लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

Posted On by &filed under विधि-कानून.


समझौते , समाधान या न्याय के नाम पर इतिहास और तथ्यों की अनदेखी करने, इतिहास और तथ्य की बलि चढ़ाने का अधिकार किसी भी व्यक्ति या संस्थान को नहीं दिया जा सकता। चाहे वह जज ही क्यों न हों।

लखनऊ बैंच ने कई मुद्दों पर इतिहास और तथ्यों की अनदेखी की है। आधुनिककाल में इतिहास और तथ्यों की अनदेखी के आधार पर कोई भी रास्ता शांति के समाधान की ओर नहीं ले जा सकता। बाबरी मसजिद के प्रसंग में जजों ने अपने फैसले में दो असंतुलित काम किए हैं पहला , जजों ने कानून को ‘दबाब की राजनीति’ का हिस्सा बना दिया है। कानून जब भी दबाब की राजनीति का हिस्सा बनकर काम करेगा कानूनी और सामाजिक संतुलन गड़बड़ाएगा।

दूसरा, खराब काम यह किया कि कानून,इतिहास,संविधान आदि के ऊपर उसने धार्मिक आस्थाओं को रखा है और इसमें भी उसने हिन्दू धार्मिक आस्थाओं के प्रति घोषित रूप में पक्षधरता का प्रदर्शन किया है। इससे भारत के गैर हिन्दुओं की न्यायपालिका के प्रति आस्थाएं कमजोर होंगी।

यह आयरनी है कि जब विवादित पक्ष इंतजार कर रहे थे कि उन्हें बाबरी मसजिद की विवादित जमीन के स्वामित्व का फैसला सुनाया जाए उस समय अदालत ने उन्हें राम जन्म के बारे में फैसला करके सुना दिया। राम कहां हुए कैसे हुए ? राम का जन्म हुआ था या नहीं ? राम मंदिर आस्था का प्रश्न है ? आदि प्रश्न कानून के दायरे में नहीं आते। इसके बारे में सर्वोच्च न्यायालय 1994 में एकबार निर्णय दे चुका है ।

तत्कालीन जस्टिस वर्मा ने कहा था कि संपत्ति के स्वामित्व का अदालत फैसला कर सकती है। लेकिन आस्था का फैसला नहीं कर सकती। राम जन्म कहां हुआ इसका फैसला अदालत नहीं कर सकती।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय लखनऊ बैंच ने राम मंदिर का फैसला राम भक्तों की आस्था के आधार पर करके कानून का एक गलत उदाहरण पेश किया है। अदालत के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट को अपने पुराने फैसले की रोशनी में दुरूस्त करना चाहिए। वरना अब अगला नम्बर काशी-मथुरा और ताजमहल का होगा। क्योंकि हिन्दू आस्थाओं के अनुसार ये तीनों स्थान हिन्दुओं के पवित्र मंदिर हैं। इस तरह की तकरीबन 3000 मसजिदों को संघ परिवार ने चिह्नित किया है ,जिन्हें वह मुसलमानों के कब्जे से मुक्त करना चाहते हैं।

दूसरी बात यह कि आस्थाओं के आधार पुराने धार्मिक विवादों को उठाना और उनमें देश को उलझाए रखना भारत के भविष्य के लिहाज से सही नहीं होगा । जजों ने आस्था और मान्यताओं के आधार पर कानूनी फैसला देकर दबाब की राजनीति के सामने कानून को बौना बनाया है। यह संदेश भी दिया है कि यदि कोई संगठन या सामाजिक समुदाय अपनी भावनाओं को बार-बार आंदोलन के माध्यम से या समूहबल के आधार पर उठाता है तो उसके दबाब में अदालतें आ सकती हैं। इतिहास और तथ्य को तिलांजलि दी जा सकती है। न्यायपालिका में यह खतरनाक रूझान का संकेत है। यह इस बात का भी संकेत है कि हमारे न्यायाधीशों के मन में पुरानी धार्मिक अस्मिता के अवशेष अभी भी सक्रिय हैं। वे इतिहास और तथ्यों की बजाय आस्था के आधार पर सोचते हैं।

विवादित अंश है –

‘Whether the disputed site is the birth place of Bhagwan Ram?

The disputed site is the birth place of Lord Ram. Place of birth is a juristic person and is a deity. It is personified as the spirit of divine worshipped as birth place of Lord Rama as a child. Spirit of divine ever remains present every where at alltimes for any one to invoke at any shape or form in accordancewith his own aspirations and it can be shapeless and formless also.’

इस फैसले का एक और विवादित अंश महत्वपूर्ण है । इसमें दो बातें हैं, पहली, यह कि बाबर ने बाबरी मसजिद के निर्माण का आदेश दिया था, लेकिन यह मसजिद कब बनी इसे निश्चित करने में जज महोदय असमर्थ रहे हैं। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा है कि इस्लाम धर्म की मान्यताओं के आधार पर यह मसजिद नहीं बनी। इसलिए इसे मस्जिद मानना सही नहीं होगा। इस प्रसंग में सबसे पहली बात तो यह है कि बाबरी मसजिद थी और सैंकड़ों सालों से ठोस शक्ल में थी। वह तो मसजिद थी वह कैसे बनी और किन नियमों के आधार पर बनी इसका फैसला आज करना संभव नहीं है। इस पर विवाद नहीं हो सकता कि वह मसजिद थी या नहीं ? इस्लाम धर्म के अनुसार उसका निर्माण हुआ था या नहीं ? यदि इसके आधार पर मसजिदों के बारे में फैसले अदालत लेने लगेंगी तो मामला गंभीर दिशा ग्रहण कर सकता है। यह कानून के दायरे बाहर है कि वह यह बताए कि बाबरी मसजिद गैर-इस्लामिक है।

जजमेंट का यह बिंदु भड़काने वाला है और इसको सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए। साथ ही यह मुसलमानों के निजी कानूनों में खुला हस्तक्षेप है। कोई इमारत मसजिद है या नहीं यह फैसला भारतीय अदालतें नहीं कर सकतीं इसका फैसला मुसलमान और उनके धार्मिक संस्थान ही कर सकते हैं। बाबरी मसजिद का स्वामित्व सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास है । मसजिद के मालिक कम से कम हिन्दू नहीं हो सकते। मंदिर के मालिक हिन्दू हो सकते हैं। मसजिद के मालिक के रूप में कानूनन वक्फ बोर्ड को ही अधिकार हैं। मुसलमान ही मसजिदों की देखभाल करते रहे हैं। विवादित अंश को पढ़ें-

Whether the disputed building was a mosque? When was it built? By whom?

The disputed building was constructed by Babar, the year is not certain but it was built against the tenets of Islam. Thus, it cannot have the character of a mosque.

