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विनोद उपाध्याय

एकलव्य हूँ मैं ढूँढ़ता

हे द्रोण कहाँ हो ,

एकाकी शर संधान से

हे तात ! उबारो।

प्रश्न नहीं मेरे लिये

बस एक अंगूठा ,

कर लिये कृपाण हूँ

लो हाथ स्वीकारो।

है चाह नहीं देव !

अर्जुन की धनुर्धरता ,

एकलव्य ही संतुष्ट मैं

बस शिष्य स्वीकारो।

श्रीकांत मिश्र कांत की पंक्तियां आधुनिक भारत के एकलव्य की व्यथा को दर्शा रही हैं। महाभारत के पात्र एकलव्य को शिक्षा के लिए जिस तरह उपेक्षा झेलनी पड़ी थी, इसी प्रकार की उपेक्षा मध्यप्रदेश के आदिवासी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के बालकों को झेलना पड़ रही है और आगे भी पड़ सकती है, क्योंकि जिस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने पद भार संभालते ही अपना अधिकतर समय इनके बीच गुजारने का ऐलान किया और जिस सरकार के मुख्यमंत्री ने उनके सम्मान में यात्रा निकाली उसी सरकार के आदिमजाति तथा अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के आदिवासी मंत्री कुंवर विजय शाह की हठधर्मिता के कारण केन्द्र से मिली एकलव्य विद्यालयों की सौगात अधर में लटकी हुई है।

मप्र आदिवासी बहुल राज्य है। प्रदेश में सरकार बनवाने में आदिवासियों के वोट महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिसको देखते हुए राजनीतिक पार्टियों द्वारा इन्हें हर बार लोकलुभावन वायदों के जाल में फांसने का क्रम चलता है। कहा जाता है कि मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल इलाकों में चुनावी आग हमेशा अंदर ही अंदर धधकती रहती है लेकिन धुंआ दिखाई नहीं पड़ता है। सूबे में किसी की सरकार बनाने और बिगाडऩे में आदिवासियों की अहम भूमिका रहती है। आदिवासियों ने जब जब जिसका साथ दिया सरकार उसी की बनी। बीते 2003 के चुनाव में आदिवासी बहुल इलाकों में भाजपा को हर जगह बड़ी सफलता मिली थी। राज्य में आदिवासी दबदबे वाली लगभग पचपन सीटें हैं। बघेलखंड, महाकौशल, उज्जन , इंदौर से लेकर झाबुआ तक इनका विस्तार है। आमतौर पर आदिवासियों के बीच कांग्रेस ही प्रभावी रही है। लेकिन संघ परिवार के संगठन वनवासी आश्रम भी इनके बीच सक्रिय रहा है। धार, बाडवानी , खरगौन और बैतूल में इसीलिये जनसंघ के जमाने से पार्टी को वोट मिलते रहे हैं। विपरीत इसके झाबुआ, शहडोल, सीधी, रतलाम में समाजवादी पार्टी की पकड़ रही है। लेकिन प्रदेश भाजपा की कमान जब से प्रभात झा ने संभाली है उन्होंने आदिवासियों के वोट पर एकतरफा कब्जा जमाने की कवायद शुरू कर दी लेकिन लगता है कि पार्टी अध्यक्ष की मंशा पर उन्हीं की सरकार के मंत्री और नौकरशाह पानी फेर देंगे।

‘आम तौर पर आदिवासी चौथी या पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं, इससे वे न तो खेती के लायक रहते हैं और न ही नौकरी के। इसलिए आदिवासियों की तकदीर और तस्वीर बदलने के लिए केंद्र देशभर के आदिवासी क्षेत्रों में नवोदय विद्यालयों की तर्ज पर ‘एकलव्य आवासीय विद्यालय खोलने जा रही है। उल्लेखनीय है कि केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय ने 30 जून 2010 को आगामी वर्ष 2010-11 के लिए 50 एकलव्य विद्यालय स्वीकृत किए हैं। इस मामले में केन्द्र सरकार ने मध्यप्रदेश को अन्य राज्यों से अधिक प्राथमिकता देते हुए अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों के लिए 6 नये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय खोलने की स्वीकृति एक साथ प्रदान की है।

जिन नये आवासीय विद्यालयों को मंजूरी दी गई है उनमें अलीराजपुर जिले के सोंडवा में, खंडवा जिले के विकास खंड खालवा के ग्राम रोशनी में, शहडोल जिले के सुहागपुर विकास खंड मुख्यालय में, बालाघाट जिले के बैहर विकास खंड के ग्राम उकवा, झाबुआ जिले के राणापुर विकास खंड के मोरडुडिया एवं छिदंवाड़ा जिले के बिछुआ विकास खंड के ग्राम सिंगारदीप हैं। अभी इन विद्यालयों को बनाने की कार्ययोजना भी नहीं बन पाई थी की केन्द्र ने दो और एकलव्य विद्यालय की सौगात दे दी। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में वर्तमान में 12 एकलव्य विद्यालय संचालित हो रहे हैं। ये विद्यालय झाबुआ जिले के थांदला, धार के कुक्षी, बड़वानी, रतलाम के सैलाना, बैतूल के शाहपुर, सिवनी के घंसौर, अनूपपुर के अलावा मंडला जिले के सिझौरा, छिदंवाड़ा जिले के जुन्नारदेव, उमरिया के पाली, डिंडौरी एवं सीधी जिले के टंसार में हैं। इन विद्यालयों में लगभग 3750 विद्यार्थियों को सी.बी.एस.सी. पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई कराई जा रही है। इन शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों को ऐकेडेमिक शिक्षा के साथ-साथ कम्प्यूटर शिक्षा, व्यक्तित्व विकास प्रशिक्षण, भोजन, गणवेश, पुस्तकें, स्टेशनरी एवं लायब्रेरी की सुविधा नि:शुल्क उपलब्ध कराई जा रही है।

