लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन

(एक)वॉल स्ट्रीट जर्नल लेख “चर्च बिक रहे हैं”
लेखक का नाम है; Naftali BenDavid।
गत रविवार – ४ जनवरी २०१५ के वॉल स्ट्रीट जर्नल के आलेख पर आधारित है आज का आलेख।
नेदरलॅण्ड के कुल १६०० रोमन कॅथोलिक चर्चों में से,  दो तिहाई चर्च अगले दस वर्षों में बंद होने का अनुमान स्वयं रोमन कॅथोलिक चर्च के नेतृत्व ने ही लगाया है।
उसी प्रकार हॉलण्ड के ७०० प्रोटेस्टंट चर्च भी अगले चार वर्षों में बंद होनेका अनुमान है।
जर्मनी के रोमन कॅथोलिक चर्च ने ५१५ चर्च गत दशक में बंद किए हैं।
२०० डॅनिश चर्च अनुपयोगी हो चुके है।
इंग्लैण्ड भी प्रतिवर्ष प्रायः २० चर्च बन्द कर रहा है।
यही कहानी है, सारे युरप भर के चर्चों की।
“The numbers are so huge that the whole society will be confronted with it,” says Ms. Grootswagers, an activist with Future for Religious Heritage, which works to preserve churches.
Everyone will be confronted with big empty buildings in their neighborhoods.”
संख्या इतनी बडी है , कि, सारे समाज  को इस समस्या का सामना करना पडेगा; कहना है “ग्रुट्सवेजर” का जो धार्मिक परम्परा को बचानेवाली संस्था का काम करती है।

(दो) अमरिका अभी बचा है।
अमरिका अभी भी बचा हुआ है। पर “वॉल स्ट्रीट जर्नल का आलेख  का लेखक कहता है, अमरिका में भी चर्च जानेवालों की संख्या घट ही रही है। कहता है, अमरिका भी, आनेवाले वर्षों में इसी समस्या का सामना करेगा।
एक चर्च का पादरी दुःख के साथ कहता है, कि हम चर्च का मकान कोई जूआ-घर (कसिनो) बनते देख नहीं सकते, या कोई वासना (sex Shop) तृप्ति के व्यावसायिकों  के हाथ में जाने नहीं देना चाहते।

(तीन) वॉल स्ट्रीट जर्नल की सामजिक सर्वेक्षण सांख्यिकी ==>”चर्च जानेवाले घट रहे हैं।”
वॉल स्ट्रीट जर्नल की सामजिक सर्वेक्षण सांख्यिकी, कहती है, जिस के लेखक का नाम है; Naftali BenDavid कि, युरप में चर्च जानेवालों की संख्या घट चुकी है। ध्यान रहे इसाइयत सामूहिक प्रार्थना में विश्वास करती है। सप्ताह में एक बार चर्च जाना आवश्यक समझा जाता है। ये इसाइयत के संगठन की नींव है।आज निम्न प्रतिशत इसाई ही, कम से सप्ताह में एक बार चर्च जाते हैं। बहुत सारे चर्च खाली पडे हैं, इस लिए, चर्च की बैठकें खाली होती है।

(चार)चर्च जानेवालों इसाइयों के २०१२ के आँकडे :
आयर्लॅण्ड में ४८ %,
इटाली में ३९%,
नेदरलॅण्ड ३० %,
स्पैन २५%,
यु के २२%,
जर्मनी १२%,
फ्रांस ११%,
डेन्मार्क ५%
इतनी  इसाई जनसंख्या सप्ताह में कम से कम एक बार चर्च जाती है।
इस के कारण हज्जारों गिरजाघरों को बेचने की बारी आयी है। जिसका वृत्तान्त ऊपर आ ही  चुका है।
जब इसाईयत भौतिकता से ही अपना प्रभाव फैलाती है; तो ऐसा स्वाभाविक ही मानता हूँ। क्यों कि, भौतिकता का प्रभाव अल्प कालिक होता है। पर उसमें स्थायी आध्यात्मिक शक्ति अपवादात्मक  होती है। डेविड फ्राव्ले ने भी इसी बिन्दुका उल्लेख किया था; जो आप ने पढा ही है।

