लेखक परिचय

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

'स्‍वतंत्रता संग्राम और संघ' विषय पर डी.लिट्. कर रहे लेखक पत्रकार, फिल्म समीक्षक, समाजसेवी तथा हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक हैं।

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डॉ. मनोज चतुर्वेदी

भारतवर्ष देवभूमि, मातृभूमि तथा पुण्यभूमि इसलिए नहीं है कि हम अंध श्रद्धा एवं भक्ति के द्वारा इसकी आराधना किया करते हैं। यह तो कर्मयोगियों की तपस्थली है, जिन्‍होंने अपने अस्थि-मज्जाओं से इस राष्ट्र को सींचा है। ऐसे ही धरती पुत्र हुए दादा साहेब आप्टे उपाख्‍य शिवराम शंकर आप्टे। श्री आप्टे जी का जन्म 19 मई, 1905 को गुजरात राज्य के बड़ोदरा में हुआ था। प्राथमिक एवं महाविद्यालयी शिक्षा पूर्ण करने के बाद एल.एल.बी. हेतु मुंबई में आए। संस्कृत विद्यालय में अर्थोपार्जन के साथ-साथ इन्होंने कानून की उपाधि प्राप्त की। कानूनी बारीकियों तथा राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा उस जमाने के विधिवेता तथा भारतीय संस्कृति के उपासक कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी से प्राप्त किया। अपनी कार्यकुशलता, अनामिकता तथा अध्ययन की पैनी दृष्टि के कारण वे मुंबई के प्रमुख ‘लियो प्रेस’ से जुड़े। इसी बीच 1939 के आस-पास उनका संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आया और वही उनके जीवन का मोड़ बन गया। वकालत तथा पत्रकारिता को छोड़कर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गए तथा उन्हें तमिलनाडु में संघ कार्य के विकास के लिए भेजा गया।

उन्ही दिनों उन्होंने अपने दैनंदिनी में लिखा कि जीवन तो जुआ नहीं है। इसलिए उसे राष्ट्र को समर्पित करना चाहिए परंतु विवाह तो जुआ है। राष्ट्र कार्य में लगे व्यक्ति को ऐसा जुआ खेलने की जरूरत नहीं है। शिवराम शंकर उपा’य दादा साहेब आप्टे स्वयंसेवकों के स्वयंसेवक बन गए। उनके लिए राष्ट्रकार्य ही सबकुछ था। उन्होंने संघ की शाखा से प्राप्त अमृतबिंदुओं को राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत करने का यथा-संभव प्रयास किया। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक दादा साहेब आप्टे को याद करते हुए कहता है कि दादा साहेब में गजब की शक्ति थी वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विहिप के आधार स्तंभ थे। आज जब हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दु परिषद् की संबंध में विचार करते हैं तो हमें दादा साहेब आप्टे का नाम एकाएक चिंतन पटल पर आ जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सांप्रादायिक संगठन है। यह देश के विभाजन के लिए दोषी है। इसका समूल नाश होना चाहिए। इस प्रकार के विचार भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के थे। यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनके विचारों के साथ हां में हां मिलाए तो ठीक है परंतु यदि वह कहें कि संघ संस्थापक के अनुसार राजनीतिक संगठनों के द्वारा समाजिक विकास, समाजिक प्रगति तथा समाज का संगठन संभव नहीं है। यह दलदल है क्योंकि संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने अनुशीलन समिति तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में कार्य करते हुए यह अनुभव किया कि देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले युवकों को एक ऐसा संगठन होना चाहिए जिसके कार्यपद्धति का आधार राष्ट्रहित सर्वोपरि होगा और उसी विश्वव्यापी संगठन का नाम है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। यह राष्ट्र के लिए, राष्ट्र में तथा राष्ट्रीय दृष्टिकोण के लोगों का संगठन हीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है और हमारा लक्ष्य भारत को ‘परम वैभवं नेतुमेतत स्वराष्ट्रम’ है। अत: हमें राजनीति से लेना-देना नहीं है। यही कारण बना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध का। यदि हम नेहरू की बातों को मान लेते तो हम ठीक थे। नहीं मानते तो गांधी के हत्यारे हो गए। बस क्या था संघ पर प्रतिबंध लगा? भारतीय मीडिया का स्वरूप आजादी पूर्व तथा आजादी बाद भी अराष्ट्रीय रहा है। श्री गुरूजी ने यह अनुभव किया कि राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से ओत-प्रोत एक ऐसी संवाद समिति की आवश्यकता है जो भारतीय भाषाओं में समाचारों को निष्पक्ष एवं तटस्थ भाव से प्रेषित कर सके। श्री गुरूजी ने संघ से प्रतिबंध हटने के बाद विभिन्न राज्यों से अनुभवी एवं प्रमुख प्रचारकों को हिन्दुस्थान समाचार हेतु दिया। जिसमें से बापूराव लेले, नारायण राव तर्टे, बालेश्वर अग्रवाल के साथ ही अशोक पंडित भी थे। अपने अल्प समय में ही हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी ने दूरमुद्रकों के द्वारा समाचार प्रेषण में जो कीर्तिमान स्थापित किया वो अपने आप में ही गौरव की बात है। इस अवसर पर सहयोग एवं सान्निध्य मिला देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी का। जिनके मन में हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के विकास की एक योजना थी। उनका मानना था कि भारतीय भाषाओं द्वारा ही भारतीय जनता को शिक्षित, जागरूक एवं संगठित किया जा सकता है और इसके आधार पर स्तंभ (हिन्दुस्थान समाचार) बने दादा साहेब आप्टे।

