लेखक परिचय

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

'स्‍वतंत्रता संग्राम और संघ' विषय पर डी.लिट्. कर रहे लेखक पत्रकार, फिल्म समीक्षक, समाजसेवी तथा हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक हैं।

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– डॉ. मनोज चतुर्वेदी

गांव की चौपालों पर बैठा हुआ नौजवान, किसान, कुंभकार, ग्वाला हो या विश्वविद्यालयों में एम. फिल तथा पी-एच-डी. किया हुआ नौजवान हो। सबके मन में एक ही पीड़ा है कि भारतीय समाज को कैसे बदला जाए? इस पर लंबे-चौड़े शोध पत्र तैयार करते हैं। कुल मिलाकर सबका यही कहना होता है कि भारतीय समाज में विकास के अवरोधकों में धर्मांधता, कर्मकांडी मनोवृत्ति, सांप्रदायिकता, धर्मांध इस्लामिपंथ खाप पंचायतों का कहर, जातिवाद क्षेत्रवाद, राष्ट्रवाद, लिंगभेद, अशिक्षा, बेरोजगारी, दहेज प्रथा, अपराध, भ्रष्ट राजनीतिज्ञ, निरंकुश नौकर शाह, दलाल पुलिस अधिकारी, मूल्यविहीन शिक्षा, नारी शिक्षा का अभाव, घुसखोरी, कन्या भ्रूण हत्या, निवेश का अभाव, मानसिक दिवालियापन, भ्रष्ट चुनाव प्रणाली इत्यादि हजारों प्रकार की समस्याओं का जिक्र किया करते हैं। इतना सबकुछ होने के बावजूद समाज कछुआ चाल से बदल तो रहा है, लेकिन सामाजिक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन की उम्मीद बेमानी है तो नौजवान, वृद्ध और बुध्दिधर्मी जन क्या करें? यदि उपरोक्त समस्याओं पर हम दृष्टि डालते है तो हमें लगता है कि समस्त क्षेत्रों में परिवर्तन का सूत्रपात करना होगा। जिसके लिए रचनात्मक, बौध्दिक तथा आंदोलनात्मक माध्यमों के द्वारा ही इन समस्त क्षेत्रों में परिवर्तन किया जा सकता है। सामाजिक क्षेत्रों में द्रुतगति से परिवर्तन के लिए सबसे पहले जरूरी है। शिक्षा पद्धति में आमूलाग्र परिवर्तन। क्योंकि शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन के किसी भी क्षेत्र में परिवर्तन नहीं हो सकता है। हमें एक ऐसी शिक्षा पद्धति का विकास करना होगा। जिसमें अमीर-से-अमीर तथा गरीब-से-गरीब का बालक भी सुदामा-कृष्ण की तरह एक ही स्थान पर शिक्षा ग्रहण करें तथा उनके मन एवं मस्तिष्क में राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ ही साथ वैश्विक मानवता के प्रति सकारात्मक दृष्टि का विकास हो सके। टाट-पट्टी पर बैठा शिशु तर्क एवं प्रयोगाधारित हो। यदि कोई शिक्षक दो और दो चार कहता है तो उसके मन में चार नहीं विचार आए छः तथा आठ क्यों? 6 तथा 8 क्यों? यदि शिक्षक कहता है। इस देश की आजादी में महात्मा गांधी का अमूल्य योगदान रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तो कहीं स्थान ही नहीं है। इस प्रकार बच्चों में तर्क, चिंतन तथा शोध केंद्रित विचारों का रोपण किया जाए कि गांधी का इस देश के स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं था। यदि था तो किस प्रकार था। यदि भारत में कुछ राष्ट्रीय संगठन हैं तो ये कैसे राष्ट्रीय संगठन हैं? इस प्रकार के तार्किक एवं प्रायोगिक विचारों का विकास करके एक स्वस्थ एवं सशक्त भारत एवं समाज का निर्माण किया जा सकता है। बच्चों में इस प्रकार के विचारों का रोपण किया जाए कि वे राष्ट्र के साथ ही क्यों प्रेम करें? विश्व के प्रति क्यों नहीं? उसमें