लेखक परिचय

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर धानापुर-चन्दौली (उत्तर प्रदेश) के निवासी हैं। इन्होने समाजशास्त्र में परास्नातक के साथ पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। स्वतंत्र पत्रकार , स्तम्भकार व युवा साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। पिछले पन्द्रह सालों से पत्रकारिता एवं रचना धर्मीता से जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अखबारों , पत्रिकाओं और वेब पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिखते रहते हैं। Mobile- 8081110808 email- mafsarpathan@gmail.com

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शर्मा जी को हमे शा कसक रहता कि वे सरकारी मुलाजिम न हुए। जब भी हमारे यहां उनकी आमद होती, बस एक ही रट लगाते। भाई साहब… काश! मैं भी सरकारी मुलाजिम होता। मेरे पास भी आलीशान बंगला, ए.सी. कार व रूपये का भण्डार होता। चाश्नीदार पकवान, रेमण्ड के सूट ,रीबाक के जूते व स्लीप वेल के कुशन होते। आराम से जिन्दगी बसर होती। साली दो टके की प्राइवेट जानमारू नौकरी करते-करते मैं तो थक गया हूं। न सोने का सही वक्त, न खाने का, न नहाने का और तो और टट्टी-पेशाब की हाजत भी सही से पूरी न हो पाती है। हमारी दशा पर तो कुत्ते भी शर्मशार हो जाते हैं। अमूमन शाम के वक्त मैं घर पर ही रहता हूं सो एक शाम बाजार से वापसी के दौरान शर्मा जी टकरा गए। सलाम-बन्दगी के बाद एक गिलास पानी से गला तर किया, फिर शुरू हो गए। भाई साहब… काश! मैं भी सरकारी मुलाजिम होता। इतना सुनना था कि मेरा ब्लड प्रेशर सेंसेक्स की तरह उच्चतम स्तर पर जा पहुंच। पूछा कि अरे जनबा ये सरकारी मुलाजिमत भी क्या बला है, जो रोज-रोज तोते की तरह रट लगा रखा है। मतलब तो मुलाजिमत से है, सरकारी हो या प्राइवेट, काम दोनों ही करते हैं, पैसा भी दोनो पाते हैं। प्राइवेट काम में भी अच्छी तंख्वाह है।

 

इतना पूछना था कि शर्मा जी ग्रेनेड के गोले की तरह फट पड़े। अगर आपने दरयाफ्त किया है तो सुन लीजिए सरकारी मुलाजिम होने के फवायद। आपने बिल्कुल ठीक फरमाया काम दोनों करते हैं और तंख्वाह भी दोनों पाते हैं मगर आपने कभी ख्याल किया है कि सरकारी मुलाजिमत पाने के लिए लोग लाखों रूपये क्यों देते है? आखिर क्यों अपना खेत, मकान सब दांव पर लगा देते हैं, क्योंकि सरकारी मुलाजिमत में सुविधा शुल्क की चाश्नी जो मिली है! ये सुविधा शुल्क क्या बला है जनबा….? आपको इस सर्वव्यापी चीज का इल्म नही? अरे हां, मैं भी कितना बुद्धू हूं आप अखबार वाले इस शुल्क से एकदम महरूम हैं। देखिए! नया दौर चल रहा है। अगर आप थाने में रपट लिखवाना चाहते हैं या लेखपाल कानूनगो की रिपोर्ट लगवाना चाहते हैं या फिर कोर्ट कचहरी की दबी फाइलें निकलवाना चाहते हैं तो सुविधा शुल्क लाजमी मानकर चलिए! इसके बिना आप शर्तिया धकिया दीए जायेंगे। पुलिस व भू-राजस्व जैसे कदीम व पुराने महकमे सुविधा शुल्क के ही मजबूत सुतून पर टिके हैं! पग-पग पर आपको यहां सुविधा शुल्क की अदायगी करनी होगी, अगर आप यहां फराख दिली का नजराना पेश करते हैं तो पूरा महकमा आपके इशारे पर नाचेगा वरना आप कत्थक नृत्य करते नजर आयेंगे। अब आप ही बताइए आयकर जैसा सक्ष्म विभाग इस छोटे से शुल्क से न जाने आपको कितने आयकर शुल्कों से मुक्त कर देता है! सरकारी अस्पतालों से बिमरीहा विभाग आपने कहीं देखा है! अक्सर खुद संक्रामक रोगों की चपेट में रहता है, इसके दवाखाने व इमरजेंसी में मलेरीया का व्यापक प्रकोप रहता है मगर आपको यहां भी सुविधा शुल्क का नजराना पेश करना होता है! पूछिए कैसे? अच्छे डाक्टर आपको प्राइवेट में मिलेंगे तो उनका शुल्क, मारपीट करके जाइए अदा करीए सुविधा शुल्क तो 325 का 307 बनेगा! टानिक, कैप्सूल, बेहतर एंटीबायोटिक्स लेना है तो आपको लाजमी है अदा करना सुविधा शुल्क!