मैं पुन: इस बात पर बल देना चाहता हूं कि यह ‘विश्व हिंदू परिषद’ की संकल्पना आपकी है, हमारी है और उन सबकी है जो यहां उपस्थित नहीं है। यह कितनी आश्चर्य की बात है। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि दादा साहेब एक श्रेष्ठ विचारक के साथ-साथ एक कुशल समाज संगठक भी थे। आज विहिप को जो सांगठनिक स्वरूप दिखाई पड़ रहा है इसको पल्लवित-पुष्पित करने में दादा साहेब आप्टे की अपूर्व भूमिका थी।

दादा साहेब आप्टे लियो नार्दो द विंची की तरह ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे कानून के ज्ञाता थे, पत्रकार थे, लेखक थे, वक्ता थे, चित्रकार थे, यायावर थे, घुमक्कड़, वेदों तथा उपनिषदों के ज्ञाता भी थे। लेकिन वे किसी में लिप्त नहीं थे। वे उन सबों से ऊपर होकर भ्ी नीचे थे। यह पढ़कर पाठकों को आश्चर्य होगा कि वे एक माता तथा पिता भी थे। लेकिन वे सामान्य जनों की भांति नहीं बल्कि धरती माता की भांति थे। उन्होंने अपने आपको विस्तृत किया था। उनके लिए संपूर्ण हिंदू समाज सगा था। उस समाज के उत्थान के लिए उन्होंने विवाह तथा गृहस्थी को त्यागा।

श्री दादा साहेब आप्टे एक कुशल संगठक भी थे। इसका प्रमुख कारण यह था कि गुजरात से मुंबई, मुंबई से कर्नाटक के साथ ही सुदूर ग्रामांचलों में यह अनुभव हुआ कि अपना यह हिंदू समाज असंगठित क्यों हैं? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से विहिप नाम जिसके संगठन की स्थापना मुंबई के सांदीपनी आश्रम से 28 अगस्त, 1964 को की गई। उसमें मुख्‍य रूप से द्वारकापीठ के शंकराचार्य, पूजनीय अभिनव सच्चिदानंद, नामधारी पंथ के गुरू प्रताप जी, कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी, संत तुकड़ो जी महाराज, मास्टर तारा सिंह, हनुमान प्रसाद पोद्दार, स्वामी चिंमयानंद, सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर, जैन संत सुशील मुनि, परमपूज्य दलाईलामा, स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी महाराज, श्री अय्यर के साथ ही गोरक्षा पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ जी प्रमुख रूप से थे।