भी हमारे राष्ट्रप्रेम का आधार क्या है? इस प्रकार की शिक्षा में तार्किक-चिंतन तथा उदारवादी दृष्टिकोण के द्वारा पुष्पित-पल्लवित नौजवान समाज में सकारात्मक संदेश दे सकते हैं। बच्चों के मन में जब तक शिक्षक यह कहता है कि भारत में 28 राज्य तथा 7 केंद्र शासित प्रदेश हैं। ये 50 तथा 20 क्यों नहीं हो सकते? विश्व में भारत ही श्रेष्ठ है तथा था भी तो तर्क करें कि भारत विश्व में श्रेष्ठ हैं तो कैसे तथा नहीं तो क्यों? इस प्रकार के विचारों में तर्कों का समावेश करना जरूरी है। यदि कोई कहता है कि हिंदू धर्म विश्व का सर्वश्रेष्ठ धर्म है तथा इस्लाम, इसाईयत निम्न धर्म हैं तथा वे भारत में माइग्रेट करके आए है तो बच्चे पूछे की आपके तर्क का आधार क्या है? कैसे हिंदू धर्म श्रेष्ठ है तथा इस्लाम-इसाईयत माइग्रेट करके आए हैं। कभी राजीव गांधी ने कहा था कि केंद्र से भेजे जाने वाले सरकारी धनों का 15 प्रतिशत ही जनता उपयोग कर पाती है फिर राजग सरकार के प्रधानमंत्री श्री अटल विहारी वाजपेयी ने कलकता की सभा में कहा था कि मात्र 10 प्रतिशत ही पहुंच पा रहा है। ये 90 प्रतिशत कहां-कहां जा रहा हैं। इस तरह के तार्किक विचारों तथा मूल्यपरक, सेवा, शुचिता वाली शिक्षा जो गरीब-अमीर में भेदभाव, गरीब रहित हो तो कुछ-कुछ परिवर्तन हो सकता है। सहनशीलता का होना मानव के लिए जरूरी होता है। इसका मतलब यह थोड़े है कि हम हर प्रकार के सामाजिक जीवन में होने वाले अन्याय-अत्याचार को सहते जाएं। मुझे यदि यकीन है कि 80 के उत्तरार्ध्द-पूर्वार्ध्द में घुसखोरी 5 प्रतिशत थी लेकिन 2010 में हर बच्चा-बच्चा घुसखोरी से परिचित है। सरकारी कार्यालयों में बिना सलामी के फाइलों का बढ़ना संभव ही नहीं है। वे चाहें भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा, शिवसेना से जुड़े अधिकारी-कर्मचारी हों। वे लंबी-चौड़ी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, लोहिया के समाजवाद, अंबेडकर के दलितवाद तथा गांधी के त्याग-तप की बातें तो करेंगे लेकिन घुस लेने में सबसे आगे वाली पंक्ति में नजर आएंगे। बस यही बीमारी हमारे बच्चों के शैशव काल से ही बैठ जाती है कि देखो बेटे समाज में सबकुछ चलता है। यह समाज बदलने वाला नहीं है। जाति तथा क्षेत्र के नाम पर वोट देते हुए हम उन राजनीतिक दलों के एजेंडे को भूल जाते हैं कि यह प्रत्याशी समाज के लिए भास्मासुर तो नहीं है। बिहार-उत्तर प्रदेश ही क्यों? देश के भिन्न-भिन्न भागों में जातिवादी दलों एवं क्षेत्रवादियों की भरमार है। यहीं पर राष्ट्रीयता का पतन हो जाता है।

* लेखक, पत्रकार, कॅरियर लेखक, फिल्म समीक्षक, समाजसेवी, हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक तथा ‘आधुनिक सभ्यता और महात्मा गांधी’ पर डी. लिट् कर रहे हैं।

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1 Comment on "विकास के अनंत अवरोधक"

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आर. सिंह
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तर्क तो अच्छा है. आमूल परिवर्तन जरूरी है पर आगाज कहाँ से हो.?पहले कौन इमानदार बने?कौन सबसे पहले उन बुरायीओं से ऊपर उठे जिनका जिक्र आपने यहाँ किया है?

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