ईसाई धर्म संस्थापक यहूदी ईसा मसीह

—विनय कुमार विनायक
ईस्वी सन् एक में जन्मे थे
(वास्तव में ईस्वी सन् चार में
जन्मे थे ईसा मसीह)
एक कुमारी यहूदी कन्या मेरी की
पवित्र कोख में पलकर
तीन धर्मों के संधिस्थल
इजरायल के पवित्र स्थल
जेरुसलम के निकट बेथलेहेम में
जीसस ने जन्म लेकर
खुद को ईश्वर पुत्र कहलाया
लेकिन सबको यकीन नहीं हो पाया
जिन्होंने ईसा को मसीहा माना
वे ईसाई कहलाये बांकी विरोधी उनकी जाति
बनी रही प्राचीन यहूदी धर्म की थाती!
ईसा बुद्ध सा स्वधर्म-जाति विकृति का
सुधारक था,ईश्वरीय राज्य का आकांक्षी
ईश्वर का बेटा,मनुष्य मात्र का प्रेमी
बुराई का तीव्र विरोधी था ईसा,
किन्तु किस भले मानव का दुश्मन नहीं?
कौन आज तक ऐसा?
ईसा के दुश्मनों ने उनपर दाँत पीसा
बात घुमाकर भर दी कान में
रोमन गवर्नर पोण्टियस पाईलेट के
तथाकथित “ईश्वरीय राज्य” “ईश्वर का पुत्र’
‘का अर्थ शासक के कान में यूं जा सजा,
“जीसस कहता खुद को यहूदी का राजा,
वह बजा देगा शीघ्र रोम शासक का बाजा”
बस क्या था? मसीहा को मिला
प्राणदण्ड ‘शूली’ की सजा!
उनका जीवन दर्शन अंकित
पवित्र ग्रंथ ‘एंजिल’ में जो ईसाइयों का
पवित्र ‘बाइबल’ बन गया
जो कुछ और नहीं यहूदी धर्मग्रंथ
‘ओल्ड टेस्टामेंट’ का ही स्वरूप है नया,
ईसा ईश्वर का पुत्र क्षमा,दया का अवतार
सजा देने वाले का किया नही प्रतिकार
अपने पूर्ववर्ती भगवान बुद्ध,जिन से
ईसा को मिला विचार, संस्कार, व्यवहार
ईसा ने अपने पीड़क रोमन गवर्नर के लिए
ईश्वर से क्षमा प्रार्थना की थी
कहते हैं प्रभु ईशु जब थे तेरह वर्षीय शिशु
तब से तीस वर्ष तक भारत में बिताई
उस वक्त भारत था बौद्ध धर्म दर्शन शिक्षा का
विश्वस्तरीय गढ़, जहां ईसा ने की पढ़ाई
बौद्ध,जैन, सनातन धर्म के महाप्राण,
योग क्षेम के भगवान कृष्ण की नीति को
क्रीस्ट/क्राइस्ट ने जीवन में अपनाई
योग बल से शूली पे अपनी जान बचाई
शूली से तीन दिन बाद जी उठे थे जो
उस ईसा की क्रिस्चनिटी कहीं कृष्ण नीति तो नही?

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