लेखक परिचय

इफ्तेख़ार अहमद

मो. इफ्तेख़ार अहमद

लेखक इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के अनुभवी पत्रकार है। वर्तमान में पत्रिका रायपुर एडिशन में वरिष्ठ सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं और निरंतर लेखन कर रहे हैं। कई राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में इनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। पत्र पत्रिकाओं के लिए लेख मंगवाने हेतु 09806103561 पर या फिर iftekhar.ahmed.no1@gmail.com पर संपर्क करें.

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kartikमोहम्मद इफ्तेखार अहमद,
सीबीएसई से साइंस साइड से 96त्न अंके के साथ इसी वर्ष 12वीं पास करने वाले एक नेत्रहीन छात्र कार्तिक साहनी ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। साहनी का आरोप है कि विकलांग बच्चों के लिए नीति बनाते समय विकलांगों के किसी संगठन को शामिल नहीं किया जाता है। बल्कि, एक आईएएस अफसर खुद ही विकलांगों को लेकर निर्णय ले लेता है। इसलिए कई बार ऐसे निर्णय गलत और अव्यवहारिक होते हैं। इसके अलावा देश में शिक्षा व्यवस्था की इस स्थिति का कारण गिनाते हुए कार्तिक बताते हैं कि कोई रिसर्च नहीं करता है। जानकारी का अभाव और असंवेदनशील रवैया दो ऐसी चीजें हैं, जो भारत में बहुत ज्यादा है।

दरअसल साहनी नेत्रहीन होने के बावजूद 12वीं में साइंस विषय लेने की ठान ली। इसके बाद स्कूल से लेकर सीबीएसई तक सभी ने उसके फैसले का विरोध किया। अपने स्कूल से लेकर सीबीएसई तक को उन्हें समझाना पड़ा कि वह साइंस विषय क्यों लेना चाहते हैं और फिर इसकी पढ़ाई कैसे करेंगे? बड़ी जद्दोजहद के बाद साइंस विषय मिला। इसके बाद उन्हेंने 96 प्रतिशत अंक हासिल कर अपनी काबिलियत भी साबित कर दी है। लेकिन, इस कामयाबी के साथ ही एक बार फिर संघर्ष ने उनका पीछा करना शुरू कर दिया है। अब वह 12वीं पास करने के बाद एक बार फिर देश के सबसे बड़े आईटी संस्थान में पढऩे के लिए जब आईआईटी से संपर्क कर ये जानना चाहा कि क्या वहां से कोई नेत्रहीन छात्र कंप्यूटर इंजीनियरिंग कर सकता है, तो कंप्यूटर साइंस विभाग के हेड ने ये पूछा कि नेत्रहीन होने की वजह से काम कैसे करोगे? कंप्यूटर साइंस विभाग के हेड के इस सवाल पर कार्तिक साहनी गम्भीर सवाल उठाते हुए पूछते हैं कि जब आईआईटी के कंप्यूटर साइंस के एचओडी को ये नहीं पता कि स्क्रीन रीडर या टेक्स्ट टू स्पीच टेक्नॉलॉजी क्या होती है तो यह चिंताजनक स्थिति है। अपने देश की इस स्थिति से दुखी होकर कार्तिक आगे की पढ़ाई पूरा करने के लिए अमरीका के स्टैंफर्ड जा रहे हैं।

ये तो थी एक विक्लांग छात्र की कहानी। देश में नॉर्मल छात्रों की स्थिति इससे कुछ अलग नहीं है। मौलिक रिसर्च और उसके इम्पलिमेंटेशन का प्राय: हर जगह अभाव नजर आता है। किसी भी कोर्स की बुनियाद उसकी विषय वस्तु होती है। विषय वस्तु जितनी उपयोगी होगी उसको पढ़कर निकलने वाले विद्वान की काबिलियत भी उसी स्तर की होगी। लेकिन, हमारे देश का दुर्भाग्य ये है कि सिलेबस के मोडीफीकेशन पर बिल्कुल ही ध्यान नहीं दिया जाता है। वर्षों पुराने और कॉपी पेस्ट की नीति के कारण नए-नए संस्थान आने और उद्योगों की जरूरत और टेक्नोलॉजी बदलने के बावजूद सिलेबस में बदलाव उस स्तर पर नहीं किया जाता है। और वर्षों तक नीरस और अनुपयोगी सिलेबस की पढ़ाई बदस्तूर चलती रहती है। औद्योगों की जरूरत के हिसाब से कोर्स शुरू करने की बात तो बहुत होती है। लेकिन, उद्योगों की बदलती तकनीक और जरूररत के हिसाब से सिलेबस में बदलाव नहीं किया जाता है।

