लेखक परिचय

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

जन्म लखनऊ में, पर बचपन - किशोरावस्था जबलपुर में जहाँ पिताजी टी बी सेनिटोरियम में चीफ मेडिकल आफिसर थे ; उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान में स्नातक / स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन करने के पश्चात् भारतीय स्टेट बैंक , केन्द्रीय कार्यालय, मुंबई में राजभाषा विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त ; सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी बैंक में सलाहकार ; राष्ट्रीय बैंक प्रबंध संस्थान, पुणे में प्रोफ़ेसर - सलाहकार ; एस बी आई ओ ए प्रबंध संस्थान , चेन्नई में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर ; अनेक विश्वविद्यालयों एवं बैंकिंग उद्योग की विभिन्न संस्थाओं से सम्बद्ध ; हिंदी - अंग्रेजी - संस्कृत में 500 से अधिक लेख - समीक्षाएं, 10 शोध - लेख एवं 40 से अधिक पुस्तकों के लेखक - अनुवादक ; कई पुस्तकों पर अखिल भारतीय पुरस्कार ; राष्ट्रपति से सम्मानित ; विद्या वाचस्पति , साहित्य शिरोमणि जैसी मानद उपाधियाँ / पुरस्कार/ सम्मान ; राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर का प्रतिष्ठित लेखक सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान , लखनऊ का मदन मोहन मालवीय पुरस्कार, एन सी ई आर टी की शोध परियोजना निदेशक एवं सर्वोत्तम शोध पुरस्कार , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अनुसन्धान अनुदान , अंतर -राष्ट्रीय कला एवं साहित्य परिषद् का राष्ट्रीय एकता सम्मान.

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डा, रवीन्द्र अग्निहोत्री,

प्रतिवर्ष हम आश्विन शुक्ल दशमी को दशहरा मनाते हैं . इस अवसर पर रामलीला में श्री राम के द्वारा रावणवध का कार्यक्रम प्रमुखता से आयोजित किया जाता है. इसके लगभग बीस दिन बाद कार्तिक अमावस्या को दीपावली मनाई जाती है. यह प्रसिद्ध है कि इसी दिन श्री राम अपना वनवास पूरा करके सीता और लक्ष्मण सहित अयोध्या वापस आए थे और वहां उनका अभिषेक हुआ था. अतः इस दिन अयोध्यावासियों ने दीपक जलाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की थी. इस प्रकार दशहरा और दीपावली – दोनों त्योहारों का संबंध रामकथा से माना जाता है. समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जो रामकथा को काल्पनिक मानते हैं, पर अनेक लोग इसे ऐतिहासिक मानते हैं. “ रामकथा : उत्पत्ति और विकास “ पर शोधकार्य करके अंतर-राष्ट्रीय ख्याति अर्जित करने वाले डा. कामिल बुल्के ने भी इसे ऐतिहासिक माना है. आइये, रामकथा के तथ्यों के आलोक में यह देखें कि दशहरा और दीपावली को रामकथा से जोड़ना कितना तर्कसंगत है.

रामायणकालीन इतिहास हमें आज रामकथा से संबंधित काव्यग्रंथों, कतिपय पुराणों, महाभारत, बौद्ध और जैन ग्रंथों में ही उपलब्ध है, पर इन ग्रंथों में रामकथा एक ही रूप में नहीं मिलती. इनमें से वाल्मीकि रामायण को रामकथा का सर्वप्रथम एवं प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है, पर यह ग्रंथ भी अपने मूलरूप में आज सुरक्षित नही. आज इसके तीन संस्करण मिलते हैं और उनके कथानक में बहुत अंतर है. वस्तुतः श्री राम की यह कथा इतनी लोकप्रिय हुई कि बाद में अनेक कवियों ने इस पर काव्यरचना की और उसमें अपनी-अपनी रुचि के अनुसार नए – नए प्रसंगों की उद्भावना की. कुछ लोगों ने नई कृति की रचना करने के बजाय प्राचीन ग्रंथों में ही स्वरुचि के अनुरूप कुछ अंश जोड़ दिए जिन्हें विद्वान लोग “ प्रक्षिप्त “ कहते हैं . इन प्रक्षेपों के कारण ही आज रामकथा के अनेक प्रसंगों के अलग-अलग रूप मिलते हैं. जैसे, सीता को कहीं जनक की पुत्री कहा है, तो कहीं रावण की या दशरथ की पुत्री बताया है, कहीं उन्हें भूमिजा, पद्मजा, रक्तजा आदि कहा है.

