लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

Posted On by &filed under कला-संस्कृति, विविधा.


1 2

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

डॉ. मधुसूदन

सारांश:
===>संस्कृत शब्दों के समानार्थी अंग्रेज़ी शब्द नहीं मिलते।
===>६८ वर्षों की स्वतंत्रता के बाद गुलाम मानसिकता।
===>जब तक अंग्रेज़ी रहेगी समस्या बनी रहेगी।
===> धर्म=रिलिजन=मज़हब(गलत)
===> संस्कृति=कल्चर=सिविलायज़ेशन (गलत)
===> शब्दार्थ विकृत हो कर रूढ हो जाता है।
(एक) संस्कृत से अंग्रेज़ी अनुवाद की समस्या।
सामान्यतः अनेक संस्कृत शब्दों के समानार्थी अंग्रेज़ी शब्द नहीं मिलते। जो शब्द संस्कृत शब्दों के पर्याय मान कर, अंग्रेज़ी में प्रयोजे जाते हैं, वे शब्द अनुवाद को (गलत) विकृत कर देते हैं। ऐसे विकृत अर्थ को सही मान कर, शुद्ध मौलिक अर्थ को ही गलत मानने का चलन रूढ हो गया है। और यह है ६८ वर्षों की स्वतंत्रता के बाद गुलाम) मानसिकता की समस्या है।
इस लिए दैहिक स्वतंत्रता मिली पर मानसिकता अभी गुलामी की ही है।

(दो) समस्या कब तक रहेगी?
यह समस्या तब तक बनी रहेगी जब तक हम अंग्रेज़ी में ही व्यवहार करते रहेंगे।
अंग्रेज़ जो अंग्रेज़ी छोडकर गए, उसी से हम स्वयं बंध गए; और अपने को स्वयं इस मानसिकता से बाँध कर हम गौरव अनुभव करते हैं। इसके दुष्परिणाम हम ६८ वर्षों से भोग रहे हैं। न्याय और संविधान भी ऐसे विकृत अर्थों पर आधारित है।इस प्रक्रिया के कुछ उदाहरण विस्तार से दिखाना इस आलेख का उद्देश्य है।

(तीन)शब्दार्थ विकृति।
किसी भाषा में सही अर्थ का शब्द जब उपलब्ध नहीं होता, तो,अनुवादक भिन्न अर्थका शब्द प्रयोग कर मूल अर्थ को भ्रष्ट कर देता है; और फिर यह विकृत अर्थ ही रूढ हो जाता है। ऐसी अर्थ-विकृति जब अनुवादित भाषा में प्रचलन पा जाती है; तो भ्रान्त धारणाएं रूढ हो जाती है। इस विषय पर आज का लेख कुछ मौलिक विचारों पर प्रतिष्ठित है। साम्प्रत इन्स्टिट्यूट फॉर एडवान्स्ड सायन्सेस में एक व्याख्यान में प्रबुद्ध श्रोताओं द्वारा पूछे गए प्रश्नों के आधार पर आलेख बनाया है; जो प्रस्तुत है।
(चार) मूल संस्कृत शब्दार्थ

अंग्रेज़ी शब्दों को व्युत्पत्ति नहीं होती, शब्दैतिहास (एटिमॉलॉजी) होता है। इससे विपरित संस्कृत शब्दों को व्युत्पत्ति होती है। मूल धातु से संस्कृत शब्द का अर्थ सदैव जुडा हुआ होता है। इस कारण (प्रायः)अर्थ खो नहीं सकता। कभी अर्थ बदलने पर भी मूल अर्थ कुछ खोज करनेपर पता लग जाता है। ऐसे अर्थ की खोज भी विशेष कठिन नहीं होती।
वास्तव में अंग्रेज़ी शब्दों की एटिमॉलॉजी की अपेक्षा यह संस्कृत शब्दों की व्युत्पत्ति ढूँढने का काम मनोरंजक भी होता है; और तर्कसंगत होने के कारण स्मृति पर भार नहीं होता। इस शब्दार्थ ढूँढने की शास्त्रीय पद्धति को, शब्दार्थ-विज्ञान या व्युत्पत्ति-विज्ञान कहा जा सकता है।
एक उदाहरण से यह सरलता से, प्रमाणित किया जा सकता है।
*सभा* एक शब्द है। स का अर्थ साथ साथ ऐसा होता है। जैसे==> सपरिवार= परिवार के साथ। सपत्नीक=पत्नी के सह। सचेत=चेत कर, सहेतु=हेतुपूर्वक, सक्षम= क्षमता सहित।*भा भाति* का अर्थ होता है चमकना, शोभना, भाना।
इसी भा से निकलते हैं हमारे अनेक शब्द। जैसे *प्रभा, *विभा, *आभा, *प्रतिभा, फिर *प्रभाकर, *प्रभात, *विभाकर, *विभावरी इत्यादि। इन सारे शब्दों में चमकना, शोभना, जगमगाना, शानदार प्रतीत होना, प्रकट होना ऐसे अर्थ जुडे हुए हैं। और विशेष, ऐसे सारे संबंधित शब्द एक साथ समझे जा सकते हैं।

