परिचर्चा : अयोध्या मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ का निर्णय |
अयोध्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के निर्णय के अनुसार, अयोध्या में विवादास्पद स्थल भगवान राम का जन्म स्थान है। पीठ ने सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा लखनऊ बेंच ने 2:1 से खारिज कर दिया है। विवादित जमीन के 3 हिस्से किये गए हैं। जिसे तीनों पक्षकारों में अलग-अलग बांट दिया गया है। विवादित जमीन का केंद्रीय हिस्सा जहां मू्र्तियां रखीं थीं, उसे रामलला का जन्मस्थान मानते हुए पूजा के लिए दिया गया है।
इस निर्णय से पिछले 60 साल के विवाद के खत्म होने की उम्मीद लगाई जा रही है। फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय की विशेष लखनऊ पीठ ने सुनाया है। न्यायिक पीठ के तीन अनुभवी न्यायाधीश, न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा, न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल और न्यायाधीश सिबघट उल्लाह खान हैं। इस मामले में विवादित भूमि के तीन दावेदार थे। सुन्नी वक्फ बोर्ड, हिंदू महासभा और निर्मोही अखाड़ा।
फैसले के प्रमुख अंश इस प्रकार हैं-
1. विवादित जमीन 3 हिस्सों में बांटी गयी।
2. सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया गया है। वक्फ बोर्ड का दावा 2:1 से खरिज हुआ है।
3. तीनों जजों ने माना है कि विवादित स्थल भगवान राम की जन्मभूमि है।
4. विवादित जमीन के मुख्य केंद्रीय हिस्से को भगवान राम का जन्मस्थान मानते हुए रामलला की पूजा के लिए दिया गया है।
5.विवादास्पद इमारत बाबर द्वारा बनाई गई थी। इसके निर्माण का साल निश्चित नहीं है लेकिन इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ इसे बनाया गया था। इसलिए इसका चरित्र मस्जिद का नहीं हो सकता है।
6. विवादास्पद ढांचे का निर्माण पुराने ढांचे के स्थान पर उसे ही तोड़कर किया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने प्रमाणित किया है कि वहां एक विशाल हिन्दू धार्मिक ढांचा था।
7. विवादित जमीन का बाहरी हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया है जबकि तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया गया है।
8. न्यायिक फैसले पर अगले 3 महीनों के अंदर कार्यवाही पूरी की जाएगी।
अयोध्या विवाद पर हाई कोर्ट के फैसले पर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कहा है कि वह इस मामले को खत्म नहीं कर रहे हैं और अदालत के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगें. वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने पत्रकारों को बताया कि विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटे जाने के फैसले के खिलाफ अपील की जाएगी क्योंकि यह फार्मूला वक्फ बोर्ड को मंजूर नहीं है. मुस्लिम नेता असादुद्दीन उवैशी का कहना है कि उन्हें इस बात का अफसोस है कि अदालत ने ठोस सबूतों को भी नहीं माना है. अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने भी सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है. उसका कहना है कि रामजन्मभूमि को तीन हिस्सों में बांटे जाने के फैसले को उन्होंने चुनौती देने का फैसला लिया है.
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J P Sharma Says:
October 29th, 2010 at 11:09 pm
“हम लोगों ने यही सोच कर ‘प्रवक्ता’ शुरू किया था कि मुख्यधारा के मीडिया से ओझल हो रहे जनसरोकारों से जुड़ी खबरों व मुद्दों को प्रमुखता से प्रकाशित करें और उस पर गंभीर विमर्श हो।”प्रवक्ता परिवार का यह निर्णय प्रशंसनीय है. विशेषतया इस लिए की राष्ट्रीय मीडिया पर दो चार अपवाद स्वरुप पत्र पत्रिकाओं को छोड़ कर लगभग सभी पर राष्ट्रीयता विरोधी लोगों का अधिकार है तथा वे अपना दुष्प्रचार निरंतर बेखटके करते रहते हैं. बहुत हर्ष का विषय है की प्रवक्ता ने इतने थोडे समय में इतनी लोकप्रियता अर्जित कर ली .आप सब को हार्दिक शुभ कामनाएं.
प्रवक्ता.कॉम से मेरा परिचय हुए एक साल भी नहीं हुआ.इसी बीच में मैं प्रवक्ता का नियमित पाठक बन गया हूँ और यदा कदा विवश होने पर टिपण्णी भी कर देता हूँ.
