लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-
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तत्काल बारिश का जिस तेजी से पूरे मध्य प्रदेश में विस्तार हुआ है, उससे लगता है कि सूखे की भयावह समस्या से एक हद तक प्रदेश सरकार निजात पा लेगी। फिर भी सूखे की आशंका से सचेत रहते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री ने आपात स्थिति से निपटने का जो भरोसा जताया है और उसके लिए जो अर्थ-प्रबंध किया है, यह एक अच्छी पहल है। कमजोर मानसून मध्य प्रदेश में ही नहीं, पूरे देष में है। लेकिन प्रदेश की दयनीय स्थिति इसलिए है, क्योंकि अभी प्रदेश की खेती का बहुत बड़ा हिस्सा सिंचाई साधनों से अछूता है। बिजली की कमी है। गांवों से ज्यादा बिजली शहरों को दे दी जाती है। समय पर वर्षा नहीं होने के कारण प्रदेश के ज्यादातर जलाशयों में जलस्तर भी गिर गया है। इस कारण न तो पूरे सिंचित रकबे में पानी पहुंचाया जा सकता है और न ही बिजली का उत्पादन किया जा सकता है ? प्रदेश में विडंबना यह भी है कि जितने भी बड़े बांध हैं, वे शहरी आबादी की प्यास बुझाने का काम भी करते हैं। जाहिर है, अवर्षा की हालत में सूखे से निपटना मुश्किल काम है। प्रदेश में अभी तक खरीफ फसल की बुवाई 9 लाख 85 हजार हेक्टेयर में हो पाई है। जबकि इस साल बुवाई का लक्ष्य का रकबा 130 लाख 20 हजार हेक्टेयर रखा गया था। मसलन लक्ष्य के विरुद्ध महज 7 फीसदी ही बुनाई हो सकी है। पिछला साल 26 जून तक ही 74 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि पर बुवाई हो चुकी थी। ज्यादातर किसानों ने सोयाबीन की फसल बोई थी। अब बारिश की शुरुआत होने के बाद यह उम्मीद करना मुश्किल है कि इतने बड़े रकबे में सोयाबीन की बोनी संभव हो पाएगी। क्योंकि अभी बारिश का आंकड़ा 63 फीसदी कम है। अब तक औसतन जिलों में 45 से 60 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है।

यह अच्छी बात है कि प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने सूखे जैसी आपात स्थिति से निपटने के लिए 100 करोड़ रुपए की धनराशि का इंतजाम कर लिया है। बीज उपलब्धता के लिए 40 करोड़ रुपए कृषि विभाग को उपलब्ध करा दिए हैं। अब जरूरत है कि जरूरतमंद किसान को मोटे अनाज की उपलब्धता हासिल कराई जाए। क्योंकि किसान अपनी जमा पूंजी सोयाबीन का महंगा बीज खरीदने में खर्च कर चुका है। उसकी जेब कमोबेश खाली है। सोयाबीन बोने का समय भी लगभग निकल चुका है। अब किसान के पास दो ही विकल्प हैं कि जहां सिंचाई सुविधाएं और सिंचाई जल बहुतायत में हैं, वहां किसान धान रोपने का काम करें अथवा मोटा अनाज बोएं। नकद फसल होने के कारण सोयाबीन पैदा करने के फेर में प्रदेष के ज्यादातर किसानों ने मोटा अनाज बोना बंद कर दिया है, जाहिर है, उनके पास अपना बीज तो होने से रहा ? बाजार से गुणवत्ता युक्त बीज खरीदना होगा। लिहाजा सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह मोटे अनाजों का बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराए। दरअसल मोटे अनाजों को पानी की जरुरत कम पड़ती है, इसलिए कम वर्षा के चलते इन्हीं फसलों को बोने से संतोषजनक पैदावार की आशा की जा सकती है।

अवर्षा और सूखे से बने हालात से प्रदेश सरकार को सबक भी लेने की जरूरत है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन और अलनीनो का प्रभाव जिस तरह से मानसून को प्रभावित कर रहा है, उससे सचेत रहते हुए एहतियाती कदम उठाने की जरूरत है। सोयाबीन की फसल की पैदावार करने से पहले तक प्रदेश की कृषि भूमि पर बड़ी मात्रा में विभिन्न दालें, तिलहन, मक्का, ज्वार, मूंगफली व अन्य शुष्क फसलें पैदा की जाती थीं। किंतु नकद धनराशि देने वाली सोयाबीन के सम्मोहन और सरकारी नीतियों के प्रोत्साहन ने किसान की ऐसी मानसिकता बना दी कि उसने तमाम मोटे अनाजों की पैदावार से मुंह ही फेर लिया। यही वजह है कि आज बाजार में कठिया गेहूं, ज्वार, बाजरा, कोंदो, कुटकी और पसाई धान के चावल ढूंढ़े नहीं मिलते हैं। जबकि मध्य प्रदेश ही नहीं संपूर्ण भारत हरित क्रांति के पहले तक दाल और तिलहनों के मामले में आत्मनिर्भर था। आज देश को ये वस्तुएं आयात करनी पड़ती हैं। इसमें बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होती है और महंगाई भी बढ़ती है। जाहिर है, बहुफसलीय खेती समय की मांग है।

पंजाब जिसे हम आदर्श खेती का उदाहरण मानते हैं, उसने अपने यहां इस एकरूपता को खत्म करके बहुफसलीय खेती को सरकारी स्तर पर प्रोत्साहन देने की शुरुआत की है। वहां के कृषि वैज्ञानिकों ने भी सरकार को सलाह दी है कि खेती में विविधता न केवल भूजल स्तर को बनाए रखने में उपयोगी होगी, बल्कि फसलों की पैदावार में जो एकरूपता आ गई है, उसे भी विविधता में बदला जा सकेगा। इसके अलावा मोटे अनाज प्रोटीनयुक्त होने के कारण स्वास्थ्य के लिए लाभदायी भी होते हैं, क्योकि इनके पैदा के लिए रासायनिक खादों और कीटनाषकों की बड़ी मात्रा जरूरत नहीं पड़ती है।
भविष्य में सूखा, किसान और प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए संकट न बने, इसके लिए शिवराज सिंह सरकार को चाहिए कि मोटा अनाज उत्पादक किसानों को प्रोत्साहित करे व पर्याप्त संरक्षण दे। इस मकसद पूर्ति के लिए सरकार मोटे अनाज के दायरे में आने वाली फसलों को गेहूं-चावल की तरह न्यनूतम समर्थन मूल्य पर खरीदना शुरू करे। साथ ही सीमांत और छोटी जोत के किसानों को वैकल्पिक बीजों के साथ, सहकारी बैकों से ब्याज मुक्त कर्ज भी दिलाए ? क्योंकि अब सहकारी बैंकों ने लघु कृषि भूमि वाले किसानों को किसी भी तरह का कर्ज देना बंद कर दिया है। इन किसानों की आर्थिक स्थिति बहाल रहे, इसके लिए जरूरी है कि मनरेगा के तहत इन्हें सौ दिन की बजाय, डेढ़ सौ दिन की मजदूरी दिलाई जाए और इस पर निगरानी के लिए एक ऐसी समिति हो, जिसके सदस्य सामाजिक क्षेत्र के गणमान्य नागरिक भी हों। यदि ऐसे उपाय नहीं किए गए तो आमदनी में तरलता नहीं बनी रहेगी तो किसान और कृषि आधारित मजदूर भुखमरी के दायरे में आकर आत्महत्या को विवश होंगे।

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