(पाँच) पाप आप करें, फिर इसाइयत स्वीकारें, और स्वर्ग आरक्षित”
कोई भोला-भाला मनुष्य ही,ऐसा तर्क सहसा मान लेगा। फिर भी इसाइयत, “पाप आप करें, पर इसाइयत स्वीकार करने पर, आप का स्वर्ग में स्थान आरक्षित करवाने का वचन देती है।” अब जब विज्ञान आगे बढ चुका है, तो पढी लिखी जनता इसे स्वीकार करने में हिचकिचाती है। इसके कारण चर्च जानेवालों की संख्या घटना संभव लगता है।
बुद्धिमान इसाई ऐसा वचन संभवतः स्वीकार नहीं कर सकता। फलतः इसाइयत में विश्वास घट रहा है। उसके अन्य कारण भी हो सकते हैं, पर यह एक कारण स्पष्ट है। कुछ मित्र जिन्हें जानता हूँ,वे भी ऐसी मान्यता रखते हैं।
फिर इसी की  पुष्टि करनेवाला यह आलेख भी गत रविवार (४ जनवरी २०१५)की,  “वॉल-स्ट्रीट जर्नल” के प्रथम पृष्ठ पर ही छपा है। जिसका शीर्षक है, (“Europe’s Empty Churches Go on Sale”–अर्थात युरप के चर्च बिक रहे हैं। इस लम्बे आलेख का उत्तरार्ध ८ वें पृष्ठ पर है।

(छः)बिके हुए गिरजाघरों के रंगीन छाया चित्र।
आलेख में तीन बिके हुए गिरजाघरों के रंगीन छाया चित्र भी छपे हैं। इन बिके हुए, चर्चों का  उपयोग कैसे किया जा रहा है, इसका अनुमान कीजिए। ये बडे बडे गिरजाघर हैं।
उदाहरणार्थ ब्रिस्टल इंग्लॅंण्ड का  “सॅन्ट पॉल चर्च”– “सर्कस ट्रैनिंग स्कूल” बना हुआ है। ऊंची दिवालों के कारण उसका ऐसा उचित उपयोग हो रहा है।
दूसरा एडिन्बरो का लुथरन चर्च फ़ॅन्केस्टाइन का बार (मद्यालय) बन चुका है।
और १९ वी शताब्दी का नेदरलॅण्ड का अर्नेहॅम चर्च बडी कपडोकी दुकान बन गया है।
एक चित्र में स्केटिंग की प्रशिक्षा दी जा रही है। दूसरे चित्र में सर्कस के कलाकारों को सिखाया जा रहा है। और तीसरे में एक  कपडों की बहुत बडी दुकान दिखाई गयी है।
इन युरप के देशों में चर्च नगर के केंद्र या मध्य में एक विशेष वास्तुकला का आकर्षण केंद्र हुआ करता था; उसे क्षति पहुंच रही है। आलेख इस समस्यापर ही प्रकाश फेंकता है। उसके हल पर मौन है, आलेख का अंत भी कुछ ऐसी हताशा ही दर्शाता है। “You have a building of value-historic value, cultural value-that is still owned by the (catholic) church.But there are no worshipers any more.”
“आप के पास एक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक  मूल्य की वास्तु है, जिसका स्वामित्व चर्च के पास है। पर उसका उपयोग करनेवाले श्रद्धालु ही नहीं है।” इन्हीं शब्दों से आलेख का अंत होता है।
अब इन चर्च त्यागियों की तो घर वापसी भी नहीं हो सकती!
अस्तु।

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18 Comments on "य़ुरप के चर्च बिक रहे हैं"