यदि इसे आप मेरी अनाधिकार चेष्टा न समझें तो मैं निवेदन करना चाहूँगा की प्रवक्ता को अपने घोषित उद्देश्यों से हट कर राष्ट्रीयता विरोधी प्रचार का माध्यम बनाये जाने से सतर्क रहना होगा. सेकुलरिस्टों,मिशनरिओन जिहादिओं वाम्पन्थिओन और माकाले-मानसपुत्रों के अनेक प्रचार माध्यम हमारे देश में पहले से ही अपना अपना काम कर रहे हैं.कम से कम प्रवक्ता को राष्ट्रीय विचारों की अभिव्यक्ति तथा महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रश्नों पर गंभीर चर्चा का मंच बना रहना चाहिए.
मैं देखता हूँ की प्रवक्ता पर सब से अधिक लेख जगदीश्वर चतुर्वेदीजी के छपते हैं केवल अक्तूबर के महीने में ही चतुर्वेदीजी के ४२ लेख छप चुके हैं जिनका लक्ष्य केवल वामपंथी विचारधारा को जनता के सामने रखना है. मैं यह नहीं चाहता की ऐसे लेखकों का सर्वथा बहिष्कार किया जाये पर ऐसे लेखकों को अनुचित प्रोत्साहन तो कदाचित नहीं मिलना चाहिए. सप्ताह में एक दो लेख छापें तो ठीक है पर हर अंक में दो तीन लेख छापना मेरे विचार से उचित नहीं है. वे अपना प्रचार पार्टी की पत्रिकाओं के माध्यम से करते रहें जिसकी उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता है.
yeh tippani maine pravakta dot com ke do varsh poore hone par vishesh sheershak vale lekh par dee thee. Main chahata tha the pathak mere vichr par apni raae den. lagta hai vah vishaya thoda purana hone se logon ka dhyan udhar nahin gaya. Yeh pravakta ke mahatva ka prashna hai kripaya apna vjchar avashya prakat karen.
अब यह करना है…………
["अयोध्या पर फ़ैसला आने बाद...३०.०९.२०१०]
पढ़ चुके इतिहास अब भूगोल* भी जाचेंगे,
‘इक’ को कैसे ‘तीन’ करे, ‘इन्साफ’ से नापेंगे.
साठ साल तक लड़े है, अब दम थोड़ा ले-ले,
“रहनुमा” से अब तो अपने दूर ही भागेंगे.
धर्म, माल, कुर्सी या शौहरत किसकी चाहत है?
किस-किस की क्या निय्यत थी यह ख़ुद ही आकेंगे.
चाक गरीबां है अपना और हाल भी है बेहाल,
फटे में अब दूजो के यारो हम न झाकेंगे.
तौड़-फौड़, तकरार किया, अब चैन से रहने दो,
निकट हुए मंजिल के अब तो ख़ाक न छानेगे.
*भूगोल= geoagraphy
mansoorali hashmi
http://aatm-manthan.com
In title case actually judgment has come against wakf Board hence it is expected that supreme court may remove wakf board from awarding even for remaining area currently given by High Court on gracious basis. In title case judgment is possible only in the form of Yes or no.
तिलक, गोखले, फ़िरोज़ शाह मेहता, नौरोजी, व्योमेश चन्द्र बनर्जी, बिपिन चन्द्र पाल, सभी के बारे में पढ़ा है. कांग्रेस का गठन १८८५ में हुआ था और उसके प्रथम ७५ नेताओं में तिलक जी नहीं थे. उनहोंने कांग्रेस १८९० में ज्वाइनउस घटना के ठीक १ वर्ष बाद जब की चेट्टिया के तमिल प्रश्नोत्तर नमक पर्चे से अँगरेज़ खफा हो गए थे और कांग्रेस को समाप्त करना चाहते थे. इन ७५ नेताओं को हम उदारवादी कहते है और ये नेता साल में एक बार मिलते थे और महज काफी टेबुल वार्ताएं करते थे. इनकी मांगें भी टैक्स, एक्स्चंज रेट, सिविल सर्विसेस में प्रवेश की आयु जैसी हुआ करती थी, जिनका जनता से कोई सरोकार नहीं था. फ़िरोज़ शाह मेहता जैसे