते.

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