(पाँच) कल्ट का उदाहरण:
कल्ट. कल्चर, ऍग्रिकल्चर, संस्कृति, सभ्यता, और सिविलायज़ेशन इन छः शब्दों के मौलिक अर्थों की खोज इस आलेख का विषय है। एक एक शब्द लेकर उसके मौलिक अर्थ की चर्चा करेंगे।

कल्ट है, अंधश्रद्धा युक्त समूह का द्योतक। ऐसे कल्ट की सामान्य नीति, रीति और रुढियाँ कहलाती है, कल्चर। इस अंधश्रद्धासे जुडे *कल्चर* शब्द को बढा चढाकर ऊर्ध्वगामी अर्थ वाले,*संस्कृति* के समान मान लिया। क्यों? क्या तर्क था;और यह तर्क कितना सयुक्तिक था ? पर ऐसी विकृति स्वीकार की गयी। ऐसा करने की आवश्यकता नहीं थी।इसपर उपाय (या पर्याय)था, अंग्रेज़ी में संस्कृति शब्द का ही प्रयोजा जाना। जिस अंग्रेज़ी ने १२० तक भाषाओं से शब्द स्वीकारे हैं,उसे इसमें कठिनाई अपेक्षित नहीं थी।ऐसा होता, तो अर्थ का अनर्थ तो ना होता। पर शायद हम ही अंग्रेज़ी से प्रभावित थे। भ्रान्त दास्यता से पीडित थे।

(छः) कल्ट का अर्थ
तो अब कल्ट का वास्तविक डिक्षनरी (हिन्दी) अर्थ जानते हैं।
(१)कल्ट संकीर्ण, साम्प्रदायिक विधि या कर्मकाण्ड से जुडे समूह के लिए प्रयोजा जाता है।
(२)या किसी धर्मगुरू के प्रति, कट्टर अंधश्रद्धा-युक्त विश्वास करनेवालों का समूह कल्ट कहलाता है।
(३) अंतिमवादी, पाखण्डी, जिसके सदस्य सामान्य जनों से अलग बस्ती बसाकर रहते हो, उसे भी कल्ट कहा जाता है। ऐसे हीन अर्थ वाला शब्द है कल्ट; और उस से ही कल्चर शब्द भी बनता है।
(सात ) कल्ट, कल्चर, और ऍग्रिकल्चर
कल्चर का मौलिक अर्थ कल्ट से जुडा है।अंधश्रद्धालुओं के, कल्ट की जो सामान्य परम्पराएँ होंगी, उपासना पद्धति होगी; रूढि-रीति होगी उसे कल्चर नाम से पहचाना जाएगा। यह कल्चर का मूल अर्थ है।
ऐसे शब्द को संस्कृति जैसे शब्दकी बराबरी कैसे दी जा सकती है? पर अंग्रेज़ी की डींग हाँकनेवालों के पास इस प्रश्नका कोई सटीक उत्तर नहीं होता। ऐसे कल्चर के मूल में जो अर्थ नहीं है, वैसा ऊंचा अर्थ उसमें घुसा दिया। और ऐसे हीन अर्थ वाले शब्द को ऊर्ध्वगामी *संस्कृति* के बराबर मान लिया। और आप यदि अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश देखे, तो कल्चर का अर्थ संस्कृति बताया जाता है।