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इंसान
Guest
डा: मधुसूदन जी द्वारा वॉल स्ट्रीट जर्नल लेख “चर्च बिक रहे हैं” पर प्रस्तुत समीक्षा को पढ़ मेरे मन में अकस्मात् प्रश्न उठता है कि इसके विपरीत भारत में गली मुहल्लों में मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे अथवा चर्च क्योंकर खुल रहे हैं? देश प्रदेश में भ्रमण करते इस स्थिति को समझने हेतु मैंने अपने हिंदुत्व में “राम राज्य” की कल्पना की है| वैश्विक और उपभोक्तावादी आधुनिक जीवन में जब नागरिक विद्या, दर्शन, दया, परोपकार, अनुशासन, धन-धान्य सहित वैभव, इत्यादि “धर्मों” से परिपूर्ण हो जाते हैं तो वे सापेक्षवाद को प्राप्त हो जाते हैं| ऐसी स्थिति में पूजा स्थलों का महत्व खो… Read more »
Rekha Singh
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ईसाइयत ज़िंदा है क्योकि दुनिया मे आर्थिक और सामाजिक असमानता है । पाश्चात्य जीवन शैली हमे भौतिकता की पराकाष्टा को जीने को प्रेरित करती है । बस यही एक जीवन है ” यावत् जीवेत सुखम जीवेत , ऋणम् कृत्वा घ्रितम् पिवेत भष्मी भूतस्य देहस्य , पुनरागमनः कुतः ? ——चारवाक आज दुनिया के देशो मे , उनकी संस्कृति पर प्रहार करके उनका जो शोषण किया गया उसके पीछे एक महान षड्यंत्र ही था की उनको इतना तितर -वितर कर दो की ऐ लोग कभी एकत्रित नही हो पाएगे और फिर इनपर राज करो और उनकी सम्पदा का बहुत छद्म तरीके से… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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आदरणीय मित्रों—नमस्कार। ==> आज पश्चिम में मात्र सनातन एवं सनातन धर्म के सहप्रवासी धर्मों के सिवा किसी और की संभावनाएँ नहीं के बराबर है। ===> आज जैसा आध्यात्मिक (Religious नहीं, मज़हबी भी नहीं) शून्य (Void) अस्तित्व में आ चुका है; कभी नहीं था। योग, ध्यान, पुनर्जन्म, और शुद्ध वैज्ञानिक आध्यात्मिकता की माँग आनेवाले दशकों में ऐसी उभर कर आएगी, जैसे दूध गरम होनेपर उबाल आता है, उछलता है।इस शून्य को भरने के लिए कितनी सज्जता है? ===> अनुमान नहीं, आप सभी को अत्यंत आग्रहभरा अनुरोध है; कि, जो जालस्थल मैंने सुझाया है; उसको खोलकर सारे आर्यसमाजी, सनातनी, सिख, जैन, बौद्ध… Read more »
kaushalendram
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पश्चिम के चर्चीले पादरियों के लिये – कोई बात नहीं समायोजन तो हो ही रहा है, चिंता मत कीजिये । भारत में चर्च बढ़ रहे हैं …चर्च जाने वाले भी । पश्चिम में सनातन धर्म की ओर स्वाभाविक आकर्षण की संभावनायें हैं ।

डॉ. मधुसूदन
Guest
आदरणीय—नमस्कार। बिलकुल सही कहा आप ने। पर, मैं कुछ बढकर कहूंगा। ==> आज पश्चिम में मात्र सनातन एवं सनातन धर्म के सहप्रवासी धर्मों के सिवा किसी और की संभावनाएँ नहीं के बराबर है। ===> आज जैसा आध्यात्मिक (Religious नहीं, मज़हबी भी नहीं) शून्य (Void) अस्तित्व में आ चुका है; कभी नहीं था। योग, ध्यान, पुनर्जन्म, और शुद्ध वैज्ञानिक आध्यात्मिकता की माँग आनेवाले दशकों में ऐसी उभर कर आएगी, जैसे दूध गरम होनेपर उबाल आता है, उछलता है।इस शून्य को भरने के लिए कितनी सज्जता है? ===> अनुमान नहीं, आप सभी को अत्यंत आग्रहभरा अनुरोध है; कि, जो जालस्थल मैंने सुझाया… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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प्रामाणिक अनुरोध:
कृपा करके निम्न जालस्थल पर एक ही दृष्टि डालें।
आपका समय बचाएं।
http://bishop-accountability.org/
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चर्च बिकने का महत्व पूर्ण कारण है, हजारों बलात्कार-वे भी पादरियों के।

यदि बीभत्स कथाएँ, पढने का साहस है, तो, तनिक निम्न जालस्थल अवश्य देखिए।हजारों सत्य कथाओं से भरपूर है।
इस आलेख से भी अधिक, यह, जालस्थल का प्रमाण आपको चौंका देगा।
http://bishop-accountability.org/
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चर्च बेचकर ईसाइयत कानूनन दण्ड(?) के प्रचण्ड खर्च से बचना चाहती है।
जब रिलिजन ही आर्थिक स्तरपर आसीन है, और आध्यात्मिकता दिखावा है; तो यह सारा अपेक्षित है।

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