बात अगर बिजली महकमें का हो तो क्या पूछना है? राजा नौकरी है। नया कनेक्शन लेना हो, जर्जर विद्युत तार व पोल बदलवाना हो, विद्युत मीटर की सनसनाती रफ्तार को रोकना हो या सालों पुरानी बकाया बिल जो आपके पहुंच से दूर हो उसे मैनेज करवाना हो तो अदा कीजिए सुविधा शुल्क! पांच हजार देंगे तो पच्चीस हजार का लाभ शर्तिया मिलेगा! कोलतार से सड़क व रेत से पुल बनाने वाले लोक निर्माण विभाग तो पूरी तरह सुविधा शुल्क से सुविधाजनक हो जाता है! पिच रोड, आर. सी. सी., पुल या सीवर लाइन का टेंडर तो मिलिए इस विभाग के सरकारी मुलाजिमों से दीजिए सुविधा शुल्क करोडों का मुनाफा आपका, घाटा सरकार का!

शिक्षा जैसी पवित्र व साफ महकमा भी इससे अछूता नही रहा। फिल्वक्त शिक्षा विभाग सुविधा शुल्क के मामले में टाप वन रैंक पर कब्जा बनाये हुए है! प्राथमिक से उच्च शिक्षा के आलयों से कार्यालयों तक इसकी चर्चा बुलन्द है। मिड-डे-मील, वजीफा, ड्रेस, भवन निर्माण व तबादलों का कारोबार यहां सुविधा शुल्क के दम पर ही तो चलता है! सरकारी मुलाजिमत पाने में उम्र की बाधा आडे आती हो, लिखने नहीं आता हो, आप डिग्री से महरूम नहीं रहेंगे हां, थोड़ा ज्यादा सुविधा शुल्क अदा करना होगा। हाई स्कूल, इण्टर, बी.ए. सब डिग्रियां बंट रहीं हैं सुविधा शुल्क से तोल कर! शिक्षा के मंदिर तो सुविधा शुल्क के भोग से बड़े-बड़े काले-पीले करतब करने के लिए अफसरानों व हुक्मरानों की नीलामी तक सुविधा शुल्क के बल पर कर दे रहे हैं! एक महकमा तो ऐसा है जहां तंख्वाह की फिक्र ही नहीं जब रूपयों की दरकार हुआ बस वर्दी पहना डंडा लिया और बीच सड़क पर पटक दिया, देखते-देखते रूपयों की बरसात होने लगी, जेब गरम काम खत्म!

अगर आप इसे भ्रष्टाचर कहेंगे तो दोष आपका है, क्योंकि जो चीज सर्वव्यापी हो जाती है, वह ग्रहणीय हो जाती है। फिर हम जैसे डरपोक किस्म के लोग सुविधा शुल्क देने के लिए हर वक्त आतुर जो रहते हैं। खामखाह के पचडों से बचने के लिए हमारी आदत में शुमार है सुविधा शुल्क। दाम बनाए काम के फलसफे को हम पूरी अकीदत के साथ अपना चुके हैं। धीरे-धीरे यह फलसफा हर सरकारी महकमे में पोशीदा तौर से लाजमी कानून का रूप ले चूका है! सरकारी मुलाजिम चाहे वह चपरासी हो, बाबू हो, अधिकारी हो, डाक्टर हो, मास्टर हो या इंस्पेक्टर सब इस मायावी शुल्क को खा-पचा कर पेट निकाले घूमते हैं! मुश्किल क्या नामुम्किन कामों को भी आसान बनाया जा सकता है! आप अक्सर समाचारों में पढ़ते तो होंगे ना कि फलां अधिकारी व कर्मचार के पास आय से ज्यदा सम्पत्ति पाया गया, वह इसी सुविधा शुल्क का कमाल है! अब आप पूरी तरह से सुविधा शुल्क की माया से वाकिफ हो गये होंगे। तो है ना बड़ी काम का चीज ये सुविधा शुल्क! मगर हां, सरकारी मुलाजिम होना इसकी खातिर बेहद जरूरी है। अचानक शर्मा जी को चैकें और बड़बड़ाने लगें… काश! मैं भी सरकारी मुलाजिम होता।

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1 Comment on "दास्तान-ए-सुविधा शुल्क"

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सुनील कुमार यादव
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सुनील कुमार यादव

वर्तमान समय में भ्रष्टाचार चरम पर है। बिना सुविधा शुल्क के कुछ हो पाना समभव नहीं।
उम्दा व्यंग्य।

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