लोग पूरा रेल का डिब्बा बुक करा के आते थे और कांग्रेस के आयोजकों को उनका शामियाना शानदार लगाना होता था वहीँ तिलक जी जनता के आदमी थेतिलक ने ही कांग्रेस को छुट्टियों का मनोरंजन कहा था और गोखले की निंदा भी की थी. असल में गाँधी से पहले एक तिलक ही थे जो यह समझ पाए थे की भारत की जनता को क्या चाहिए. उन्होंने ही सबसे पहले स्वराज, कांग्रेस वर्किंग कमेटी, और समाज कार्य की अवधारणा प्रस्तुत की थी. एनी बेसेंट से पूर्व ही उन्होंने होम रुल लीग स्थापित की.गाँधी से पहले वाही जनता के नेता थे. लेकिन भारत जैसे बहुलतावादी समाज में वे इसलिए असफल रहे (१९२० में मृतु) की वे क्षेत्रीय राजनीति की और अधिक झुके. महाराष्ट्र में वे बड़े नेता थे पर राष्ट्रीय स्तर पर नहीं. गाँधी से पहले आज़ादी की दिशा में जो भी ठोस पहल हुए वह गोखले या बिपिन चन्द्र पाल केद्वारा नहीं तिलक के द्वारा हुए जिन्हें अंततः १९०७ में लात मार कर बहार कर दिया गया और अंग्रेजों ने उन्हें जेल में दाल दिया. Aurobindo ghosh जो भारत के kranti kari थे जेल hone पर वह rasta chod दिया और pondincheri में (which was under the french rule ) sharan li. १९०७ से 1915 tak असल में कांग्रेस mrit rahi ise nav jeevan dene का shreya भी तिलक और एनी बेसेंट को है jinhine firozshah मेहता की mrityu के बाद तिलक को phir प्रवेश dilaya. पर isi samay ghandhi के andolanonon की saphalta ने तिलक और anya logon को वह vokalp दे दिया jiski उन्हें talash थी. ahinsa का rasta गाँधी नेrajnaitik roop से bahut soch samajh कर chuna था. iska zikra उन्होंने dakshin afrika के dinon के bare में likhte हुए kiya है. is raste से desh का vishal madhyam varg और aam जनता andolan से jud गयी. और isne अंग्रेजों का जो bhaya dilon में baitha था वह nikal दिया. आज़ादी to hamein dandi march के varshon में ही mil गयी थी kyunki जनता ने darna band kardiya था और nirbheek जनता को कोई satta ghulam नहीं bana sakti. To singh sahab mujhe poori tarah pata है कि kagres क्या थी और ise poojniya kisne banaya. rahi baat madhya kaal कि to atyachar beshak kiye गए और वह gulami भी कोई achchi नहीं थी (में vampanthi lekhakon कि isi point bar khinchayee karat hoon कि वे zabardasti ये siddh करना चाहते hain कि madhya kaal swarn youg था – mere vivhar में to swarn youg ateet में नहीं vartman में होता है.) लेकिन 1000 वर्ष purane murdon को ukhad कर vaimanasya badha कर कोई fayda नहीं है. और agar yahi करना है to सबसे पहले उस sansad bhavan को tod daliye jise centra assembly कहा jaata था और जो सबसे abhootpoorva gulami कि prateek है, India gate, gateway of india, और untamam smarakon को nasht कर dijiye जिन्हें babar से भी बड़े gundon ने banvaya था bhartiyata के har sishan को mitane के liye. Jala dijiye वे kitabein जो upniveshi itihaskaaron ने likhin thin और jinmein hamein
Sampaadak mahoday ab hindi mein typing kaise kee jaaye ?copy paste hogaa naheen, hindee tankan kaa wikalp nazar naheen aa rahaa. Kripayaa suuchit kare ki ab kyaa vyawasthaa hai ?