नवीन एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय में आदिवासी छात्र-छात्राओं को बेहतर व गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने के लिए मार्गदर्शिका में मंत्रालय द्वारा कई आमूल-चूल संशोधन किए गए हैं। इन संशोधन के अनुसार, राज्य में एक नवीन एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय स्थापित करने के लिए राज्य सरकार को पूर्व में 2.50 करोड़ रुपये के राशि के स्थान पर अब अधिकतम 12.00 करोड़ रुपये दिये जा सकते है। इसके अतिरिक्त नव संशोधित मार्गदर्शिका में विद्यार्थियों की अधिकतम सीमा को 420 से बढा़कर 480 किया गया है । साथ ही बढ़ी कीमतों व बेहतर सुविधाएं प्रदान करने की दृष्टि से, अब प्रत्येक विद्यार्थी पर 17,000 रुपए प्रति वर्ष के स्थान पर 42,000 रुपए प्रति वर्ष देय होगा। बच्चों के खेलने व अन्य गतिविधियों के लिए जगह की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, नवीन मार्गदर्शिका में एकलव्य विद्यालय की स्थापना के लिए 20 एकड़ भूमि की अनिवार्यता रखी गयी है। विद्यार्थियों के सर्वागीण विकास हेतु अन्य सुविधाओं के लिए आवश्यक प्रावधान भी इन नवीन मार्गदर्शिता में समाहित किये गये है। इसलिए मध्यप्रदेश को सर्वप्रथम कुल 72.00 करोड़ रुपये स्वीकृत किये गये है जिसमें से 36.00 करोड़ रुपये वर्ष 2010-11 में दिये जा रहे है ।

नई मार्गदर्शिका के अनुसार उक्त विद्यालयों का निर्माण उच्च कोटि का हो तथा निर्माण कार्य निर्धारित अवधि 2 वर्ष में पूरा हो जाये, जिससे अनुसूचित जनजाति के बच्चे इन नवीन एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों में उच्च गुणवत्ता की शिक्षा का लाभ शीध्र प्राप्त कर सके। उल्लेखनीय है कि अगर इस योजना में किसी भी प्रकार की देरी होती है और निर्माण कार्यों की लागत बढ़ती है तो उसका भुगतान राज्य सरकार को वहन करना होगा। बावजूद इसके आलम यह है कि मध्यप्रदेश में अभी तक इन विद्यालयों के निर्माण के लिए निर्माण एजेंसी का निर्धारण ही नहीं हो पाया है। इसके पीछे मुख्य वजह बताई जा रही है कि विभागीय मंत्री कुंवर विजय शाह और प्रमुख सचिव देवराज बिरदी में समन्वय का अभाव। पिछले सात महीने से लटकी इस बहुप्रतीक्षित योजना के निर्माण के लिए मंत्री ने अभी हाल ही में दस्तखत कर इस फाइल में मंडी बोर्ड को निर्माण करने को लिखा। लेकिन सूत्र बताते हैं कि मंडी बोर्ड ने यह कार्य करने से मना कर दिया है और फाइल प्रमुख सचिव के टेबल पर धूल खा रही है। उधर इस मामले में मंडी बोर्ड के आयुक्त अजातशत्रु श्रीवास्तव कहते हैं कि हमें एकलव्य विद्यालय बनाने का आदेश दिया गया था लेकिन हमने कार्य करने से मना कर दिया क्योंकि हमें मिले पिछले काम ही पूरे नहीं हो पा रहे हैं।

मंडी बोर्ड से एकलव्य विद्यालय बनवाने के पीछे विभागीय मंत्री की मंशा क्या है यह तो समझ से परे है लेकिन एक बात जरूर चर्चा का विषय बनी हुई है कि प्रदेश में पीडब्ल्यूडी जैसी निर्माण एजेंसी होने के बाद भी मंत्रीजी ने मंडी बोर्ड को निर्माण करने के लिए क्यों लिखा। प्रदेश में न तो मंडी बोर्ड का निर्माण कार्य का कोई बड़ा अनुभव है और न ही उसका प्रत्येक जिले में सेटअप है। जबकि पीडब्ल्यूडी की स्थापना इसी उद्देश्य से हुई है और उसका प्रदेशभर में अपना सेटअप है तथा उसके पास पर्याप्त अनुभव और इंजीनियर हैं। वैसे देखा जाए तो कुंवर विजय शाह हमेशा ही एक असंवेदनशील मंत्री के रूप में गिने जाते हैं। ऐसे में वे जिस भी विभाग में रहे हैं उस विभाग के प्रमुख सचिव उन्हें मार्गदर्शन करते रहे हैं, लेकिन यहां स्थिति बिल्कुल उसके उलट है। विभागीय प्रमुख सचिव देवराज बिरदी यह जानते हुए भी की आदिवासी एवं अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग के लोग सरकार की प्राथमिकता में सबसे ऊपर हैं और इस विभाग के मंत्री भी आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं सरकार और मंत्री की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहे हैं।

उधर कांग्रेसी नेताओं का आरोप है कि भाजपा नेता संघ के इशारे पर काम करते हैं और उनकी सोच है कि राहुल गांधी ने आदिवासी क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के ‘वनवासी कल्याण परिषद के स्कूलों का प्रभुत्व कम करने की नियत से यह रणनीति तैयार की है और उनके सुझाव पर केंद्रीय जनजाति कार्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘एकलव्य आवासीय विद्यालय खोलने की योजना बनाई है। यह आदिवासियों में सक्रिय आरएसएस संगठनों के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। इसलिए भाजपा कि सोच है कि इस योजना में जितना विलंब हो सके किया जाए।

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