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हृदयनारायण दीक्षित

दुख और सुख सामान्य संसारी अनुभव हैं लेकिन ‘दुख की संरचना का बोध’ सौभाग्यशाली अनुभूति है। यही बोध कपिल को हुआ था, दुख बोध से ही विश्वविख्यात् सांख्यदर्शन उगा। महात्मा बुध्द का नाम बोधिसत्व से बुद्ध हुआ, दुख संरचना के गहन बोध की बुध्द कथा सारी दुनिया जानती है। ऋषि कणाद का परमाणुवाद भी इसी बोध से उगा। शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन भी बादरायण के गहन बोध का विकास है। भारतीय चिन्तन में ‘दुख बोध’ की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन बोध और जानकारी में फर्क करना चाहिए। दुख की जानकारी सबको होती है लेकिन दुख का बोध विरलों को ही होता है। सामान्य जन कष्ट और दुख को एक समझते हैं लेकिन कष्ट शारीरिक होता है और दुख मनपरक होता है। मन पर आया दुख बुध्दि के तल पर समझ और तर्क का विषय बनता है। दुख के कारण की तलाश होती है। बुध्दि इसके वाह्य कारण खोजती है और दुख ‘परिस्थितियों की उपज’ मान लिया जाता है। मनुष्य विपरीत परिस्थितियों के निराकरण की इच्छा करता है। ढेर सारी आकांक्षाओं और इच्छाओं के जन्म का केन्द्र यही दुख ही होता है। इच्छा का अर्थ ही है कि हम स्वयं से संतुष्ट नहीं हैं, हमकों कुछ और की आवश्यकता है।

भारतीय चिन्तन का निष्कर्ष इच्छा समाप्ति है। ‘निष्काम कर्मयोग’ समस्त उपनिषद् साहित्य व गीता दर्शन का सार है लेकिन इच्छाएं समाप्त करना असंभव जैसी योग साधना है। इस काम में इच्छा समाप्ति की भी एक नई इच्छा का जन्म होता है। प्रत्येक इच्छा अपनी पूर्ति के लिए मन संकल्प से गुजरती है। गीता (6.24) में कहते हैं निरवाद रूप से संकल्प से उत्पन्न समस्त इच्छाओं को परित्याग करके और सब इन्द्रियों को सब ओर से मन द्वारा वश में करना चाहिए। (डॉ. राधाकृष्णन् का अनुवाद) यहां मन की खास भूमिका है। मन से इन्द्रियों को वश में करने का निर्देश है लेकिन मन अंतिम चरण नहीं है। आगे कहते हैं, धीरे-धीरे बुध्दि के द्वारा विश्वासपूर्वक मन को आत्मस्थ करना चाहिए। अन्य कुछ भी नहीं सोचना चाहिए – ‘न किचिंदपि चिन्तयेत’। (वही 6.25) मन के बाद बुध्दि की भूमिका है। फिर मन, बुध्दि को आत्मस्थ करने के निर्देश हैं लेकिन साथ में अन्य कुछ भी नहीं सोचने के निर्देश है। मनुष्य अपने चिन्तन का स्वामी नहीं होता। विचार आते है, दृश्य आते हैं, मन की परतों पर तरह-तरह की बातें चलती हैं इसलिए अन्य कुछ भी न सोचने का निश्चय क्रियान्वित करना आसान नहीं। मन चंचल है।

मन की क्षमता विराट है। गीता का मनः संस्कार ‘ऋग्वेद’ की परम्परा है। ‘ऋग्वेद’ (10.57.4) में श्रेय प्राप्ति के लिए मन का आह्वान है-‘आ तु एतु मनः’ मन बेशक चंचल है लेकिन सांस्कृतिक शक्तियां इसका संस्कार करती हैं। ‘ऋग्वेद’ में पूर्वजों (पितरों) से मन को ठीक दिशा में प्रेरित करने की स्तुति है- ‘पुनर्नः पितरो मनोददातु’। (वही 5) मन भागता है, पल में यहां अगले पल वहां, जहां, तहां, यहां। ‘ऋग्वेद’ (10.58) में संकल्प है, हम दिव्य लोक, भूलोक तक गए मन को वापिस लाते है, अस्थिर मन को दूरवर्ती प्रदेशों से वापस लौटाते हैं जो मन समुद्र या अंतरिक्ष या सूर्यलोक दूर से दूर दूरस्थ पर्वत, वन या अखिल विश्व में, भूत या भविष्य में गया है, उसे वापिस लाते है। ‘ऋग्वेद’ का यह सूक्त बहुत प्यारा है। यहां हरेक मंत्र के आखिर में एक तर्क या कारण जोड़ा गया है, यहीं, आपका जीवन है। स्व से दूर गया मन व्यर्थ है, स्व से जुड़ा मन ही जीवन का सौन्दर्य है। गीता (6.26) में श्रीकृष्ण कहते हैं -‘यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम्’ – चंचल, अस्थिर मन जहां-जहां भागता है, उसे वहां-वहां से वापिस लाकर स्व-स्थ (आत्मन्येवैव) लाना चाहिए। यहां ‘ऋग्वेद’ और गीता की शब्दावली एक जैसी है। आगे कहते हैं, प्रशांतमन, योगसाधक उत्तम सुख प्राप्त करता है और समस्त राग द्वेष रहित शांत आवेश होकर सम्पूर्णता के साथ एक हो जाता है। (गीता 6.27) डॉ. राधा कृष्णन् के अनुवाद में जो परमात्मा के साथ अपनी गुणात्मक एकता समझता है। यहां ब्रह्भूतम् का अनुवाद परमात्मा के साथ एकता किया है। लेकिन ब्रह्म का मूल अर्थ सम्पूर्णता ज्यादा सही प्रतीत होता है।