(आठ) सभ्यता:
अब सभ्यता शब्द का विचार करते हैं।
सभ्यता *सभ्य* से निकला, और सभ्य निकला है *सभा* से। तो *सभ्य* उसे कहा जाएगा, जो, सभामें शिष्टता से व्यवहार करना जानता है। जो सूक्ष्मतासहित समझना चाहते हैं; उनके लिए, जानना आवश्यक है; कि, *सभा* की व्युत्पत्ति है; *सह भान्ति* से, जिसका अर्थ होता है परिषद् या सम्मिलन जहाँ सभी एक साथ शोभायमान हो रहे हैं। ऐसी सभाएँ कुछ विचार विमर्श के लिए होती है। स(ह)भा(न्ति) का अर्थ हुआ *साथ साथ शोभना* से।
*भा भाति* का अर्थ होता है चमकना।

इसी भा से निकलते हैं हमारे अनेक शब्द। जैसे *प्रभा, *विभा, *आभा, *प्रतिभा, फिर *प्रभाकर, *प्रभात, *विभाकर, *विभावरी इत्यादि। इन सारे शब्दों में चमकना, शोभना, जगमगाना, शानदार प्रतीत होना, प्रकट होना ऐसे अर्थ जुडे हुए हैं।
पर सभामें बैठने के लिए आवश्यक शिष्टता गुण वाला व्यक्ति *सभ्य* कहलाता है।
और उसका यह शिष्टता का गुण *सभ्यता* कहलाता है।
पर इस सभ्यता के अर्थ में ऊर्ध्वगामिता का गुण नहीं है;जो संस्कृति शब्द में पाया जाता है। इसकी चर्चा अंतिम परिच्छेद में, की गयी है।
सिविलायझेशन का अर्थ नागरिक (नगर के) नियमों के अनुसार रहने की आवश्यकता से जोडा जाता है।
जैसे आप शिष्टता से सारे नगर के,विधि-नियमों के अनुसार नगर में रहते हैं; किसी से झगडते नहीं; मेल मिलाप से रहते हैं। किसी के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते नहीं है। धन्यवाद, आभार,कृपया, इत्यादि प्रयोग और गलती करने पर खेद व्यक्त करते हैं। ऐसी सारी शिष्टताएँ सिविलायझेशन शब्द के अंतर्गत आ जाती हैं। इसको नागरी (नगर की) सभ्यता ऐसा माना जा सकता है।
(नौ ) विकृति प्रकृति और संस्कृति
संस्कृति शब्द का अर्थ समझने में ये तीनों शब्दों के सहायक हैं।
संस्कृति संस्कार द्वारा व्यक्ति को ऊपर उठाती है।
प्रकृति प्राकृतिक याने उपलब्ध स्थिति तक सीमित है; उस में न ऊपर उठने का अर्थ है, न नीचे ले जानेका।
विकृति व्यक्ति को अधोगामिता की ओर नीचे ले जाती है।
संस्कृति संस्कारों के साथ जुडी है।
प्रकृति जैसे जैसे उत्क्रांत होती है; अलग अलग प्रकार विकसित होते हैं। कुछ लाखो वर्ष पूर्व पाईन वृक्ष के पर्ण एक ही आकार के हुआ करते थे।
आज १८ प्रकार के होते हैं। यह प्रकारों का बढना प्रकृतिजन्य है।ऐसे प्रकृति की उत्क्रान्ति के साथ प्रकार जुडते हैं।
संस्कार के साथ संस्कृति जुडी हुयी है।
किसी संन्यासी का ब्रह्मचर्याश्रम से सीधा संन्यस्ताश्रम में कूदना संस्कार का लक्षण है।
पर ब्रह्मचर्याश्रम -गृहस्थाश्रम-वानप्रस्थाश्रम-संन्यस्ताश्रम इस क्रममें जाना प्रकृति है।
पर इन आश्रमों से विपरित आचरण करना, स्वैराचार, और वेश्यागमन इत्यादि करना विकृति मानी जाएगी।
इस प्रकार विकृति विकारों के साथ जुडी है।
प्रकृति प्रकारों के साथ जुडी है।
और संस्कृति संस्कारों के साथ जुडी है।
आप कह सकते हैं; कि, विकृति प्रकृति और संस्कृति ये विकार, प्रकार, और संस्कार से क्रमशः संबंध रखते हैं।
यह सार है, शनिवार दिनांक नवम्बर २८ को उठे प्रश्नों का।
अनेक प्रबुद्ध श्रोताओं ने काफी प्रश्न पूछे थे।