इस फैसले का एक अन्य विवादास्पद हिस्सा है जिसमें यह कहा गया है कि हिन्दू मंदिरों को तोड़कर मसजिद बनायी गयी थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा जो रिपोर्ट दी गयी है उस पर भारत के अधिकांश इतिहासकार पहले ही अनेक तथ्यपूर्ण आपत्तियां उठा चुके हैं और उस रिपोर्ट की ऐतिहासिक आलोचना कर चुके हैं। अदालत ने उन सबकी अनदेखी की है और इस अनदेखी का प्राथमिक आधार है हिन्दू आस्थाओं के प्रति जजों का समर्पणभाव। वे इसके कारण अन्य इतिहासकारों की राय की अनदेखी करके इस नतीजे पर पहुँचे हैं।

सवाल उठता है क्या धार्मिक जमीन के स्वामित्व के विवादों को सैंकड़ों-हजारों साल पीछे ले जाकर सुलझाना सही कानूनी तरीका है ? क्या इससे हम भारत में एक नए विवादों को जन्म नहीं दे रहे हैं ? हाईकोर्ट के जजों ने सामाजिक भविष्य,तथ्य ,इतिहास और कानून को आधार बनाकर फैसला नहीं दिया है। जजों की नजर अतीत और आस्था पर टिकी रही है।

अतीत और आस्था के आधार पर कानून सिर्फ उनका मददगार हो सकता है जो इस समाज को अंधियारे अतीत में ले जाना चाहते हैं। आधुनिक जज जब अतीत की ओर भरोसा करके फैसले देंगे तो फैसले अन्तर्विरोधपूर्ण होंगे। अस्पष्ट होंगे। इस फैसले में कानूनी और तथ्यपूर्ण समझ कम व्यक्त होती है राजनीतिक समाधान की ओर झुकाव ज्यादा व्यक्त हुआ है। जजों को राजनीति के पीछे चलने वाले भक्त नहीं होना चाहिए।

बल्कि वे तो राजनीति के आगे चलने वाली मशाल हैं।

भारत में कोई भी इमारत ऐसी नहीं होगी जो किसी न किसी पुरानी इमारत के मलबे पर न बनी हो। सवाल यह है कि लखनऊ के आधुनिक जज हमारे सामने निर्णय की किस तरह की आधारशिला रख रहे हैं ? उनकी नजर में वर्तमान है और वे उसके संकट से निकलना भी चाहते हैं । लेकिन वर्तमान के संकट से अतीत के मार्ग और राजनीतिक शार्टकट के जरिए नहीं निकला जा सकता। अतीत का मार्ग यदि संकटमुक्त रहा होता तो हम इस विवाद का अतीत का मलबा अब तक न ढ़ो रहे होते। बाबरी मसजिद के गैर इस्लामिक अस्तित्व के सवाल को उठाकर जजों ने आग में घी डालने का काम किया है। एक अन्य चीज है जिस पर हम गौर करें ,जब मंदिर के मलबे पर बनी बाबरी मसजिद अवैध है तो मसजिद के मलबे पर बना राम मंदिर वैध कैसे हो सकता है ? यह कैसे हो सकता है मंदिर के मलबे पर इमारत बनाना अवैध है लेकिन मसजिद के मलबे पर इमारत बनाना वैध है । मलबे में भी हिन्दू पक्षधरता की जजों ने यह बेजोड़ मिसाल पेश की है। विवादित अंश देखें-

Whether the mosque was built after demolishing a Hindu temple?

The disputed structure was constructed on the site of old structure after demolition of the same. The Archaeological Survey of India has proved that the structure was a massive Hindu religious structure.

आश्चर्य की बात है कि जजों ने माना कि 22 दिसम्बर 1949 की रात को बाबरी मसजिद में राम की मूर्ति कोई रख गया। कौन रख गया ,कैसे रख गया ,इसका ब्यौरा एफआईआर में उपलब्ध है और जज भी मानते हैं बाबरी मसजिद में उपरोक्त तारीख को ये मूर्तियां रखी गयीं । सवाल यह है कि ये मूर्तियां वैध रूप में जब नहीं रखी गयीं तो फिर इन्हें हटाने का निर्णय माननीय जजों ने क्यों नहीं लिया ? जजों ने सैंकड़ों साल पुरानी बाबरी मसजिद को गैर-इस्लामिक मान लिया, लेकिन चोरी से मसजिद में जाकर राम की मूर्ति को रखे जाने को गैर हिन्दू धार्मिक हरकत नहीं माना। राम मंदिर को अवैध नहीं माना ? यह जजों की खुली हिन्दुत्ववादी पक्षधरता है।

यह खुला सच है कि बाबरी मसजिद के अंदर वाले हिस्से में या इस इमारत के अन्य किसी भी हिस्से में 22-23 दिसम्बर 1949 के पहले कोई हिन्दू मूर्ति नहीं थी। ये मूर्तियां अवैध रूप से रखी गयी थीं और भारत के संविधान,कानून और हिन्दू धर्म की समस्त धार्मिक मान्यताओं और मर्यादाओं को ताक पर रखकर रखी गयी थीं। इन मूर्तियों को किसी भी रूप में वैधता प्रदान नहीं की जा सकती। कम से कम कानून और हिन्दू धर्म की नजर में ये मूर्तियां अवैध और अधार्मिक कृत्य के दायरे में आती हैं। लेकिन जजों को इसमें कोई अधार्मिकता और अवैधता नजर ही नहीं आयी। इससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जजों का हिन्दू धर्म के लिए एक पैमाना था,और इस्लाम धर्म के लिए दूसरा पैमाना था। धर्म के प्रति अपने और पराए का भाव जजों के लिए खतरनाक बात है। पेशेवर लोगों को धर्म,नस्ल,भेदभाव आदि से ऊपर उठकर काम करना होता है। वे सबके होते हैं। जज सबके हैं। वे किसी एक जाति या धर्म के नहीं हो सकते। वैसे ही एक डाक्टर सबका होता है, एक शिक्षक या इंजीनियर सबका होता है। वह किसी एक धर्म के मानने वालों का नहीं हो सकता।

कानून की नजर में ,पेशेवर लोगों में धर्मों के प्रति यदि भेदभाव का नजरिया आने लगेगा तो इससे बेहद खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है । बाबरी मसजिद में चोरी छिपे मूर्तियां बिठा देना गलत था। भारत के कानून का उल्लंघन था। इसे किसी भी आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। जजमेंट के इस विवादित अंश को पढ़ें-

4. Whether the idols were placed in the building on the

night of December 22/23rd, 1949? The idols were placed in the middle dome of the disputed structure in the intervening night of 22/23.12.1949.

लखनऊ पीठ के फैसले ने एक सकारात्मक काम किया है कि उसने इस विवाद को समाधान करने की दिशा में ठेल दिया है। उम्मीद है हाईकोर्ट के जजमेंट में जो कमियां हैं वे सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दूर हो जाएंगी। इस जजमेंट का एक बड़ा संदेश है कि राजनीतिक दल और संसद जो काम करने में असफल रहे हैं उन कामों को अदालतें कर सकती हैं। न्यायपालिका के इस साहस भरे काम की हम सबको प्रशंसा करनी

चाहिए। इससे यह मसला आगामी दिनों में जल्दी सुलझने की प्रक्रिया में आ गया है। लेकिन इस समस्या के राजनीतिक शार्टकट से बचने की जरूरत है। लखनऊ बैंच की सबसे बड़ी कमजोरी यही है और इसे सुप्रीम कोर्ट को दुरूस्त करना चाहिए।

55 Responses to “दबाव की राजनीति में इतिहास और तथ्य की विदाई / जगदीश्‍वर चतुर्वेदी”

  1. विजय प्रकाश सिंह

    चतुर्वेदी जी , आप कुछ बातें भूल गए :

    १. फ्रेंच ट्रेवलर की पुस्तक का फ्रेंच और अंग्रजी अनुवाद दोनों ही सबूत का हिस्सा है और रिकार्ड पर है जिसके अनुसार १७६० केपहले से मान्यता है कि मंदिर की जगह मस्जिद बनाई गयी | क्या इसे इग्नोर किया जा सकता है | इसका हवाला ज. खान ने अपने निर्णय में सरसरी तौर पर दिया है |

    २. कोर्ट के पहली बार १८५५ में दायर हुआ तबसे लेकर अब तक मुकदमे चल ही रहे हैं कभी कुछ हिस्से पर कब्जे को लेकर और और कभी वहाँ लगाने वाले मेले ( राम नवमी और परिक्रमा पर ) से होने वाली आमदनी , जो हिन्दू और मुसलमान दोनों में बंटती थी , को लेकर |

    ३. वहाँ राम चबूतरा और सीता रसोई १७६० के पहले से थी ऐसा फ्रेंच लेखक के द्वारा लिखा गया है |

    ४. १८५५ से आज तक किसी जज ने कभी यह निर्णय नहीं किया कि पूरी जमीन या उअस पर बने भवन – मस्जिद या उसके बरामदे ( सहन ) का इस्तेमाल कोइ एक कर सकता है , बल्कि यह एक अनोखी बात थी कि ‘ यह एक अकेली मस्जिद थी जिसके भीतर हिन्दू मूर्तियां थी और पुजा होती थी , कम से कम १७६० के पहले से |

    ५. मस्जिद के खम्भे किसी हिन्दू मंदिर के खम्भे है , उनकी फोटो सबूत के तौर पर रिकार्ड पर है |

    ऐसे हालात में जब बहुमत से निर्णय सामिलात तौर पर बटवारे का है तो अनुचित कैसे है और क्या आस्था पर है , कहाँ तर्क का इस्तेमाल नहीं हुआ ?

