लेखक परिचय

अर्पित बंसल

अर्पित बंसल

मूल रूप से उज्‍जैन (मध्‍यप्रदेश) के, वर्तमान में दिल्‍ली में निवास। विक्रम विश्‍वविद्यालय, उज्‍जैन से इलेक्‍ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग एवं मानव संसाधन प्रबंधन में स्‍नातकोत्तर शिक्षा। वर्तमान में टाटा कन्‍सलटेंसी सर्विसेस, गुड़गांव में प्रोजेक्‍ट मैनेजर के रूप में कार्यरत। साहित्यिक अभिरुचि, समाचार-पत्रों में संपादक के नाम पत्र एवं दो लघुकथाओं का प्रकाशन।

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अर्पित बंसल 

दिन भर के अथक परिश्रम व बाबुओं की आवाज पर भागदौड करने के बाद जैसे ही ननकू ने अपनी साइकिल उठाई पीछे से आती एक आवाज ने उसके कदम रोक दिये !

“अरे ननकू जरा रुकना”, कार्यालय के सबसे बड़े अधिकारी वर्मा जी उसे अपनी मृदु आवाज मे रुकने का इशारा कर रहे थे !

दो महीने पहले बाढ़ के कारण तबाह हुऐ गाव को छोड कर अंशकालिक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रुप मे नियुक्त ननकू का वर्मा जी से बातचीत का पहला मौका था ! इन दो महीनों मे ननकू उनके कमरे मे निरंतर चाय पहुचाता रहा था पर आज तक उसने साहब की आवाज नही सुनी थी !

बाबुओं के मुताबिक वर्मा जी बड़े नरमदिल और अच्छा व्यवहार करने वाले आदमी थे !

” जा रहे हो ” , जी ननकू ने जवाब दिया !

” अच्छा काम कर रहे हो ” ,बड़े बाबू बतला रहे थे !

” सुनो ऐसा करो कल सुबह सात बजे बंगले पर आ जाना ” !

यह सुनते ही ननकू सोच मे पड गया उसे एक एक करके रविवार के दिन किये जाने वाले काम जो वो काफी समय से टालता आ रहा था याद आने लगे !

साहब कल तो रवि- – आगे के शब्द मुँह मे ही अटक गये ननकू के !

हाँ पता है भाई कल रविवार है, इसलिये ही तुम्हारा थोड़ा समय चाहते है वो ऐसा है कि कल मेमसाब ने सत्यनारायण की कथा का आयोजन किया है तो तैयारी में तुम्हारा सहयोग हो जायेगा और हां तुम्हारी मेमसाब कहती है कि पूजा से ज्यादा पुण्य पुजा की तैयारी करवाने वाले को मिलता है ! वर्मा जी कह रहे थे !

” जी साहब पहुँच जाऊँगा , ननकू धीमी आवाज मे बोला !

” ठीक है भाई थोडा समय का ध्यान रखना और किसी से पता पुछ लेना, वर्मा जी आश्वस्‍त होते हुऐ बोले !

सुबह ठीक सात बजे ननकू बंगले पर पहुच गया , बाहर ही बने बड़े से मंदिर की साफ-सफाई और धुलाइ करते करते ननकू को 9 बज गये पडित जी अभी तक नही आये थे इस बीच ननकू को एक कप चाय नसीब हुई थी वो भी कोई नौकरानी उसे पकड़ा गई थी, घर के तो किसी सदस्य का उसकी तरफ ध्यान तक नही गया था !

10 बजे बाद कही पंडित जी आये मंदिर की सज्जा मे कुछ परिवर्तन के आदेश के साथ ननकू को फिर काम मे जुटना पड़ा ! पूजा कथा और हवन होते होते दिन चढ चुका था ! अब ब्राम्हण भोज और फिर घर परिवार के भोजन की तैयारी थी !

इधर ननकू भूख से कुलबुला रहा था और उसे रह रह कर दिनो के बुखार मे तडपती अपनी बेटी का चेहरा याद आ रहा था उसने सोचा था कि रविवार के दिन जा के पास के सरकारी हस्पताल से उसे दवाई दिला लायेगा !

पत्नी से दो घंटे का कह कर निकला ननकू अभी तक यहीं फंसा हुआ था !

और इधर पूजा मे ब्राम्हण भोज के पश्चात आशीर्वाद स्वरुप हर जगह पुण्य ही पुण्य बरस रहा था !

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