धन्यवाद संघियों के चश्मे का रंग बताने के लिए, पर उससे भी कुछ कुछ दिखता है, दुर्भाग्य से तुमने जो चश्मा पहना है वो टीन का है और उसमे से कछ भी नही दिखता है, बस अपने मन मे जो चित्र बना लो वही समझ आता है।
तुमने कहा कि गांधी के पहले कांग्रेस ने कोई कार्य नही किया, यह सिद्ध करता है कि तुम आजादी की लडाई के बारे मे भी कुछ नही जानते हो अन्यथा तिलक, लाला लाजपत राय, गोपाल कृष्ण गोखले, विपिन चन्द्र पाल इत्यादि का नाम भी जानते होते, अतः इस विषय मे तुम्हे कुछ बताना पूर्णतः व्यर्थ है।
अनुपम, निश्चित तौर पर गांधी की हत्या करने वाले कभी भी देश प्रेमी नही हो सकते और संघ भी यही कहता है, वस्तुतः संघ कि निर्लिप्तता तो अदालत मे भी सिद्ध हो चुकी है अगर किसी ने विचार नही किया है तो इस बिन्दु पर कि पुराना कांग्रेसी नाथूराम ने कहीं नेहरु के इशारे पर तो गांधी की हत्या नही की क्योंकि गांधी कांग्रेस भंग कर देना चाहते थे, कांग्रेस भंग करने पर नेहरु की दुकान भी बंद हो जाती।
रंगीला गांधी निश्चित तौर पर निंदनीय है, जहाँ भी आप इसकी चिंदियां उधेडे, मुज्हे भी लिंक दे, साथ खडा पाएगें, मैं सिर्फ सत्य के साथ हूं, फालतु के शर्मनिरपेक्षता के साथ नही, देश का उसी ने बेडा गर्क किया है।
अनुपम, तुम्हे अंग्रेजो के विषय मे ज्यादा इस लिए ज्ञात है क्योंकि वो तात्कालिक आघात है, अन्यथा मुगलों ने भी कम अत्याचार नही किए, रानी पद्मावती तक के सतीत्व हरण का प्रयत्न हुआ। और वैसे भी अगर एक गुण्डा दूसरे से कम खराब है तो वो वर्णेय नही हो जाता।
अहिंसा और क्षमा का पाठ हम सबने पढा है, अगर अनुपम तुम्हारे लिए संभव हो तो मुस्लिमों को पढाओ, भाजपा ने सदैव ही सर्वमान्य हल की बात कही है, अपने शासन काल मे भी, पर वोटों के चलते शेष लोगो ने उसे सफल नही होने दिया। अब फासीवादी वो लोग हैं जो अदालत के फैसले के सम्मान की बात कर रहे हैं या वो लोग जो एक समुदाय को भडकाने की कोशिस कर रहे हैं, अगर यह भी समझाना पडे तो व्यर्थ है।
Anupam, by defying the court’s ruling & trying to create agitation against it, and your comment above, can we make out of it that you guys are also new age TALIBAN.
afgani taliban & Indian left taliban bhai bhai.
वह भाई कट्टरपंथियों के भी दिमाग होता है. कितनी जल्दी आपने प्रश्न धर दिया सामने अब बताओ. अरे हट बुद्धियो यही तो कह रहा हूँ की स्वाभिमान की लड़ायी लड़नी ही थी तो उसी समय लड़ते. तब तो आसानी से हिन्दू ध्वजा के रक्षक और पता नहीं क्या क्या कहे जाने वाले राजपूत, ब्रह्मण सब उस शक्ति के सामने नतमस्तक हो गए. १७०७ तक औरंगजेब तक तो मुग़लों का हो राज था स्वाभिमान तब क्यूँ नहीं जागा. क्यूँ की बावजूद इसके की गुलामी में पड़े थे हम लड़ने में लगे रहे. खुद शिवा जी भी इसी आपसी लडाई के कारन असफल हुए और ये शिव जी के ही वंशज थे सिंधिया जिन्होंने desh को angrejon के hathon bech दिया. आज़ादी की लड़ाए हमने angrezon से उसी समय लड़ी 400 varshon baan नहीं isii liye मुझे उस लडाई par garv हैं. apke nathuram godse ने तो उसी आज़ादी की लडाई के farishte को maar dala. और हिन्दू स्वाभिमान की रक्षक hindu maha sabha ने तो भारत chodo andolan का bahishkaar तक kiya था. angrezon का साथ दिया था. Beshak yeh प्रश्न आपको खुद से poochana chahiye की आज़ादी से आप khush हैं ya नहीं. आप स्वाभिमान की लड़ाए उस समय लड़ रहे हैं jab desh को shanti, vikas और sadbhavna की zaroorat है. desh में gareebi से लड़िये, ashiksha, swasthya, chua chhoot, bimari jaise babaron से लड़ने की avashyakta है एक itihaas के gart में sam chuke raja के khilaf लड़ने की नहीं.
to jo muslim us jagah par 400 salon se namaz pad rahe hain un par advers possession nahin laagu hoga kya ?
Rahi baat santosh jha ki to unhon ne bilkul sahi kaha hai. Voh mutmayein hain ki patthar pighal nahin sakta, main bekarar hoon avaz mein asar ke liye. aisa aadmi pagal hi to kehlayega. lekin yeh pagalpan hi asal mein mera dharm hai.