‘ऋग्वेद’ में दिक् काल की सम्पूर्णता का पर्याय अदिति या पुरूष है। उपनिषदों में यही सम्पूर्णता ब्रह्म कही गयी है। ब्रह्म सम्पूर्णता की ही प्रगाढ़ अनुभूति है। आगे के श्लोक (6.28) के अनुवाद में राधाकृष्णन कहते हैं, वह योगी जिसने सब पापों को दूर कर लिया है, आत्मा को सदा योग में लगाता हुआ सरलता से ब्रह्म के संस्पर्श से होने वाले परम् सुख का अनुभव करता है। यहां आत्मा को योग में लगाने का भाव है। मनुष्य के भीतर केर् कत्तापन या कार्य का परिणाम होता है। परिणाम कर्म बंधन में डालते हैं लेकिन गीताकार का मन्तव्य योगसिध्द की स्वानुभूति का आनंद बताना है कि ऐसा योगी ‘ब्रह्म संस्पर्श’ का अनुभव करता है। ब्रह्म संस्पर्श की अनुभूति स्वयं को सम्पूर्णता के साथ एकाकार पाना है। आगे के श्लोक (6.29) में यही बात बहुत प्यारे अंदाज में कही गयी है, तब सभी तत्वों में स्वयं का ही अनुभव होता है – ‘सर्वभूतस्थमात्मानं’। स्वयं के भीतर सभी तत्वों की अनुभूति होती है – ‘सर्वभूतानि चात्मनि’। ऐसा योगयुक्त समदर्शी हो जाता है और समत्व बोध में होता है – ‘सर्वत्र समदर्शनः’।

समूचा अस्तित्व एक इकाई है, वह एक है। वह सम्पूर्ण है। रूपों प्रतिरूपों में प्रकट यह संसार अस्तित्व का ही फैलाव है। लेकिन सम्पूर्णता एक है। यही ‘ऋग्वेद’ में कहा गया एकं सद् है। मनुष्य इसी अस्तित्व का एक लघुतम भाग है। योग इसी अनुभूति के दर्शन का विज्ञान है। तब सारे रूप अपने ही रूप हो जाते है। ज्ञानी सम्पूर्ण ज्ञान की उच्चतम दशा में समूचे अस्तित्व को स्वयं में और स्वयं को समूचे अस्तित्व में देखता है। ईशावास्यापनिषद् ‘यजुर्वेद’ का अंतिम भाग है, उपनिषद् के 6ठे मन्त्र की भाषा गीता के उक्त श्लोक (6.29) से मिलती जुलती है। उपनिषद् में कहते है -‘यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानु पश्यति/सर्वभूतेषु चात्मानं’- सभी भूतों तत्वों में स्वयं आत्म को और स्वयं में सभी भूतों को देखता है। उसे शोक नहीं होता। गीता में भी यही तथ्य दोहराया गया है – ‘सर्वभूत स्थमात्मानं सर्व भूतानि चात्मनि’। ब्रह्माण्ड विज्ञानी भी ‘कासमोस’ को एक सत्ता मान चुके हैं, सृष्टि के सभी जीवन उसी के हिस्से हैं। प्राचीन भारतीय ज्ञान, योग और आधुनिक विज्ञान के निष्कर्ष एक है। भक्ति का चरम बिन्दु भी यही है।

विज्ञान और भक्ति मार्ग इस संसार को दो हिस्सों में बांटकर चलते है। विज्ञान की दृष्टि में एक खोजी वैज्ञानिक और दूसरे खोज योग्य यह प्रकृति है। यहां वैज्ञानिक और प्रकृति का द्वन्द्व है। भक्त के लिए एक वह स्वयं और दूसरा परमात्मा है, यहां भक्त और परमात्मा का द्वैत है। गीता के अगले श्लोक (6.30) में इसी द्वैत को मिटाया गया है। श्रीकृष्ण ने योग समझाने के बाद कहा, जो मुझे सर्वत्र देखता है, सबमें मुझे ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह भी मेरे लिए अदृश्य नहीं होता। यहां भक्त का द्वैत भी जस का तस है लेकिन परम सत्ता, सम्पूर्णता के अद्वैत की स्थापना है। सत्य अविभाजित सत्ता है। दुख बोध बेचैनी लाता है। इसी बोध से सत्य बोध का मार्ग खुलता है। सत्य अव्याख्येय है, उसकी व्याख्या नहीं हो सकती। सत्य पदार्थ या द्रव्य नहीं है सो उसे देखा भी नहीं जा सकता। ‘कठोपनिषद्’ (1.2.23) व ‘मुण्डकोपनिषद्’ (3.2.3) में एक साथ आए एक आह्लादकारी मन्त्र में ऋषि ने बताया कि यह प्रवचन से नहीं जाना सकता, तीव्र बुध्दि से भी इसका अनुभव नहीं होता, सुनकर भी इसे नहीं पाया जा सकता। कठोपनिषद् के अगले मन्त्र में प्रीतिकर ढंग से कहते हैं असंयत इन्द्रिय वाले को वह नहीं मिलता। यानी बर्हिमुखी को भी सत्य की लब्धि नहीं होती। अशांत मन वाले को सूक्ष्म बुध्दि से भी सत्य नहीं मिलता-‘न अशान्त मानसो वापि प्रज्ञानेन अपि आप्ुयात्’। यहां इन्द्रिय संयम और प्रशान्त मन को सत्य उपलब्धि में सहायक बताते हैं। अशांतमन का परिणाम दुख है। अशांत मन से दुखी हुआ व्यक्तित्व अर्न्तयात्रा पर निकलता है और एकंसद् की प्रतीति में आनंदमगन हो जाता है।

* लेखक उत्तर प्रदेश विधान परिषद् सदस्य हैं।

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