    आप ने सारे कोट्स सिर्फ एक जज के उठाये हैं जो कि अल्पमत का निर्णय होने से लागू नहीं होता , जो बहुमत का निर्णय है जो लागू होगा उसे आप ने कोट नहीं किया और जो साक्ष्य रिकार्ड पर है उन्हें इग्नोर किया है |

    कारण साफ़ तौर पर आपकी विचारधारा है |

    Reply
    • Ravindra Nath

      विजय जी लेखक महोदय कुछ भूले नहीं है, बस उन्हे इन सबूतों को देखना या इनके बारे मे बात करना पसंद नही।

      Reply
      • विजय प्रकाश सिंह

        इस फैसले से केवल और केवल वामपंथी नेता , विचारक और समर्थक नाराज और व्यथित हैं | शायद यदि यह लागू हो जाएगा तो जो हिन्दू – मुस्लिम सद्भाव पैदा होगा वह बहुत सारे मार्क्सवादियों और समाजवादियों ( जिन्हें परिवार वादी कहना चाहिए ) की दूकान बंद हो जायेगी |

        सारे माई , अजगर , मजगर जैसे पुराने फार्मूले फेल हो जायेगें | नए फार्मूले पता नहीं कैसे हों , यही इन लोगों की चिंता है |

        Reply
  2. भारत भूषण

    Bharat Bhushan

    माननीय, जगदीश्वर जी,
    आप जैसे महान लेखकों को बिना पढ़े टिका टिप्पणी शोभा नहीं देता, पूरा जजमेंट 8,००० पेज में है, जिसको पढ़ने के लिए समझने के लिए कम से कम २ वीक चाहिए, आप तो जजमेंट पढ़े बिना शुरू हो गए, अभी इतना भी महान नहीं हुए हैं सर, जो बिना पढ़े सब समझ जाएँ, ये लिंक है फुल जजमेंट का http://elegalix.allahabadhighcourt.in/elegalix/DisplayAyodhyaBenchLandingPage.do
    इस जजमेंट में सारे framed issues और सारे issues पर तीनों माननीय जजों का निष्कर्ष है, पुरे जजमेंट में ये कंही नहीं लिखा है की चूँकि हिन्दूओं की आस्था है इसलिए ये जगह उनहें दे दी जाए,

    आपको ये जानकार काफी दुःख हुआ होगा की तीनों जजों ने ये माना की यंहा पहले हिन्दुओं का मंदिर था,

    तीनों जजों ने ये भी माना की वो टोम्ब मंदिर के ऊपर बनाया गया था,
    और सबसे बड़ा धमाका तो ये टोम्ब एक सिया नवाब के द्वारा बनाया गया था, जबकि दावा ठोंका एक शुन्नी वक्फ बोर्ड ने, और तो और उस प्रोपर्टी का कभी वक्फ ही क्रियेट नहीं हुआ,

    शुन्नी वक्फ बोर्ड कोई भी सबूत नहीं दे सकी वक्फ क्रियेसन का ?

    इस जजमेंट में अगर कुछ गलत है तो बस बिना किसी सबूत के वक्फ बोर्ड को १/३ जमीन मिल गया.

    और जगदीश्वर जी आपको ये जान कर शोक्क लगेगा की, इस देश में एक law है adverse possession का जो सारे law पर supercede करता है, उस जगह पर हिन्दू १२ साल से भी ज्यादा सालों तक पूजा करते रहे उस प्रोपर्टी को manage करते रहे, पर वो सुन्नी वक्फ बोर्ड वाले सोये रहे, वो जागे भी तो अपने कारण से नहीं कुछ तथाकथित समाजवादियों व वामपंथियों के politicization से,

    मुझे उम्मीद है आप पढ़े लिखे हैं पहले पूरा जजमेंट पढेंगें फिर कोई बात कहेंगे, अगर सच के साधक हैं तो अपने सारे लेख जो बिना पढ़े लिखे गए हैं use wapas lete hue samaaj और देश court से maafee भी mangen ge.

    Reply
  3. अजय कुमार झा

    मेरी तो समझ में ये नहीं आ रहा कि जिस विवाद को समझने में , उन विशेषज्ञों को ( अभी तो फ़िलहाल उन न्यायाधीशों को आम पाठकों और आप जैसे लेखकों से थोडा ज्यादा काबिल तो मानना ही पडेगा , हो सकता है कि आगे चलकर वे आप जैसों के तर्कों को अपनी कानूनी शिक्षा से ज्यादा तरजीह दें ) साठ साल का समय लगा , उस फ़ैसले को इतनी जल्दी इतनी भलीभांति समझने में आप जैसे विद्वान लोगों ने शायद साठ घंटे भी क्या लिए होंगे । समझ में नहीं आता कि ,सिर्फ़ उंगलियां उठा देने भर से अपना काम खत्म हुआ लोग ऐसा क्यों समझ लेते हैं ……शायद इसलिए क्योंकि ये सबसे आसान रास्ता है ….यदि सच में ही यही सब सत्य है तो फ़िर आखिर अदालत में वो अधिवक्ता क्यों नहीं खडे किए गए ..जो आपके तर्कों को वहां रख सकते और शायद अदालत को नई रोशनी दिखा सकते …मगर मुझे पूरा यकीन है कि कल को यदि सर्वोच्च न्यायालय भी ऐसा ही कोई फ़ैसला सुनाती है …तो यकीनन आपका रुख नहीं बदलने वाला ।

    एक आखिरी बात , मैंने ऊपर की टिप्पणियों में देखा है कि आपने उन पाठकों को भी ..अपनी ही शैली या अंदाज़ में उत्तर दिया है ..किसी को राम राम कहने को कहा है तो किसी को कोई और सलाह दी है ..खैर वो आपका अधिकार है …मगर मुझे पूरी उम्मीद है कि मैंने कोई अभद्र या अनुचित बात नहीं कही है ..इसलिए जवाब में भी ऐसी ही अपेक्षा रहेगी मुझे …

    Reply
  4. रवीन्द्र नाथ

    मेरे सवालों से घबरा कर लेखक ने मुझे low priority मे डाल दिया

    mail पढिए ”

    Hello chattu_74@rediffmail.com,

    This message serves as notification that you will not receive any more courtesy notices from Boxbe members for two days. Messages you have sent will remain in a lower priority queue for our member to review at their leisure.

    Future messages will be more likely to be viewed if you are on our member’s priority Guest List.

    Thank you,
    jagadishwar_chaturvedi@yahoo.co.in

    और मेरी टिप्पणियों को देखिये, कहीं कुछ अनर्गल अगर लिखा हो कोई भी दिखा सके तो।

    Reply
  5. निरंकुश आवाज़

    आदरणीय सम्पादक जी,

    आपसे निवेदन है कि व्यक्तिगत तीखे आक्षेपकारी एवं असंसदीय टिप्पणी किस प्रकार से प्रकाशित हो रही हैं? जैसे-

    1-मिस्टर चतुर्वेदी खान आप कृपया अपने पिता का तथा माता का नाम बताये व देश का नाम भी बताये नहीं लगता की आप इंडियन है .

    2-आपकी आवश्यकता हम से अधिक पाकिस्तान में है.

