लेखक परिचय

देवेन्द्र कुमार

देवेन्द्र कुमार

स्वतंत्र पत्रकार

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देवेन्द्र कुमार

jharkhand

एक लम्बा संघर्ष, अनगिनत कुर्बानियां और जनान्दोलन की कोख से उपजा झारखंड अपने जन्म के साथ ही राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो गया । छोटे छोटे दल और निर्दलियों की केन्द्रीय भूमिका हमेशा बनी रही । सच कहा जाय तो वे किंग मेकर की भूमिका में बने रहें । मंत्री – मुख्यमंत्री पद के लिए अनवरत जोड़ – तोड़ चलता रहा और इस घातक प्रवृति ने प्रशासनिक व्यवस्था को पुरी तरह पंगु बना दिया । सरकार बनने के पहले ही बिखरने के कयास लगाये लाने लगें । झारखड का पहला बजट तो सरप्लस बजट था पर बाद में बजटीय घाटा लगातार बढ़ता ही गया ।

जिन सिन्द्धातों और मूल्यों को लेकर झारखंड आन्दोलन चला था ,शहादतें दी गर्इ थी ,उसे जमींदोज कर दिया गया । राजनीतिक सत्ता की स्थिति अली बाबा चालिस चोर के सदृष्य हो गया । जो भी सत्ता में आया उसकी गिद्ध दृष्टि राज्य के अपार संसाघनों के लूट पर ही टिकी रही ।

यहां यह याद रखने की जरुरत र्है कि यह पहली सरकार है, जिसमें छोटे -छोटे दलों और निर्दलियों की भूमिका नहीं रही । हर सरकार में बगैर कोर्इ सैन्द्धातिक प्रतिबद्धता के रोटी सेंकता आजसू आज सता के बाहर है। निर्दलियों की फौज सत्ता से दूर है। उनमें तड़प है -बेचैनी है और यहीं से शुरु होता है विशेष राज्य के दर्जे की मांग की राजनीति । आज तक आजसू बगैर किसी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के हर सरकार में भागीदार होकर राज्य के संसाघनों के बल पर अपना विस्तार करता रहा करता रहा पर इस बाहर होने पर उसे अपना बजूद ही डुबता नजर आया ।

अब वह विशेष राज्य के दर्जे का राग अलाप कर अपनी प्रासंगिकता बनाये रखना चाहता है । अब चूंकि मुद्दा उठाने का श्रेय आजसू न ले जाय इसलिए झारखंड मूकित मोर्चा समेत दूसरे दल भी इसका राग अलापने लगें ।

इसी क्रम में दिसोम गुरु शिबू सोरेन ने प्रघानमंत्री मनमोहन सिंह से बीस मिनट की मुलाकात भी कर ली । उन्हे अपना मांग पत्र भी सौंप दिया । बाहर शिबू सोरेन ने मीडियाकर्मियों को बतलाया कि प्रघानमंत्री ने झारखंड के साथ नाइंसाफी नहीं होने देने का आश्वासन दे दिया है । अब मात्र बीस मिनट में मौनव्रतधारी मनमोहन ने नाइंसाफी नहीं होने का आश्वासन दे अपना व्रत तोड़ दिया तो इसे गुरु जी का चमत्कार ही कहा जायेगा । जो मनमोहन अपने दो कार्यकाल में स्वेच्छा से दो शब्द नहीं बोल सकें उस मनमोहन ने अपनी जुबान खोल दी तो इसे झारख्ंड का सौभाग्य ही तो कहा जायेगा । हां , एक बात हो सकती है कि गुरु जी ने डा. मनमोहन सिंह को समझाया होगा कि माना कि झारखंड राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक अक्षमता का दूसरा नाम हो चला है पर कम तो दिल्ली की सरकार भी नहीं है। हमारे पास मधु कोड़ा है तो आपके पास तो मधु कोड़ों की पुरी फौज ही खड़ी है। आप अपने तमाम अक्रिय र्इमानदारी और चुप्पी की विरासत के मधु कोड़ों की फौज के सरदार है, हमारा दामन तो फिर भी आपसे कुछ ज्यादा ही उजला है, भले ही रीन की सफेदी नहीं हो, तो फिर हमारी मांग अनसूनी करने की जुर्रत आप कैसे कर सकते ।