आज वाल्मीकि रामायण में सात कांड (बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्धकाण्ड और उत्तरकाण्ड) मिलते हैं, पर विद्वानों का कहना है कि मूल वाल्मीकि रामायण का प्रारम्भ अयोध्या कांड से और समापन युद्ध कांड पर मानना चाहिए, बालकाण्ड और उत्तर कांड तो पूरे के पूरे प्रक्षिप्त हैं अर्थात अन्य लोगों द्वारा बाद में जोड़े गए हैं. इनके अतिरिक्त अन्य कांडों में भी अनेक प्रसंग प्रक्षिप्त हैं. जैसे, अवतारवाद से संबंधित सामग्री, स्वर्ण मृग का वृत्तांत, हनुमान द्वारा लंका – दहन, संजीवनी बूटी की तलाश में हनुमान की हिमालय यात्रा,  रावण वध के बाद सीता की अग्नि परीक्षा, पुष्पक में अयोध्या की वापसी यात्रा आदि. इन्हें प्रक्षिप्त सिद्ध करने के लिए विद्वान लोग अनेक तर्क देते हैं. उदाहरण के लिए उत्तर काण्ड को देखें. कथानक की दृष्टि से इस कांड की सर्वाधिक प्रमुख घटना सीता त्याग की है, पर महाभारत में, या विष्णु पुराण, हरिवंश पुराण, वायु पुराण, नृसिंह पुराण जैसे रामकथा से संबंधित प्राचीन पुराणों में इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता. अध्यात्म रामायण और कंबन की तमिल रामायण में भी इसकी कोई चर्चा नहीं. गुणभद्र कृत उत्तर पुराण में तो लंका से अयोध्या लौटने के बाद सीता के आठ पुत्र उत्पन्न होने की चर्चा की गई है. वहां सीता त्याग की ओर कोई संकेत तक नहीं. महाराज भोज के समय में “ चम्पू रामायण “ लिखी गई, जिसे वाल्मीकि रामायण का संक्षिप्त रूप माना जाता है. इसमें भी केवल युद्ध कांड तक की कथा का वर्णन है. इटली के एक विद्वान गोरेशियो (Gaspare Gorresio – 1808 – 1891) ने वाल्मीकि रामायण का इतालवी भाषा में अनुवाद (1847) किया था. यह यूरोप में रामायण का सबसे पहला अनुवाद था. उसने भी उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त माना और अपने अनुवाद में इसे सम्मिलित नहीं किया. उत्तर कांड को प्रक्षिप्त मानने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि कथा की फलश्रुति (कथा सुनने का लाभ, उसकी महिमा ) कथा के अंत में कही जाती है और वाल्मीकि ने रामकथा की फलश्रुति युद्धकाण्ड के अंत में कह दी है. फिर भी अगर कोई फलश्रुति के बाद कथा को आगे बढ़ा रहा है तो यह प्रक्षिप्त होने का ही प्रमाण है.

जहाँ तक दशहरा और दीपावली का संबंध है, रामायण के अयोध्या कांड के तृतीय सर्ग के अनुसार भगवान राम का राज्याभिषेक चैत्र मास में होना निश्चित हुआ था और उसी अवसर पर उन्हें 14 वर्ष के लिए वनवास हुआ, अर्थात वे चैत्र मास में वन के लिए गए. इस दृष्टि से देखें तो 14 वर्ष की अवधि चैत्र मास में ही पूरी होनी चाहिए, न कि आश्विन या कार्तिक में. जहाँ तक रावणवध का संबंध है, वह हमारी रामलीला का एक प्रमुख कार्य होता है. जिन गोस्वामी तुलसी दास की पहल पर रामलीला का आयोजन शुरू हुआ था, उन्होंने स्वयं अपने रामचरितमानस में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि रावणवध चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को हुआ था. उनके शब्द हैं :

 

चैत्र शुक्ल चौदस जब आयी !

मरयो दशानन जग दुखदायी !!

 

पर हम तुलसी के सन्देश ( चैत्र शुक्ल चौदस ) को भूलकर रावण वध आश्विन मास की शुक्ल दशमी (विजयदशमी) को करने लगे हैं.