दादा साहेब आप्टे ने अथक परिश्रम करके 22 देशों में विहिप को स्थापित किया। गौरवपूर्ण, अद्भूत वक्तृत्व क्षमता तथा निष्काम कर्मयोगी दादा साहेब जी ने कहा था, मैं तो निमित्त मात्र हूं। एक संदेशवाहक अथवा सर्वसाधारण की भाषा में एक संदेशवाहक की भूमिका मात्र निभा रहा हूं और मैं यही सहर्ष करना भी चाहता हूं। अत: हिन्दुस्थान समाचार समिति एक निजी समिति नहीं होगी बल्कि यह सहकारी संवाद समिति होगी। बिहार प्रांत के संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री बालेश्वर अग्रवाल को इस हेतु नियुक्त किया गया था कि श्री आप्टे जी की अनुपस्थिति में सुचारू रूप से कार्य का संचालन हो सके। पूरी जिम्मेदारी से मुक्त होकर दादा साहेब हिन्दुस्थान समाचार के बतौर प्रतिनिधि बनकर पूर्वी, जर्मनी तथा लंदन की यात्रा की। इसी कालखंड में प्रथम प्रेस आयोग ने अनुशंसा की कि देश की तीन समाचार एजेंसियों को एक साथ करके समाचार एजेंसी में परिवर्तन कर दिया जाए। प्रेस आयोग के इन सिफारिशों को ध्यान न देकर हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी के प्रबंधकों ने यह निर्णय लिया कि हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी एक सहकारी समिति में बदल दिया जाए। 1957 में ‘हिन्दुस्थान समाचार’ एजेंसी एक सहकारी संवाद समिति बन गयी। इसके फलस्वरूप भारतीय भाषाओं के प्रति श्रद्धा तथा भक्ति ही नहीं बल्कि पूर्ण आस्था रखने वाले महाजनों सर्वश्री घनश्याम गुप्त, आर. आर. दिवाकर, डॉ. हरेकृष्ण मेहताब, हरिश्चंद्र माथुर, डॉ. रामसुमन सिंह, डॉ. सरोजिनी महिषी, डॉ. जयसुखलाल हाथी, श्री गंगाशरण सिंह आदि दिग्गजों का शुभाशिर्वाद प्राप्त हुआ। समिति दिन पर दिन बढ़ने लगी। उनका मूल मंत्र था –

हिंदवा सोदरा सर्वे, न हिंदू पतितो भवेत।

मम दीक्षा हिंदू रक्षा, मम मंत्री समानता॥

द्वितीय विश्व हिंदू सम्मेलन में सारे पतित पद दलित हिंदू समाज को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य श्री गुरूजी की प्रेरणा से दादा साहेब आप्टे ने किया और हिंदू समाज जाग उठा।

स्वयंसेवक बंधुओं को यह याद ही होगा-पूणे का ‘कौशिकाश्रम’ यह वह स्थान है जहां हमारे वरिष्ठ वृध्द प्रचारकों का निवास हैं यही रज्जू भैया ने स्वर्ग सिधारे। इसको न्यास बनाकर भेंट की दादा साहेब आप्टे ने। लगभग दो दशक तक राष्ट्र की आराधना अविरत भाव से करने वाले पथिक ने अनुभव किया कि अब इस हाड़-मांस के शरीर से अधिक श्रम करना संभव नहीं है तो क्यों न हमें श्री रज्जू भैया के शब्दों में – ‘तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित’ करके 10 अक्टूबर, 1985 को स्वर्ग सिधार गए। आज दादा साहेब आप्टे हम सबके बीच नहीं है पर उनके जीवन-दर्शन करोड़ों जनता एवं स्वयंसेवकों के लिए आदर्श हैं।

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1 Comment on "दादा साहेब आप्टे – व्यक्तित्व और कृतित्व"

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डॉ. मधुसूदन
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जब दादा साहब आपटे पहली बार अमरीका पधारे, और हवाई अड्डे पर, उनकी पेटी उठाने के लिए, अधिकार वाणी से उन्होंने कहा, तो तुरंत एक आप्त जन की आज्ञा जैसे अपनेपन का आभास हुआ|
उनका प्रेरणा दाई बौद्धिक भी कार्यकर्ताओं को एक सुगंधी फूल की भाँती आह्लादित और प्रभावित करता|
और उनका ऋषि तुल्य व्यक्तित्व और व्यवहार सभीके लिए बहुत प्रेरणादाई रहा करता था| आज उनकी स्मृतियां फिरसे जागृत हो गयी|

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