अब सवाल विशेष राज्य के दर्जे के औचित्य का । क्या यह माना जाय कि विशेष राज्य का दर्जा मिलते ही झारखंड की राजनीति में व्याप्त राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक अक्षमता दूर हो जायेगी । किंग मेकर के रुप में खड़े व्यकितत्व केनिद्रत ये छोटे छोटे दल और निर्दलियों की फौज जन राजनीति की हिस्सा बन जायेंगी । राज्य की मुख्य समस्या राजनीतिक अस्थिरता का समाधान हो जायेगा ? राजनेताओं में जन समस्याओं के सामाधान की अंत:दृष्टि पैदा हो जायेगी । राज्य को सक्षम ,कर्मठ और र्इमानदार नेतृत्व मिल जायेगा ? क्या यह भी विशेष राज्य के दर्जे के साथ ही झारखंड को केन्द्र की ओर से सौगात होगा ? जबकि सल्लतनते- हिंद खुद ही इस रोग से दो -चार है।

विशेष राज्य के दर्ज की मांग के पैमाने को छोड़ भी दे तो हमें यह तो देखना ही होगा कि अपने वर्तमान संसाधनों के बुते हमने हासिल क्या किया है ।हममें खुद की सकारात्मकता कितनी है ? हमारी खलबली का कारण पड़ोसी राज्य बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा विशेष राज्य की निरन्तर मांग और केन्द्र के द्वारा एक हद तक इसके प्रति सकारात्मक रुख ही तो है । पर हम यह भूल रहे हैं कि नीतीश कुमार के पूर्व बिहार के हालात क्या थें ? तब वहां राजनीतिक स्थिरता तो थी ,पर राजनीतिक संवेदनशीलता खो गया था । पूरे राज्य में दंबग गिरोहों की सरकार चलती थी । राज्य नाम की सता खुद ही फरार नजर आती थी । अपहरण राज्य का सबसे फलता -फुलता उधोग बन गया था । आज आलोचक कहते है कि नीतीश कुमार केन्द्र के पैसे और केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रमों से अपनी उपलबिधयां गिना रहा है ,बात सही है पर केन्द्र का पैसा तब भी मिलता था और केन्द्र के कार्यक्र्रम तब भी चलते ही थे । बड़ा सबाल यह है कि तब का राजनीतिक प्रबंधन कैसा था ? केन्द्र पैसे खैरात में नहीं देता । यह राज्यों का संवैधानिक अधिकार है । आज जितनी राशि केन्द्र से मिल रहा है क्या हम उसका उपयोग कर पा रहे है। हमें बार बार केन्द्र के पैसों को सरेंडर करना क्यों पड़ रहा है और जो पैसे खर्च हो रहे है क्या वह राशि जमीन तक पहुंच भी रही है । यदि नहींतो विशेष राज्य के दर्जे के कारण मिलने वाली नब्बे फीसदी राशि का नब्बे फीसदी हिस्सा भष्ट्र राजनेता, नौकरशाह,दलाल – ठेकेदारों की तिकड़ी को भेंट चढ़ जायेगा । क्या हमने इसकी सुरक्षा कवच बना ली है। यदि नहीं तो हमें अभी इस पर और काम करने की जरुरत है । और तब ही हम इसके बाजीब हकदार होगें । हमें अपने आप को बदलना होगा । विकास की दृष्टि अपनानी होगी ,सकारात्मकता लानी होगी। और विकास सिर्फ शहरी आबादी और सड़कों का जाल का ही नहीं। यह जो विशाल जनजातीय आबादी और ग्रामीण समाज है, भूमिहीन ,विस्थापित ,खेतीहर -दिहाड़ी मजदूर है, हमें इनकी तस्वीर बदलनी होगी । विकास का पहला पैमाना मानवीय विकास का है । राजनीतिक सामाजिक जीवन में भष्ट्राचार, विस्थापन, कुपोषण ,अशिक्षा, बेरोजगारी आदि के विरुद्ध संकल्प लेना होगा । और अपने बुते अपनी एक सकारात्मक तस्वीर बनानी होगी । तब हमारी आवाज में दृढ़ता होगी ,बेबसी का आलम नहीं ।

 

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