लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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-गिरीश पंकज

महान कवि कबीर ही कह गए हैं शायद, कि –

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान.

मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।

आज से छह सौ साल पहले जातिवाद के कारण सामाजिक समरसता पर असर पड़ता देख कर कवि ने जाति विरोधी दोहा लिखा था और समाज को प्रगतिशील दृष्टि से संपृक्त होने की अपील की थी। लेकिन इस नये आधुनिक युग में हम फिर वही मध्ययुगीन मानसिकता की ओर लौटते हुए सामाजिक परिदृश्य का निर्माण करने की जद्दोजहद से गुजर रहे हैं। मैं एक तथाकथित उच्चकुल में जन्मा (इसमें मेरी अपनी कोई भूमिका नहीं थी…) लेकिन 1974-75 के आसपास जब जेपी का जाति तोड़ो आंदोलन चला तो मैंने अपनी जाति हटा दी, क्योंकि मैंने महसूस किया कि व्यक्ति के नाम के साथ जाति चस्पा होने के कारण उसके व्यवहार और उसके साथ व्यवहार करने का नजरिया बदल जाता है। आज भी मैंने देखा है कि तथाकथित उच्च जाति के लोग अपने आप को कुछ ज्यादा ही श्रेष्ठ समझने की भूल करते हैं। उनका पूरा जीवन निहायत घटिया रहेगा, आचरण, व्यवहार, चरित्र, कुल मिलाकर समूची जीवन शैली टुच्चई से भरी होगी, लेकिन वे खुद को समझेंगे श्रेष्ठ, क्योंकि उनकी जाति ऊँची है। अनके ऐसे मित्रों को मैं जानता हूँ, जो केवल इसी आधार पर अपने को ऊँचा मानते हैं कि वे ब्राह्मण हैं। ये लोग मुझे भी अपनी सभाओं में बुलाते हैं, लेकिन मैं वहाँ नहीं जाता। लोग नाराज भी होते हैं, लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। उल्टे एक गर्व की अनुभूति होती है, कि मैं जाति-व्यवस्था के विरुद्ध एक हस्तक्षेप तो कर रहा हूँ। भले ही निपट अकेला हूँ। लेकिन हूँ तो।

हम लोग लाख आधुनिक समाज होने का दावा करें, लेकिन जो जातीय व्यवस्था बन गई है, उसे बाहर निकलना अब मुश्किल ही नज़र आता है। और ऐसे समय में जब जाति के आधार पर आरक्षण और अन्य सुविधाओं का लाभ दिजा जा रहा हो, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएँ चल रही हैं और चलायी जाने वाली हों, तब तो जातीय आधारित जनगणना को रोकना मुश्किल ही है। ऐसे समय में अगर इसका विरोध किया जाएगा, तो साफ-साफ लगेगा कि हम इन जातियों को दिए जाने वाले लाभ के पक्ष में नहीं है। ऐसी स्थिति में जाहिर है कि सामाजिक समरसता खत्म होगी और आपसी विद्वेष ही बढ़ेगा इसलिए समय का यही तकाजा है कि जातीय आधारित जनगणना होने दी जाए, लेकिन अगली जनगणना फिर कभी न हो, यह संकल्प लिया जाए।