    3-खाते है इस धरती का पर गाते हैं किसी और देश का और ये तथाकथित मानवाधिकार वादी ही इस देश के सबसे बड़े नासूर हैं।……क्यों नहीं ये लोग अपना नाम लेनिन या माओ नहीं रख लेते ।

    4-बकवास जारी रखो है जगदीश्वर

    इस प्रकार की टिप्पणियों के प्रकाशित होने से प्रवक्ता का स्तर गिर रहा है। आशा है आप इस पर विचार अवश्य करेंगे।

    शुभाकांक्षी
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    Reply
    • प्रवक्‍ता ब्यूरो

      प्रवक्‍ता ब्यूरो

      आदरणीय पुरुषोत्तमजी, हमसे हुई भूल की ओर ध्‍यान दिलाने के लिए आपका हार्दिक धन्‍यवाद। दरअसल प्रवक्‍ता पर प्रतिदिन पचास से अधिक टिप्‍पणियां आ रही है, और कुछ टिप्‍पणियों में तो इतनी गालियां होती हैं कि हम उसे सीधे डिलीट कर देते हैं। अभी इस वेबसाइट का संपादन सिर्फ मेरे द्वारा हो रहा है इसलिए कुछ बातें छूट जाती हैं। अपनी ओर से हम असंसदीय बातों को हटाने हेतु भरसक प्रयास करते हैं, जो बातें छूट जाती है उस ओर ध्‍यान आकृष्‍ट होते ही हम अवश्‍य पहल करेंगे।

      Reply
    • शैलेन्‍द्र कुमार

      शैलेन्द्र कुमार

      ये तो सामान्य टिप्पणिया है इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं

      Reply
  6. निरंकुश आवाज़

    मैंने श्री चतुर्वेदी जी के पूरे आलेख को पढा है।

    1. इस आलेख को पढने से प्रवक्ता डॉट कॉम पर लगाये गये आरोप तनिक भी सही सिद्ध नहीं होते हैं। हम सभी जानते हैं कि श्री चतुर्वेदी जी एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिनके विचारों को सामने लाना मीडिया का कर्तव्य एवं अधिकार है। हम कई बार भावावेश में सच्चाई को देख नहीं पाते हैं। हाँ मैं यह अवश्य ही कह सकता हूँ, कि प्रवक्ता के सम्पादक जी का झुकाव एवं उनकी श्रद्धा आरएसएस एवं हिन्दूवादी संगठनों के प्रति है। जिसके चलते अनेक बार भेदभाव होता रहता है। यही नहीं प्रवक्ता के अधिकतर पाठकों को भी ऐसा करना ही अच्छा लगता है, इसके उपरान्त भी प्रवक्ता पर ऐसे आलेखों का प्रकाशन भी होता है, जो आरएसएस एवं हिन्दू धर्म की मान्यताओं के विपरीत होते हैं। इसलिये प्रवक्ता अपने कर्तव्यों का निर्वाह करता हुआ दिखता रहता है। इस आलेख के मामले में तो प्रवक्ता पर आरोप उचित नहीं है।

    2. जहाँ तक बात श्री चतुर्वेदी जी के आलेख की विषयवस्तु की बात है तो मुझे श्री चुतर्वेदी के विचारों में कुछ भी नया नहीं लगता। उनको अपने वैचारिक धर्म का निर्वाह करना है, सो वे करते रहे हैं और करते रहेंगे।

    3. इस आलेख के आधार पर ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विद्वानों की चर्चा के आधार पर इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि हाई कोर्ट का निर्णय कानूनी कम और पंचायती निर्णय अधिक लगता है। जिसके पीछे असल कारण क्या रहे हैं, इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ही सही टिप्पणी कर सकता है, लेकिन श्री चतुर्वेदी जी की ओर से हाई कोर्ट के निर्णय की आलोचना तार्किक और सीमा में ही हैं। फिर भी श्री चतुर्वेदी जी लेख में कुछ आपत्तिजनक बातें। जैसे-
    (1) यह प्रमाणित हो चुका है कि तथाकथित मस्जिद किसी धार्मिक ढाँचे को तोडकर बनायी गयी थी और वर्तमान में उस स्थान पर विवाद है। ऐसे में इस्लाम के सिद्धान्तों के आधार पर स्वयं सिद्ध है कि मस्जिद बन ही नहीं सकती और बन भी सकती है तो वहाँ नवाज अदा नहीं की जा सकती। इस बात को स्वयं इस्लाम के अनुयाई भी मानते हैं, लेकिन श्री चतुर्वेदी जी ने इस बारे में एक भी शब्द नहीं लिखकर निष्पक्ष दिखने का प्रयास नहीं किया?
    (2) श्री चतुर्वेदी जी लिखते हैं, बल्कि तर्क प्रस्तुत करते हैं कि यदि पुरानी धार्मिक इमारत पर मस्जिद नहीं बन सकती तो मन्दिर कैसे बन सकता है? मैं जहाँ तक जानता हूँ, हिन्दू धर्म में इस बात पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। इसलिये इस प्रकार की तुलना करना बुद्धिमतापूर्ण नहीं है। बल्कि इस तर्क से स्वयं श्री चतुर्वेदी जी की पूर्वाग्रही सोच का ही पता चलता है, जिसकी उनके स्तर के लेखक से अपेक्षा नहीं की जा सकती।
    (3) श्री चतुर्वेदी जी ने अपने लेख में कहीं पर भी इस्लाम के अनुयाईयों को इस बात की सलाह नहीं दी, कि जब इस्लाम में विवादास्पद जगह पर मस्जिद का निमार्ण नहीं हो सकता और नवाज नहीं पढी जा सकती, तो क्यों विवाद को आगे बढाया जा रहा है? इससे भी श्री चतुर्वेदी जी की निष्पक्षता संदेह के घेरे में है।

    4. एक सवाल मैं यह उठाना चाहता हूँ कि श्री चतुर्वेदी जी मार्क्सवादी हैं, जिनका दर्शन नास्तिकता पर आधारित है। ऐसे में नास्तिक लोगों को आस्तिक लोगों के विचारों को सही या गलत ठहराने का हक क्यों होना चाहिये?

    5. हालांकी मैं आस्तिक हिन्दू होते हुए भी धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करता हूँ और देश के हर व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिये कानूनी कदम उठाये जाने के पक्ष में भी हूँ, इस दृष्टि से हाई कोर्ट के निर्णय को संवैधानिक निर्णय नहीं माना जा सकता। फिर भी यह सवाल उठाना जरूरी समझता हूँ कि बाबर के द्वारा बनाई गयी या बाबर के नाम पर बनाई गयी विवादास्पद मस्जिद के प्रति इस्लाम को मानने वालों की आस्था क्यों, विशेषकर तब जबकि-

    (1) कहा जाता है कि भारत में 90 प्रतिशत मुसलमान हिन्दू धर्म से मुसलमान बने हैं, जिनका पूर्वक बाबर नहीं है और उनके पूर्वजों को बाबर ने इतना कुचला और मसला कि उन्हें इस्लामक कबूलने को विवश कर दिया?
    (2) बाबर ने भारत को और भारतीय धार्मिक भावनाओं को बुरी तरह से कुचला था। ऐसे क्रूर अपराधी के द्वारा निर्मित या उसके नाम पर निर्मित मस्जिद को कैसे पवित्र माना जा सकता है?
    (3) जो लोग बाबर के नाम पर या बाबर के द्वारा निर्मित मस्जिद में नवाज अदा करना चाहते हैं, उन लोगों को बाबरी प्रवृत्ति का एवं बाबरी सिद्धान्तों का पक्षधर क्यों नहीं माना जाना चाहिये?
    (4) बाबर के नाम पर किसी भी प्रकार के निर्माण पर स्वयं मुसलमानों को ही विरोध में खडा क्यों नहीं होना चाहिये?
    (5) बाबर का समर्थन करने वाला कोई भी व्यक्ति देशभक्त कैसे हो सकता है?

