लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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सुरेश हिन्दुस्थानी
देश की राजधानी दिल्ली में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद राजनीतिक दलों में सक्रियता आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जहां भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने की तैयारी कर रही है, वहीं आम आदमी पार्टी फिर से दिल्ली में पिछले चुनावों जैसा गणित बनाने की ओर अग्रसर होती दिखाई दे रही है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस के नेता बयान कुछ भी दें, लेकिन उसके बड़े बड़े नेताओं की भी चुनाव लडऩे की हिम्मत नहीं हो रही। दिल्ली में अभूतपूर्व विकास के दावे करने वाली पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का चुनाव मैदान में आने के लिए अरुचि दिखाना इसका साक्षात उदाहरण है। ऐसे में कहा जा सकता है कि दिल्ली के सिंहासन को प्राप्त करने के लिए जहां भाजपा उत्साह से परिपूर्ण है, वहीं आम आदमी पार्टी फिर खेल बिगाडऩे की मुद्रा में दिखाई दे रही है।
भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में नरेंद्र मोदी का उदय निश्चित रूप से देश की एक परिवर्तनकारी घटना है। जनमानस ने उन्हें बदलाव का वाहक माना और सकारात्मक प्रतिसाद भी दिया। कहीं न कहीं उन्होंने भारतीय जनमानस को उम्मीदों के पंख दिये। संप्रग सरकार से उत्पन्न जनाक्रोश को जिस खूबसूरती से उन्होंने अपनी ताकत बनाया वह उनके राजनैतिक कौशल का ही पर्याय है। अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम से उपजे हालातों ने उन्हें अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का मौका जरूर दिया। एक के एक बाद सफलताएं उनके खाते में जुड़ती चली गयी। लोकसभा चुनाव से पहले चार राज्यों में से तीन पर जहां भाजपा की सरकारें बनी, वहीं लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे राज्यों में वे सरकार बनाने में सफल रहे।
अब जब दिल्ली विधानसभा चुनाव का बिगुल एक बार फिर से बज उठा है, तो ऐसे में दिल्ली में किसकी सरकार बनेगी यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। चार राज्यों के साथ जब दिल्ली में चुनाव हुए तो वहां भारतीय जनता पार्टी को सीटों के हिसाब से पहला स्थान प्राप्त हुआ, लेकिन नई नवेली आम आदमी पार्टी ने २८ सीटें जीतकर सबको चौंका दिया। आम आदमी पार्टी के केजरीवाल ने कांगे्रस के साथ बेमेल समझौता करके सरकार बनाई, कांगे्रस ने केजरीवाल को फ्री हैण्ड भी दे दिया, लेकिन केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के साथ धोखा ही दिया और मात्र ४९ दिन में दिल्ली की सत्ता को त्याग दिया। अब जब यहां फिर चुनाव होने हैं तब क्या एक बार फिर से दिल्ली की जनता आप को मौका देगी या फिर भाजपा को। जहां तक आप का प्रश्न है तो दिल्ली की जनता उन्हें एक बार मौका दे चुकी है, लेकिन जितने दिन यह सरकार रही, उतने दिनों तक एक नया ड्रामा खड़ा करती रही। लंबे लंबे वायदे होते रहे लेकिन जब काम करने का समय आया तो आपकी सरकार पीछे हटती चली गयी और ठीकरा दूसरों पर फोड़ती नजर आई।
चुनावों के लिए भाजपा, आप और कांग्रेस तीनों ही दल सरकार बनाने के दावे करते दिखाई दे रहे हैं। अब सवाल यह भी आता है कि क्या दिल्ली फिर से उसी राजनीतिक राह का अनुसरण कर रही है, जो पूर्व के विधानसभा के परिणामों में बने थे। अरविन्द केजरीवाल का खेल तो कुछ इसी प्रकार का दिखाई दे रहा है, वे किसी भी मामले में पीछे नहीं रहना चाहते। उनके फिर से वैसे ही लुभावने भाषण दिल्ली में सुनाई देने लगे हैं। लगता है इस बार भी केजरीवाल दिल्ली में त्रिशंकु के हालात पैदा करने की राजनीति कर रहे हैं। ऐसे में जनता को भी सावधान होने की जरूरत है, क्योंकि एक साल खराब होने के बाद जनता को स्थिर और मजबूत सरकार मिलना चाहिए, जो बहुत ही जरूरी है।
लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी राजग सरकार के कामों का विश्लेषण करें तो यह सरकार कहीं भी असफल नहीं हुई चाहे वह भ्रष्टाचार का मामला हो या फिर स्वार्थी राजनीति का। सत्ता संभालते ही मोदी का जादू देश में सिर चढ़कर बोलने लगा। चाहे मेडसिन स्कवॉयर गार्डन न्यूयार्क हो या सिडनी एलफोन्से एरिना में हुई रैलियां हों। शायद ही किसी एक व्यक्ति ने सारे साल ऐसा प्रभाव छोड़ा होगा जैसा कि नरेन्द्र मोदी ने। 2014 में लोगों ने जानना चाहा कि वे क्या कह रहे हैं और क्या करना चाहते हैं। कांग्रेस का नाम तो इसलिए भी नहीं लिया जा सकता है कि जितने भी चुनाव हुए हैं, उन सब में कांग्रेस बुरी तरह से पराजित हुई है। ऐसे में दिल्ली में कांग्रेस सरकार बना पायेगी यह कहना बड़ा मुश्किल है। दिल्ली चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच माना जा रहा है। पिछले चुनाव के बाद दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार का गठन किया था और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि मई 2014 में संपन्न लोकसभा चुनावों में तस्वीर बिल्कुल पलट गई थी जब भाजपा ने दिल्ली में क्लीन स्वीप कर सभी सातों लोकसभा सीटें जीत ली थीं। इस परिणाम को विधानसभा के हिसाब से देखा जाए तो दिल्ली के ६० विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा ने सर्वाणिक मत प्राप्त किए। कहना तर्कसंगत ही होगा कि आज भी पूरे देश में भाजपा के प्रति वैसा ही वातावरण है जो लोकसभा चुनावों के प्रति था, क्योंकि लोकसभा चुनावों के बाद अभी तक हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों में भाजपा ने चौंकाने वाले परिणाम ही दिए हैं। ऐसे में अब चुनाव की घोषणा के बाद दिल्ली को लेकर भाजपा का उत्साह चरम पर है।
सच कहा जाए तो दिल्ली का चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक तरह से परीक्षा होगी। अब तक के कार्यकाल में हुए कामों की समीक्षा के तौर पर इस चुनाव को देखा जा रहा है। जनता ने उनके कामों को कितना सराहा है, इसकी मुहर इस चुनाव में लगने वाली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को रामलीला मैदान से चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत करते हुए बिना नाम लिये ही आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल पर प्रहारों से भाजपा की रणनीति का संकेत दे दिया है तो पिछले चुनाव में बुरी तरह पराजय से पस्त कांग्रेस भी अजय माकन को आगे कर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाना चाह रही है। जहां तक आप का सवाल है तो यह वह खुद मान चुके हैं कि 49 दिन बाद इस्तीफा दे देना गलती थी और पुन: सत्ता में आने का मौका मिलने पर किसी भी हाल में पांच साल तक सत्ता नहीं छोड़ेंगे। स्वाभाविक है उन्हें दिल्ली के मतदाताओं को इस सवाल का जवाब देना पड़ेगा कि ऐसी गलती करने वाले को दोबारा मौका क्यों दिया जाए? सवाल यह भी है कि उस मध्य वर्ग में आप की लोकप्रियता कितनी कायम है जिसके बल पर केजरीवाल उम्मीद की नई किरण बनकर उभरे थे। पस्तहाल कांग्रेस भी अगर पूरी ताकत से दो-दो हाथ करने के इरादे से चुनाव मैदान में उतरती है तो उसका भी सबसे ज्यादा नुकसान आप को ही होने के आसार हैं। दिल्ली छावनी बोर्ड के चुनाव परिणामों को अगर विधानसभा चुनाव परिणामों का संकेतक मानें तो भाजपा तो सबसे आगे है ही।

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