शुरू में ही स्पष्ट कर चुका हूँ, मैं जातिवाद के विरुद्ध हूँ। मैं यह भी मानता हूँ कि हम सब को अपनी एक ही जाति दर्ज करवानी चाहिए वो है भारतीय या हिंदुस्तानी, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर ऐसा संभव नहीं है। भावुकता में हम ऐसा कर भी लें मगर बहुसंख्यक वर्ग ऐसा नहीं करेगा। सबको अपनी-अपनी जाति पर अभिमान है। कुछ को अभिमान है, कुछ को यह लालच है कि इसी बहाने कुछ सुविधाएँ मिलेंगी। हालत तो यह है कि सुविधाओं की चाह में अब कुछ सवर्ण अनुसूचित जाति में शामिल हो गए हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि सवर्ण बने रहकर भी क्या होगा? अनुसूचित जाति में दर्ज हो जाएँगे, तो कुछ लाभ तो मिलेगा। जहाँ तक जाति आधारित जनगणना का सवाल है, इसे अब होने ही देना चाहिए। एक बार पूरा आँकड़ा तो सामने आ जाए कि पिछले साठ सालों में किस जाति के कितने लोग हैं। किसकी आबादी कितनी बढ़ी। जब संविधान में आरक्षण का प्रावधान है तो उसके अनुपालन की दृष्टि से भी यह जरूरी है। आखिर जो वंचित वर्ग है, अनुसूचित जाति-जनजाति है, उसके उन्नयन के लिए योजनाएँ तो बनानी ही है। और यह तो मानना ही पड़ेगा कि आरक्षण का लाभ मिला है। आरक्षण के कारण ही आज अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग मुख्यधारा में शामिल हो सके हैं और सिर उठा कर जी रहे हैं। अगर यह व्यवस्था न होती तो कल्पना कीजिए कि कैसा समाज बना होता। हम लोग जब छोटे थे तो आदिवासियों के छात्रावास देखते थे, उनको अनेक सुविधाएँ मुफ्त दी जाती थीं, यह देख कर दुखी होते थे और उनको सरकारी दामाद कहा करते थे। लेकिन अब उस वक्त की अपनी बचकानी सोच पर हँसी आती है। आज सोचता हूँ, तो लगता है कि यह कितना महत्वपूर्ण काम हो गया। आदिवासी बच्चों को हमने सुविधाएँ दीं, उनको पढ़ाया-लिखाया तो बाद में समाज के काम ही आये। कही कोई सरकारी नौकरी कर रहा है, कहीं अपना रोजगार कर रहा है। हमारी आरक्षण की नीति ने उनको अपने पैरों पर खड़ा कर दिया। अगर उन्हें यह सुविधा नहीं मिली होती तो वे आज भी अनपढ़ रहते और जंगल में तेंदूपत बीन रहे होते या कुछ और कर रहे होते। मगर राष्ट्र की मुख्यधारा से कटे रहते। मैं आज जब अपने साथ पढऩे वाले आदिवासी मित्र को एक ऊँचे पद पर देखता हूँ, तो बेहद खुशी होती है। हम लोग उसके घर जाया करते थे। वह संकोच से भरा रहता था। लेकिन पिछली बार जब मैं उससे मिला तो उसके चेहरे पर हीनता का वह बोध नजर नहीं आया। आरक्षण के कारण स्वाभिमान भी लौटा है। अगर जाति आधारित जनगणना की व्यवस्था नहीं होती और हर कोई भारतीय ही होता तो जो बेचारा जंगलों में रहता है, जो सदियों पुरानी जाति-वर्ण व्यवस्था के कारण पहले से ही हाशिये पर है, वह तो और पीछे रह जाता।