अपने सर्किल के दोस्तों से होने वाली बात चीत और खुद अपनी पढ़ाई के दौरान जो अनुभव हुआ। वह भारत में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की अस्लियत समझने के लिए काफी होगा। एक दोस्त जो कि एनआईटी, रायपुर से मेटेलर्जी से बी-टेक कर रहा था। जब उनसे इस मुद्दे पर बात हुई तो उन्होंने अपने संस्थान में अपने विषय की स्थिति बताते हुए बोला कि भाई जान क्या बताऊं? मैं मेटेलर्जी का स्टूडेंट हूं। मेरा चार साल का कोर्स है। लेकिन, पिछले तीन साल से सीविल इंजीनीयिरिंग की पढ़ाई कर रहा हूं। जो मेरा विषय है वह मुझे सिर्फ आखिरी के एक वर्ष में पढ़ाया जाएगा। इसी प्रकार बीडीएस में पढ़ाई कर रहे एक दोस्त ने बताया कि हमारे यहां वह दवाइयां अब भी हमारे सिलेबस में शामिल हैं, जो सालों पहले बंद हो चुकी है।

हमारा भी अनुभव इससे कुछ अलग नहीं रहा है। जब मैं स्वयं कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की पढ़ाई कर रहा था। तब हमें भी इस समस्या से दो चार होना पड़ा। दरअसल हमरे सिलेबस के आईटी सेक्शन में प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से संबंधित ऐप्लीकेशन सॉफ्टवेयर की जगह हार्डवेयर और नेटवर्किंग को जोड़ा गया था। जब इसकी पढ़ाई शुरू हुई तो हमने इसकी उपयोगिता पर सवाल उठाए। लेकिन, इस ओर ध्यान देने के बजाए टरकाने की कोशिश शुरू हुई। लिहाजा, छात्रों ने स्ट्राइक की। मामला कुलपति डॉ. सच्चीदानन्द जोशी साहब तक पहुंची। उन्होंने इसे गंभीरता से लिया और तत्काल प्रभाव से सिलेबस को बदलने की प्रक्रिया शुरू करवाई।

दरअसल इस तरह की समस्या इसी लिए आती है। क्योंकि लोकतंत्र और सहभागिता की बात तो की जाती हैं। लेकिन, किसी भी कोर्स को डिजाइन करते वक्त पूर्व छात्रों या फिर छात्रों से संबंधित संगठनों को शामिल ही नहीं किया जाता है। इतना ही नहीं किसी भी संस्थान के पास इसके लिए भी समय नहीं है कि अपने पूर्व छात्रों से ये फीडबैक हासिल कर सकें कि उन्होंने जिस सिलेबस की पढ़ाई की है। उससे उन्हें फिल्ड में कितनी मदद मिली? अगर ऐसा नहीं है तो इसे कैसे उपयोगी बनाया जा सकता है? ताकि, प्रोफेशनल कोर्स करके बाहर जाने वाले छात्र फील्ड में अपने आपको अनट्रेंड महसूस नहीं करे।

यहीं वजह है कि आज प्रोफेशनल कोर्स करने के बाद भी देश का नवजवान बेरोजगार घूमते है। इलेक्ट्रिक इंजीनीयरिंग का कोर्स करने के बाद भी एक फ्यूज जोडऩे में उनके हाथ-पांव फूलने लगते हैं। यही स्थिति कमोबेस सभी क्षेत्र से निकलने वाले प्रोफेशनल्स की होती है। प्रोफेशनल कोर्स करने के बाद भी क्वालीफाइड प्रोफेशनल्स फिल्ड में आकर एक अजनबी की तरह प्रायौगिक ज्ञान लेकर ही कुछ कर पाते हैं।

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