रावण वध के बाद उसकी अंत्येष्टि और फिर विभीषण के राज्यारोहण में अधिक समय नहीं लगा. उधर राम भरत के लिए भी चिंतित थे. वनवास की अवधि पूरी होते ही उन्हें अयोध्या अवश्य पहुँचना था, अन्यथा भरत के प्राण त्यागने की आशंका थी. इसी कारण राम ने कुछ दिन लंका में रुकने और विभीषण का आतिथ्य ग्रहण करने के आग्रह को भी स्वीकार नहीं किया. वे अयोध्या वापस आते समय जब भरद्वाज आश्रम में पहुंचे तब चैत्र शुक्ल पंचमी का दिन था.

इस प्रकार स्पष्ट है कि कार्तिक अमावस्या को मनाई जाने वाली दीपावली का रामकथा से कोई संबंध नहीं है. वस्तुतः दीपावली (और होली) निश्चित रूप से इस कृषिप्रधान देश के बहुत प्राचीन त्योहार हैं जिनका संबंध ऋतु परिवर्तन और नई फसल तैयार होने से है. हमारे यहाँ दो मुख्य फसलें होती हैं जिन्हें आज हम रबी और खरीफ कहते हैं. रबी की फसल होली पर और खरीफ की फसल दीपावली पर तैयार होती है. प्राचीन काल में इन पर्वों पर विशाल यज्ञ (हवन) करने की परम्परा थी जिसे “ नवसस्येष्टि ” (नई फसल आने के उपलक्ष्य में किया गया यज्ञ) कहते थे. दीपावली वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर मनाई जाती है. हम जानते ही है कि वर्षा ऋतु में तमाम चीजें सड़ – गल जाती हैं और वातावरण को विषाक्त बना देती है. नाना प्रकार के कीड़े-मकोड़े भी बरसात में उत्पन्न हो जाते हैं जिनसे विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं. अतः हमारे पूर्वजों ने यह परम्परा डाली कि इस अवसर पर घरों की सफाई – पुताई करके विशेष हवन किए जाएँ ताकि वायुमंडल शुद्ध हो जाए.

कालान्तर में इस परम्परा को हम भूल गए और दीपावली पर लक्ष्मी पूजन की प्रथा विकसित हो गई (अगर यह त्योहार भगवान राम से संबंधित होता तो इस अवसर पर उनकी पूजा की जाती, न कि लक्ष्मी की. कृषक के लिए ही नहीं, हम सबके लिए भी अच्छी फसल मानों लक्ष्मी का साक्षात रूप होती है. अतः लक्ष्मीपूजन भी इसी बात का प्रमाण है कि यह कृषि से संबंधित त्योहार है). आधुनिक युग में ऋषिवर दयानंद सरस्वती ने वायुमंडल की शुद्धि के लिए हमें हवन के लाभों से परिचित कराया. अतः अनेक लोग अब दीपावली पर हवन करने लगे हैं, पर जिन तक यह सन्देश अभी नहीं पहुंचा है वे लक्ष्मी की पूजा करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं. कुछ लोग इस अवसर पर मन को अशुद्ध करने वाले कर्म जुआ खेलने को “ शुभकर्म ” मानने लगे हैं. ये लोग दुहाई देते हैं ब्रह्म पुराण की, जिसमें दीपावली के अगले दिन का नाम ही “ द्यूत (जुआ) प्रतिपदा ” रखकर इस तिथि पर प्रभातकाल में जुआ खेलना अनिवार्य बताया गया है. हमने इसे तो पुराण की बात मानकर  अपना लिया, पर जो काम पुराण में भी नहीं बताया गया था हम वह भी करने लगे, और वह है – ध्वनि और वायु को प्रदूषित करने वाली आतिशबाजी. लोगों ने इसे अपनी सम्पन्नता का प्रतीक बना लिया है. बात तो थी दीपावली पर वातावरण को शुद्ध करने की, पर हम तो उसे और अशुद्ध करने लगे हैं.

अतः अनुरोध है कि अब जब दीपावली मनाएं तो उसका सही सन्दर्भ याद रखें, और घर की सफाई करने के बाद वातावरण को अशुद्ध करने वाले काम कदापि न करें, वातावरण को शुद्ध करने के लिए हवन अवश्य करें.

 

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

 

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