लेखक परिचय

राघवेन्द्र कुमार 'राघव'

राघवेन्द्र कुमार 'राघव'

शिक्षा - बी. एससी. एल. एल. बी. (कानपुर विश्वविद्यालय) अध्ययनरत परास्नातक प्रसारण पत्रकारिता (माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय जनसंचार एवं पत्रकारिता विश्वविद्यालय) २००९ से २०११ तक मासिक पत्रिका ''थिंकिंग मैटर'' का संपादन विभिन्न पत्र/पत्रिकाओं में २००४ से लेखन सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में २००४ में 'अखिल भारतीय मानवाधिकार संघ' के साथ कार्य, २००६ में ''ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी'' का गठन , अध्यक्ष के रूप में ६ वर्षों से कार्य कर रहा हूँ , पर्यावरण की दृष्टि से ''सई नदी'' पर २०१० से कार्य रहा हूँ, भ्रष्टाचार अन्वेषण उन्मूलन परिषद् के साथ नक़ल , दहेज़ ,नशाखोरी के खिलाफ कई आन्दोलन , कवि के रूप में पहचान |

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कहीं डूबती फसल बाढ़ में कहीं ज़मीं बंजर फटती ।
भारत माँ के कृषक पुत्र की रातें रोते ही कटती ।
डूब कर्ज में फ़र्ज़ की खातिर चुनते ज़हर व फांसी ।
भारत माँ अब आज बन गयी सत्ताधीशों की दासी ।
धरतीपुत्रों की लाशों पर यहाँ खेल सियासी होते हैं ।
जीवनदाता इस धरती पर खून के आंसू रोते हैं ।।
खिलते हुए फूल कितने हर दिन मुरझाते हैं ।
नहीं शर्म आती हमको हम नहीं लजाते हैं ।
मानव ही दानव बनकर हर ओर तांडव करता है ।
यहाँ रहा हो रामराज झूठा – झूठा सा लगता है ।
धर्म चतुर्दिश इस समाज में ठोकर पर ठोकर खाता है ।
सत्य अहिंसा हैं दलदल में ईमान भी मिटता जाता है ।
राज-काज भारत में अब तो विकट पिशाचिक होते हैं ।
धरतीपुत्रों की लाशों पर यहाँ खेल सियासी होते हैं ।
जीवनदाता इस धरती पर खून के आंसू रोते हैं ।।
ग्राम देवता का करते सब तिरस्कार पर तिरस्कार ।
ग्राम तनय शोषित वंचित जीवन फंसा बीच मझधार ।
महंगा पानी पड़ता इनको मगर खून इनका सस्ता ।
समयचक्र के दो पाटों में बनकर घुन किसान पिसता ।
जब-जब मेहनत मजदूरी पर इनकी डाका पड़ता है ।
रोष रक्त बनकर तब इन मजदूरों का बहता है ।
आस न्याय की लिए हुए ये राजनीति में जलते हैं ।
धरतीपुत्रों की लाशों पर यहाँ खेल सियासी होते हैं ।
जीवनदाता इस धरती पर खून के आंसू रोते हैं ।।
खून पसीने की कीमत भी इनकी छीनी जाती है ।
इज्ज़त इनकी पूंजीवादी बिस्तर पर रौंदी जाती है ।
इस समाज ने आज ग़रीबी अर्थहीन कर डाली है ।
तन पहले ही खुला हुआ था अब थाली भी खाली है ।
लोकतंत्र का लोक आज इस लोकतंत्र से गायब है ।
लूटतंत्र का लूटखोर अब आज बन गया नायब है ।
संविधान के सब विधान इन्हें देखकर घुटते हैं ।
धरतीपुत्रों की लाशों पर यहाँ खेल सियासी होते हैं ।
जीवनदाता इस धरती पर खून के आंसू रोते हैं ।।

(राघवेन्द्र कुमार “राघव”)

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