परिशिष्ट: कल्ट का डिक्षनरी अर्थ
CULT:
——————————————————-
1.a religion or sect considered to be false, unorthodox, or extremist, with members often living outside of conventional society under the direction of a charismatic leader.
2. a group or sect bound together by veneration of the same thing, person, ideal, etc.
3.the object of such devotion.
4.an instance of great veneration of a person, ideal, or thing, especially as manifested by a body of admirers:
5.a particular system of religious worship, especially with reference to its rites and ceremonies.
——————————————————-
आभार प्रदर्शन:
Fall River office of the Institute for Advanced Sciences
(Massachusetts).के आमंत्रण के लिए, लेखक डॉ. बलराम सिंह एवं श्रीमती रेखा सिंह का आभार व्यक्त करता है। नवम्बर-२८-२०१५ को इन्स्टिट्यूट फॉर एडवान्स्ड सायन्सेस के फॉल-रिवर (मॅसॅच्युसेट्ट्स )कार्यालय में लेखक को व्याख्यान के लिए आमन्त्रित किया गया था।

Leave a Reply

6 Comments on "कल्चर=संस्कृति=सिविलायज़ेशन?"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
बलराम सिंह
Guest
बलराम सिंह

बड़ा ही उपयोगी लेख है। लेखक एक सुदृढ़ एवं वैज्ञानिक तर्क द्वारा भारतीय भाषाओं को बौधिक और व्यावहारिक आयामों में उपयोगी सिद्ध करता है। भा की परिभाषा बहुत भाई! क्या भारत का अर्थ भी यहीं से निकलता है?

डॉ. मधुसूदन
Guest
डॉ. मधुसूदन

जी हाँ। भाः का एक अर्थ प्रकाश या तेज है। रत का अर्थ तो स्पष्ट है। जैसे कार्यरत, या कार्य में मग्न। भारत का अर्थ हुआ वह देश जो तेज या प्रकाश में रत हुआ है। यहाँ तेज या प्रकाश का अर्थ आध्यात्मिक प्रकाश से है। अर्थात भारत आध्यात्मिक प्रकाश (ज्ञान) में सदा रत या मग्न है।यह बात हम सब के लिए काफी गौरव की है।
सारे संसार में सर्वाधिक आध्यात्मिक साहित्य भारत नें दिया है।
डॉ. बलराम सिंह जी का प्रश्न पूछकर स्मरण दिलाने के लिए, और व्याख्यान आयोजित करने के लिए भी हृदयतल से धन्यवाद करता हूँ।

डॉ धनाकर ठाकुर
Guest
डॉ धनाकर ठाकुर

संन्यस्ताश्रम न सन्न्यासाश्रम लिखेत

Himwant
Guest

भारतीय भाषाओं को आगे बढाया जाना चाहिए. हिन्दी को उच्च शिक्षा का माध्यम बनाया जाए. सिर्फ हिन्दी जानने वाला व्यक्ति डाक्टर या इंजीनीयर बन सके यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए. इससे देश की तस्वीर बदल सकती है.

डॉ धनाकर ठाकुर
Guest
डॉ धनाकर ठाकुर

सहमत किन्तु हिन्दी ही नहीं किसी भी भारतीय भाषा को जाननेवाला

डॉ. मधुसूदन
Guest
डॉ. मधुसूदन

डॉ. ठाकुर जी की बात गलत न भी हो, पर फिर भी, पहले हिन्दी शिक्षा की सिद्धता हो। पारिभाषिक शब्दावली तो सभी की समान होगी। आप अंग्रेज़ी को तो सत्तर वर्ष सहते रहे।

wpDiscuz