    आशा है कि मेरी ओर से उठाये गये सवालों पर विद्वान पाठक अवश्य ही बिना पूर्वाग्रह के गौर करेंगे और चर्चा को आगे बढाते हुए मार्गदर्शन करेंगे।

    शुभाकांक्षी
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    Reply
    • रवीन्द्र नाथ

      पुरुषोत्तम जी आप मुझे अक्सर धर्म संकट मे डाल देते हैं, आप के लेख “हिन्दु क्यों नहीं चाहता हिन्दु राष्ट्र” ने मुझे भावुक कर दिया था, और आपकी यह टिप्पणी, मैं शायद आपको अब तक ठीक से समझ नही सका हूँ। कभी संभव हो तो मुझे mail करें robeendar@gmail.com पर, संभवतः मैं आपके ज्ञान से कुछ लाभांवित हो सकूं।

      Reply
  7. आर. सिंह

    R.Singh

    चतुर्वेदीजी आपकी विडंबना यह है की आप वकवास ज्यादा करते है.आपने जजों पर तो टिपण्णी देदी और पूरे फैसले को नकार दिया,पर आपने कभी ऐसा सोचा की मुस्लिम धर्म के बारे में बोलने का हक़ आपको किसने दिया?मैं तो यह पूछना चाहूँगा की आप के आलेखों से तो मुझे ऐसा लगता है की आपको तो उस धर्म के बारे में भी कोई ज्ञान नहीं है,जिसमें आपने जन्म लिया है,दूसरे मजहब के बारे में आप क्या जानेंगे?. यह कोई आप की ही गलती नहीं है,यह हिन्दू समाज में जन्मे हर बुद्धिजीवियों की ,खासकर बामपंथी विचारकों की ख़ास विशेषता है की वे हिन्दू धर्म में केवल बुराईयाँ देखते हैं और अन्यत्र उन्हें केवल अच्छाईयाँ नजर आती है.
    आप सब महानुभाओं से मेरा यही अनुरोध है की आप लोग पहले पूरी जजमेंट जो १२००० पृष्ठों में है,पढ़िए तब कोई टिपण्णी कीजिये.मैं भी मानता हूँ की पुरातत्व बिभाग के रिपोर्ट से यह सिद्ध नहीं होता की वह राम जन्मभूमि है,पर इतना तो सिद्ध हो ही जाता है वहाँ कोई स्ट्रक्चर मस्जिद बनने के पहले मौजूद था और मस्जिद उसको तोड़ कर बनाई गयी.वह स्ट्रक्चर मंदिर ही था,ऐसा भी शायद रिपोर्ट में कहा गया है.उस हालत में फैसले में आपको खोट क्यों नजर आता है?ऐसे तो एक मत यह भी है की अगर वहां मंदिर था फिर मस्जिद के नाम पर एक तिहाई हिस्सा क्यों दिया गया?आप इसका उत्तर क्यों नहीं दे रहे हैं?
    रह गयी बात की इससे अन्यत्र भी जहाँ मंदिर को तोड़ कर मास्जिद बनाई गयी है,फिर से उन सब जगहों को खाली कराने के लिए लोग अदालत का दरवाजा खटखटाने लगेंगे.पहले तो ऐसा होगानाही,जिसका कारण आप भी जानते हैं,पर अगर ऐसा होता भी है तो यह क्या इतिहास की गलतियों को सुधारने जैसा काम नहीं होगा?पर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रवैया ekdam साफ़ है की अयोध्या के अलावा और कोई मामला उठाया ही नहीं जा सकता.चतुर्वेदीजी, वामपंथी विचारक के नाते ,अगर आप नास्तिक हैं तो नास्तिकता का मतलब धर्म vimukhtaa तो कदापि नहीं है है,धर्म insaaniyat एक varchyu yani gun है,usse vimukhtaa insaaniyat से hatnaa है.

    Reply
    • जगदीश्वर चतुर्वेदी

      मान्यवर, बिना वजह के इतनी परेशानी उठायी। सिर्फ जबाब में इतने अक्षर राम-राम लिख देते हम मान लेते आप क्या चाहते हैं। गद्य में काहे परिश्रम करने गए। गद्य बेवकूफों के लिए होता है हमारे आपके जैसे रामभक्तों को राम-राम ही काफी है।

      Reply
      • आर. सिंह

        R.Singh

        Shriman chaturvediji,agar MANYAVAR nam se aapne mujhe sambodhit kiya hai to main ek baat aapko saaf kar doo ki main Ram to kya Ishwar ke kisi roop mein nahi vishwaas karta.Main mandir wale Ram ka to nahi par us purushotaam ka anukaran karta awashya hoon jo tyag ka ek mishaal prastut karta hai.Usi tarah Geeta ka aadhaa shlok mere jiwan ka aadhaar hai,jahaan kahaa gayaa hai ki KARMANYEDHIKAARSTU,MAA FALESHU KADAACHAN.Isase agar siddh hota hai ki main aastik ya ishwar bhakt hoon to mujhe koi etraaj nahi hai,par meri maanyataa yah hai ki Ishwar ko maanavon ne apni subhidhaa ke liye banaayaa hai ishwar ne manushyon ko nahi banaayaa.Isiliye maine inhi pannon mein kahi likhaatha ki Ram aur Krishna ko Mandiron se baahar laiye aur unki poojaa ke badle unke aadarshon ka paalan kijiye.Mera dharm yahi hai.Aap jaisa nahi ki kiisi dhaaraa ke andh samrthak ho gaye. Phir aap mein aur un kattar panthion mein antar hi kya rahaa jinke virodh mein aap na jaane kya kya vakvaas kar jaate hain?

        Reply
        • Ravindra Nath

          सिंह साहब, सत्य वचन, हमे इन महापुरुषों की सच्ची पूजा करनी चाहिए, उनके आदर्शों को अपना कर। शेष अन्य सब व्यर्थ है।

          Reply
    • Ravindra Nath

      सिंह साहब, यह वामपंथी नास्तिक नही होते हैं, इनका भी धर्म होता है, और इनके भी देवता होते हैं, जिनके चित्र छपे जूते बेचने पर किसी के ऊपर हमला भी हो सकता है। बस अगर कुछ मैं नही समझ पाया तो यह कि ये जूते तो इनके धर्म देश चीन से बन कर आए थे, क्या वहां के पुजारियों ने इस पर ध्यान नही दिया या वो हमारे देश के पुजारियों से कच्चे हैं?

      Reply
    • जगदीश्वर चतुर्वेदी

      सलाह के लिए धन्यवाद। आगे भी ऐसे ही मार्गदर्शन करें। कृतार्थ हुआ। जयश्री राम।

      Reply
    • जगदीश्वर चतुर्वेदी

      सलाह के लिए धन्यवाद मान्यवर।

      Reply
      • ateet

        जग्दिस्वर
        तुम श्रीराम का नाम लेते हो भले उनकी astitva ko सवाल करते हो लेकिन मुझे बिस्वास है की मरते वक्त लेनिन की जगह राम ही यद् आयंगे.