पिछड़ों को आगे बढ़ाने के भाव से अगर जातीय आधारित जनगणना होती है, तो इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन अब यह सिलसिला बार-बार दोहराना नहीं चाहिए। इसके कारण समाज में कटुता की भावना बढ़ती है। सदियों पहले जाति व्यवस्था बना दी गई। उस समय तात्कालिक सोच भी रही हो। समाज ने उस व्यवस्था के तहत एक आकार ले लिया है। अब इसे कोई ताकत खत्म नहीं कर सकती, लेकिन इतना तो हो सकता है, कि हम जातीय विद्वेष न फैलाएँ। वर्ण व्यवस्था का पुरातन ढाँचा तो अब टूटता ही जा रहा है। ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र और क्षत्रिय वाली व्यवस्था तो खत्म हो गई है। जिसे जो काम उचित लग रहा है, वह कर रहा है। पहले जाति के अनुसार कर्म होता था, अब कर्म के आधार पर नई मानव जाति बन रही है। ऐसा जाति जो केवल हिंदुस्तानी है। सोने का काम करने वाला व्यक्ति जरूरी नहीं कि वह सोनार ही हो। चर्मकारी कर रहा व्यक्ति ब्राहमण भी हो सकता है। होटल में गो मांस बेचने या खाने वाला वाला कोई जैनी, बनिया या ब्राह्मण भी हो सकता है। कहने का मतलब यह कि जाति के आधार पर किसी के काम का मूल्यांकन हम नहीं कर सकते। तो जाति व्यवस्था टूटती जा रही है। ऐसे समय में अगर सरकारी स्तर पर जातीय आधारित जनगणना हो रही है, तो उसके पीछे के उद्देश्यों को समझने की जरूरत है। इसका एक ही कारण है, कि जो पिछड़ी जातियाँ हैं, उन्हें सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिल सके। यह हमारा सामाजिक ही नहीं, राष्ट्रीय कर्तव्य भी है। जो पिछडे रह गए हैं, उन्हें अपने साथ ले कर चलने वाला राष्ट्र ही तरक्की कर सकता है। यह कैसे संभव है कि कुछ लोग प्रगति करते रहें और कुछ लोग अभी भी कंदराओं में रहें और कहा जो कि साहब सब लोग अपनी-अपनी योगय्ता के अनुसार अवसर पाएँ। आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। जंगल में रहने वाले वालक और कम्प्यूटर और इंटरनेट पर बैठने वाले एक बालक की मेधा को हम बराबर मानें तो यह हमारा पाखंड होगा और यह मान कर चला जाएगा कि हम साजिशन यह चाहते हैं, कि आदिवासी या अन्य पिछडे वर्ग का बालक पीछे हीरह जाए। इसलिए हमें उसे आरक्षण देना ही होगा। तभी वह सामने आ सकेगा। इस दृष्टि से अगर जातीय आधारित जनगणना हो रही है, तो उसका स्वागत करने में कोई दिक्कत नहीं। लेकिन अगर इसके पीछे राजनीतिक सोच हैं,वोट का टुच्चा गणित है तो यह दुर्भाग्यजनक है। व्यक्ति या जाति को हम केवल वोट के रूप में देखते हैं तो यह बौद्धिक दिवालियापन है। तब हमें अपने आपको सभ्य कहने का हक नहीं। तब हम बहुत बड़े माफिया है। अपराधी हैं। लोहिया जातिवाद के खिलाफ थे। मगर वे आरक्षण के भी पक्ष में थे क्योंकि आरक्षण से हम पिछड़े वर्ग के लोगों को आगे ला सकते हैं। फिर भी जिनको अपनी जाति हिंदुस्तानी दर्ज करवानी है, वे दर्ज करवाएँ, लेकिन जो वंचित वर्ग के हैं, जो पिछड़े हैं, जिनको आरक्षण और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सकता है, वे अपनी सही जाति दर्ज करवाएँ। इसे अन्यथा लेने की जरूरत नहीं है। हाँ, इस बात का जरूर ध्यान रखा जाए कि समाज में जातीय विद्वेष न फैले। छोटी या बड़ी जाति के आधार पर प्यार और नफरत का खेल न हो। हमें एक प्रगितिशील और खुशहाल भारत का सपना साकार करना है, वह तभी संभव है, जब हम वंचितों और पिछड़ों को भी साथ में लेकर चलेंगे और उनका पता हम भी लगा सकेंगे जब जातीय आधारित जनगणना होगी। इस दृष्टि से तो मैं भी जातीय आधारित गणना के पक्ष में हूँ। ये और बात है कि मैं खुद जातिवाद के विरुद्ध हूँ। मैं अपनी जाति नहीं लिखता, लेकिन जो पिछड़ी जाति के लोग हैं, उन्हें हम आदर्शवाद नहीं थोप सकते। अभी उनके विकास का समय है। उनको अभी और आगे बढऩा है। इसलिए देश को यह हक है कि वह पता करे कि किस जाति के कितने लोग हैं और किस-किसको मदद की जरूरत है। मैंने देखा है कि सवर्ण लोग जातीय आधारित जनगणना का ज्यादा विरोध कर रहे हैं। क्योंकि उनके मन में कहीं न कहीं यह भाव है कि इससे उनके बच्चों के अवसर छिन जाएँगे, लेकिन वे भ्रम में हैं। कोई किसी का अवसर नहीं छीन सकता। प्रतिभा अपना रास्ता बना लेती है। हाँ, इतना जरूर है कि किसी-किसी को कुछ अतिरिक्त प्रोत्साहन देने के लिए पक्षपात तो करना ही पड़ता है। अपने घर के किसी कमजोर बच्चे को भी आगे बढ़ाने के लिए हम इसी तरह का जतन करते हैं। कोई बच्चा किसी प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय या तृतीय स्थान नहीं प्राप्त कर पाता तो हम उसे प्रात्साहन पुरस्कार तो देते ही है। आरक्षण एक तरह का प्रोत्साहन पुरस्कार ही है। प्रोत्साहन पुरस्कार पाकर कितने ही लोग भविष्य में सफल नागरिक बन कर उभरे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। इस तरह मैं अंत में यह मानता हूँ कि जातिवाद बुरी चीज है, सभ्य समाज में इसका कोई स्थान नहीं होना चाहिए। अपने स्तर पर मैंने इसका अनुपालन किया है लेकिन जहाँ तक राष्ट्र की बात है, यह स्पष्ट है कि आज भी बहुत-सी जातियाँ पिछड़ी हुई हैं, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है कि वे सब सूचीबद्ध हों। लेकिन इसके पीछे मंशा केवल उनका विकास ही हो, वोट की राजनीति बिल्कुल ही न हो।