        श्री राम तुझे सत्बुधि दे

        Reply
  8. शैलेन्‍द्र कुमार

    शैलेन्द्र कुमार

    पंकज झा जी ब्राह्मणों पर की गयी टिप्पणी आपके लिए नहीं है ये कुछ विशेष तरह के ब्राह्मणों के लिए है जिन्हें आप अच्छी तरह जानते है

    Reply
  9. डॉ. महेश सिन्‍हा

    डॉ महेश सिन्हा

    सैकड़ों वर्षों तक रूस में साम्यवादी शासन था । धर्म को अफीम मानता है साम्यवाद लेकिन साम्यवाद के खंडहर के ढहते ही सारे धर्म सामने आ गए और उसने ही पूरे देश को तोड़ डाला। इस देश में अभी भी लोग बचे हैं जो रस्सी जल गयी पर ऐंठन नहीं गयी को सही साबित करते हैं। रहते हैं इस देश में लेकिन अपने आप को दूसरे गृह का प्राणी समझते हैं । खाते है इस धरती का पर गाते हैं किसी और देश का और ये तथाकथित मानवाधिकार वादी ही इस देश के सबसे बड़े नासूर हैं। इनके पेट का पानी नहीं पचता बिना विवाद खड़े किए। धन्य है यह भूमि और धन्य है हिन्दू संस्कृति जो किसिकों भी अपना नाम रखने देती है । क्यों नहीं ये लोग अपना नाम लेनिन या माओ नहीं रख लेते ।

    Reply
    • जगदीश्वर चतुर्वेदी

      अरे ज्ञानीजी, कहां पढ़ लिया सैंकडों सालों से रूस में समाजवाद था। यह तो कल की पैदाइश है। समाजवाद के बारे में लगता है कोई नई किताब हाथ लग गयी है,भाई स्कैन करके डाल दो नेट पर हम सब पढ़ेंगे। प्लीज जल्दी करो।

      Reply
  10. शैलेन्‍द्र कुमार

    शैलेन्द्र कुमार

    ब्राह्मणों का एक विशेष गुण है की वो हर समुदाय का नेतृत्व हासिल कर लेते है इसके लिए वो सारे तर्कों-कुतर्को का सहारा लेते है और अपने आप को उस समुदाय का शुभचिंतक साबित कर देते है जैसे चतुर्वेदी जी और तिवारी जी एक गुट में और पंकज झा जी एक गुट में धर्म को अच्छा बताने वाले भी ब्राह्मण और बुरा बताने वाले भी ब्राह्मण इस्लाम का विरोध करने वाले भी ब्राह्मण और समर्थन करने वाले भी ब्राह्मण ये इसी में देश के लोगो को उलझाये रखना चाहते है
    तौसिफ हिन्दुस्तानी और अहतेशाम त्यागी से अनुरोध है कि इनके चक्कर में मत फसों अपनी अकल लगाओ
    मैं भी समर्पित हिन्दू हूँ और आप समर्पित मुसलमान चलिए देखते है कि सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला देता है
    कम से कम जगदीश्वर चतुर्वेदी तो मामले का फैसला न करें
    @तिवारी जी मैं ये मान सकता हूँ कि अतीत जी जगदीश्वर चतुर्वेदी के चरणों कि धूल के बराबर नहीं होगे लेकिन माननीय न्यायाधीसो को उनके चरणों कि धूलि न बनाये इसी में आपकी इज्जत है
    अजीब स्थिति है इन ब्राह्मणों कि एक दुसरे कि तारीफ करके ही ये एक दूसरे को अन्य लोगों कि नज़रों में महान बना लेते है ………..धोखेबाज़

    Reply
  11. Awadhesh

    चतुर्वेदी जी, बडे महान हो. लेकिन खेद है कि आप हिन्दु सन्सकृति को भी थोडा समझ पाते. आपने जो लिखा है वो सिर्फ हिन्दुस्थान मे ही सम्भव हो सकता है वो भी हिन्दुओ के खिलाफ. किसी और धर्म के बारे मे लिखो, ऐसी ल‌ात पडेगी की छठी का दुध याद आ जायेगा. दुनिया के सब‌से ज्यादा विकसित देश अमरीका का राष्ट्रपति अभी तक अपने इसाई होने का प्रमाण दे रहा है. धर्म और आस्था का अस्तित्व कभी नकारा नही जा सकता और तुम जैसे व्यक्ति के लिये सिर्फ एक कथन सत्य है कि हाथी जाता रहता है और कुत्ते भौकते रहते है.
    न्याय और न्यायपलिका का सम्मान करना बाबरी क‌ा मुकदमा लडने वाले हाशिम से कुछ सीखीये. कम से कम वो न्यायाधीश आपसे ज्यादा योग्य थे. और उन्होने जो फैसला दिया उससे न्यायालय का सम्मान ही बढा है.

    Reply
    • जगदीश्वर चतुर्वेदी

      बंधुवर, काहे को नाराज हो रहे हो। हम तो आपसे ही डरे हैं। थर-थर कांप रहे हैं। कि कन्हीं आप आकर मार ही न डालें। देखो आप नाराज हो लेना लेकिन अन्य धर्म के लोगों को इस झंझट में शामिल न करो।हम एक ही धर्म वालों से डरे हैं,बाकी से मुठभेड़ के चक्कर में 24 घंटा लिखने में ही उलझे रहेंगे। यह हम से नहीं होगा।

      Reply
      • ateet

        चातिउर्वेदी
        सत्य हमेशा करवा होता है लेकिन सत्य सत्य ही होता है

        Reply
  12. भारतीय नागरिक

    आदरणीय चतुरवेदी जी. बहुत अच्छा लेख. आपकी आवश्यकता हम से अधिक पाकिस्तान में है. वहां भी धर्मनिरपेक्षता की अलख जगाकर आयें. तालिबानियों में भी. अगर हिन्दू पाकिस्तानियों की तरह होते तो न आप ऐसे न लिख पाते.. केरल में एक प्रोफेसर का हाथ काट दिया गया, उस पर कुछ लिखने की हिम्मत करो प्रिय धर्मनिरपेक्ष महोदय…

    Reply
    • जगदीश्वर चतुर्वेदी

      भईया पाकिस्तान में जुगाड़ लगा दो हम जाने को तैयार हैं।तुम्हारे बड़े ऋणी रहेगे। थोड़ा संघ वालों से कहो वे हमारी मदद करें। हम बिस्तर बांधे इंतजार कर रहे हैं। जयश्री राम।

      Reply
      • Ravindra Nath

        क्यों भाई संघ वाले क्यों, खुद को किसी लायक बनाया है या नहीं?

        Reply
      • ateet

        पाकिस्तान जाओगे
        लेकिन वह ऐसा नहीं लिख पाओगे अगर ऐसा लिखअ तो किसी चौराहे पर सर कटी लॉस बनकर दुसरे दिन ही दिखोगे,
        तुम्हारे मुह से श्री राम सब्द अच्छा नहीं लगता.जय लेनिन बोलो

        Reply
  13. प्रवक्‍ता ब्यूरो

    प्रवक्‍ता ब्यूरो

    पंकजजी, प्रवक्‍ता की नीयत पर आप संदेह कर रहे हैं, यह आपकी सोच हैं। स्‍पष्‍ट कर दें कि टीआरपी के चक्‍कर में हम रहते जरूर हैं लेकिन इस चक्‍कर में समझौता नहीं करते। हर महीने हम चार पांच लेख लेखकों को लौटा रहे हैं या रिसाइकिल बिन में डाल रहे हैं। कोई दर्जनों पेज लिख रहा है तो आप क्‍यों परेशान हैं। दस लाइन की टिप्‍पणी आपने ठोक दी लेकिन किस बात पर आपको आपत्ति है ये नहीं लिखा। प्रवक्‍ता डॉट एक बगिया हैं इसलिए भांति-भांति के फूल ना खिले तो फिर उसके सौंदर्य का क्‍या महत्‍व। आप प्रवक्‍ता के शुभचिंतक हैं, बेहतर होता कि आप हमारी गलतियों की ओर इशारा करते।

    Reply
    • अहतशाम त्यागी

      कुछ लोग अपने दुःख से दुखी नहीं हैं
      दुसरे के सुख से दुखी हैं

      Reply
  14. Ravindra Nath

    तो चतुर्वेदी जी का मानना है कि ASI ने जो भी निष्कर्ष निकाले हैं वो सब गलत हैं, तो चतुर्वेदी जी और उनके मित्र पुरातत्व ज्ञानी अदालत मे अपनी बात रखने क्यों नही पहुंचे? अब निर्णय के पश्चात गाल बजाने का क्या लाभ? न्यायालय ने उपलब्ध साछ्यों पर अपना निर्णय दिया है, अगर उस पर कोइ विरोध है तो न्यायालय की गरिमा को बनाए रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय मे जाएं। स्वयं तो दूसरो को नसीहत देते फिरते है, निर्णय का सम्मान करने के किए और खुद थू थू करते हैं, इसे कहते हैं खुद मियाँ फजीहत दूसरों को नसीहत।

    न्यायालय के ऊपर हिन्दुवादी होने का ठप्पा लगाते समय मतिभ्रम का शिकार हो कर यह भी भूल जाते हैं कि उनमे एक न्यायाधीश मुस्लिम भी था और उसने भी स्वीकार किया है कि वहां पहले मंदिर था। उसके भग्नावशेषों पर ही मस्जिद के निर्माण का प्रयत्न हुआ है।

    Reply
  15. पंकज झा

    पंकज झा.