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3 Comments on "जाति न पूछो साधु की…."

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अभिषेक पुरोहित
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kon mana kar raha he ki vanchit bandhuo ko age ane ka avasar na mile??ya ir unako saman na samjha jaye????ya uanke sath vyvahar achchha nahi kiya jaye????koe esa kah rha he???koe jati esa kah rahi he???koe nahi.lekin arkshan ke nam par pratibha ko dabana apane pero par kuladi marane jesa he,ye to ap manege hi na ki etana arkshan dene ke bad bhi hamesha genral v sc/st ki exams ki cut off marks me bahut antar hota he,kyo??or jese hi saman cut off rakhi jati he to reserved candidates hi nahi milate he or vo post back lock me… Read more »
sunil patel
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गिरीश जी का कथन एक द्रष्टिकोण से सही है इससे कमजोर वर्ग को फायदा मिलेगा. जब किसी कार्य का उदेश्य अच्छा हो तो वह लागू होनी चाइए. किन्तु जब उदेश्य में खोट हो तो फल भी कडवा होगा. यह तो अगले दस या पंद्रह साल बाद ही पता चलेगा की इससे कितना फायदा या नुक्सान हुआ है. किसी घाव को जितना कुरेदो उतना ही दुखेगा और तजा रहेगा. आरक्षण का फायदा तो जब है जब किसी गरीब को मिले. कितने सम्पन्न परिवार ने आरक्षण का फायदा छोड़ा किसी गरीब के लिए. यह एक कोरी कल्पना है. जातिगत गड़ना की मलाई… Read more »
पंकज झा
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पंकज कुमार झा.
बिल्कुल सही एवं सबल चिंतन ….अच्छी चिंता भी.सवाल ना जाति का है और ना उससे देश का कुछ बनना बिगड़ना है. वैसे इतना अकुछ बिगड़ा हुआ ही है कि अब क्या बिगड़ जाएगा इस जाति आधारित जनगणना से? अगर मंडल आयोग की बदतमिज़ियों, लालू, मुलायम, रामविलास, मायावती जैसे अभागों के बावजूद देश टूटने से बचा हुआ है. अगर पूरी की पूरी राजनीति को जाति के आधार पर विभक्त कर दिया गया है. राबडी-लालू के जातिवादी कुशाशन के बावजूद बिहार ज़िंदा रहा, मधु कोड़ा के बावजूद झारखंड, और सबसे बड़ी बात यह कि हर तरह के तुष्टिकरण द्वारा देश को बेचते… Read more »
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