    अब तो कई बार प्रवक्ता के नीयत पर ही संदेह हो जाता है. आखिर चाहते क्या हैं ये प्रवक्ता वाले. खुद को राष्ट्रवाद का प्रवक्ता कहते हैं और जो भी उल जुलूल मिल जाय उसको भकोसते रहते हैं. भाई ठीक है विमर्श अपनी जगह पर. सभी विचारों को मंच देना भी अपना कर्तव्य है. लेकिन एक सीमा तक ही न. कोई दर्ज़नों पेज लिखता रहे जिसमें सिवा कुंठा और देश को तोड़ने के अलावे कोई बात ही न हो. जब पूरे देश में सद्भाव का माहौल हो. तब भी अपनी बुद्धिमत्तक के घमंड में कोई दिन को रात कहता फिरे और आप छापते फिरें…कहाँ का न्याय है ये. कोई तो लक्षमन रेखा खिचिये अन्यथा यही माना जायेगी कि आप भी टीआरपी के फेर में पड़ गए. संपादक जी आपको चेताना चाहता हूं कि जिस दिन आप इस फेर में पड़े उस दिन फिर कुछ भी नहीं एबचेगा आपके पास भी. क्युकी आपके साईट का अभी तक यही यूएसपी रहा है कि कभी हिट के चक्कर में अपने सरोकारों से समझौता नहीं करता…सादर.

    Reply
    • जगदीश्वर चतुर्वेदी

      पंकज जी आप ठीक कह रहे हैं मैं सहमत हूँ आपसे ।ये लोग राम-राम छोड़कर किस गोरखधंधे में फंस गए हैं। बंद कर देना चाहिए विचार-विमर्श ।सिर्फ बाबा रामदेव मार्का प्रवचन छापें और संपादक अपने लिए कहीं और काम खोज लें। एकदम बिगड़ गए हैं। तरह-तरह की बाते छापते हैं।मैं आपसे शत-प्रतिशत सहमत हूँ। बताओ कैसे सुधारें इन्हें।

      Reply
      • पंकज झा

        पंकज झा.

        आ. चतुर्वेदी जी….सर कृपया नाराज़ न हो..बस संपादक जी से इतना ही निवेदन किया था कि थोडा बांकी लोगों को भी मौका दें.साथ ही एक यह लाइन ज़रूर लें कि हर उस बात को नज़र अंदाज़ करेंगे जो ‘तोड़ने’ का सबब हो. आपलोगों के विद्वता की कृपा से मोटे तौर पर यह जन सामान्य भी समझ गया है कि कोर्ट का फैसला, फैसला कम पंचायत ज्यादा है. लेकिन ऐसा ही है तो यही सही. प्रणाली चाहे कोई भी हो अंततः उसे खुद को समाज के सरोकारों से जोड़ना चाहिए न कि लकीर का फ़कीर बन जाना चाहिए. यह सही है कि ऐसा फैसला देश की सबसे बड़ी पंचायत ‘संसद’ को करना चाहिए था लेकिन वह पिछले साठ सालों में इस मामले में विफल रही है. तो न्यायालय ने ही यह किया तो भी कोई बात नहीं है. इसका दूरगामी कोई नकारात्मक परिणाम नहीं होने वाला है, आप निश्चिंत रहे.
        आपको मालूम होगा कि संसद ने क़ानून बना मर राम जन्मभूमि के अलावा हर धार्मिक मसले पर 1947 से पहले की स्थिति कायम रखने का संकल्प लिया हुआ है. तो यह मामला कही भी ‘नजीर’ नहीं बनने जा रहे है.अतः आप जैसे विद्वानों से यही निवेदन की आत्मसंयम का परिचय दें. अपने लेखन में तथ्यों से ज्यादा सद्भाव को महत्त्व दें. और अगर यह संयम आप न रख पाएं तो संपादक जी को नीर-क्षीर विवेक का परिचय देना चाहिए….सादर.

        Reply
        • पंकज झा

          पंकज झा.

          पुनश्च:
          जैसा कि संपादक जी ने खुद कहा है कि हर महीने पांच लेखकों को वो रिसाइकिल बिन में डालते हैं. तो बस यही निवेदन था कि पाठक भी तरह-तरह के फूल का रसस्वाद लेना चाहेंगे. हो सकता है कुछ फूल ‘डहेलिया’ ना होकर विचारों से भी विशुद्ध देशी किस्म का हो. थोडा चाइना की तरह शानदार पैकेजिंग नहीं हो उस गुलदस्ता का. लेकिन उन फूलों को भी महत्त्व देना उचित होगा.चीन और रूस से ही कितना आयात किया जाय. ये भी निवेदन था.

          Reply
  16. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    poonjiwadi vyvastha ke antarvirodhon ka prbhav uski nyayay vyvastha par bhi parilakshit hota hai aap jis uchch streey nyayay ko dhyaan men rakhkar prstut ghatnakrm ki sameeksha prstut kar rahe hain ;usmen yhi sbse smbhavy vikalp tha .ek or salah dunga –
    na vuddhibhedam janyedgyaanaam karmsnginaam .
    joshyet sarv karmaani viddwanykt samaacharan..

    Reply
  17. ateet

    मिस्टर चतुर्वेदी खान आप कृपया अपने पिता का तथा माता का नाम बताये व देश का नाम भी बताये नहीं लगता की आप इंडियन है .
    आपके लेख से तो कटाई नहीं लगता है आप इंडियन है या हिन्दू है ,लेकिन मगर रेकुएस्ट है की आप चुनाव जरुर लादे

    राम जी आपको सत्बिध्ही दे आप जैसे लोग देश में दंगो को प्रेरित करते हो

    Reply
    • श्रीराम तिवारी

      shriram tiwari

      thanda rakh thanda .chaturvedi ji ke pair ki dhool ke barabar nahin hai tun ..
      chaturvedi ji ne jo -jo pankti galat likhi ho wo apne hath se kagaj par utaar or kisi bhi chaddidharivakeel se poonch ,ek bhi shbd galat nahin hai is aalekh men .sachaai bayaan karne ka hosla jo chaturvedi ji men hai wo tumhaare jaise manmatiyon ke boote ki baat nahin .
      jaat na poonchho saadhu ki .poonch leejiye gyaan .
      mole karo talwar ka .padi rahan de myaan ..
      jo bhi kuchh ho chuka use ughadna bhi theek nahin .kintu asahmati ke arth ye nahin ki galee gufta kiya jaye .or ye jo khan ki upadhi dee hai wo to dunia ka sarvshreshth tauheed hai.

      Reply
      • Ravindra Nath

        अतीत भाई, आप तो चतुर्वेदी जी के पैर की धूल भी नही हैं क्योंकि वो स्थान तो तिवारी जी ने ले रखा है।

        और सच्चाई वही है जो इन्हे रुचे, चाहे न्यायालय ने ही क्यों न कही हो बात वो सच नही हो सकती तब तक जब तक इनके मन को न भाए।

        और जो बडे बडे दोहे दिए जा रहे हैं चतुवेदी जी के ज्ञान को प्रस्तुत करने के लिए, माननीय न्यायाधीशों पर शायद वह लागू नही होते हैं, उनके लिए तो सिर्फ लानते ही हैं।

        अगर तिवारी जी मे जरा भी न्याय भाव है (जिस पर मुझे शक है) तो समान ज्ञान चतुर्वेदी जी को भी दें कि वो माननीय न्यायधीशों पर अनर्गल आरोप न लगाएं।

        Reply
      • शैलेन्‍द्र कुमार

        शैलेन्द्र कुमार

        ब्राह्मणों का एक विशेष गुण है की वो हर समुदाय का नेतृत्व हासिल कर लेते है इसके लिए वो सारे तर्कों-कुतर्को का सहारा लेते है और अपने आप को उस समुदाय का शुभचिंतक साबित कर देते है जैसे चतुर्वेदी जी और तिवारी जी एक गुट में और पंकज झा जी एक गुट में धर्म को अच्छा बताने वाले भी ब्राह्मण और बुरा बताने वाले भी ब्राह्मण इस्लाम का विरोध करने वाले भी ब्राह्मण और समर्थन करने वाले भी ब्राह्मण ये इसी में देश के लोगो को उलझाये रखना चाहते है
        तौसिफ हिन्दुस्तानी और अहतेशाम त्यागी से अनुरोध है कि इनके चक्कर में मत फसों अपनी अकल लगाओ
        मैं भी समर्पित हिन्दू हूँ और आप समर्पित मुसलमान चलिए देखते है कि सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला देता है
        कम से कम जगदीश्वर चतुर्वेदी तो मामले का फैसला न करें
        @तिवारी जी मैं ये मान सकता हूँ कि अतीत जी जगदीश्वर चतुर्वेदी के चरणों कि धूल के बराबर नहीं होगे लेकिन माननीय न्यायाधीसो को उनके चरणों कि धूलि न बनाये इसी में आपकी इज्जत है
        अजीब स्थिति है इन ब्राह्मणों कि एक दुसरे कि तारीफ करके ही ये एक दूसरे को अन्य लोगों कि नज़रों में महान बना लेते है ………..धोखेबाज़

        Reply
        • जगदीश्वर चतुर्वेदी

          मुक्ति कहे गोपाल से मेरी मुक्ति बताय,ब्रजरज़ उड़ मस्तक लगे तो मुक्ति मुक्त होय जाय।

          Reply
      • अहतशाम "अकेला"

        तिवारी जी आप विचार भी बताते हैं की आप भी किसी विद्वान से कम नहीं
        संतुलित विचार रखते हो आप
        धन्यवाद्

        Reply
      • ateet

        माफ़ करना तिवारी जी मई चतुर्वेदी के पागलपन को बर्दास्त नहीं कर पाया

        Reply
    • जगदीश्वर चतुर्वेदी

      बंधुवर खांटी मथुरा का चौबे हूँ और आपके भगवान श्रीकृष्ण का पक्का पौराणिक पड़ोसी मेरे पुरखों की कंसवध में केन्द्रीय भूमिका रही है। समझना हो तो कभी मथुरा जाना और कंसवध के समय देखना कि वे कौन थे जो कृष्ण के साथ कंसवध के समय गए थे। पुरखे कंस वध का काम दे गए हैं। अभी भी कृष्ण जी की कृपा से वही कर रहा हूँ। जय बांकेबिहारी की।

      Reply
      • Ravindra Nath

        सुना था कि कृष्ण जी के अंत काल मे उनके कुल वालों की बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी, आज विश्वास हो गया है।

        Reply
      • GOPAL KRISHAN ARORA

        चोबे जी को जय श्री कृष्ण….. बड़ी खुशी हुई यह जान कर कि आप अपने को श्री कृष्ण की परम्परा का मानते हो … पर एक बात है.. क्यों अपने पुरुखों को व्यर्थ के विवाद में घसीट रहे हो ? … हम मथुरा गए और कृष्ण जन्म भूमि की ओर निकल गए तो आधा कृष्ण जन्म स्थान तोड़ कर बनाई हुई मस्जिद देख कर मन और दुखी होगा … आपका तो होता नहीं पर उन पुरखों का जरूर होगा जिन्हें आप कंसवध में श्री कृष्ण का साथी बता रहे हैं …. सोच लो, कहीं आप गलती से कंसवध के स्थान पर कृष्ण वध तो नहीं कर रहे? ऐसा हुआ तो पुरखों का नाम मिट्टी में मिल जाएगा … ऐसे पूत को कौन सपूत कहेगा? पुरखों के रिकार्ड में शायद आपको उस स्थान का फोटो भी मिल जाए जहाँ श्री कृष्ण का जन्म हुआ था अन्यथा तो फिर आस्था का प्रश्न आड़े आ जाएगा…

        Reply
  18. tausif hindustani

    जब रखवाले ही भच्छक बन जाये तो देश का क्या होगा ,अब तो पुरे दुनिया को पता लग गया की हिंदुस्तान में लोकतंत्र है बलतंत्र जिसकी लाठी उसकी भैंस जब बाबरी मस्जिद को शहीद किया गया था तब पुरे दुनिया में हमारी थू थू हुई थी और अब फिर इनलोगों वही हरकत की है इसका बहुत ही दूरगामी नतीजा होगा

    Reply
    • Ravindra Nath

      सच मे जब बाबरी ढ़ांचा गिरा तब भारत की बहुत थू थू हुइ थी, पर तब नही हुइ जब अपने ही देश मे लाखों नागरिक शरणार्थी बन के रहने के लिए मज़बूर हुए, तब भी नही जब न्यायालय के फैसले को एक संप्रदाय के दबाव मे बदल कर एक उम्र दराज महिला को बेसहारा छोड़ दिया गया। तब भी नही जब अमर्नाथ यात्रियों के लिये अस्थाई तौर पर तम्बू गाडने के लिए कुछ एकड जमीन न देने पर एक समुदाय हठधर्मी पर अड गया था।

      अब तो बस यह जानना है कि विदेशों मे इस थू थू का प्रचार के लिए पेट्रो डालर कहाँ से और कितना मिलता है।

      Reply
      • जगदीश्वर चतुर्वेदी

        पेट्रो डॉलर कहां से आता है,किनके पास आता है विस्तार से लिखो। हम सबका भला करोगे। कम से कम लिखने-पढ़ने के काम में तो लगोगे।

        Reply
        • Ravindra Nath

          अगर इतना ही नही जानते हो तो दूसरों को क्यों उपदेश देते फिरते हो?

          Reply
  19. अहतशाम त्यागी

    बिलकुल सही कहा आपने चतुर्वेदी जी
    जजों ने माना कि 22 दिसम्बर 1949 की रात को बाबरी मसजिद में राम की मूर्ति कोई रख गया। कौन रख गया ,कैसे रख गया ,इसका ब्यौरा एफआईआर में उपलब्ध है और जज भी मानते हैं बाबरी मसजिद में उपरोक्त तारीख को ये मूर्तियां रखी गयीं । सवाल यह है कि ये मूर्तियां वैध रूप में जब नहीं रखी गयीं तो फिर इन्हें हटाने का निर्णय माननीय जजों ने क्यों नहीं लिया ? जजों ने सैंकड़ों साल पुरानी बाबरी मसजिद को गैर-इस्लामिक मान लिया, लेकिन चोरी से मसजिद में जाकर राम की मूर्ति को रखे जाने को गैर हिन्दू धार्मिक हरकत नहीं माना। राम मंदिर को अवैध नहीं माना ? यह जजों की खुली हिन्दुत्ववादी पक्षधरता है।
    यह फेसला हिन्दुत्ववादी पक्षधरता की मिसाल है

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *